भगवान को आस्वादन मिल सकता है। यह सब विचार है। इसलिए भगवान सिखा रहे हैं—रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः (रसो प्रभास)। यदि आप इसका अनुसंधान करें कि ये सूरज की किरण किधर जाती है, तो आप research कीजिए ना। जीवन भर research कीजिए। तो समझ लीजिए आप सूर्य तक पहुंच गए। देखो, ये सूरज की जो किरण है, इधर से निकलती है। अब फिर जाके research कीजिए कि सूर्य कहां से आया। ऐसा अगर आप उसको research करते रहिएगा, तो आगे जाकर के देखिएगा कि कृष्ण सब का मूल हैं—अहं सर्वस्य प्रभवो।
तो दो किस्म का ज्ञान है—inductive and deductive। जैसा research करके आप जाइए कि सूर्य किरण कहां से आता है, और सूर्य कहां से आता है, वो सूर्यनारायण कहां से आता है। जाइए आगे, पहले ब्रह्मा तक पहुंचिए। फिर ब्रह्मा कहां से आता है? फिर गर्भोदकशायी विष्णु के पास पहुंचिए। फिर उधर जाइए, वो कहां से आता है? तो ये कारणोदकशायी विष्णु से आता है। फिर कारण विष्णु कहां से आता है? ना, संकर्षण से आता है। संकर्षण कहां से आता है? ना, नारायण से आता है। नारायण कहां से आता है? ऐसे ही जाइए, आखिरी में जाके देखिएगा—ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥
तो आप चाहे खुद research करके देख लीजिए, नहीं तो परंपरा से गुरु की बात मान लीजिए। दोनों में आपको ज्ञान हो सकता है। जो गुरु है, परंपरा अनुसार है, वो जो कह दिया—"देखो जी, कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।" जैसे उदाहरण, ये लोग (विदेशी भक्त), हमने कह दिया और इन्होंने मान लिया कि भगवान एक ही हैं—कृष्ण। ये लोग मान लिया, भगवान का नाम ले रहे हैं, बस! अब खुद बड़े सुखी हैं और आगे बढ़ रहे हैं। तो दोनों तरफ से ज्ञान लाभ होता है। एक तो आप ढूंढते रहिए जीवन भर—चिरं विचिन्वन्—चिरकाल चिंता करते रहिए कि "भगवान क्या चीज है? भगवान क्या चीज है?" यह एक रास्ता है ज्ञान लाभ करने के लिए। और एक रास्ता है कि जो गुरु ने बोल दिया, उसको मान लीजिए, काम खत्म! जैसे भगवान की बात—हाँ, यह भगवान की बात हम लोग मान लें, तो फिर भगवान को समझने में क्या देर लगती है? क्या research की जरूरत है? केवल समय नष्ट करना! भगवान कृष्ण जब बोलते हैं—मत्तः परतरं नान्यत्—"मुझसे बढ़कर कोई परतत्त्व नहीं है"—तो मान लो, काम खत्म! फिर भगवान को ढूंढने के लिए वो Theosophical Association, this association, that association—न जाने क्या सब बनाया है! "भगवान को ढूंढो!" भगवान ऐसे मिलते हैं क्या?
अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि। जानति तत्त्वं... चिरं विचिन्वन्॥ जिसको तो भगवान की थोड़ी ही कृपा मिली है, वही कुछ भगवान को समझ सकता है। उपनिषद् में कहा है—नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यह जो आत्मा (परमात्मा) है, यह केवल प्रवचन करने से नहीं मिलता, और दिमाग बहुत अच्छा होने से भी नहीं मिलता, और बहुत वेद-वेदान्त पाठ सुनने से भी नहीं मिलता। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः—जिसको भगवान कृपा करते हैं, उसको मिलता है। भगवान खुद भी कहते हैं—भक्त्या मामभिजानाति—केवल भक्ति से हमको जान सकता है, नहीं तो और कोई उपाय नहीं। इसलिए सबके लिए उचित है कि यह कृष्ण भक्ति, कृष्ण भावनामृत संघ में जो प्रचार करना है, इसको सब ग्रहण कीजिए। और सरल उपाय है:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
Thank you very much.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥