श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  720121LE-JAIPUR_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
जयपुर, 21-जनवरी-1972
 
 
 
[संगीत] Evening, January 21, Jaipur.

भक्तिरधोक्षजे अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति — सभी चाहते हैं आत्मा सुप्रसन्न रहे। तो वह आत्मा सुप्रसन्न रखने के लिए जो तरीका है, वह है भगवद्-भक्ति। सब परो धर्म। भौतिक जगत में मनुष्य आत्मा को सुप्रसन्न करने के लिए अनेक प्रकार की चेष्टा, प्रयत्न कर रहे हैं। परंतु शास्त्र हमें निर्देश दे रहा है कि यदि आत्मा को सुप्रसन्न करना चाहते हो, तो पर-धर्म को जाग्रत करो, अपर-धर्म से काम नहीं बनेगा। स वै पुंसां परो धर्मो... श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यतो धर्मात् कृष्ण-श्रवण-लक्षणा तद्भवती स परो धर्मः। कृष्ण-कीर्तन, श्रवण-कीर्तन, विष्णु-स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य — यह जो नवधा भक्ति है, सब से शुरू होती है भगवद्-भक्ति। भक्ति का अर्थ होता है जिस कार्य द्वारा भगवान को प्राप्त हो सकें, उसका नाम है भक्ति। भगवान को समझने के लिए भक्ति एकमात्र उपाय है और उसका नाम है परो धर्म — उत्कृष्ट धर्म।

तो श्रीधर स्वामी इसलिए कहते हैं कि पर-धर्म कौन सी चीज़ है? यतो धर्मात्... जिस धर्म को जाग्रत करने से कृष्ण-श्रवण-लक्षणा भवती स परो धर्मः। आत्यन्तिक श्रेय। आत्यन्तिक श्रेय — श्रेय का अर्थ है सबसे बड़ा लाभ। दो चीज़ें होती हैं: श्रेय और प्रेय। श्रेय जो... जैसे बालक लोग चंचल होते हैं, खेलने-कूदने में उनको अच्छा लगता है। तो दिन भर उसको खेलने दिया जाए, तो वह समझता है कि हमको बहुत आनंद हो रहा है; यह है प्रेय। और श्रेय क्या चीज़ है? श्रेय यही चीज़ है, जैसे पिता-माता कहते हैं, "दिन भर खेलो नहीं, पढ़ो। जाओ, Master Saheb के पास जाओ, school जाओ, सीखो।" वह है श्रेय। श्रेय का अर्थ होता है जो अंत में, अंतिम में जो सुख है, असल जो सुख है, उसका नाम है श्रेय। और यह भगवद्-भक्ति जो है, वह परम श्रेय है। हां, हां, [गला साफ़ करने की आवाज़]।

तो श्रीधर स्वामी कहते हैं कि एवं श्रेय एकांतिक वास्तविक मंगल। और पहले सूत गोस्वामी भी बताए हैं कि यह जो कृष्ण-प्रश्न आप लोग किए हैं, यह भवल्लोक-मङ्गलम् है। यह प्रश्न केवल सुनने से लोक का मंगल हो जाए। आगे जाके और भी कहेंगे: शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः। यह जो भगवान का विषय है, केवल श्रवण-कीर्तन करने से... और आगे नहीं बढ़ सकता है, तो भी उसको पुण्य लाभ होता है। पुण्य-श्रवण-कीर्तनः — कोई कुछ समझे और न समझे, यह जो Hare Krishna मंत्र का उच्चारण हो रहा है, इस शब्द से ही सबका पुण्य हो जाता है। इसलिए कहते हैं लोक-मंगलम और श्रेय। कृष्ण-कथा सुनने में यह पुण्य होता है, श्रेय, परम श्रेय, जिसका अभी नहीं लाभ होता है, आगे जाके कृष्ण का चरणारविंद उसको लाभ होगा। क्योंकि पुण्य कार्य करते-करते पाप बिल्कुल नष्ट हो जाता है, और पाप नष्ट हो जाने से ही फिर भगवान के चरणों में दिल लगता है। हां, भक्ति ठीक-ठीक शुरू होती है।

येषां त्वन्तगतं पापं... [नाक से की जाने वाली आवाज़] पापी जो है, वह भगवद्-भजन नहीं कर सकता। भगवान खुद कहते हैं: येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। केवल जो पुण्य कर्म करते हैं... तो पुण्य कर्म करने से, कर्मकांडी विचार से, यज्ञादि साधन अनेक कुछ करना पड़ता है। परंतु कलयुग में वह सब साधन बड़े मुश्किल हैं। हां, वह याज्ञिक ब्राह्मण भी नहीं मिलता है। और यज्ञ आदि साधन करने के लिए सामग्री एकत्रित करना, वह भी बड़ा मुश्किल है। त्रेतायां यजतो मखैः — भगवान रामचंद्र के युग में यज्ञादि साधन संभव था। अभी वह सब चीज़ संभव नहीं है। अभी जो यज्ञ है, यही यज्ञ है — संकीर्तन-यज्ञ। जो आज सात-आठ रोज़ इधर हम लोग यह साधन कर रहे हैं कि गोविंद जी के मंदिर में यह जो कीर्तन हो रहा है, यही यज्ञ है। यजन्ति हि सुमेधसः — जिसका मेधा, मस्तिष्क ठीक है। मेधा यानी मस्तिष्क ठीक नहीं होने से भगवद्-भजन भी नहीं हो सकता।

और जिसका मेधा ठीक नहीं है, वह दूसरे-दूसरे देवताओं की पूजा करता है। भजन नहीं, पूजा। पूजा में और भजन में फर्क है। पूजा माने किसी व्यक्ति को आपने बुला लिया, अच्छी तरह से बैठाया, खाने को दिया और नमस्कार किया, और फिर कहते हैं, "देखिए साहब, एक नौकरी हमको दिला दीजिए, एक certificate हमको दे दीजिए।" उसका नाम है पूजा। तो कोई किसी को बुला करके अपना जो मतलब है, उसको साधन करे, उसका नाम है पूजा। और भजन का यह अर्थ नहीं है। भजन का मतलब होता है जिसमें कोई मतलब नहीं। हां, अन्याभिलाषिता-शून्यं — सब किस्म के मतलब से विवर्जित, उसका नाम है भक्ति। इसलिए सूत गोस्वामी कह रहे हैं कि अहैतुकी अप्रतिहता — कुछ हेतु, हेतु-मूलक नहीं। भगवद्-भजन करना कोई हेतु नहीं, कोई कारण नहीं। भगवान से नित्य संपर्क है — नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्।

इसलिए श्रीधर स्वामी कहते हैं कि यतो धर्मात् कृष्ण-श्रवण-लक्षणा — श्रवण, आदर से श्रवण करना। आदर-लक्षण। भक्ति का अर्थ होता है आदर, प्रेम। प्रेम से, प्रेम-भक्ति। पहले विधि-भक्ति; विधि-भक्ति से जब आगे बढ़े हैं, तब प्रेम-भक्ति। तो वह शुरू होती है श्रवणादि-लक्षणा। भगवान का विषय श्रवण, यही आदि है। शास्त्र में कहते हैं: अतः श्रीकृष्ण-नामादि न भवेद् ग्राह्यम् इन्द्रियैः। यह जो हमारा इन्द्रिय है उपस्थित, इस इन्द्रिय द्वारा भगवान का नाम भी श्रवण ठीक-ठीक हो नहीं सकता। हां, यह दस अपराध का विचार है। शुद्ध नाम होने से भगवद्-प्रेम, और शुद्ध नाम के पहले नामाभास होने से मुक्ति, और नाम-अपराध से दुनिया का... यह सब विचार है।

तो चैतन्य महाप्रभु ने इस श्रवण के विषय में बहुत ज़ोर दिया। और सब जितने साधन हैं, वह कलयुग में उसको काम में ले आना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु से जब श्री रामानंद राय से बातचीत हो रही थी, उस समय श्री रामानंद राय ने जब बताया, ब्रह्मा जी का एक श्लोक भागवत से उद्धृत करके बताया: स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिः — अपना-अपना स्थान में रह के, श्रुतिगतां — कान से सुनो भगवान की बात। इसका नाम है श्रवण। ज्ञान-प्रयासम उदपास्य — यह ब्रह्मा जी ने बताया, उसको उद्धृत करके श्री रामानंद जी ने चैतन्य महाप्रभु को सुनाया कि, "महाराज, मैंने ऐसा सुना है भागवत से कि कोई व्यक्ति ज्ञान के प्रयास को छोड़कर..." यह जो ज्ञानी लोग अपने प्रयास से भगवान को समझने को चाहते हैं, उसको छोड़कर — ज्ञाने प्रयासम् उदपास्य — उसको छोड़ देना चाहिए, वह तो वृथा है। पश्यन्त एव कोटि-कोटि वर्ष बरस — अपनी बुद्धि से भगवान को समझना, यह असंभव है। अगर कोटि-कोटि वर्ष बरस अगर वह चेष्टा करे, तो वह जहाँ के तहाँ। भगवान कहते हैं: बहूनां जन्मनामन्ते — अनेक कोटि वर्ष के पश्चात जब उसकी यह बुद्धि खुल जाती है सत्संग से, भगवद्-भक्त से, कि भगवान के चरणों में आत्म-समर्पण करना ही सबसे बढ़िया चीज़ है। तो उसको चैतन्य महाप्रभु ने स्वीकार किया कि "इहो हय, आगे कहो।" यह श्रवण-कीर्तन।

तो श्रीधर स्वामी भी वही चीज़ बता रहे हैं: यतो धर्मात् कृष्ण-श्रवण-लक्षणा भवती स परो धर्मः। कथा की हेतु? तदहैतुकी अप्रतिहता — विघ्न-अनभिभूता। तो यह श्रवण, भगवान का विषय श्रवण करना... अपनी बुद्धि से भगवान को समझना, यह संभव है नहीं। सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः — भगवान भी कहते हैं कि सत्संग, साधु-संग में भगवान का विषय श्रवण करना चाहिए। यह ऐसा भाड़ा नहीं कि कुछ पैसा दिया, जैसे नाचते हैं नाचने वाले, ऐसे ही भागवत भी पढ़ दिया; वह नहीं। वास्तविक अनुभवी भगवद्-भक्त, उनके मुखारविंद से श्रवण करना चाहिए। सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो... फिर भगवान की जो कथा है, वीर्य-संविद्, ठीक-ठीक श्रवण करने से उसका काम बन जाता है। इसलिए श्रीधर स्वामी कहते हैं: श्रवणादि-लक्षणा — आदर से, भक्ति से भगवद्-विषय श्रवण करो।

वनं व्रजेत् — 50 वर्ष के ऊपर में वह वानप्रस्थ ग्रहण करे, फिर उसके बाद संन्यास ग्रहण करे। बाकी कलयुग में यह सब बड़ा कठिन है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि आपका स्थान परिवर्तन करने की कोई आवश्यकता है नहीं। परंतु जो भगवद्-भक्त हैं, उनके मुखारविंद से श्रवण करो। श्रवण करते-करते यह जो हमारा हृद-रोग, काम है, वह नष्ट हो जाएगा। चेतो-दर्पण-मार्जनं — भगवद्-कीर्तन। भगवद्-कीर्तन का अर्थ होता है जैसे यह मृदंग और झांझ से हम लोग कीर्तन करते हैं, यह भी कीर्तन है। और जो आपके सामने श्रीमद्भागवतम् का विषय सुना रहा हूँ, यह भी कीर्तन है; यह नहीं कि कीर्तन नहीं है, वही कीर्तन है। कहीं भी भगवद्-कीर्तन हो, और सतां प्रसङ्गात् — जो कि शुद्ध भक्त हैं, जिसका और कोई अभिलाष नहीं है, अन्याभिलाषिता-शून्यं। जो भागवत पाठ करके अपना गृहस्थी को पालन करेंगे, पैसा जमाएंगे, वह बात... वह श्रवण करने से कभी काम नहीं बनेगा, उसमें बहुत देर लगेगी, क्योंकि यह वैष्णव विचार के विरुद्ध है।

और हमारे सनातन गोस्वामी यह बताते हैं: वैष्णव-मुखोत्गीर्णा पूत-हरिकथामृतम् / श्रवणं नैव कर्तव्यं — जो वैष्णव आचार से भ्रष्ट हैं, इन professional भाड़े टट्टूओं के मुंह से भगवद्-कीर्तन सुनना ही नहीं चाहिए, मना कर दिया। क्योंकि उसमें कुछ फल नहीं, विपरीत फल होता है। उसका उदाहरण देते हैं: सर्पोच्छिष्टं यथा पयः — जैसे दूध है, बहुत उत्तम वस्तु है, परंतु उसको सांप अगर मुंह लगा दे, तो उसको पीने से बस मृत्यु; यह शास्त्र में कहते हैं। यह ठीक नहीं है कि कहीं भी भगवद्-कथा सुन लें, वह ठीक है। इस तरह से कि चंदन को किसी तरह से घिसो, उसमें सुगंध ज़रूर आएगा, परंतु विधि से घिसने से जल दिया... इसलिए विधि-भक्ति जो है, उसको जाग्रत करना चाहिए। शास्त्र में निर्देश जैसा है, इस प्रकार भक्ति। जैसे चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी को सिखाया, सनातन गोस्वामी को सिखाया, और वह सब और दूसरे को सिखाया। एवं परम्परा-प्राप्तम् — इसी प्रकार परंपरा से, हां, भगवद्-भक्ति याजन करने से काम बन जाता है।

इसलिए सतां प्रसङ्गात्... भगवान खुद भी बताते हैं। अन्याभिलाषिता-शून्यं — जिसका और कोई अभिलाष नहीं है, केवल मात्र भगवान की सेवा करने की इच्छा है और कुछ नहीं। ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम् — और ज्ञान का जो निर्भेद ब्रह्मानुसंधान, यह भी छोड़कर। अनेक हैं, उनका विचार है कि अभी भगवद्-भक्ति याजन किया जाए और आगे जाकर के भगवान के साथ हम मिल जाएं — सायुज्य-मुक्ति। सायुज्य-मुक्ति शास्त्र में है, परंतु शुद्ध वैष्णव जो हैं, वह सायुज्य-मुक्ति नहीं चाहते। सायुज्य-मुक्ति नहीं, कोई प्रकार की मुक्ति नहीं चाहते, क्योंकि मुक्ति उनको मांगने की कोई वस्तु ही नहीं है, उनको तो भगवद्-प्रेम चाहिए।

इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि:
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥

"हे जगदीश! मैं धन भी नहीं चाहता, और अनेक अनुगमनकारी यह शिष्य और कुछ leader हम बन जाएं, यह भी नहीं चाहता। न धनं न जनं न सुन्दरीं — और साधारण सुन्दरी स्त्री, घर, पुत्र, पौत्र, यह सब चाहते हैं, श्री, यश, श्री और यह सब चाहते हैं।" तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "यह भी नहीं चाहता।" और जन्मनि जन्मनि — जन्म का निवृत्ति भी नहीं चाहते, क्योंकि मुक्ति होने से फिर जन्म नहीं होता। तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "जन्म-जन्म में आपके चरणों में अहैतुकी भक्ति रहे।" न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये / मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि। यही सूत गोस्वामी यही बताते हैं, यही परंपरा जो पूर्व काल में सूत गोस्वामी बताए थे, वही चीज़ फिर चैतन्य महाप्रभु बता रहे हैं। अप्रतिहता — यह जो गोस्वामी कहते हैं कि स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। कोई कारण नहीं, भगवद्-भजन कोई कारण से नहीं। "इसलिए मैं भगवद्-भजन... भगवान प्रभु, मैं उनका नित्य दास, हमारा उचित है सब समय भगवान की सेवा में लग्न रहना।" इसी में मुक्ति है, यही मुक्ति है। मुक्ति अलग ढूंढना नहीं पड़ेगा।

हां, बिल्वमंगल ठाकुर जैसे बता रहे हैं: भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा यदि भगवन् स्याद्... "हे भगवान! यदि आपके चरणों में स्थिर भक्ति रही, हिलने-चलने वाली नहीं, fixed अगर भक्ति रहे, तो मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽस्मान् — मुक्ति जो है, वह हाथ जोड़ के खड़ी रहती है: 'महाराज, आपके लिए क्या मैं करूँ?' नौकरानी।" तो भगवद्-भक्त मुक्ति क्यों चाहे? मुक्ति, अनेक मुक्तियां उनकी सब दासी हैं, उनको मुक्ति की कोई आवश्यकता है नहीं। हां, जैसे नारद मुनि सब जगह कीर्तन करते-करते घूमते फिरते हैं। नरक में भी जाते हैं। उनको नरक में जाते हैं... कोई राजा अगर जेलखाना में गया देखने के लिए कि कैदी लोग कैसे हैं, तो वह क्या जेलखाना का कैदी रहा? नहीं, वह राजा ही रहा। इसी प्रकार भगवद्-भक्त यदि जगत में भगवद्-भक्ति प्रचार करने के लिए जहन्नुम में भी जाता है, नरक में भी जाता है, वह भगवद्-भक्त ही रहता है, वह नरक-भोगी नहीं है। यह विचार है। वह कहीं भी जाए, वह वैकुंठ में रहता है। हां, कहीं भी जाए। क्यों? भगवान खुद कहते हैं: "तत्र तिष्ठामि नारद यत्र..." जब भगवान वहां रह गए, तो नरक में भी जाए, वह वैकुंठ है। जब भगवान खुद कहते हैं, "तत्र तिष्ठामि नारद", हृदय में रहता हूँ... तो भगवान क्या नरक में रहते हैं? ईश्वरः सर्व-भूतानां... तो भगवान सूअर के हृदय में भी हैं। तो जब सूअर के हृदय में हैं, तो सूअर तो गू खाता है, तो भगवान क्या नरक में रहते हैं? नहीं। भगवान, भगवद्-भक्त सब समय बस वैकुंठ में ही रहता है। तो इसलिए उनके लिए मुक्ति की क्या आवश्यकता है? वह तो सब समय वैकुंठ में ही रहता है। यह विचार है शास्त्र का।

तो श्रीधर स्वामी इसलिए कहते हैं कि वह यतो धर्मात् कृष्ण-श्रवण-लक्षणा भक्तिस्तृप्तिर्भवती स परो धर्मः। यह पर-धर्म जो भगवान का नाम कीर्तन करते-करते जो वैकुंठ में रहता है, वह पर-धर्म। जैसे प्रह्लाद महाराज बता रहे हैं कि, "भगवान, मैं इस संसार से डरता नहीं।" नैवोद्विजे पर दुरत्यय... "क्यों? सब कोई डरता है, तुम डरते नहीं?" "मैं डरता नहीं।" "क्या बात है?" त्वद्-वीर्य-गायन-महामृत-मग्न-चित्तः — "क्योंकि हमारे चित्त को ऐसा बना लिया है कि सब समय आपका वीर्यवान, वीर्यवती जो कथा है, उसे सुनने में हमारी रुचि है।" त्वद्-वीर्य-गायन-महामृत-मग्न-चित्तः। "तो तुम्हारा सोचने का क्या चीज़ है?" शोचे ततो विमुख-चेतस इन्द्रियार्थ-माया-सुखाय भरम् उद्वहतो विमूढान् — "मैं सोचता हूँ इन विमुख चेतसा, माया-सुख के लिए जो बहुत विमूढ़ हैं। यह जो मूर्ख लोग सब समय माया-सुख के लिए दो, दस, पच्चीस, पचास, सौ वर्ष के लिए, हां, केवल परिश्रम करते हैं पशु की तरह। किस तरह से पैसा मिले, किस तरह से रुपया मिले, किस तरह से सुख मिले, वह माया-सुख है, वास्तविक सुख नहीं है। और उसके लिए बड़ा भारी भ्रम उद्भव, बहुत भारी-भारी काम करना, बड़ा-बड़ा factory, बड़े-बड़ा industry... इसलिए, इसलिए मैं सोचता हूँ, और कुछ नहीं।" तो भगवद्-भक्त जो हैं, उनका यही काम है। प्रह्लाद महाराज जैसा सोचते हैं — यह जो मूर्ख लोग हैं, इनको कैसा भगवद्-भक्ति में लगाया जाए। ऐसा नहीं है कि अपने लिए केवल भगवद्-भक्ति जाग्रत किया जाए, नहीं। पर-दुःख-दुःखी — दूसरे के दुःख से दुःखी होना चाहिए। दुःखी होकर उनको जगाना चाहिए, क्योंकि बिना भगवद्-भक्ति द्वारा उसको कभी सुख नहीं मिलेगा, यह असंभव है। भगवान खुद कहते हैं: भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम्। सुहृदं सर्व-भूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ इधर भी यही बात कहते हैं सूत गोस्वामी: ययात्मा सम्प्रसीदति। यदि आत्मा को सुप्रसन्न करने को चाहते हो, तो सब समय कृष्ण-कथा में निमग्न रहो।

कृष्ण-कथा... भगवान खुद कृष्ण-कथा हम लोगों को दे गए हैं — श्रीमद् भगवद्गीता। साधारण व्यक्ति... श्रीमद् भगवद्गीता यह प्रवेशिका है आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए, पहली गीता, श्रीमद् भगवद्गीता। वह भगवान खुद बता रहे हैं कि भगवान क्या चीज़ हैं, किस तरह से भगवान के चरणों में आगे हम लोग बढ़ सकेंगे, सब चीज़ उसमें बताई विधि है। वह विधि श्रीमद् भगवद्गीता समझ के, जैसे भगवान बता रहे हैं: सर्व-धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। जब भगवान में शरणापत्ति हो जाए, तो फिर उसका जीवन सफल। इसका एक व्याख्यान श्री चैतन्य-चरितामृत में कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं: श्रद्धा। आदि श्रद्धा। भगवद्-भक्ति याजन करने के लिए पहली बात है श्रद्धा। जैसे आप लोग सब इधर बैठे हैं — श्रद्धा, कि भगवद्-कीर्तन इधर हो रहा है, सुनो, ध्यान देकर के सुनो। यह श्रद्धा। श्रद्धा परिपूर्ण जितना आगे बढ़ेंगे, वह भगवद्-भक्ति पूर्णता लाभ करेगी। वह श्रद्धा असल चीज़ है। आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गोऽथ भजन-क्रिया। ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति — यह क्रम है। तो सुनना चाहिए। सुनते-सुनते, सुनते-सुनते चेतो-दर्पण-मार्जनं — चित्त-दर्पण मार्जन हो जाएगा। फिर भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणम् — यह जो संसार चक्र में सब कोई जल रहा है। नरोत्तम दास ठाकुर कह रहे हैं कि: विषय-विषानले, दिबा-निशि हिया ज्वले — यह जो कर्मी लोग हैं, यह विषय के अनल में हैं, और सब समय उनका दिबा-निशि हिया जल रहा है, उनका जो हृदय है, वह सब समय जल रहा है। तरिबारे ना कइनु उपाय — इस विषय से तर जाने का कोई उपाय मैंने नहीं किया। उपाय क्या है? गोलोकेर प्रेम-धन, हरि-नाम-संकीर्तन, रति ना जन्मिल केने ताय — उसमें हमारी रति नहीं। यह जो गोलोक से, गोलोक वृंदावन से, भगवद्-धाम से यह नाम, नाम रूप से भगवान अवतार ग्रहण किए हैं, इसमें हमारी प्रीति नहीं। रति ना जन्मिल केने ताय।

और कृष्णदास कविराज गोस्वामी वही श्रद्धा को बढ़ाने के लिए कहते हैं:
'श्रद्धा'-शब्दे — विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय।
कृष्णे भक्ति कैले सर्व-कर्म कृत हय॥

यह श्रद्धा। यह भगवान कृष्ण के चरणों में शरणागत होकर उनका भजन करने से हमारा सब काम हो गया, बस। और दूसरी काम करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम् — कि यदि भगवान की आराधना है, फिर और क्या तपस्या? सब तपस्या का फल वही। श्रीधर स्वामी भी बताए हैं कि यथा कृष्ण-विषय-संश्लेषणादेव... जो सब शास्त्र का जो सार है, वह कृष्ण-भक्ति। सब शास्त्र, वेद, वेदांत जो कुछ है, शास्त्र का उद्देश्य है कि भगवान के चरणों में शरणागति। भगवान खुद भी कहते हैं: वेदैश्च सर्वैर अहमेव वेद्यो — सब वेद-वेदांतों को पढ़ के आगे जाकर के यदि यह बुद्धि हमारी हो जाए कि वासुदेवः सर्वम् इति — भगवान ही सब चीज़ हैं, भगवद्-भक्ति एकमात्र है। इस प्रकार जिसकी बुद्धि हो जाती है: बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ वासुदेव, भगवान कृष्ण के चरणों में शरणागति हो जाए, तब इसका जीवन सफल। वही सबसे उच्च श्रेय है। श्रेय और प्रेय का बात आपको समझाया। श्रेयो हि श्रेयः — सबसे बड़ा श्रेय है यह भगवद्-भक्ति लाभ करना, भगवान के चरणों में शरणागति और भगवान की सेवा में लग जाना। फिर मुक्ति त्याग है। मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि-सेवितास्मान्। जो विचार... भक्तियोगेन यः सेवते — जो भक्ति-योग से सब समय भगवान की सेवा में नियुक्त है, स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते — वह मुक्त बहुत दिन आगे ही, बहुत दिन पहले ही हो चुका है, उसके लिए मुक्ति की कोई ज़रूरत नहीं। मुक्ति से आगे बढ़े, पंचम पुरुषार्थ, वह भगवद्-प्रेम के लिए आगे जा रहे हैं। हां, मुक्ति साधारण के लिए है, और भक्ति मुक्ति का बाप है। मद्भक्तिं... ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं labhate parām॥ तो मुक्ति हो जाने के बाद जो भक्ति है, वह परा भक्ति है। यही आज का हम लोगों का विषय था।

Thank you very much. Hare Krishna.
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥