श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्तवृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
(Maha-mantra repeated)
प्रेम से कहो श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्तवृन्द की जय!
अनंत कोटि वैष्णव वृन्द की जय!
नामाचार्य श्रील हरिदास ठाकुर की जय!
श्री श्री राधा-कृष्ण, गोप-गोपीनाथ, श्यामकुण्ड, राधाकुण्ड, गिरिगोवर्धन की जय!
श्री वृन्दावन धाम की जय!
श्री नवद्वीप धाम की जय!
गंगा माई की जय! यमुना माई की जय!
तुलसी देवी की जय! भक्ति देवी की जय!
All glories to the assembled devotees! Thank you.
मुझे आशा है कि... मुझे हिंदी भाषा में बोलने का विशेष अभ्यास नहीं है, क्योंकि हमारा शरीर बंगाल का है और मैं जो प्रचार कर रहा हूँ, वह ज़्यादातर अंग्रेजी में होता है। हिंदी बोलने का अभ्यास नहीं है, परंतु थोड़ा-बहुत हिंदी में आपके काम के लिए कुछ कहूँगा। आप लोग अगर उसमें कोई त्रुटि हो, तो क्षमा करें।
यह जो श्री कृष्ण संकीर्तन का जो आंदोलन चल रहा है, सारी दुनिया में—अमेरिका से शुरू हुई है, न्यूयॉर्क, फिर आपका कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अभी अफ्रीका, अभी मैं यहाँ आया हूँ। तो यह चैतन्य महाप्रभु की बात है: "परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्"। परम विजय! और क्यों है? उसका कारण है—"चेतो-दर्पण-मार्जनम्"। यह श्री कृष्ण का संकीर्तन करने से यह जो हमारा चित्त है—चित्त यानी मन, बुद्धि, अहंकार, विशेषता मन—it becomes clean (यह स्वच्छ हो जाता है)।
हमारी जो दुर्दशा है भौतिक जगत में, समझ लेना चाहिए कि भौतिक जगत में सभी का ज्ञान कम है। क्योंकि भगवान ने श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है कि यह जो जगत् है, "दुःखालयम् अशाश्वतम्"—यह दुःखों का घर है। यह आप सभी समझ सकते हैं। यह जब हम माँ के पेट में थे, उस समय से शुरू करके मरण तक केवल दुःख ही दुःख है। इसको खाली समझना चाहिए। बाकी यह जो मनुष्य जाति है, वह दुःख को ही सुख समझती है। यही माया का प्रभाव है। दिन-भर परिश्रम करते हैं, बाकी उसी को वह समझता है सुख। परंतु शास्त्र बताते हैं कि यह मनुष्य शरीर जो है, यह परिश्रम करने के लिए नहीं है—"नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामान् अर्हते विड्भुजां ये"। विड्भुज यानी जो विष्ठा (मल) खाने वाला है—यह सूअर। सूअर दिन-भर परिश्रम करता है—कहाँ विष्ठा है, कहाँ खाने को मिले। और जहाँ खाया, थोड़ा झगड़ा हो गया, उसी वक्त इंद्रिय-तृप्ति। उसमें मान-अपमान का कुछ ज्ञान नहीं। यह आप लोग सब जानते हो। इस प्रकार सब बताया है कि देखो, दिन-भर परिश्रम करो और खूब खाओ और इंद्रिय-तृप्ति करो—यह जो जीवन है, यह हमारा नहीं है।
यह जो वचन है कि "नायं देहो देहभाजां नृलोके...", यह उपदेश है सम्राट ऋषभदेव का। सम्राट ऋषभदेव कौन? महाराज भरत के पिता। महाराज भरत, जिनके नाम से यह सारा भूगोल 'भारतवर्ष' कहलाता है। पहले भारतवर्ष कोई छोटी सी जगह नहीं थी, जो अभी हमारा भारतवर्ष है। पहले सारा भूगोल, सारी दुनिया ही भारतवर्ष थी। यह महाभारत का इतिहास है। Great India (महान भारत)। तो अभी जो हम लोग भारत समझ रहे हैं, जैसे 20 वर्ष पहले जो भारतवर्ष था, अभी पाकिस्तान अलग हो गया, वह भारतवर्ष नहीं रहा। इसी प्रकार जो प्राचीन भारत था, जैसे-जैसे भारत में वैदिक संस्कृति (culture) नष्ट होती गई, सब अलग-अलग होते गए। अभी थोड़ा सा हिस्सा आपके पास है, जिसे आप लोग भारत कहते हैं। तो वह संस्कृति क्या चीज़ है? जैसा ऋषभदेव ने बताया कि यह जो शरीर है, मनुष्य शरीर, शरीर तो सभी का है—कुत्ते का भी है, गधे का भी है, देवता का भी है, मनुष्य का भी है, पक्षी का भी है। भौतिक जगत में जब-जब जीवात्मा भोग करने की इच्छा करती है, उसी प्रकार उसको शरीर मिलता है—"कर्मणा दैव-नेत्रेण"। अपने-अपने कर्म के अनुसार।
जैसा हम लोग अभी कर्म करेंगे, आगे उसी प्रकार का शरीर मिलेगा। जैसे बचपन में कोई विद्या ग्रहण करता है, तो आगे जाकर वह विद्वान बनता है, उसको अच्छा स्थान मिलता है, सम्मान मिलता है। और जो मूर्ख रहता है, उसको क्या मिलेगा? इसी प्रकार जैसा हम लोग कर्म करते हैं, वैसा ही हमारा आगे होने वाला शरीर बनता है। यह मनुष्य शरीर जैसे व्यवहार में लगेगा, उसी प्रकार आगे जन्म और मृत्यु का चक्र चलेगा। जिस प्रकार की भावना में हमारी आत्मा प्रवृत्त होगी, उसी प्रकार का शरीर मिलेगा। यह शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करना—यह सब विचार श्रीमद् भगवद्गीता में अच्छी तरह से दिए गए हैं। आप लोग सब जानते हैं:
जो देवताओं का भजन करते हैं, वे देवलोक जाते हैं; जो पितरों का भजन करते हैं, वे पितृलोक जाते हैं; जो भूतों का भजन करते हैं, वे भूतलोक जाते हैं; और जो मेरा (भगवान का) भजन करते हैं, वे मेरे धाम आते हैं। तो कर्म के विचार से, इसी प्रकार ज्ञान से, जो इधर भौतिक लोक में रहने के लिए आते हैं, वे यहीं रहते हैं। और भगवान कहते हैं कि जो हमारा भक्त है, वह हमारे पास आता है। यह जो आजकल चल रहा है कि "जो भी करो, सब एक ही जगह पहुँचेंगे"—यह बिलकुल गलत बात है। ऐसी कोई बात शास्त्र में नहीं है। भगवान साफ़ कहते हैं: "यान्ति देव-व्रता देवान्..."। अगर आप कराची का टिकट लीजिएगा तो कराची जाइएगा, और लंदन का टिकट लीजिएगा तो लंदन में जाइएगा। यह common sense (सामान्य ज्ञान) की बात है। जो टिकट लीजिएगा, वहीं जाइएगा। "सब एक ही जगह पहुँचेंगे"—यह बात बिलकुल गलत है। शास्त्र-सिद्धांत को छोड़कर जो मनमाना काम करते हैं, उन्हें कोई सिद्धि नहीं मिलेगी, न सुख मिलेगा और न परम गति मिलेगी।
यह जो सनातन धर्म है, उसका क्या उद्देश्य है? उसका उद्देश्य यही है कि भगवान से संपर्क बनाया जाए। यही मनुष्य जीवन का कर्तव्य है। और जो शारीरिक काम हैं, वह तो पशु-पक्षी भी करते हैं। उसमें क्या लाभ कि दिन-भर परिश्रम करके थोड़ा-बहुत दो-चार रोटी खा लिया, फिर रात में इंद्रिय-तृप्ति की, फिर सुबह उठकर वही बात! मनुष्य जीवन के लिए बताया गया है कि "तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुध्येद्"—तपस्या करने के लिए, शुद्ध होने के लिए। जिस कारण से हमको यह भौतिक शरीर मिला है, उससे मुक्त होने के लिए। इसलिए हमारा जो भारतीय कल्चर है, वह तपस्या प्रधान है। बड़े-बड़े ऋषि-लोग, बड़े-बड़े राजा-लोग—आप लोग सब जानते हैं। महाराज भरत, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष कहा जाता है, उन्होंने 24 वर्ष की उम्र में अपना घर, राज-पाट सब छोड़ दिया। छोटे-छोटे बच्चे, सुंदर पत्नी, राज-संपत्ति—सब छोड़ दिया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। महाराज युधिष्ठिर ने इतना लड़ाई करके कुरुक्षेत्र में राज्य लिया, फिर सब छोड़ दिया। महाराज ध्रुव ने भी आगे जाकर सब छोड़ दिया। चैतन्य महाप्रभु ने 24 वर्ष की उम्र में—ब्राह्मण का लड़का, बड़ा सुंदर चेहरा, बड़े भारी विद्वान, समाज में बहुत सम्मान—यह सब होते हुए भी सब छोड़ दिया। षड्-गोस्वामी जो वृन्दावन में रहे: "धीराधीर-जन-प्रियौ प्रिय-करौ निर्मत्सरौ पूजितौ..."। वे भी बड़े-बड़े मंत्री थे, सब छोड़कर तपस्या की।
और हमारा यह धर्म, जिसे आप लोग 'हिंदू' कहते हैं—यह 'हिंदू' शब्द तो मुसलमानों का दिया हुआ नाम है। असल में यह 'हिंदू' शब्द किसी शास्त्र में नहीं है। शास्त्र में जो है, उसका नाम है 'वर्णाश्रम धर्म'।
भगवान विष्णु को संतुष्ट करने के लिए वर्णाश्रम धर्म का पालन आवश्यक है। यदि आप भगवान को संतुष्ट करना चाहते हैं, तो यही वर्णाश्रम धर्म का मार्ग है। जिस समाज में वर्णाश्रम का विचार नहीं है, उसे सभ्य मनुष्य समाज नहीं कहा जा सकता। इसीलिए भारतीय जो संस्कृति है, भारतीय जो धर्म है, उसका नाम है वर्णाश्रम। श्रीमद् भगवद्गीता में इस विषय में वर्णन है। चतुर्थ अध्याय में भगवान खुद कहते हैं:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः।
गुण और कर्म के अनुसार यह जो चार वर्ण हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—यह मेरी बनाई हुई व्यवस्था है। तो भगवान की बनाई हुई चीज़ क्या केवल भारतवर्ष में ही रहेगी? नहीं। भगवान तो सबके हैं। सारी दुनिया में जितने जीव हैं, सभी के भगवान पिता हैं: "अहं बीज-प्रदः पिता"। भगवान कोई हिंदू, क्रिश्चियन या मुसलमान नहीं हैं। भगवान सबके हैं, केवल मनुष्य जाति के लिए ही नहीं, परंतु पशु, पक्षी, पतंग—सभी के लिए। भगवान खुद कहते हैं कि सभी योनियों में जितने भी जीव प्रकट होते हैं, उन सबका बीज प्रदाता पिता मैं हूँ।
शास्त्रों में कहा गया है: "ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः"। ईश्वर का अर्थ होता है—हुकुम करने वाला, नियंता (controller)। तो हुकुम करने वाला तो हर कोई होता है। थोड़ा-बहुत आप लोग जितने यहाँ बैठे हैं, कुछ-न-कुछ हुकुम आप लोगों का चलता ही है—ऑफिस में चलता है, बिज़नेस में चलता है, अपनी family (परिवार) में चलता है। जैसे हम हैं, हमारा भी हुकुम चलता है। तो हुकुम करने वाला सभी है, इस हिसाब से सभी ईश्वर हैं। बाकी जिसका हुकुम केवल चलता है और जो किसी का हुकुम नहीं मानता, वह कौन है? हम हुकुम करते हैं, पर हमारे ऊपर भी कोई और है जो हमें हुकुम करता है। जैसे कोई व्यक्ति घर में स्त्री-पुत्र पर हुकुम करता है, और ऑफिस में जाकर जो उसका boss (साहब) है, उसका हुकुम मानता है। वह साहब भी किसी और का हुकुम मानता है। इसी प्रकार आगे बढ़ते जाइए। जब आप उस परम व्यक्ति पर पहुँचेंगे जो केवल हुकुम करता है और किसी का हुकुम नहीं लेता, वही परम ईश्वर है। इसलिए शास्त्र ने निर्देश दिया: "ईश्वरः परमः कृष्णः"। कृष्ण जो हैं, वे सभी पर हुकुम करने वाले हैं, बाकी कृष्ण को हुकुम करने वाला कोई नहीं है। कृष्ण को हुकुम करने वाला केवल उनका भक्त होता है। भगवान किसी का हुकुम नहीं मानने वाले, बाकी अपने शुद्ध भक्त का हुकुम वे प्रेमवश मानते हैं। इस प्रकार जो भगवान हैं, उनका भजन करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है।
इसलिए हम लोग सारी दुनिया में यह movement (आंदोलन) चला रहे हैं—कृष्ण भावनामृत आंदोलन। "ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥" भगवान खुद भी कहते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में: "मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय"। मुझसे बढ़कर और कोई सत्य नहीं है। "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते"—भगवान कहते हैं कि दुनिया में जो कुछ भी है, सब मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। वेदांत सूत्र में भी कहते हैं कि ब्रह्म वस्तु क्या चीज़ है? "जन्माद्यस्य यतः"—जहाँ से सब चीज़ों का जन्म आदि होता है, वही परम ब्रह्म हैं। और जो श्रीमद् भगवद्गीता को अच्छी तरह से समझता है, वह कृष्ण को कहता है: "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥" इसलिए मनुष्य जीवन का कर्तव्य है, जैसा ऋषभदेव ने बताया है, कि केवल इंद्रिय-तृप्ति के लिए कठिन परिश्रम न करके तपस्या की जाए। तपस्या, ब्रह्मचर्य, शम, दम, त्याग, शौच—यह सब तपस्या के अंग हैं।
इसलिए यह जो सनातन धर्म बोलिए, हिंदू धर्म बोलिए या वर्णाश्रम धर्म बोलिए, इसमें लोगों को पहले ब्रह्मचर्य सिखाया जाता था। ब्रह्मचर्य का उद्देश्य क्या है? उसे शुरू से सिखाया जाता है कि किस तरह से तपस्या करके गुरु-गृह में, गुरुकुल में जाकर रहना है। और गुरु का जो निर्देश है, उसे नम्रतापूर्वक मानना है। चाहे कितना भी बड़ा लड़का हो, चाहे राजा का लड़का हो, गुरुकुल में जाकर गुरु का जो हुकुम है, उसे दास की तरह मानना पड़ता है। जैसे आप लोगों के यहाँ नौकर होता है, जो हुकुम आप करते हैं, वह करने के लिए तैयार रहता है, इसी प्रकार ब्रह्मचारी को बनाया जाता है। यह भारत की संस्कृति है। यह नहीं कि जैसा पश्चिमी देशों में मैं देख रहा हूँ, 10 वर्ष का लड़का है और उसे कुछ भी संयम नहीं सिखाया जाता। ब्रह्मचर्य का अर्थ है—इंद्रिय-संयम, विशेषकर स्त्री-सम्पर्क से दूर रहना। 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का निर्देश है। अगर गुरु-पत्नी युवती भी हो, तो शिष्य को उनके पास जाने की अनुमति नहीं थी। दूर से ही गुरु-पत्नी को प्रणाम करना—यह सब नियम थे। 25 वर्ष तक कोई स्त्री-सम्पर्क नहीं। सभी स्त्रियों को 'माता' मानने की शिक्षा दी जाती थी। चाणक्य पंडित, जिनके नाम से नई दिल्ली में 'चाणक्यपुरी' है, वे सिखाते हैं कि पंडित कौन है:
मातृवत् पर-दारेषु पर-द्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत् सर्व-भूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥
जो अपनी विवाहित स्त्री को छोड़कर अन्य सभी स्त्रियों को माता के समान समझता है, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझता है, और सभी जीवों को अपने समान समझता है, वही वास्तव में पंडित है। यह नहीं कि अपनी तृप्ति के लिए हजारों गायों और बकरियों को रोज काटा जाए—यह कोई सभ्यता नहीं है।
[Closure]
यदि आप लोग चाहते हैं कि यह जो भारतीय सभ्यता है, यह जो original (मूल) वैदिक संस्कृति है, जिसे आप सनातन धर्म कहते हैं, इसका दुनिया में प्रचार हो, जिससे भारत का सम्मान बढ़े, तो आप लोग इस movement (आंदोलन) में हमारा साथ दीजिए। यहाँ भी काम चलेगा, जैसे सारी दुनिया में काम चल रहा है। इसमें सभी का कल्याण है। यह कोई सांप्रदायिक विचार नहीं है। भगवान कहते हैं कि मैं सभी का पिता हूँ, तो सभी को उनके परम पिता से परिचय कराया जाए। यह भारत का कर्तव्य है। भगवान कहते हैं:
जो अत्यंत नीच कुल में भी उत्पन्न हुए हैं, वे भी यदि भगवान की शरण ग्रहण करते हैं, तो शुद्ध हो जाते हैं और परम गति को प्राप्त करते हैं। यह शास्त्र का विचार है, यह भारतीय संस्कृति है। यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन इसी तरह से चलाया जा रहा है, और इसमें हमें बहुत उत्साह मिल रहा है। देखिए, ये सब जो विदेशी बालक हैं, कोई क्रिश्चियन परिवार से है, कोई जूइश (यहुदी) है, कोई मुसलमान है, सभी इसे अपना रहे हैं। इस movement को अच्छी तरह से चलाइए। दुनिया सुखी होगी, आप लोग भी सुखी होंगे और हम लोग भी सुखी होंगे।
Thank you very much. बहुत-बहुत धन्यवाद।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥