श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  710912LE-MOMBASA--Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
मोम्बासा, 12-सितंबर-1971
 
 
 
आप लोग, यह बात ठीक नहीं है कि वैष्णव शिव मंदिर में नहीं जाते या भगवान की उपासना नहीं करते। "वैष्णवानां यथा शम्भुः"—भगवान के शास्त्रों में यह महा-विषय बताया गया है। धर्म क्या चीज़ है, बहुत गंभीर है। उसको समझना साधारण बात नहीं है। "तर्कोऽप्रतिष्ठः"—सबसे कौन धर्म ठीक है, कौन धर्म बड़ा है, कौन धर्म छोटा है, यह सब केवल तर्क करके नहीं समझा जा सकता। शास्त्र पाठ करके भी धर्म का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि भगवान का धर्म अत्यंत सूक्ष्म है। "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो"—सब वेदों का पाठ करके असल जो वास्तविक संबंध है, वह भगवान श्रीकृष्ण से ही है।

परंतु शास्त्र में निर्देश है अन्य देवताओं का भजन करना और उपासना करना। वेदों में तीन काण्ड हैं—कर्मकाण्ड, ज्ञानकाण्ड और उपासनाकाण्ड। यह विभाजन है। तो भगवान शंभू का मंदिर जो है, यहाँ वैष्णव लोग भी उपासना करते हैं। परंतु उपासना करके जो साधारण लोग फल की प्रार्थना करते हैं, वह बहुत साधारण प्रार्थना करते हैं कि "हमको धन दीजिए, हमको दौलत दीजिए, हमको संतान दीजिए, हमको मकान दीजिए।" यह सब वैष्णव प्रार्थना नहीं है। वैष्णव भगवान शंभू को नमस्कार करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि "हमको कृष्ण-भक्ति दीजिए।" यह वैष्णव की प्रार्थना है।

जैसे ध्रुव महाराज के प्रसंग में... महाराज कुबेर जी बहुत संतोष होकर ध्रुव महाराज को वर देना चाहते थे और कहे, "जो चाहे हमसे माँग लो।" तो उस समय ध्रुव महाराज चाहते तो सारी दुनिया का जितना धन है, वह सब ले सकते थे। परंतु उन्होंने कुबेर जी से यही प्रार्थना की, "महाराज, हमको भगवान के चरणों में मति रहे, बस यही प्रार्थना है।" और दूसरा कुछ माँगना, वह भगवान कहते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में, अल्प-बुद्धिवालों का काम है। जिनका मस्तिष्क कमज़ोर है, वे ये सब दुनियावी चीज़ों को प्राप्त करने के लिए देवताओं के पास प्रार्थना करते हैं। असल चीज़ जो है, वह है भगवद्-भक्ति। कोई भी देवता हो, उनसे यही प्रार्थना करनी चाहिए कि "किस तरह से कृष्ण-भक्ति प्राप्त हो, हमको यही प्रार्थना दीजिए।" तो कृष्ण का श्लोक चालू है...

आप लोग माफ़ कीजिएगा, हिंदी बोलने में मेरा ज़्यादा अभ्यास नहीं है और शरीर भी अस्वस्थ है, तो हिंदी बोलने में यदि कोई त्रुटि हो... तो यह जो कृष्ण-भक्ति का प्रचार है, इसे अगर आप कहते हैं कि हिंदू धर्म का है—तो वास्तविक हिंदू धर्म का नहीं, यह भागवत धर्म का है। "हिंदू धर्म" बोलने से संकीर्णता आती है। वास्तविक वैदिक शास्त्रों में "हिंदू" यह शब्द कहीं भी नहीं है, हमको तो नहीं मालूम। यह मुसलमानों का दिया हुआ नाम है। जैसे हिंदू, जैसे मुसलमान एक संप्रदाय है, ऐसा वे लोग समझते हैं कि हिंदू एक संप्रदाय है। वास्तविक भारतीय जो धर्म है, वह है वर्णाश्रम धर्म—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।

भगवान स्वयं बता रहे हैं कि ये जो चार वर्ण और चार आश्रम हैं, ये भगवान की सृष्टि की वस्तु हैं। तो क्या यह केवल भारतवर्ष में ही रहेगा? जैसे भगवान की श्रेष्ठ वस्तु सूर्य सब जगह उदय होता है—America में भी सूर्य उदय होता है, जो सूर्य आपको भारत में उदय दिखता है, वही सूर्य 10 घंटा पीछे America में उदय होता है। इसी प्रकार, जो वर्णाश्रम धर्म का विषय भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं, वह वर्णाश्रम धर्म केवल भारतवर्ष में ही रहेगा, यह बात नहीं है। यह सब जगह होना चाहिए। सब जगह में ब्राह्मण हैं, सब जगह में क्षत्रिय हैं, सब जगह में वैश्य हैं, सब जगह में शूद्र हैं।

चाहे वे किसी और नाम से हों, कोई भी जगह जाइए, जो व्यक्ति बुद्धिमान है, ज्ञानी है, उसका नाम है ब्राह्मण। विद्वान, ज्ञानी, उनकी दुनियादारी से कुछ मतलब नहीं है। वे सबके गुरु हैं, सबको भगवद्-भक्ति सिखाते हैं। यह ब्राह्मण का काम है। ब्राह्मण सब वर्णों का गुरु है—the intelligent class. He can be called the intelligent class. तो कहीं भी जाइए, यह intelligence class होती ही है। इसी प्रकार, क्षत्रिय राज्य शासन करने के लिए होते हैं। वैश्य business करने के लिए, व्यापार करने के लिए, कृषि और गौ-रक्षा करने के लिए। वैश्य का स्वाभाविक काम है कृषि, हाँ, किसान लोग जैसे अन्न उत्पादन करते हैं, कृषि और गौ-रक्षा। वैश्य का काम यह है—गौ-रक्षा।

हमारे भारतवर्ष में आजकल वैश्य लोग गौ-रक्षा नहीं करते। वे बड़े-बड़े factory खोलते हैं, हज़ारों रुपया खर्च करते हैं, करोड़ों रुपया खर्च करते हैं, परंतु गौ-रक्षा के लिए कोई ध्यान नहीं है। वैश्य का स्वाभाविक कर्म गौ-रक्षा करना है। जैसे क्षत्रिय का काम है मनुष्यों की, अपनी प्रजा की शासन करके रक्षा करना, इसी प्रकार वैश्य का काम है गौ-रक्षा। और शूद्र का काम सेवा का होता है। शूद्र का स्वाभाविक कर्म है दूसरे की नौकरी करके जीविका चलाना। तो कलयुग में शास्त्र कहते हैं—"कलौ शूद्र-संभवाः"। कलयुग में वास्तव में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य मिलना मुश्किल है। तो कम से कम, ब्राह्मण-क्षत्रिय के लक्षण सब जगह होने चाहिए।

नारद मुनि ने महाराज युधिष्ठिर को बताया है, जैसा श्रीमद् भगवद्गीता में भी है—"ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्"। केवल ब्राह्मण नाम बोलने से नहीं होगा, उसका लक्षण होना चाहिए। जैसे डॉक्टर के पास जाइए, तो उसका कुछ पहचान होता है, stethoscope होगा गले में। तो इसी को कहा गया है कि ब्राह्मण का लक्षण बताया गया है। ऐसा नहीं है कि कोई अपने मनमाने ढंग से कह दे कि "मैं ब्राह्मण हूँ।" उसका लक्षण होना चाहिए। तो लक्षण देखकर तय होता है कि वह ब्राह्मण है कि नहीं है। कलयुग में इतना तो होना ही चाहिए। इसी प्रकार क्षत्रिय का लक्षण है, वैश्य का लक्षण है, शूद्र का लक्षण है। तो नारद जी ने युधिष्ठिर महाराज को बताया है: "यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्..." वर्ण निर्देश करने के लिए जो-जो लक्षण हैं, यदि वे लक्षण किसी दूसरे वर्ण में भी दिखाई पड़ते हैं, तो उस लक्षण से ही उसको निश्चित करना चाहिए कि यह ब्राह्मण है कि क्षत्रिय है कि शूद्र है।

इसी प्रकार, यह जो कृष्ण-भावनाभावित आंदोलन चल रहा है, हमारे शास्त्र के अनुसार, ये European, American और जितने भी भारत के बाहर के लोग हैं, उनको हम लोग म्लेच्छ, यवन, चंडाल आदि कहते हैं। परंतु श्रीमद्भागवतम् में लिखा है:

"किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुल्कशा आभीर-शुम्भा यवनाः खसादयः।
येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥"

ये जो किरात जाति के लोग हैं, हूण जाति के लोग हैं, यवन हैं, आभीर हैं, और भी कोई पापी जाति के लोग हों, यदि वे भगवान कृष्ण के शुद्ध भक्त का आश्रय ग्रहण करें, तो वे शुद्ध हो जाते हैं। शास्त्र का यह निर्देश है। यदि कोई ब्राह्मण के घर में पैदा हुआ हो, पर उसमें लक्षण शूद्र के हों, तो वह शूद्र है। और यदि कोई शूद्र के घर में पैदा हुआ हो, परंतु उसमें लक्षण ब्राह्मण के देखे जाते हैं, तो लक्षण के द्वारा ही उसका निर्देश होना चाहिए। यदि उसमें ब्राह्मण का लक्षण है, तो उसको ब्राह्मण मानना चाहिए, और यदि उसमें शूद्र का लक्षण है, तो उसको शूद्र मानना चाहिए। यह शास्त्र का नियम है।

तो ये जितने आपके सामने America और Europe के हमारे साथ कम से कम 100 भक्त आए हैं, और India में भी हैं, इधर भी कुछ हैं, Europe और America में बहुत ज़्यादा हैं, इन सबमें ब्राह्मण के लक्षण हैं। इन्हें साधारण न समझिए। "वैष्णवे जाति-बुद्धिः"—वैष्णव जब कोई हो जाता है, तो उसमें जाति-बुद्धि नहीं रखनी चाहिए, वह नारकी बुद्धि है। "अर्च्ये विष्णौ शिला-धीर् गुरुषु नर-मतिर् वैष्णवे जाति-बुद्धिः..." जैसे भगवान का श्रीविग्रह है, सब कोई जानते हैं कि वह पत्थर या लकड़ी का बना हुआ है, पर जो विग्रह की पूजा की जाती है, उसे कोई साधारण पत्थर या लकड़ी समझे; गुरु को कोई साधारण मनुष्य समझे; और वैष्णव में जाति-बुद्धि रखे—वह नारकी है, शास्त्र ने ऐसा मना किया है। तो इनका आचार-विचार सब ब्राह्मण का है।

ऐसी बात नहीं है कि ये लोग किसी और के आदेश में आते हैं और कहते हैं कि "तुम जो कुछ भी खाओ, जो कुछ भी करो।" नहीं, हमारे movement में ऐसी बात नहीं है। अगर कोई दीक्षित होना चाहता है, तो उससे प्रतिज्ञा कराई जाती है कि वह अवैध स्त्री-संग नहीं करेगा (अपनी विवाहित पत्नी को छोड़कर किसी अन्य स्त्री से संपर्क नहीं रखेगा), मांस, मछली, अंडा आदि का भोजन नहीं करेगा, और नशा (चाय, कॉफ़ी, सिगरेट आदि) नहीं करेगा, और जुआ नहीं खेलेगा। यह प्रतिज्ञा करने के बाद ही उसको दीक्षित किया जाता है। पहले उसको हरिनाम दिया जाता है माला जपने के लिए। छह महीने के पश्चात् जब देखा जाता है कि वह ठीक-ठीक माला जप रहा है और उसका आचार-विचार सब ठीक है, तब उसको दीक्षित किया जाता है। इसी प्रकार से ये लोग सब वैष्णव बने हैं। ऐसा नहीं है कि कोई अपने sentiment से ये लोग नाच रहे हैं। ये लोग शुद्ध वैष्णव हैं। इसलिए शुद्ध वैष्णवों में जाति-बुद्धि नहीं करनी चाहिए और उनको ब्राह्मणों का सम्मान देना चाहिए। यह शास्त्र का निर्देश है।

तो यह जो आंदोलन चल रहा है सारी दुनिया में, जैसा आपको बताया गया है, हमारी 62 शाखाएँ हैं। America में ज़्यादा हैं, प्रायः 40 शाखाएँ हैं। खाली America ही नहीं, New York में है, Los Angeles, San Francisco, Boston, Moscow और सब जगह, सब बड़े-बड़े शहरों में हमारा मंदिर है। सबसे बड़ा मंदिर Los Angeles और New York में है। और एक-एक मंदिर में कम से कम 25 से लेकर 200 तक ऐसे भक्त सब रहते हैं, और सब समय नियमित पूजा-पाठ, कीर्तन, सब कुछ किया जाता है। और उनको ग्रंथ दिया गया है अंग्रेजी में। चैतन्य-चरितामृत को अंग्रेजी में रूपांतरित किया गया है, जिसे 'Teachings of Lord Chaitanya' कहते हैं। 'Bhakti-rasamrita-sindhu' को भी अंग्रेजी में रूपांतरित किया गया है ('Nectar of Devotion')। जैसा कि पुस्तकें प्रस्तुत हैं, आप देख सकते हैं। और श्रीमद्भागवतम् तथा श्रीमद् भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द का अर्थ देकर भागवत को प्रकाशित किया गया है अंग्रेजी में, विशेषकर दशम स्कंध को 'Krishna' नाम से दो भागों में प्रकाशित किया गया है। और 'Back to Godhead' जो पत्रिका है, वह अंग्रेजी में दो लाख छपती है, और हिंदी में भी इसका प्रकाशन शुरू हुआ है। और सब भाषाओं में—German भाषा में, French भाषा में, Spanish भाषा में, Japanese भाषा में—यह सब प्रकाशित हो रहा है। तो यह जो कृष्ण-भक्ति है, कृष्ण-भावनाभावित संघ है, इसका हमने नाम दिया है—अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (ISKCON)।

तो यह सुनिए, हम लोग केवल हिंदू धर्म का प्रचार करने के लिए नहीं आए हैं। पहले बहुत से स्वामी जी भी आए थे, जिन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार करने का प्रयास किया था, विशेष रूप से वेदांत के नाम पर। परंतु वास्तव में जो कृष्ण-भक्ति है, वह सबके लिए है। यह कोई खास हिंदुओं के लिए या केवल भारत के लिए नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: "सर्व-योनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥" भगवान कहते हैं कि जितने भी अनेक प्रकार के जीव हैं, जितनी भी योनियाँ हैं, उन सभी जीवात्माओं का पिता मैं हूँ। तो भगवान कृष्ण केवल हिंदुओं के लिए क्यों होंगे? नहीं, भगवान कृष्ण केवल मनुष्य समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पशु, पक्षी, कीट-पतंग, पेड़-पौधे—सबके लिए हैं। तभी तो भगवान सब जीवात्माओं के मूल हैं। "नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्"—यह शास्त्र का निर्देश है। भगवान मूल चेतन वस्तु हैं, और जितने जीवात्मा हैं, वे सब उनके अंश हैं। तो अंश का काम है पूर्ण की सेवा करना। जैसे आपके शरीर में अनेक अंश हैं—हाथ है, पैर है, आँखें हैं, उँगलियाँ हैं, इन सबका काम है पूर्ण शरीर की सेवा करना। इसी प्रकार, प्रत्येक जीव मात्र भगवान का अंश है, इसलिए सबके लिए उचित है भगवान की सेवा करना। यह शास्त्र का निर्देश है। इसलिए श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान स्वयं बता रहे हैं: "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"।

तो यह जो कृष्ण भावनामृत आंदोलन (Krishna consciousness movement) है, यह वैदिक शास्त्रों पर आधारित है। ऐसा नहीं है कि मैंने खुद अपने मन से इसका आविष्कार किया है और इसे प्रचार कर रहा हूँ। यह आज नहीं, 5000 वर्ष पहले ही स्थापित हो गया था, जब श्रीमद् भगवद्गीता लिखी गई थी, जैसा कि आप लोग जानते हैं। तो कृष्ण भावनामृत कोई नया आंदोलन नहीं है। यह 5000 वर्ष पहले जब भगवान स्वयं उपस्थित थे, उस समय से यह आंदोलन चालू है। भगवान श्रीकृष्ण ही स्वयं मूल भगवान हैं—"कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"। और जितने भी अन्य भगवान के रूप हैं, वे उनके अंश हैं। कृष्ण में 100% गुण हैं, और अन्य रूपों में 90%, 80%, 70% गुण होते हैं, ऐसा शास्त्र का निर्देश है। आप लोग, जीवात्मा भी जब मुक्त हो जाएँ, तो आपको भगवान के गुणों का कुछ अंश मिलता है, वह भी 78% तक, ऐसा शास्त्र का निर्देश है। जीवात्मा क्यों, देवता लोग भी—शिवजी, ब्रह्माजी—कोई भी भगवान के समान नहीं हैं। "असम-ऊर्ध्व"—भगवान के समान कोई है ही नहीं, और भगवान से ऊपर भी कोई नहीं है, सब उनके नीचे हैं। इसलिए भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बता रहे हैं: "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते"। देवता लोग भी भगवान के ही विभूति-स्वरूप हैं। महाविष्णु, जिनके एक निश्वास से सारा ब्रह्मांड, अनंत कोटि ब्रह्मांडों का सृजन होता है—

"यस्यैक-निश्वसित-कालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः।
विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥"

यह शास्त्र का विचार है।

तो कृष्ण-भक्ति यह साधारण चीज़ नहीं है। भगवान बता रहे हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥" करोड़ों मनुष्यों में से कोई एक जीवन में सिद्धि लाभ करने के लिए प्रयत्न करता है। सब नहीं करते। सब तो दिन-भर गधे की तरह परिश्रम करके जीविका उपार्जन करने में लगे रहते हैं, कृष्ण के विषय में कोई नहीं जानता। तो भगवान कृष्ण को समझना, भगवान कृष्ण का भक्त होना, यह साधारण बात नहीं है। "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥" अनेक जन्मों तक तपस्या करके, ज्ञान की चर्चा करके, कोई भगवान कृष्ण के चरणों में शरणागत होता है। ऐसा महात्मा मिलना बहुत मुश्किल है, यह शास्त्र का विचार है।

परंतु ये जो आप लोग देख रहे हैं, जिन्हें आप लोग म्लेच्छ या चंडाल कह सकते हैं, इन्होंने जो वैष्णव भक्ति को प्राप्त किया है, वह निश्चित रूप से अनेक जन्मों की सुकृति का फल है। अगर नहीं भी किया हो, तो यह भगवान कृष्ण की विशेष कृपा है कि चैतन्य महाप्रभु के रूप में स्वयं भगवान कृष्णचंद्र यह कृष्ण-प्रेम सारी दुनिया को दे रहे हैं—

"नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः॥"

भगवान ने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में सबको बताया था कि "सर्व-धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"—सब छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। परंतु मंद और मूर्ख लोग इसे समझ नहीं पाए, उन्होंने भगवान कृष्ण की अवज्ञा की और उन्हें साधारण मनुष्य समझा। इसलिए भगवान ने कृपा करके फिर चैतन्य महाप्रभु के रूप में, एक भक्त के रूप में आकर सिखाया कि किस तरह से कृष्ण-भक्ति की जाती है। इसलिए आप देख रहे हैं कि जिन्हें हम लोग म्लेच्छ समझते थे, वे आज भगवान के चरणों में समर्पित हैं।

यह बड़ा सुंदर चैतन्य महाप्रभु की एक भविष्यवाणी को सिद्ध करता है: "पृथ्वीते आछे यत नगरादि ग्राम। सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥" महाप्रभु की भविष्यवाणी है कि सारी दुनिया में जितने भी शहर और गाँव हैं, सब जगह चैतन्य महाप्रभु का नाम प्रचारित होगा। किस तरह से? इसी कृष्णभावनामृत के प्रचार द्वारा। चैतन्य महाप्रभु क्या सिखा रहे हैं? "यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश"। चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है कि किसी से भी मिलो, केवल कृष्ण-उपदेश सुनाओ। कृष्ण-उपदेश क्या है? श्रीमद् भगवद्गीता है, और कृष्ण के विषय में उपदेश श्रीमद्भागवतम् है। इन दो ही चीज़ों का हम लोग प्रचार करते हैं, इसमें कोई मिलावट नहीं करते। जैसा भगवान कृष्ण बताते हैं, उसी प्रकार हम लोग बताने का प्रयत्न करते हैं, और वह काम कर जाता है। उसमें अगर आप कुछ और मिलाकर रख दीजिएगा, तो वह काम नहीं करेगा। भगवान कृष्ण बताते हैं: "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय"—मुझसे बढ़कर और कोई सत्य नहीं है। हम लोग भी यही बताते हैं कि श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान हैं, उनसे बढ़कर और कोई नहीं हो सकता। भगवान कृष्ण बता रहे हैं: "मन्मना भव मद्भक्तो"—मेरे भक्त हो जाओ, सब समय मेरा चिंतन करो, मुझे नमस्कार करो, मेरे भक्त बन जाओ, इसी से तुमको मुक्ति मिलेगी। भगवान कहते हैं: "सर्व-धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। हम लोग भी यही बताते हैं कि सब कुछ छोड़कर एकमात्र कृष्ण के चरणों में शरणागत हो जाओ।

और इसमें बहुत काम हो रहा है, आप लोग देख रहे हैं। अभी यहाँ आने के समय, हम लोग रास्ते में एक घंटा रुके थे, तो वहाँ भी नौजवान लोगों ने हमें देखा और कहने लगे—"हरे कृष्ण! हरे कृष्ण!" सारे Europe में, सारे America में यह हरे कृष्ण महामंत्र खूब प्रचारित हो रहा है। और आप लोगों से निवेदन है कि यहाँ Mombasa में, आपके Africa में भी इसका प्रचार करने के लिए, कृष्ण-भक्ति का प्रचार करने के लिए आप लोग प्रयास कीजिए। और इसमें सफलता मिलेगी। ये जिन्हें आप लोग African कहते हैं, ये लोग भी आए हैं, ऐसा प्रभाव है। हमारे बहुत से African शिष्य बड़े सुंदर वैष्णव बनकर नाम-कीर्तन कर रहे हैं। तो आप लोग यहाँ बहुत सक्षम हैं, आप लोगों से यही निवेदन है कि जिस तरह से शुद्ध कृष्ण-भक्ति का प्रचार हो, उसका आयोजन कीजिए। इसमें जगत का मंगल होगा, इस देश का मंगल होगा और आपका भी मंगल होगा।

धन्यवाद।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥