English, Hindi माता, समझ बहनों-भाइयों, गुरु महाराज... आवाज़ छे माइक में बोले छता बहुत समय... बहनों-भाइयों... बेसी जइए अगर तो शांति राखजो, मेहरबानी करजो, शांति राखजो तो बदा बीजा सांभळी शके। आज गुरु महाराज नुं व्याख्यान हिंदी मां छे, एमनो विषय छे... English मां, अंग्रेजी मां भाषण करवा वारे पण आप समझी सको एटला माटे आज हिंदी मां lecture करशे। तो मेहरबानी करी शांति राखजो।
तो भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं कि, "मय्यासक्तमनाः पार्थ"—अर्जुन, सब समय मन को हमारे ऊपर आसक्त कर। यानी हम लोगों की आसक्ति दुनिया में है—धन में है, जन में है, स्त्री-पुत्र में है। आसक्ति ऐसी है जिसमें हम लोग घर छोड़ नहीं सकते। तो यह जो आसक्ति है, यह भगवान की तरफ देना चाहिए। इसका नाम है योग। जिसमें योग है, हर प्रकार से योग की जो पद्धति है, उसका उद्देश्य है कि इंद्रिय को, मन को संयत करके, संयम करके भगवान के ऊपर मन को लगाना। "स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः"—मन को सब समय, 24 घंटा भगवान कृष्ण के चरणों में लगा दे। इसका नाम है योग।
[योगिनामपि सर्वेषां]
जैसा छठवें अध्याय के आखिरी में भगवान बता रहे हैं: "योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥" योगी अनेक प्रकार के होते हैं, और योगियों में जो सब समय मुझको मन के अंदर रखता है, यानी भगवान कृष्ण के चरण सब समय हृदय-कमल में प्रकट रखता है, इस प्रकार जो योगी है... हाँ, "योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्..." श्रद्धावान्! यह नहीं कि mechanical machine चलता है, वह हो नहीं सकता। बिना श्रद्धा के किसी का मन भगवान के चरणों में लगता ही नहीं, यह असंभव है। इसलिए पहली श्रद्धा होनी चाहिए। इस श्रद्धा को उत्पादन करने के लिए यह श्रीमद् भगवद्गीता सुनाया जा रहा है।
[भगवान की परिभाषा]
यह भगवान कृष्ण... कृष्ण भगवान, स्वयं भगवान। भगवान का अर्थ होता है—आप लोग सब समझते हैं—'भग'। जिसका भाग्य अच्छा होता है, उसको भाग्यवान कहते हैं। यह 'भाग्य' भी, यह 'भग' शब्द से हुआ है। 'भगवान'—सब प्रकार का ऐश्वर्य जिसके पास है, वह भगवान है। समझो ऐसा है, आपके पास करोड़ रुपया होगा, और किसी के पास 10 करोड़ होगा, और किसी के पास 20 करोड़ होगा। इसी प्रकार आप बढ़ते जाइए, ताकि कोई भी दुनिया में ऐसा व्यक्ति है नहीं जो कि कह सकता है कि जितना रुपया-पैसा है, सब हमारे पास है। कोई नहीं। बाकी भगवान जो हैं, वह बोल सकते हैं—"ऐश्वर्यस्य समग्रस्य"।
तो आजकल भगवान बहुत होते हैं। रास्ता-रास्ता में, गली-गली में भगवान घूमता-फिरता है। इस प्रकार का सस्ता भगवान हम लोग नहीं मानते। जो भगवान के पास सब ऐश्वर्य हो, उसको हम लोग भगवान मानते हैं। कोई भगवान बन गया और थोड़ा दाँत में तकलीफ हुआ, तो उसी प्रकार doctor के पास पहुँच गया! इस प्रकार के भगवान से कुछ मतलब नहीं। भगवान का अर्थ होता है—समग्र ज्ञान, वैराग्य, जिसके पास हर किस्म का ऐश्वर्य है, हर तरह का बल है, हर तरह का यश है, ज्ञान है, श्री है, वैराग्य है, वह भगवान है।
[भगवान के छह ऐश्वर्य और लीलाएँ]
तो यह सब चीज़ जैसा बताया गया कि आपके पास करोड़ रुपया है, आप भी थोड़ा-बहुत भगवान हैं, क्योंकि आपके पास कुछ power है। कोई सुंदर है, उसके पास भी कुछ power है, attraction है। These are attractive features: wealth, reputation, beauty, education, and renunciation. यश, रूप, बल, ज्ञान एवं वैराग्य—यह भगवान का परिचय है, संपूर्ण भगवान।
आप लोग जानते हैं कि जब वह भौमासुर को मारके 16,000 राजकन्याओं को उद्धार किया भगवान ने, यह 16,000 राजकन्याएँ भगवान से बोलीं कि, "हमको आप स्वीकार कीजिए, परंतु हम लोग जहाँ जाएँगे, वहाँ हमारे पिता-माता ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि यह असुर हमको छीनकर ले आया था, इतने दिन इधर रखा। अब हम लोग कहाँ जाएँ?" तो भगवान ने पूछा, "आप लोग क्या चाहती हैं?" तो वे लोग सब कोई कह दीं कि, "आप हमारे पति बन जाइए, नहीं तो हम लोग..." तो भगवान ने 16,000 को उसी वक्त शादी कर लिया। और शादी करके ऐसी बात नहीं है कि 16,000 रानियों के पास एक-एक दिन जा रहे हैं, नहीं। एक ही साथ भगवान ने अपने को 16,000 मूर्तियों में प्रकट किया, और 16,000 महल, बगीचे, अत्यंत ऐश्वर्य जैसे रानी को रखना चाहिए, इसी प्रकार भगवान ने सबको रखा।
नारद मुनि देखने को आए कि भगवान ने 16,000 रानियों से शादी कर ली है, किस तरह से रह रहे हैं? तो एक-एक प्रासाद में भ्रमण करके देखा तो भगवान कहीं बैठकर बच्चे लोगों से प्यार कर रहे हैं, कहीं शादी हो रही है, कहीं और कुछ है—अलग-अलग 16,000 किस्म के tasks में व्यस्त हैं, और 16,000 मूर्तियों में बैठे हैं। इसका नाम है भगवान।
`[clears throat]`
[भगवान का असीमित ऐश्वर्य]
तो भगवान का अर्थ होता है कि हर तरह से हम लोग जिससे आकर्षित होते हैं—धन से। किसी के पास धन है, तो हम लोग उसमें आकर्षित होते हैं। कोई बड़ा आदमी हो, जैसे हमारे देश में बिड़ला हैं, सब उनके पास पहुँचते हैं। हम लोग भी कभी-कभी पहुँचते हैं, तो क्यों? उनके पास धन है, वह आकर्षण करता है। इसी प्रकार किसी के पास बल है, तो वह भी आकर्षण करता है। किसी का कुछ नाम है, बहुत नाम है, जैसे गांधी जी थे हमारे देश में। सबको जहाँ गांधी जी जाएँ, "महात्मा गांधी की जय!" बेचारी को परेशान कर देता था। "महात्मा गांधी की जय!" बेचारी कान में उँगली दे देती थी, उसको बड़ा दुःख होता था। तो यह दुनिया का ऐश्वर्य है। परंतु भगवान में जो ऐश्वर्य, ज्ञान, बल है, वह unlimited है, उसकी सीमा है ही नहीं। भगवान 16,000 पत्नियों से शादी किए थे, बाकी 16,000 नहीं, 16 करोड़ भी अलग कर लेते, तब भी उनके पास कुछ कमी नहीं होती। क्यों? भगवान कहते हैं, "भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम्।" जब भगवान सब चीज़ के ही भोक्ता हैं, तो फिर उनके पास 16,000, 16 करोड़, 16 अरब हो, तब भी कुछ नहीं। इसका नाम है भगवान। आप लोग इसको थोड़ा समझिए, भगवान किसको कहा जाता है।
[आचार्यों का सिद्धांत और अर्जुन की अनुभूति]
यह सब बड़े-बड़े साधु लोग, आचार्य लोग विचार किए हैं। विचार करके सिद्धांत क्या है? जो भगवान हैं, वह कृष्ण हैं—"कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"। व्यासदेव, स्वयं व्यासदेव, वेदव्यास ज्ञानदेव, और यह श्रीमद् भगवद्गीता है। जब अर्जुन श्रीमद् भगवद्गीता सुनकर भगवान को समझ गया... भगवान को तो समझा ही था, भगवान के मित्र थे, बाकी वह लड़ाई में भगवान का क्या उद्देश्य था, वह जब समझ लिया और भगवान का प्रभाव भी समझ गया, तो क्या कहते हैं? "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।" आप परब्रह्म हैं। तो महाजन, बड़े-बड़े महाजन लोग जैसा कहते हैं, मानते हैं, उस प्रकार के मार्ग में चलना हम लोगों के लिए उचित है, नहीं तो हम लोग विपथगामी हो जाएँगे। "धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः।" धर्म का तत्त्व समझना बहुत मुश्किल है। परंतु यदि हम लोग महाजन के मार्ग पर जाएँ, उनका अगर अनुगमन करें, तो हमको धर्म का तत्त्वज्ञान हो सकता है। इसलिए हमको चाहिए कि श्रीमद् भगवद्गीता अर्जुन को सुनाया गया था, और अर्जुन जैसा भगवान को समझा, उसी प्रकार हम लोग भी समझें। तो हमारा गीता पढ़ना सार्थक होगा। और भगवान कुछ कह रहे हैं, अर्जुन कुछ समझ रहे हैं, मैं कुछ उसमें टीका-टिप्पणी लगाकर और कुछ बता रहा हूँ—इस प्रकार शास्त्र को सुनने से और इस प्रकार ज्ञान लाभ होने से कोई लाभ नहीं। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि महाजनों के मार्ग पर चलो।
[भगवान को पाना अत्यंत सुगम है]
तो चलिए, आप लोग भगवान क्या चीज़ हैं, समझने को चाहते हैं, तो देखिए श्रीमद् भगवद्गीता आपके सामने प्रस्तुत है। उसमें जैसा-जैसा बताया गया है, उस प्रकार अगर आप जीवन को उसमें यापन करें, तो भगवान को मिलना कोई मुश्किल नहीं। भगवान तो अपने को देने के लिए ज्ञान कर रहे हैं, उत्साह भी कर रहे हैं कि, "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।" क्या भगवान को पाना कोई मुश्किल है? क्या भगवान यह सब बता रहे हैं, उस प्रकार कीजिए, भगवान मिल जाएँगे। भगवान कहते हैं कि, "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।" वास्तविक क्या चीज़ है? भगवान कैसे जन्म लेते हैं? भगवान का कार्य क्या चीज़ है? जन्म का... यह साधारण नहीं है। भगवान चार वर्ष की उम्र में ही गोवर्धन पर्वत को बाएँ हाथ में उठा लिए, फिर भी वह भगवान। जैसे 16,000 पत्नियों से शादी की और 16,000 मूर्तियों में भी प्रकट हो गए, यह सब दिव्य है। इसलिए भगवान कहते हैं, "जन्म कर्म च मे दिव्यम्"—transcendental, beyond calculation.
[कृष्ण की लीलाओं की दिव्यता]
हमारा जो इंद्रिय है, वह इंद्रिय को चालू करके यह सब चीज़ समझना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि हम लोग जानते हैं कि हम एक औरत से शादी करते हैं, तो उससे परेशान हो जाते हैं, और यह 16,000! तो कैसा असंतोष? यह हमारी बुद्धि से अगोचर है, बहुत समझना मुश्किल है। इसे कहते हैं तत्त्वतः। "एवं यो वेत्ति तत्त्वतः।" ऐसे भगवान कृष्ण मथुरा जी में आए थे, उनके मामा के घर में, कंस के घर में, वृंदावन में, फिर चले गए—यह भी ठीक है। यह समझना तत्त्वतः है। वह तत्त्वतः आप समझें। तत्त्वतः समझने के लिए वह भक्ति है। अब ज्ञान से नहीं, योग से नहीं, कर्म से नहीं। भगवान कहते हैं, "भक्त्या मामभिजानाति।" भगवान ने कहीं भी नहीं कहा कि अपने ज्ञान से कोई भगवान को समझ सके। नहीं। भक्ति जो है, वह "ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्"। जब ज्ञान और कर्म से और आगे बढ़िए... कर्म से आगे बढ़ने से ज्ञान, ज्ञान से आगे बढ़ने से योग, योग से आगे बढ़ने से भक्ति। इसलिए भगवान कहते हैं, "भक्त्या मामभिजानाति।" यदि आप भगवान को समझने को चाहते हैं, तो भक्ति। "भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।" चतुर्थ अध्याय में भगवान कहते हैं, "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।" वह तत्त्वतः भगवान को समझने के लिए क्या चाहिए? तो भगवान खुद कहते हैं, "भक्त्या..." भक्ति से, ज्ञान से नहीं बताया, योग से नहीं बताया, कर्म से नहीं बताया।
[कर्मी, ज्ञानी, योगी बनाम भक्त]
ज्ञानी, कर्मी, योगी—यह सब materialists हैं। हाँ, क्योंकि उनका जो मन है, वह भौतिक मन है। जैसे कर्मी लोग; कर्मी लोग चाहते हैं कि हमको स्वर्ग-सुख मिले दुनिया में, जो हो हमको मिले। यह कर्म का मार्ग है। इसलिए कर्म का नाम है सर्वकाम, उसके पास सब कामना है।
`[clears throat]`
"अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।" तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। एक प्रकार के मनुष्य होते हैं जो दुनिया का सब सुख चाहते हैं, सब अच्छी तरह से खूब मिल जाए, सबसे बड़ा ऐश्वर्य। इसका नाम है कर्मी। दिन-भर इसलिए परिश्रम करते हैं। तो उसमें भगवान ने कर्मियों को 'मूढ़' बोला है, मूढ़। क्योंकि दो रोटी खाएँगे, इतना परिश्रम करते हैं, चाहे लाख रुपया कमाएँ, खाएँगे तो दो रोटी बस। इसमें ज्ञान नहीं होता है कि मैं तो दो ही रोटी खाऊँगा और तीन हाथ जगह में सोऊँगा, तो फिर इतना क्यों? यह ज्ञान उनका होता नहीं, इसलिए उनको भगवान ने गीता में कहा है "मूढ़ाः"।
और ज्ञानी, वे चाहते हैं मुक्ति—"ज्ञानतः दुनियादारी से छुट्टी हो।" यह लोग जब परेशान हो जाते हैं, तब ज्ञानी... हाँ, ज्ञानी होने के लिए कोशिश करते हैं कि किस तरह से मुक्ति मिले, ब्रह्म में एक हो जाएँ। उसमें भी कामना है कि हमको मुक्ति मिले। कर्मी चाहते हैं हमको दुनिया का भोग मिले, और ज्ञानी चाहते हैं हमको मुक्ति मिले—कुछ मिले। और योगी; योगी चाहते हैं हमको सब सिद्धि मिले—अणिमा, महिमा, प्राप्ति... हम छोटे से छोटा हो जाएँ, बड़े से बड़ा हो जाएँ, जो चीज़ चाहें उसी वक्त हमको मिले। यह सब योग का फल है। "अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम..." और एक है अकाम, जिसका कुछ कामना नहीं है, वह है भक्त। भक्त जो हैं, वे कुछ नहीं चाहते। वे भगवान से business करने को नहीं चाहते कि, "भगवान, मैं आपकी भक्ति करूँ और हमको आप यह स्वर्ग-सुख दीजिए, या हमको आपसे मिला लीजिए, नहीं तो योग-सिद्धि दीजिए।" नहीं। भक्त लोग, भक्त कहते हैं, "भगवान, कहीं भी हमारा जन्म हो..." वे मुक्ति भी नहीं चाहते, क्योंकि जिसकी मुक्ति हो जाती है, उसका जन्म नहीं होता है। तो भक्त लोग कहते हैं, "कहीं भी हमारा जन्म हो..." मुक्ति भी नहीं चाहते, इतना ही चाहते हैं कि, "आपको भूलूँ नहीं, बस।" कहीं भी हमारा जन्म हो, कहीं भी कीट-पतंग का जन्म हो जाए। ठाकुर भजते हैं, "कीट जन्म होउ जथा तुया दास।" "कीट जन्म होउ जथा तुया दास, अहैतुकी भक्ति..." ब्रह्मा का जन्म हो परंतु आपको मैं भूल गया, इस प्रकार का जन्म नहीं चाहता। कीट का जन्म हो जाए तथापि आपका भक्त रहूँ। क्योंकि भक्तों के पास रहने से कभी मौका मिल जाए उनको भगवद्-भक्त बनने का, कभी मौका मिल जाए। सही बात है। "सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः।" भक्तों के संग से भगवान की कथा जो है, बड़ा सुंदर है, रसायन है—कान का भी रसायन होता है, हृदय का भी होता है।
[केवल भक्ति से ही शांति संभव है]
इसलिए जो जीवन का जो उद्देश्य है मनुष्य जीवन का, वह भगवान को ही प्राप्त करने के लिए एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। और यह जो ज्ञानी, योगी, कर्मी हैं, ये वास्तविक भगवान को नहीं जानते हैं, भगवान से कुछ चाहते हैं, इसलिए यह सब अशांत हैं। चैतन्य-चरितामृत में बताया गया है: "भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकलि 'अशान्त'।" भुक्ति चाहते हैं कर्मी, मुक्ति चाहते हैं ज्ञानी, और सिद्धि चाहते हैं योगी। तो चैतन्य-चरितामृतकार कृष्णदास कविराज गोस्वामी महाराज कहते हैं कि भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी सब अशांत हैं, सब अशांत। क्योंकि उनके मन में कामना है, वे चाहते हैं। "कृष्ण-भक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त'।" यदि आप शांति चाहते हैं, तो कृष्ण-भक्ति से ही होगा, और किसी से नहीं। यह शास्त्र का निर्देश है।
इसलिए भक्ति का जो definition है: "अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥" भक्ति जो है, बिल्कुल साफ़ है—अन्याभिलाषिता-शून्यम्, किसी प्रकार की दुनिया की अभिलाषा नहीं। जैसा प्रह्लाद महाराज; प्रह्लाद महाराज जब नृसिंहदेव का दर्शन किए... नृसिंहदेव जानते हैं, "बेचारे हमारे जो भक्त हैं, बालक, इनको पिताजी बहुत तंग किया, तभी मैं प्रकट हुआ।" तो उस वक्त बोले, "महाराज प्रह्लाद, बेटा, जो वर चाहिए, ले लो।" तो प्रह्लाद महाराज ने बताया कि, "महाराज, हम तो ऐसे ही असुर कुल में हमारा जन्म हुआ है, दुनिया का भोग का विषय हमारी प्रवृत्ति है, और आप जैसे भगवान वर देने को चाहते हैं, बहुत ही लोभनीय है। मैं जो कुछ चाहूँ, आपसे माँग ले सकता हूँ। परंतु ऐसी प्रलोभन में हमको न डालिए। हमको वणिक वृत्ति में न डालिए कि आपकी सेवा करके कुछ आपके यहाँ से लाभ लें, यह हम नहीं चाहते।" तो प्रह्लाद महाराज भगवान के वास्तविक भक्त थे।
[ध्रुव महाराज की अनन्य भक्ति]
तो भगवान के जो भक्त होते हैं, उनको माँगने की ज़रूरत क्या है? जिसको भगवान ही मिल गए हैं... जैसे ध्रुव महाराज; ध्रुव महाराज तपस्या करने को गए, किसलिए? "पिताजी का राज्य हमको मिले।" उनकी जो सौतेली माता थीं, उन्होंने उनका अपमान किया था कि, "तुम अपने पिताजी की गोद में बैठ नहीं सकते हो, क्योंकि तुम्हारा जन्म दूसरी ओर से हुआ है, अगर हमसे होता तो बैठते।" यह अपमान उनको लगा। बड़ा दुःख हुआ, अपनी माता जी के पास गए, रोने लगे। माता जी ने बताया, "बेटा, यह तो भगवान ही तुम्हारी कामना पूर्ण कर सकते हैं।" तो वह पिताजी का राज्य माँगने के लिए भगवद्-भजन करने को गए। बाकी जब भगवान का दर्शन हुआ, तब कहते हैं, "स्वामीन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे।" "मैं तो कृतार्थ हो गया, अब हमको वर माँगना क्या चाहिए? मैं काँच के टुकड़े ढूँढ़ने के लिए इधर आया था, यह हीरा मिलने के लिए, और आप मिल गए।" कोई व्यक्ति अगर काँच के टुकड़े ढूँढ़ता है, लेकिन हीरा मिल जाता है, तो कितना संतोष हो जाएगा! इसी प्रकार जो दुनियादारी का सुख चाहते हैं, किसी तरह से अगर भगवान उनको मिल जाएँ, तो फिर सब भूल जाते हैं। उसी में शांति, उसी में शांति, और किसी में शांति नहीं है—ज्ञान में नहीं है, कर्म में नहीं है, योग में नहीं है, केवल भक्ति में। वह भी भक्ति कौन सी? शुद्ध भक्ति। यही जैसा रूप गोस्वामी बताते हैं: "अन्याभिलाषिता-शून्यं..." कोई प्रकार की अभिलाषा नहीं, शून्यम्। "ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्..." ज्ञान का जो फल होता है मुक्ति, और कर्म का जो फल होता है भोग, इससे भी अनावृत। तो वह क्या किया है? "आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनम्..." अनुकूल भाव से केवल भगवद्-अनुशीलन। अनुकूल और प्रतिकूल; भगवान का चिंतन जैसा कंस; कंस भगवान का चिंतन सब समय करता था—"अब भगवान आए, अब कृष्ण आया..." और जब भाग गया गोकुल में, सबको यही चिंतन लगा रहा कि किस तरह से भगवान को मारें। तो उसको भगवान का चिंतन था, पर प्रतिकूल। इसलिए वह भक्ति नहीं है।
इसलिए रूप गोस्वामी बता रहे हैं: "आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनम्..." अनुकूल भाव से। कृष्ण क्या चाहते हैं? हाँ, कृष्ण जो चाहते हैं, कृष्ण को किस तरह से संतोष हो। जैसे गोपी लोग; गोपी लोग क्या अपनी तरफ से कुछ माँगती थीं? नहीं। केवल सब समय यही चिंतन था कि कृष्ण किस तरह से सुखी रहें। इसका नाम है शुद्ध भक्ति। तो हमारा कहने का मतलब है कि यह जो movement चालू है, यह ऐसी बात नहीं है कि हम लोगों ने एक idea को प्रकट किया है और उसको चालू कर दिया, नहीं। अगर ऐसी होती, तो इतना जल्दी यह नहीं फैलता। इसके भीतर का उद्देश्य है जो भगवान चाहते हैं, भगवान कृष्ण जो चाहते हैं, उसको दुनिया में बताना, बस। भगवान क्या चाहते हैं, वह खुद ही बताए हैं, सब कुछ देख सकते हैं। भगवान कहते हैं, "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।" केवल मुझे, एक भगवान कृष्ण में मन लगाओ। इसमें संपूर्ण... यह भगवान की इच्छा है, प्रकट किया है। आप लोग सब जानते हैं, इसमें कोई बात नहीं है। हम लोग भी यही करते हैं, इसमें हमारा कोई मुश्किल नहीं है। भगवान जो कहते हैं, मैं वही करता हूँ। भगवान कहते हैं, "मन्मना भव मद्भक्तो..." हम लोग कहते हैं, "केवल भगवान के भक्त हो जाओ, कृष्ण भगवान के।" और हम लोग दूसरी तरह की कुछ बातें नहीं बताते। क्योंकि हम जानते हैं सब चीज़ का आखिरी उद्देश्य है भगवान कृष्ण। जितने वेद-शास्त्र हैं—चतुर्वेद, 18 पुराण, रामायण, महाभारत आदि, भागवत—सबका उद्देश्य है कि किस तरह से भगवान कृष्ण को समझा जाए और उनकी सेवा में अपने को लगाया जाए। यही वेद का सार है। और जितने बातें हैं—ज्ञान, कर्म, योग, दूसरे देवताओं का भजन—यह सब क्रमिक अधिकारी के लिए है, जो लोग कुछ समझ लें उनके लिए है, कुछ करें, फिर त्यागें। तो आखिरी बात जो है, यह जैसे भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बता रहे हैं: "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।" केवल भगवान कृष्णचंद्र के चरण-कमल में मन को सब समय लगाकर यह योग साधना है।
[रूस में प्रोफेसर कोटोव्स्की (Professor Kotovsky) से भेंट]
यह योग साधना... दुनिया में हम लोग सब घूमते-फिरते हैं, अनेक वैज्ञानिक, दार्शनिक सबसे मिलते-जुलते हैं। किसी का एक clear idea देखना, सब भेद है। उसको वास्तविक भगवान क्या चीज़ हैं, खुद जानता ही नहीं। यह जीवन क्या चीज़ है, वह भी नहीं जानता। अभी हम Russia में गए थे, एक perfect... Professor Kotovsky हैं, लेकिन इतना बड़ा भारी... हाँ, Professor हैं, वे कहते हैं कि शरीर का शेष हो जाने से सब शेष हो जाता है। कितना बड़ा मूर्ख! जानते ही नहीं कि जीवात्मा नित्य है। शास्त्र तो है ही, शरीर छूटने से फिर और एक शरीर होता है। और उसका हम लोग देख भी सकते हैं कि मैं बचपन में, मैं वही शरीर में था, वह शरीर अभी है नहीं, अभी दूसरा शरीर है, मैं वही हूँ। तो यदि वह बचपन का शरीर नहीं होने से भी मैं अभी मौजूद हूँ, तो यह शरीर नहीं रहेगा, मैं मौजूद रहूँगा, इसमें क्या मुश्किल है समझना? इसी बात को भगवान पहले समझाए हैं: "देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥" तो यह सच बात है, अच्छी तरह से आपके सामने प्रकाशित हो जाए, "असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।" यदि केवल आप यह जो भक्ति-योग, भगवान कृष्णचंद्र के चरणों में मन... यह श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं, "मय्यासक्तमनाः..." तो भगवान के चरणों में आसक्ति बढ़ाने के लिए यह प्रतिकूल है और अनुकूल है। क्योंकि अनुकूल कृष्ण... आपको कृष्णानुशीलन करना पड़ेगा अनुकूल भाव से। अनुकूल का अर्थ होता है जिससे आप जल्दी-जल्दी आगे बढ़ें। अगर प्रतिकूल भाव से काम करेंगे, तो उसमें बाधा पहुँचेगी।
[केवल कृष्ण की शरण]
इसलिए हमारे इस भक्ति-योग में, भगवान की आज्ञा के अनुसार, दूसरे देवताओं का भजन करना मना है। क्योंकि यह जो भगवान में आसक्ति होनी चाहिए, उसमें बाधाएँ आती हैं। जैसे एक बच्चा आपके पास है, वह बच्चा का पालन कीजिए, तो आपके पास जो कुछ है, बहुत अच्छी तरह से आप पालन कर सकते हैं। और अगर 10 बच्चे हो गए, तो ध्यान बँट जाता है, कोई बच्चे को आप अच्छी तरह से पालन नहीं कर सकते, उसमें मुश्किल होती है। इसलिए उचित है यह "अन्याभिलाषिता-शून्यम्"। और देवताओं के पास जाना है, उसमें अन्याभिलाषा है। कोई देवता के पास जाने से हमको धन मिलता है, कोई देवता के पास जाने से हमको रूप मिलता है, कोई देवता के पास जाने से हमको ज्ञान मिलता है, इसी प्रकार अलग-अलग निर्देश हैं। यदि तुमको यह चीज़ चाहिए, तो इस देवता की उपासना करो। यह कोई नहीं है... भागवत में नहीं है। परंतु जो बुद्धिमान है, उसके लिए बताया है: "अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।" उधर अकाम है; अकाम होता है भक्त, जिसका किसी प्रकार की कामना नहीं, अकाम। और सर्वकाम जो कर्मी हैं, और मोक्षकाम ज्ञानी, योगी हैं। तो शास्त्र में निर्देश देता है कि यदि आप कर्मी हों, तब भी भगवद्-उपासना कीजिए। और यदि आप ज्ञानी हों, आपको तो चाहिए मुक्ति, क्या भगवान मुक्ति आपको नहीं दे सकते? आपको चाहिए सिद्धि, क्या भगवान आपको सिद्धि नहीं दे सकते? भगवान के पास सब बल, सब कुछ है। तो भगवान से आप जो कुछ चाहते हैं, आप ले सकते हैं। परंतु फायदा यह है कि दूसरे-दूसरे देवताओं का भजन करने से हमको जो भक्ति है, यह चीज़ नहीं मिलती। और भगवद्-भजन करने से, जिस चीज़ के लिए भगवान के पास आप जाते हैं, वह चीज़ भी मिलेगी और आखिरी में जाकर भक्ति भी मिलेगी।
[शरणागति और निष्कर्ष]
इसलिए भगवान कहते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" और-और जितने भावनाएँ हैं, सब परित्याग करके केवल भगवान के चरणों में शरणागत हो जाइए, उससे आपकी सब मनोकामना पूर्ण होगी और आखिरी में जाकर आपको भक्ति मिलेगी। भक्ति मिलने से क्या लाभ होगा? आप भगवान को समझेंगे, भगवान क्या चीज़ हैं। क्योंकि बिना भक्ति के भगवान को आप समझ नहीं सकते। और यदि भगवान को आप समझ गए, जैसे भगवान बताते हैं: "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥" जो तत्त्वतः हमको समझते हैं, उनको क्या लाभ होता है? "त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति..." तो उसको फिर यह शरीर छोड़कर और भौतिक शरीर नहीं मिलता। भौतिक शरीर नहीं मिलता है, उसका नाम है मुक्ति। तो भगवद्-भक्ति का फल जो है, यदि आप दुनियादारी का सुख चाहते हैं, वह भी मिल सकता है; और यदि मुक्ति चाहते हैं, वह भी मिल सकता है; और यदि आप यह सिद्धि चाहते हैं, वह भी मिल सकता है। आगे जाकर जैसे ध्रुव महाराज, सब कुछ मिलते हुए भी वे कहते हैं, "भगवान, हमको और कुछ नहीं चाहिए, स्वामीन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे।"
और यही परो धर्म बताया गया है श्रीमद्भागवतम् में, इसी को परो धर्म बताया गया है: "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति॥" जिसके द्वारा भक्ति भगवान की... महा-भगवान, उसमें जिस तरह से भक्ति होती है, उस धर्म को धारण करने से... और "अप्रतिहता", उस धर्म में किसी प्रकार का प्रतिबंधन नहीं है, और उसका कुछ कारण भी नहीं है। इस कारण से हम भगवान की भक्ति कर रहे हैं—कोई कारण नहीं। भगवान स्वामी हैं, हमारे लिए उचित है कि उनकी सेवा में लगें। इसका नाम है धर्म। "ययात्मा सम्प्रसीदति"—यदि आप आत्मा का कल्याण चाहते हैं, आत्मा की शांति चाहते हैं, यह परो धर्म का पालन कीजिए। इसलिए भगवान कहते हैं, "सर्वधर्मान्परित्यज्य..." और भागवत में कहते हैं, "धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र..." जो धोखाधड़ी वाला जो धर्म है, वह इसमें नहीं है। जितने धोखाधड़ी वाले धर्म हैं, वह भागवत में त्याज्य हैं। श्रीधर स्वामी अपनी टिप्पणी लगाते हैं, "अत्र मोक्षाभिसन्धिरपि निरस्तः।" मोक्ष मानने वाला जो धर्म है, वह भी धोखाधड़ी है। तो यह सब विचार है, शास्त्र में ही है। जो हमारा यह Krishna consciousness movement चालू है, यह सब शास्त्र-सिद्धांत उनको समझाया जाता है, वे समझते हैं और उसको बहुत जल्दी ग्रहण करते हैं।
[अंतिम प्रार्थना और हरे कृष्ण कीर्तन]
इसलिए हम लोगों का जो आप लोगों से निवेदन है, केवल एक शास्त्र लीजिए, ज्यादा शास्त्र ढूँढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। क्योंकि कलयुग में यह संभव नहीं है। कलयुग में आयु बहुत कम है—"प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः। मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः॥" उनके जितने मनुष्य होते हैं, उनकी आयु कम है, और मनुष्य जीवन को किस तरह से आगे ले जाना है, इसको जानते ही नहीं। मनुष्य जीवन मिला है, अगर कोई जान गया, कोई समझ गया, तो जीवन को आगे ले जाना चाहिए। तो "मन्द मत"—कोई मत पकड़ लिया जो मंद है, जिसमें भगवान का कोई संपर्क नहीं, सब मंद-मंद-मंद। "मन्द-भाग्या"—और भाग्य भी इसका मंद है, और उसके ऊपर जैसा आप लोग इधर Africa में हैं, सब भय है, government क्या उपद्रव करेगी। इस प्रकार की अवस्था है। जो शास्त्र का विधान है, वह ग्रहण कीजिए। वह क्या है? "हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥" तो कहीं भी रहिए, घर में रहिए, बाहर में रहिए, परदेश में रहिए, केवल जैसा देख रहे हैं आपके सामने मौजूद हैं, ये लोग "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" कीर्तन कर रहे हैं। "तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥" यह चैतन्य महाप्रभु का आदेश है। हरि-कीर्तन करने से बहुत आदमी हँसी उड़ाएँगे, बहुत आदमी आपके विपक्ष हो जाएँगे। दुनिया का ऐसा नियम है, जब भगवद्-भजन आप करें न, आपका पिताजी भी विपक्ष हो जाता है। जैसे प्रह्लाद महाराज का, बेचारे पाँच वर्ष का बेटा, हाँ, हरि-कीर्तन करता था, उसके पिताजी हिरण्यकशिपु बहुत ज़बरदस्त उनका दुश्मन बन गया। यह सब हो सकता है, हरि-कीर्तन करने से अपना पिता भी दुश्मन हो जाए, इसमें डरना नहीं। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "तरोरपि सहिष्णुना"—पेड़ को काट दिया जाता है, और उसमें आदमी पानी नहीं देता है, उसका ऊपर से चले जाते हैं, कुछ बोलता नहीं। इसी प्रकार सहिष्णु होना होगा, पेड़ की तरह सहनशील होकर केवल नाम जपते रहिए: "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।"
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥