श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  730226BG-JAKARTA_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 2.12
जकार्ता, 26-फरवरी-1973
 
 
 
नवा जात ने जना न भविष्य सर्वे भयं। परम भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को समझा रहे हैं कि "ना अहम" - मैं भगवान, "ना जा" - ऐसी बात नहीं है कि पहले मैं नहीं था। No, ऐसी आप भी, अर्जुन, आप भी पहले थे, मैं भी पहले था, नेमी जनापा। और ऐसी बात नहीं है कि जिसने राजा और सिपाही लड़ाई में सब आए हैं, ये भी नहीं। कहने का मतलब कि मैं भगवान और आप और इतने जितने राजा और सिपाही सब इधर आए हैं, सब पहले हम लोग जैसे अभी हैं, ऐसे ही... ऐसे नहीं शून्य। न भविष्य सर्वे परम और ये भी बात नहीं है कि आगे जाकर के भविष्यत में आप भी नहीं रहेंगे, मैं भी नहीं रहेंगे और ये जितने राजा लोग इधर आए हैं ये भी नहीं रह जाएंगे, सब शून्य हो जाएगा।

ये जो मायावादी, शून्यवादी जो कि समझते हैं हम लोग सब शून्य से पैदा हुए और आगे जाकर के सब शून्य हो जाएंगे। "अत: जब तक ये शरीर है खूब मजा करो।" ये शून्यवादी का विचार - पहले तो शून्य था और किसी तरह से ये शरीर हमको मिल गया है, इंद्रिय तो अष्ट के इस भोग लो, beg, borrow, steal, किसी तरह से पैसा ले आओ और मजा करो, पहले शून्य था आगे जाके भी शून्य हो जाएंगे। ये पाप-पुण्य का विचार क्या जरूरत? ये सब मूर्ख लोग करेंगे। हम लोग बड़े विद्वान हैं।

बात यह नहीं है। भगवान स्वयं कृष्ण कहते हैं। मैं कह दूँ कोई बात तो आप उसको टाल सकते हैं। बाकी जब भगवान कहते हैं, उधर कहते हैं "भगवानुवाच", स्वयं भगवान कहते हैं, उसको आप कैसे टाल सकते हैं? वो मूर्ख होता है। आजकल भगवान बहुत होता है। भगवान का अर्थ समझना चाहिए। कौन भगवान? शास्त्र में भगवान किसको कहा जाता है? उसको बताया: पराश समग्र बीज जस ज्ञान वैराग स भ। ये छह प्रकार का ऐश्वर्य संपूर्णतया जिसके पास है, वो... वो कौन है? Etc. समग्रस्य। जैसा आप लोग, हम लोग जितने इधर बैठे हैं, किसी के पास लाख रुपया है, किसी के पास 10 लाख है, किसी के पास करोड़ है और किसी के पास और ज्यादा है, समझ लीजिए कम भी है, तो कोई भी बोल नहीं सकता है कि "हमारे पास सब धन है।" ऐसा कोई व्यक्ति इधर मौजूद है? नहीं, कोई नहीं है। हमारा कुछ कम है, आपका कुछ ज्यादा है और किसी का और कुछ ज्यादा है, तो कम है, कम-ज्यादा है, एक तरफ से भी कुछ नहीं है। और कोई भी बोल नहीं सकता जो "हमारे पास जितना धन है, इससे बढ़कर और किसी के पास है।" ये संभव नहीं।

बाकी भगवान कौन हो सकता है? जिसके पास इतना धन है जो और किसी के पास इतना धन नहीं, वो भगवान। तो भगवान का अर्थ अगर समझना है, ये छह चीज संपूर्णता जिसके पास है, यानी सब धन जिसके पास है। और समग्र वीर्य, वीर्य का अर्थ है शक्ति, सर्वशक्तिमान। हमारे पास, आपके पास कुछ शक्तियां हैं, बाकी आप कह नहीं सकते हैं, कोई भी नहीं कह सकता... तो भगवान को विचार करना चाहिए। यदि भगवान को हमको आश्रय करना चाहता है, तो ऐसा भगवान ढूँढिए जो कि संपूर्ण ऐश्वर्य का मालिक है, संपूर्ण वीर्य जो बल का मालिक है, संपूर्ण ज्ञान जिसके पास है, संपूर्ण श्री, ये सुंदरता जिसके पास है, वो... ऐसे भगवान को ग्रहण कीजिए। फालतू भगवान को ग्रहण करने से क्या लाभ होगा? हम लोग जो हैं कि फालतू भगवान के पीछे थोड़ा सा सोना बनाएंगे और भगवान हो गया। हम तो देखेंगे जो सब सोना जितना दुनिया में है, उनका मालिक जो है, वो भगवान। एक अंगूठी बना दिया, भगवान हो गया, इतना सस्ता भगवान हम लोग नहीं मानते। जितना सोना का खान है, एक नहीं, ये तो एक धरित्री है, ये तो एक मामूली एक धरती, एक ब्रह्मांड में अनंत कोटि धरित्री हैं।

जब प्रभा प्रतो जगदंड कोटि कोटिष वसुधा विभूति भिन्न तब गोविंद पुरुष भजा। हम लोग उस गोविंद का भजन करते हैं जो कि "यस्य प्रभा प्रभवतो", जिनके शरीर से प्रभा छूटती है। जैसे सूर्य लोक से प्रभा छूटती है और वो प्रभा के अंदर में, सूर्य किरण के अंदर में अनंत-अनंत कोटि आपका ये लोक है। आप लोग देख रहे हैं, ये सूर्य किरण के अंदर में एक पृथ्वी नहीं, अनेक अनंत कोटि सब घूम रहा है। ये scientific है, वैज्ञानिक। ये सूर्य का तेज में, वो गर्मी में सब घूमता है। और जगह में बताया है सूर्य के विषय में: सूर्य सताना राजा समस्त जया भल चक्रो गोविंद तजा। ये जो सूर्य है, ये सब ग्रह-नक्षत्र का आँख का स्वरूप है, क्योंकि बिना सूर्य किरण आप लोग कोई देख नहीं सकता। खाली ये पृथ्वी में नहीं, अनंत कोटि जो धरित्री है, तो आकाश में वो झूल रहा है, भास रहा है, ये सब में जब तक सूर्य किरण नहीं होता है, हमारा आँख रहते हुए भी हम नहीं देख सकते।

हम लोग आँख का बड़ा गर्व करते हैं कि "हमारे पास आँख है, हम देख लेंगे और भगवान को दिखा सकते हैं।" आपके आँख की क्या कीमत है? अभी बत्ती बुझ जाए तो आँख की कीमत सब हट जाए। हो गया। बताओ ये आँख की क्या कीमत? हाँ। भगवान को देखने के लिए इस आँख से काम नहीं चलेगा। हाँ, वो और आँख चाहिए। वो आँख क्या चीज है? प्रेम भक्ति विलोचने शदो यम श्याम सुंदर स्वरूपम गोविंदम आद पुरुषम त। जो प्रेमजन... यही आँख, जो आँख में अभी भगवान को मैं देख नहीं सकता, यही आँख में भगवान को हमको देखने को मिलेगा। कब मिलेगा? जब इस आँख में, जैसा हम लोग अंजन लगाते हैं, इसी प्रकार भगवत-प्रेम रूप अंजन जब लगाएंगे, तब जाकर के यहाँ से भगवान को देखने को मिलेगा। भगवान को देखने में कोई मुश्किल नहीं है, खाली आँख होना चाहिए। अब आँख बनाना चाहिए। हाँ, चैतन्य चरितामृत में ऐसे कहते हैं कि: सा जंगम देखे ना देखे तार मूर्ति सकल सर्वत्र इष्ट देव मूर्ति।

जब हम आँख बना लेंगे, "प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन", भक्ति के द्वारा जब प्रेम रूप अंजन से आँख को हम साफ कर लेंगे, हाँ, तब भगवान का हमारा दर्शन होगा। किस प्रकार दर्शन होगा? तो दुनिया में आप जो कुछ देख रहे हैं, हाँ, वो चीज नहीं देखेंगे, सब जगह में भगवान ही... सब जगह जैसा कोई पेड़ है सामने, जो भक्त है वो पेड़ नहीं देखता है, वो देखता है जो हमारा भगवान। एक फूल देखेगा, वो फूल में भगवान, कोई भी चीज देखेगा, क्योंकि उसका स्मरण होता है ना। जैसे आपका कोई बच्चा है और बड़ा प्रेम है उसमें, आपको बहुत प्रेम है, तो कभी उसका जूता भी देख लेते हैं, बच्चा नहीं है तो बच्चे के लिए आप रोते हैं, "देखो जी, हमारा बच्चा है, हाँ, अभी घर में नहीं है, ये उसका जूता है।" जूता देख के आप जूता नहीं देखते, उस बच्चे को देखते हैं, क्योंकि प्रेम है। ऐसा होता है कि नहीं? तो इसी प्रकार जब भगवत-प्रेम हो जाएगा, सब चीज में आप भगवान... ये भगवान को देखने के लिए रास्ता है, ये नहीं है मैजिक दिखा दिया भगवान।

जो संत होते हैं, जो वास्तविक भगवान को देखने के लिए योग्य हैं, वो तो सब समय भगवान को देखते हैं। ये नहीं कि अभी भगवान देखा और अभी नहीं, सब समय। बड़े योगी जो होते हैं, वो भी भगवान को देखते हैं: धना अवस्थित मनसा पि जगनांद रुद्र दिवंग पद उपनिषद गायती जग साना मनसा प जो ज श्याम नुसवा। ये भगवान दर्शन करने के लिए ये सब पद्धति है।

हाँ, भगवान हैं, इसीलिए भगवान कहते हैं जो ऐसी बात नहीं है कि मैं पहले नहीं था। ये मूर्ख लोग कहते हैं जो भगवान निराकार हैं, अभी एक शरीर धारण करके हमारे सामने आए। तो भगवान ये नहीं कहते। भगवान तो नहीं कहते। भगवान कहते हैं ऐसी बात नहीं है जब मैं पहले नहीं था। भगवान कहाँ कहते हैं? ये मूर्ख लोग का प्रवचन है कि जब भगवान पहले नहीं था, अभी भगवान एक रूप धारण करके, जैसा रूप मैं चाहता हूँ ऐसा रूप एक धारण करके आए। यह जो दार्शनिक विचार है, यह मूर्खता है। भगवान नहीं... तो भगवान का विषय समझने के लिए भगवान से ही पता चलेगा। आप कोई सोच-साझ करके एक भगवान खड़ा कर लेंगे, वो भगवान नहीं। भगवान इतना सस्ता चीज नहीं। भगवान... हाँ, जैसे कोई बड़ा आदमी है, समझ लीजिए आप कहीं नौकरी करते हैं, आपका मालिक जो है बहुत भारी आदमी है, तो आप सोचते रहेंगे कि "हमारा जो मालिक है, उनका पास इतना रुपया जरूर होगा, एक करोड़ तो जरूर।" कोई बोलता है, "नहीं जी, 10 करोड़।" कोई बोलता है, "नहीं-नहीं, 20 करोड़।" ऐसा सोचते जाइए, उसमें ठीक पता नहीं चलेगा वास्तविक मालिक के पास कितना करोड़ रुपया है। वो मालिक अगर संतुष्ट करके आप उनको पूछें, "हुजूर, हम लोग ऐसे सोचते हैं, वास्तविक आपके पास कितना रुपया है, ये हम लोग जानने को चाहते हैं।" वो अगर कह दे, "बेटा, हमारे पास 20 करोड़ है।" बस हो गया काम। आपको सोचने से, जीवन भर सोचते रहिए, आपको पता नहीं ठीक चला। बाकी वो मालिक अगर एक दफा कह देता है, "देखो जी, हमारा..." तो हो गया काम।

इसलिए शास्त्र में बताते हैं: भगवत-तत्त्व क्या चीज है, वो यदि जन्म-जन्मांतर हम लोग सोचते हैं, तो वो सोचने से भगवान का पता नहीं चलता। बाकी भगवान की जो कृपा प्राप्त किया, जैसे वही उदाहरण, एक बड़ा आदमी है, मैं तो जन्म भर सोचता हूँ कि उसका क्या कीमत है, कितना रुपया है, हमको पता नहीं चलता। बाकी उनका एक personal servant है, वो जानता है। वो अगर कह दे, "देखो जी, मालिक के पास इतना रुपया है।" ठीक पता चल गया। ये भगवान कह दें तो और भी ठीक है। इसी प्रकार भगवान को पता चलेगा भगवान के भक्त के जरिए से। ये तो भगवान... हाँ, नहीं तो भगवान पता नहीं। भगवान को सस्ता ना बना लीजिए। भगवान, भगवान का परिचय शास्त्र से देखिए। जैसे भगवान कृष्ण कहते हैं कि: मत पर ना कि धनंज अहम सर्वस प्रते से इति मत्या भजती मा बधा भाव समिता।

भगवान साफ वेदांत सूत्र में कहते हैं, भगवान कौन हैं? भगवान के विषय में पूछताछ करना ही मनुष्य जीवन का काम है। ये जो हम लोग बाजार में जाते हैं, "इसका क्या भाव है?" ये सब पूछते हैं, ये नहीं, ऐसा पूछना नहीं। "भगवान क्या चीज है?" हाँ, ये पूछना जो है, यही मनुष्य जीवन का काम है। और "इसका क्या भाव है? इसका क्या भाव है? वो क्या चीज है? वो क्या चीज है?" ये... ये तो आहार-निद्रा-भय-मैथुन, खाने-पीने के, सोने के लिए व्यावहारिक शरीर पालन कर लीजिए, ये सब करना पड़ता। बाकी असल जो काम हमारे पास है, वो भगवान के विषय में पूछना, जो कि कुत्ता-भेड़ी नहीं कर सकता। कुत्ता-भेड़ी से ये प्रश्न नहीं हो सकता है कि "भगवान क्या चीज है?" कुत्ता-भेड़ी का यही प्रश्न होता है, "किधर खाएंगे? क्या सोएंगे? कैसा स्त्री मिलेगा? कैसे अपने को बचाएंगे?" ये कुत्ता-भेड़ी का प्रश्न है। "आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।" क्या खाएंगे, क्या सोएंगे, कैसे गृहस्थ का पालन करेंगे, कैसे बचाएंगे अपने को, यह जो सब प्रश्न है, यह पशु का भी है। पशु भी सोचता है किस तरह से खाएंगे, किधर सोएंगे, कितना औरत मिलेगा, कितना हमको बचाएंगे। ये प्रश्न जो है, ये मनुष्य का भी है और पशु का भी। बाकी और जो प्रश्न है, "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" वेदांत सूत्र में, वो मनुष्य के लिए है। कुत्ता-भेड़ी ये प्रश्न नहीं कर सकता है कि "भाई, भगवान क्या चीज है? हम लोग क्या हैं? भगवान से हमारा क्या संबंध है? हम लोग क्यों इधर आए हैं? किधर से आए हैं? किधर जाना है?" ये सब प्रश्न मनुष्य के लिए है। इसलिए शास्त्र बताते हैं, "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा"। और भी कहते हैं: आत्म-तत्त्व... ये आत्म-तत्त्व, भगवान क्या चीज हैं, मैं क्या चीज हूँ, भगवान से हमारा क्या संबंध है, क्यों हम इतना... हम तो ये दुख नहीं चाहते हैं, क्यों हमारे ऊपर दुख चढ़ाया जाता है, कौन चढ़ाता है, कैसा है? कोई दुख नहीं चाहता है।

सनातन गोस्वामी ने पूछा था चैतन्य महाप्रभु से। चैतन्य महाप्रभु के पास सब मिनिस्टर थे, सब छोड़-छाड़ कर के जब चैतन्य महाप्रभु के साथ में रहने का विचार कर लिया, तो बनारस में चैतन्य महाप्रभु को मिलने को गया। यानी घर छोड़ कर के अब उनका शिष्य बनने के लिए गया, "उनको आप शिष्य बना लीजिए, हमको बचाइए।" तो मिनिस्टर तो यही प्रश्न उनको पूछा था, "महाराज, हमको तो ये ग्राम्य व्यवहार में बड़ा भारी पंडित जी कहते हैं।" वो सारस्वत ब्राह्मण थे, बाकी वो मुसलमान का नौकरी कर लिया था, इसलिए उसको ब्राह्मण समाज, अपने समाज से बाहर कर दिया था। पहले ब्राह्मण समाज बड़ा कट्टर था, कोई भी नौकरी कर ले, विशेष करके कहीं मुसलमान का नौकरी कर ले, तो फिर समाज से उसको निकाल दिया जाता था। इसी प्रकार ये सनातन गोस्वामी, ये ब्राह्मण का धर्म, उसका जन्म हुआ था, बाकी मुसलमान का नौकरी लेने के कारण उसका नाम हो गया था साकर मलिक, मुसलमान नाम। फिर चैतन्य महाप्रभु के पास आने से उनको गोस्वामी बनाया, सनातन गोस्वामी।

ये सनातन गोस्वामी जब चैतन्य महाप्रभु के पास पहुँचा, उनको यही प्रश्न किया था, "महाराज, ये लोग सब हमको पंडित कहते हैं।" हाँ, वो पंडित, बहुत संस्कृत बहुत अच्छी तरह से जानते थे और उस समय फारसी, उर्दू वो भी जानना पड़ता था government service में, वो भी अच्छी तरह से जानते थे, मूर्ख नहीं था, पंडित ही था वो। फिर भी कहते हैं कि "महाराज, ये लोग हमको पंडित कहते हैं, बाकी हम कैसी पंडित हैं, ये थोड़ा आप समझ लीजिए, क्योंकि मैं अपने... मैं कौन हूँ, यही नहीं जानता। मैं ऐसी पंडित हूँ। हम तो पंडिताई खूब करते हैं, सबको समझाते हैं, और जब प्रश्न करते हैं कि 'मैं कौन हूँ', उसका जवाब हमारे पास नहीं है। और समझ लिया मैं कैसे पंडित हूँ, मूर्ख हूँ।" तो यही चलता है, है तो मूर्ख बाकी चलता है पंडित के नाम से। यही आजकल की दुनिया है। किसी को पूछा जाए कि "आप कौन हैं?" वो बोलेगा, "हम यही हैं, Mr. Such-and-such, हम American हैं, भारतीय हैं, हम ब्राह्मण हैं, हम क्षत्रिय हैं, और मैं सादा हूँ, काला हूँ।" यही सब बताएगा। कोई बताएगा नहीं कि "हम ये शरीर नहीं हैं, हम शरीर छोड़ कर के... हम आत्मा हैं, अहम् ब्रह्मास्मि।" कोई नहीं बताएगा। तो समझ लीजिए सब मूर्ख हैं कि नहीं? अपने को ही जानता नहीं और सब पंडित! ऐसा पंडित से क्या काम होगा जो अपने को ही जानता नहीं? हाँ, इसलिए असल पंडित के पास जाना चाहिए, अपने को समझने के लिए।

जैसा अर्जुन, वो अपने को नहीं समझ सकता। वो कृष्ण कहे, "तुम लड़ाई करो।" वो समझता है क्या, "हमारा उधर में जो क्या नाम, grandpa है, दादा जी हैं, और भीष्म जी हैं, द्रोण जी हैं, और हमारा भाई है, वो दुर्योधन है, और हमारा गुरु है उधर द्रोणाचार्य जो हैं..." ये सब सोच-समझ करके वो यही विचार सिद्धांत कर लिया, "कृष्णा, मैं तो ये युद्ध नहीं, लड़ाई नहीं करूँगा।" ये सब आदमी को हमारा... जो इसका मतलब क्या है? ये शरीर से जो संपर्क है, वो शरीर संपर्क से वो अपने को समझता है कि ये सब हमारा शरीर के साथ उनका संपर्क है। इसको किस तरह से... बाकी वो जानते नहीं, "शरीर ही मैं नहीं।" थोड़ा समझिए, जब हमारा मूल भित्ति जो है ज्ञान की, वही... वही ठीक नहीं है, फिर शरीर से हमारा जिसका संपर्क है, उसको हम समझते हैं जो "ये हमारा पिता है, ये हमारा भाई है, ये हमारा स्त्री है।" शरीर का संपर्क है, वो कैसे ठीक होगा जब तुम शरीर ही नहीं हो? ये... ये ज्ञान देने के लिए जो भगवान अर्जुन को समझाए, यही असल ज्ञान है। पहले समझना कि "मैं ये शरीर नहीं।" दुनिया में जितना झगड़ा चलता है, वो सब समझता है "मैं ये शरीर।" ये जो भ्रमात्मक देहात्म-बुद्धि, जिसको देहात्म-बुद्धि है, उसको शास्त्र में कहते हैं गधा।

जिसका ये ज्ञान है, ये जो शरीर यही मैं, आँख बुद्धि, ये साढ़े तीन धातु... ये जो शरीर क्या चीज है? ये तीन धातु का बनाया हुआ है। हमारे आयुर्वेदिक शास्त्र में कहते हैं कफ, पित्त, वायु - ये तीन धातु। और अंग्रेजी medical science में कहते हैं body... ये शरीर जो है, ये... ये शास्त्र भी कहते हैं सात धातु हैं। कोई कहते हैं सात धातु हैं, जैसा यह चमड़ा है, फिर muscle है, फिर bone है, फिर marrow है, फिर खून है और... और बहुत सी चीजें हैं, मैला भी है, मूत्र भी है और ये सब चीज लेकर के यह शरीर बनाया हुआ है। तो इस प्रकार यह सब धातु से बनाया हुआ जो शरीर है, वो शरीर को समझता है जो "मैं हूँ", वो गधा। ये शरीर से ऐसा एक जीव हम लोग बना सकते हैं? खून तो बहुत मिल सकता है, हाँ, slaughterhouse में खून ले आओ, और हड्डी भी मिलेगा, और चमड़ा भी मिलेगा, और गू भी मिलेगा, मूत भी मिलेगा, ये सब मिला-मिला करके एक शरीर बनाओ और अगर अच्छा गुर्देदार, अच्छा दिमाग वाला कोई scientist बना दे, तभी तो हम समझेंगे आप लोग science में बड़ा उन्नति किया। माल तो सब मौजूद है, ये सब माल लेकर के एक बड़ा आदमी बनाओ, गांधी, महात्मा गांधी को बना लो, तब तो हम समझेंगे। आप लोग कुछ science में नहीं, यही मूर्खता है। ये वास्तविक गू और खून और चमड़ा और हड्डी, यही है।

अत: इसका भीतर जो है: दे तथा देहंत प्राप्ति धी। ये शरीर के अंदर में जो आत्मा है, जीवात्मा, उसको समझिए, उसका नाम है ब्रह्म-ज्ञान। इसको समझिए। ये जब तक हम लोग नहीं समझते हैं... और आत्मा को यदि हम समझ गए, तो भगवान को भी समझ गए, क्योंकि भगवान का अंश है। मम जीव... भगवान खुद कहते हैं, "जीवात्मा जो है, ये हमारा अंश है।" यदि हम लोग अंश को समझ जाएं, जैसे सोना का टुकड़ा है, सोना का टुकड़ा को हम समझ जाएं, तो सोना का खान क्या है, वो भी समझ जाएं। ये one drop of sea water, एक बूंद समुद्र का पानी, उसमें क्या-क्या चीज है, analysis करके हम लोग देखें, तो समुद्र में क्या चीज है, सब समझ गए। ये बुद्धिमान का... जैसा बड़े-बड़े chemist लोग, थोड़ा सा नमूना दे दीजिए कोई चीज का, वो analysis करके बता देंगे भाई ये चीज ऐसी चीज है। इसी प्रकार आत्म-ज्ञान, ये जो जीवात्मा है, ये जीवात्मा को यदि हम लोग ठीक-ठीक, ठीक-ठीक समझ जाएं, तो फिर भगवान को भी समझ जाएं। तो जीवात्मा को समझें, शरीर तो मैं नहीं हूँ, यही समझना चाहिए।

और शास्त्र में कहते हैं जो भगवान, ये हमारा ऐसे शरीर नहीं है। भगवान को जहाँ निराकार बताया गया है, उसका कहने का मतलब है जो हमारा ऐसा आकार नहीं। जैसे कहते हैं जो भगवान चलता-फिरता नहीं, उसका हाथ-पैर है नहीं, बाकी जो कुछ आप देते हैं जग में, वो सब भगवान हाथ से उठा लेते हैं। और जैसे भगवान भगवत गीता में कहते हैं: पत्रम पुष्पम फलम तो प्रदानी तक्तम तो। भक्ति से हमको जो पत्र, पुष्प भी देता है... तो भगवान तो भूखा हैं नहीं हमारे, तो भगवान जो कहते हैं जो "हमको खाने को दो", भूखा नहीं हैं, तो हमको सिखाते हैं कि "तुम भगवान का चीज सब खाते हो, एक दफा भगवान को देने से तुम्हारा क्या लगता है?" जो चीज हम लोग सब खाते हैं, ये तो सब भगवान का दिया हुआ है। एक को जो बहुना... ये फल, फूल, अनाज जो कुछ हम लोग खाते हैं, अगर भगवान नहीं देता है, तो हमको कहाँ से मिल सकेगा? ये factory में हम सुबह ही बनाएं?

तो जो वास्तविक भगवत-भक्त होता है, वो समझते हैं जो भगवान इतना चीज हमको खाने को दिया है। कैसा प्रेम से! एक बच्चा है, कोई चीज एक lozenges खाता है और उसमें से एक lozenge पिताजी को देता है, "पिताजी, खाइए, ये बहुत सुंदर है।" तो पिताजी बहुत खुश होते हैं, "बेटा, जाओ तुम खाओ।" तो भगवान का कुछ अभाव नहीं है, भगवान के पास सब चीज है, भगवान की चीज हम लोग खाते हैं। यदि भक्ति से भगवान को... ज्यादा नहीं, रुचि-पूरी भगवान नहीं खाते। भगवान... और दूसरे देवी-देवता की आप पूजा कीजिए, तो बहुत आपको सब संग्रह करना पड़ेगा, ये चीज चाहिए, ये यज्ञ करिए तो इतना घी चाहिए, इतना लकड़ी चाहिए, इतना अन्न चाहिए। भगवत-भजन करने के लिए कुछ नहीं चाहिए, केवल प्रेम चाहिए। भगवान कहते हैं, "पत्रम पुष्पम फलम तो प्रदानी तक्तम तो..." असल चीज है भक्ति। पत्र-पुष्प में भगवान का क्या होगा? भगवान के तो राज्य में अनेक प्रकार के पत्र-पुष्प हैं, तो भगवान बनाते हैं, भगवान क्या खा नहीं सकते? सब खा सकते हैं, सब कुछ कर सकते हैं। बाकी असल चीज क्या है? जो... जो में भक्त प्रच्छति - भक्ति से जो मुझको देता है, तो असल चीज भक्ति है।

तो भगवान को देखने के लिए, भगवान को प्राप्त करने के लिए, भगवान को खुशी करने के लिए एक ही मात्र उपाय है, वो भक्ति और कुछ नहीं। भक्त जाना जा त... भगवान खुद कहते हैं, "केवल भक्ति द्वारा हमको समझ पाएंगे।" कहीं भगवान ने बताया है कि ज्ञान से भगवान को समझ पाएंगे, और कर्म से भगवान को समझ पाएंगे, योग से भगवान को समझ पाएंगे? नहीं, भगवान कहते हैं: भ्या जाना जाम त... In true, if you want to know what is God, यदि ये आपकी इच्छा है, तत्त्वतः भगवान को समझना। और साधारण समझना, उसमें बहुत फर्क है। कोई अगर समझ लिया, "हाँ, कृष्णा हैं कि आए थे एक दफे और मथुरा में जन्म लिया था।" ये एक समझना है, और वास्तविक भगवान क्या चीज हैं, उसको समझना है। क्योंकि हम लोग भगवान को ठीक-ठीक नहीं समझते हैं, इसलिए कोई भी आके खड़ा हो गया, "मैं भगवान", उसको मान लेते हैं, तो जानते नहीं तत्त्वतः भगवान क्या हैं। इसलिए भगवान कहते हैं: मनुष्य नाम सहित ज सिद्ध है जता सिद्ध नाम कन व्यक्तित।

तत्त्वतः समझना, वास्तविक भगवान चाहिए, ऐसे ऊपर-ऊपर में समझने से ये सब धूर्त, चोर लोग का... हम लोगों को सब ठगा के भगवान बन जाएगा। तत्त्वतः समझना, वो तत्त्वतः समझना साधारण बात नहीं है। करोड़ों व्यक्ति में... इतना आप देखिएगा, जितने हैं, आप पूछिए, "आप क्या लाभ करने के लिए आप इतना परिश्रम करते हैं?" Google का रुपया और ये minister और president, कोई बोलेगा नहीं जो "हम सिद्धि लाभ करने के लिए इतना परिश्रम कर रहे हैं।" कोई नहीं बोलेगा, कोई बोलेगा, "जानते ही नहीं क्या सिद्धि है।" सब कोई कहेगा, "हमको चाहिए रुपया, हमको चाहिए ministership, हमको चाहिए president, हमको चाहिए ये चाहिए, वो चाहिए, वो चाहिए।" अनेक प्रकार। भगवान कहता है जो करोड़ों कोई व्यक्ति सिद्धि लाभ के लिए प्रयास कर रहा है, "मनुष्य नाम सहित ज सिद्ध है..." उसी सिद्धि क्या चीज है? वो सिद्धि है ब्रह्म-ज्ञान, "मैं यह शरीर नहीं हूँ।" This is called सिद्धि। "मनुष्य नाम सहित ज सिद्ध है..." वो सिद्धि लाभ जो किए हुए हैं, ऐसे हजारों व्यक्ति में शायद कोई कृष्ण को समझ सकता है, भगवान को। कठिन है, बहुत-बहुत कठिन।

इसलिए भगवान कहते हैं, ये जो कठिनता है, भगवान को समझ लीजिए, इसका एक ही मात्र उपाय है: भ्या जाना जाम त... वही तत्त्वतः। यदि भगवान को आप तत्त्वतः समझने के साथी हैं, ये भक्ति, भगवत-भक्ति को ग्रहण करने का। और भगवत-भक्ति क्या चीज है? श्रवण कीर्तन विष्णु स्मरण पाद सेवनम अर्चन वंदन दास्यम सखम आत्म निवेदन। ये नौ प्रकार की पद्धति है। पहली पद्धति है श्रवणम्। केवल भगवान के विषय में सुनिए। "हठात् भगवान को देख लिया, भगवान को समझ लिया", ये सिद्धांत ना कीजिए, सुनिए। इसलिए भगवान सुनाने के लिए खुद कह रहे हैं कि क्या है ये भगवत गीता। भगवत गीता कुछ नहीं है, भगवान खुद अपने को समझा रहे हैं।

तो ये समझाना, एक श्लोक जो प्रस्तुत किया है, भगवान कहते हैं ऐसी बात नहीं है जो आप, अर्जुन, आप और मैं और जितने इधर सब उपस्थित हैं, ये जो पहले नहीं थे, ये बात नहीं। और अभी सब मौजूद हैं, ये तो हम लोग देख रहे हैं। और आगे जाकर के हम शून्य हो जाएंगे, ये भी चीज नहीं। आगे जाके भी हम लोग सब रहेंगे और पहले भी थे और अभी तो हैं ही, देख रहे हैं। ये जीवन की समस्या है जो पहले मैं क्या था, अभी क्या हूँ और आगे जाके मैं क्या बन जाऊँगा, ये जीवन की समस्या है। क्योंकि हमारा जो जीवन है, तो भगवान का ये सभी अंश हैं, जीव मात्र। तो पहले मैं क्या पेड़ था कि गधा था कि सूअर था कि देवता था? और अभी तो मनुष्य हुआ, और आगे जाकर के मैं क्या हो जाऊँगा? ये है... तो जीव तो अनेक प्रकार के हैं, अनेक प्रकार... 84 लाख योनि हैं, तो हमको आगे जाकर के क्या योनि मिलेगा, और पहले मैं क्या योनि में था, और अभी क्या योनि में हूँ, ये सब विचार करना चाहिए। ऐसे गधा की तरह, "अभी तो हमको मनुष्य शरीर मिला है, बहुत सारा रुपया मिला है, मजा करो, फिर मर जाएं क्या हो जाएगा?" जैसा क्या नाम, चार्वाक मुनि कहते हैं: वस देस पुनराम। ये नास्तिक हैं। नास्तिक लोग कहते हैं जो "ऋण..." हाँ, तो भीख खाओ। "हमारे पास तो पैसा है नहीं।" तो ऋण, उधार लो। ऋणत्या भी घी - तो हम लोग जानते हैं घी रहने से बहुत मोटा हम लोग होते हैं, तो अगर पैसा नहीं है, English में बोलता है, "beg, borrow, steal", भीख मांगो, नहीं तो चोरी करो, नहीं तो उधार लो। "पैसा है नहीं तो किसी से ले लो, फिर देखा जाएगा।" "भाई, उधार लेते हैं, नहीं देंगे तो पाप होगा, फिर तो हमको मुश्किल होगा।" तो उसका जवाब में: भूतस देहस पुनरा मन - अरे, तो मर जावे, शरीर जला देगा, कौन आता है, कौन पाप? ये सब चलता है। ये सब नास्तिक आज नहीं हैं, वो पहले भी थे। बाकी ऐसे जीवन करने से मनुष्य जीवन बर्बाद हो जाता है।

सुनना चाहिए, क्योंकि भगवत-तत्त्व ज्ञान ही मनुष्य जीवन का एकमात्र ध्येय वस्तु है, यही पूछना चाहिए। इसलिए शास्त्र में कहते हैं कि जब तक जिज्ञासा नहीं करे, जैसे सनातन गोस्वामी किया था कि "मैं कौन हूँ?" इस प्रकार ये प्रश्न होना चाहिए और अच्छी तरह से समझना चाहिए। और उसको समझाने के लिए भगवान खुद ही मौजूद हैं, भगवत गीता में सब कुछ बताए हैं। इसको अच्छी तरह से आप लोग पढ़िए, इसको सुनिए, इसको समझिए, अपना जीवन को सफल कीजिए। खाली धूमधाम करके पशु के जैसे आहार-निद्रा-भय-मैथुन करने से वो जीवन सफल नहीं होता। ये जो भगवान कहते हैं जो आगे जाकर के हम लोग नहीं रहेंगे, ये बात नहीं है। बाकी किस तरह से रहेंगे, क्या रूप में रहेंगे, क्या योनि में हमारा जन्म होगा, ये सब सोचना चाहिए।

इसलिए सब भगवत गीता में बताया है कि: उध मध्य राजसा जगता। जो लोग सात्विक गुण को लाभ किया हो, उनको वो सब ऊर्ध्व लोक में जा सकते हैं - जनलोक, महर्लोक, तपलोक, ब्रह्मलोक, सत्यलोक। और भी बताया है: जानती देवता देवा पित जानती भूते जानती भूता म जान मा। उच्च लोक, सत्यलोक में भी जा सकते हैं आप। यदि हमारा भक्त आप हो जाएं, तो हमारे लोक में आएंगे। तो भगवान के पास जाने से क्या लाभ होगा? दुखा... भगवत धाम में जाने से फिर हमको किसी को... जो भगवत भक्त हो गया, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। ये जो दुनिया है, दुख का आलय है, और वो भी सब दिन के लिए नहीं, इधर छोड़ना ही पड़ेगा। जितना हम अच्छी तरह से मोटा-ताजा मकान बनाएं, एक दिन बस यमराज कहते हैं, "छोड़ो जी, चलो इधर से।" बस, छोड़ना ही पड़ेगा। ये सब सोचना चाहिए कि आगे जाके क्या योनि में हमारा जन्म होगा, किधर जाएंगे। भगवान सभी कहते हैं, "मद्याजिनोऽपि माम्"।

तो इसलिए मनुष्य जीवन में यदि कुछ कोशिश करना है, जिस तरह से भगवान के पास हम लोग जा सकें, उसके लिए कोशिश। इसका नाम है कृष्ण भावनामृत। ये हम लोग सिखाते हैं कि किस तरह से भगवान के पास सब जा सकते हैं और किस तरह से जाएंगे, केवल कृष्ण को समझने से, तत्त्वतः। वो भी भगवान बताए: जन्म कर्म में दिवम जो जाना तत्व वही तत्व। केवल यदि कृष्ण का अर्थ समझ लिया, तत्त्वतः भगवान कृष्ण क्या हैं, तो फिर क्या लाभ होता है? त देह पुनजन्म न मा... केवल अगर कृष्ण को ही आप समझ जाओ, कुछ बात नहीं। तो क्यों भगवान आते हैं, भगवान का स्वरूप क्या चीज है, कृष्ण क्या चीज है, यही भले समझ जाएं हम लोग। दिव्य जन्म, दिव्य, साधारण नहीं है। भगवान का जन्म, कर्म सारा दिव्य। हाँ, जो मनुष्य भगवान को हमारे ही जैसे-जैसे समझता है, अब जानती मा... वो गधा जो कृष्ण को समझता है हमारे ही जैसे हैं, "हम एक नकल करके कृष्ण हो जाएं।" ये सब ज्ञान से कोई लाभ नहीं होगा। इसलिए भगवान बताते हैं, आप लोग सब कृपा करके भगवान की बातें सब सुनिए, भगवत गीता अच्छी तरह से आलोचना कीजिए और उस तरह से काम कीजिए, सबका जीवन सफल होगा। और हम लोग जो Krsna Consciousness Movement चला रहे हैं, केवल कृष्णा को समझाने, और हमारा कुछ काम नहीं। और अगर कोई समझ गया, हजारों व्यक्ति, हजारों आदमी का अगर एक भी अगर समझ गया, तो उसका जीवन सफल होगा। यही हमारा निवेदन। Thank you very much. हरे कृष्णा।

भगवान का अवतार का कोई ठिकाना है? अनंत। वो शास्त्र में कहते हैं जैसे समुद्र का वो तूफान होता है ना, कोई बैठ-बैठकर गिने तो गिन सकता है? उसी प्रकार समुद्र का... जैसे नदी में बैठ जाइए, कितना स्रोत जा रहा है - एक, दो, तीन, चार घंटे, जीवन भर, पता नहीं। रामा मुक्ति नाना अवतार किंतु कृष्णा स्वयं समय स्वयं सम परम कुमार। बाकी भगवान कहते हैं, "अहं सर्वस्य प्रभवो..." जितना incarnation है, वो सब का कारण मैं, ये समझना चाहिए। मत भजन मानधा भाव सम... जितना incarnation है, अवतार है, सब हमसे ही होता है। इतना हम लोग अगर समझ जाएं कि भगवान का अनंत कोटि अवतार, सब अवतार भगवान से होता है, इतना ही अगर कोई समझ जाए, तो वो उसका जीवन सफल हो जाएगा। मत भजन मानधा भाव सम। बाकी वो जो अवतार है, ऐसे नहीं कोई भी आके खड़ा हो जाए, "हम भगवान का अवतार हैं।" नहीं, उसको शास्त्र से प्रमाण होना चाहिए। जितने अवतार हैं, शास्त्र में सब प्रमाण हैं। ऐसी बात नहीं है कोई आके खड़ा हो गया, "भगवान का अवतार।" ये बात सिद्धांत नहीं। Don't accept avatar.

[श्रोता]: ये जो हम लोग, हम अपने को बताते हैं, जैसे आपने समझाया शरीर नचोला कहा जाता है और आत्मा उसके अंदर है, उसको हम कहते हैं, और परमात्मा को हम जानने के लिए चाहते हैं। जब हम ही नहीं हैं, तो चाहेगा कौन?
[प्रभुपाद]: परमात्मा के... आप नहीं हैं, कौन बोला? आप तो हैं।
[श्रोता]: हम नहीं हैं।
[प्रभुपाद]: जब आप कहते हैं कि आत्मा परमात्मा का अंश है, तो अंश होने... आप पिता का अंश हैं, तो आप हैं नहीं क्या?
[श्रोता]: नहीं, तो ठीक है, मैं पिता का भी अंश हूँ, माता का भी अंश हूँ, परमात्मा का मैं हूँ नहीं। माता का भी हूँ और पिता का भी हूँ, प्रकृति भी चोला है और आत्मा भी...
[प्रभुपाद]: ये बताया जो... सर्वते असंभवती... मूर्तय माता... और मैं इनको पिता। ये तो बता दिया भगवान ने।

[श्रोता]: नहीं, ये प्रश्न देखिए, सुनिए, सुनिए। जैसा आप हैं, आप जैसा बताया कि पिता का भी अंश हैं, माता जी का अंश... सुनिए ना इसको। तो पिताजी का जो अंश है, वो जीवात्मा है, और माताजी का जो अंश है, वह तो शरीर है, भौतिक शरीर। तो परमात्मा को कहते हैं सर्वज्ञ, जब आत्मा परमात्मा का अंश है, तो अल्पज्ञ क्यों है? आपका पिता सर्वज्ञ है, सब कुछ आप जानता... सब कुछ, यही तो मैं कहता हूँ।
[प्रभुपाद]: ये होता है, पिता पंडित हो सकता है, बाकी पुत्र मूर्ख भी हो सकता है। तो मूर्ख पुत्र, अपंडित, पिता से समान कैसे हो?
[श्रोता]: नहीं, जैसा समुद्र है, पानी की बिंदु भी वैसे ही होती है, उससे अलग नहीं होती। जो-जो उसमें इंसान है, जो-जो उसमें पहाड़ है, जो-जो है, वो बिंदु में भी है, समुद्र में भी वही है। तो हम... वो सर्वज्ञ, मैं तो अल्पज्ञ हूँ, अल्पज्ञता कहाँ से है?

[प्रभुपाद]: जो समुद्र का जो बूंद है, वो तो अल्प है ना? इसका... इसका तो दिमाग आपका है नहीं। जो... जो बूंद है, वो अल्प है कि नहीं?
[श्रोता]: समुद्र का है भाई।
[प्रभुपाद]: समुद्र का जो बूंद है, वो तो छोटा है, वो समुद्र के समान कैसा हो जाएगा? ये इतना मूर्खता है, कैसा बताया जाए! उसमें चीज सब चीज है, बाकी समुद्र में जितना टन का आपका क्या नाम, साल्ट है, उतना टन बूंद में है क्या? ये समझ नहीं... वो बूंद है, उसमें थोड़ा सा नमक है, थोड़ा सा, और समुद्र में है लाखों टन आपका नमक है। तो जिसको लाखों टन नमक के साथ में एक बूंद नमक कैसे समान हो जाए? इतना दिमाग तो होना चाहिए। जब समुद्र का बूंद हो लिया, तो उसमें सब चीज है, मान लिया, बाकी समुद्र में लाखों टन आपको वो नमकीन है, और इधर में छोटा है, एक बूंद है। इसको समझने में क्या आपका मुश्किल होगा? इतना बुद्धि तो होनी चाहिए। छोटा का छोटा रहेगा, बड़ा का बड़ा, इसमें क्या मुश्किल होगा? भगवान का अंश है, भगवान का अंश से भगवान का समान... Part is not equal to the whole, that is axiomatic truth, scientific. Part is part, whole is whole. इसमें समझने में क्या मुश्किल होता है? Part is never equal to the whole. The part may have all the composition, बाकी that doesn't mean it is equal to the whole. सोना का कोई अंगूठी हुआ और सोना का खान है, दोनों समान हो जाएगा? दोनों सोना है, इसको मान लिए। बाकी ये अंगूठी जो है, खान है, बहुत फर्क है। ये कौन मूर्ख बोलेगा ये अंगूठी भी जो है, खान है? ऐसा मूर्ख लोग, पंडित नहीं बोलेगा। चीज वही है, qualitatively but quantitatively different. इसको समझ... बोलिए ठीक है कि नहीं? Quantity and quality. Quality one, quantity different. ये आग है और आग का एक बूंद है, दोनों ही आग है, क्योंकि आग का... आग का बूंद और बड़ा आग दोनों एक हो जाएगा? ये तो मूर्खता है। बड़ा आग है, वो सब कुछ जला देगा, और बूंद जो है, कहीं भी गिर गया, थोड़ा सा जला दिया। ये सब शास्त्रों में प्रमाण। भगवान, भगवान में जो चीज है, भगवान का creative power है, हमारा भी creative power है। भगवान लाखों-करोड़ों planet बना के हवा में उड़ा रहे हैं, आप बना सकते हैं 747 हवाई जहाज वैसा? बाकी भगवान कैसे बना सकते हैं? ये करोड़ों-करोड़ों planet को, हाँ, उड़ा रहे हैं, आप कर सकते हैं? आप भगवान के समान कैसे होंगे? ये सब दिमाग खराब वाले ऐसे कहते हैं भगवान के समान। यहाँ अच्छा कोई, अच्छा आदमी पागल होता है। पागलपन ना कीजिए, भगवान का नाम जपा दीजिए। यदि पागलपन छूटा नहीं, तो पागल रहिए बस, जीवन को खराब कीजिए। अपने तो समझ लीजिए हम सब मालिक हैं, जितना बैंक है सब हमारा है। मालिक, तुम्हारे पास जितना है दो-चार लाख, वही चीज तुम बोले हमारे पास जितना बैंक है दुनिया सब... तो मालिक गधा, गधा कैसे अच्छा कोई...
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥