श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  720120LE-JAIPUR_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
जयपुर, 20-जनवरी-1972
 
 
 
"भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥" (Bhagavad-gita 7.4) तो भगवान की दो प्रकार की प्रकृति है—अपरा और परा। जब अपरा प्रकृति में मैं आसक्त रहता हूँ, उस समय जो धर्म याजन करता हूँ, वो अपरा धर्म है। जैसे हम लोग समझते हैं कि हमारा धर्म है हिंदू धर्म, कोई समझता है कि हमारा धर्म मुसलमान धर्म, क्रिश्चियन धर्म, कोई समझता है हमारा धर्म है देश की सेवा, देश-धर्म, कोई समझते हैं हमारा समाज की सेवा, ये हमारा धर्म। तो ये सब जितने धर्म हैं, क्योंकि ये शरीर से संपर्कित हैं, इसलिए सब अपरा हैं, निकृष्ट धर्म हैं। तो निकृष्ट धर्म में रहने से ठीक धर्म याजन होता नहीं। इसको शास्त्र में कहते हैं 'कैतव धर्म'। कैतव का अर्थ होता है छलना, cheating। भागवत में पहले ही कह दिया कि "धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र" (Srimad-Bhagavatam 1.1.2), कि जितना cheating धर्म है, छलनापूर्वक धर्म है, ये धर्म के नाम से चलता है, असल में धर्म नहीं है। पहले थोड़ा समझिए कि धर्म किसको कहा जाए। धर्म शास्त्र में कहते हैं, "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्" (Srimad-Bhagavatam 6.3.19)—धर्म जो भगवान की वाणी है, भगवान का जो हुकुम है, वो है। क्यों? जीव है भगवान का अंश मात्र। "ममैवांशो जीवलोके..." (Bhagavad-gita 15.7)—जीव जैसा कई बार आप लोगों के सामने प्रस्तुत किया, ये जैसा हमारा उंगली है, ये शरीर का अंश है। और मैं चाहता हूँ उंगली थोड़ा सिर में हमको खुजलाने का काम शुरू करे, पैर में थोड़ा... ऐसा करे। तो जैसा कि ये अंश का उचित है पूर्ण का हुकुम मानना। और भी बहुत सा उदाहरण हो सकता है, जैसे government खुद हुकुम दिया आपको, विधानसभा में सभापति जो हुकुम देगा उसको मान लें। इसी प्रकार कोई कानून... तो धर्म का अर्थ होता है जिसको आप छोड़ नहीं सकते। आप ऐसा नहीं कर सकते हैं कि government का कानून नहीं मानते। नहीं, फिर आपको तकलीफ में पड़ना होगा, दुखी होना होगा। government शासन करेगी। तो धर्म क्या चीज है? धर्म वो चीज है जो भगवान ने बना दिया, उसका नाम है धर्म। जैसा भगवान बना देते हैं, हाँ, जैसा इमली है वो खटाई और ईख है वो मिठाई है, ये भगवान ने बनाया। पानी जो है वो तरल है और पत्थर जो है कठिन है, ये कौन बनाया? भगवान ने बना दिया। तो पत्थर है और कठिनता है, नहीं ऐसा हो नहीं सकता कि जहाँ पत्थर रहेगा वहाँ कठिनता न रहे, जहाँ पानी रहेगा उधर तरलता रहेगी, जहाँ अग्नि है उधर ताप है, प्रकाश है। तो धर्म इसी प्रकार है, इसको समझना चाहिए। धर्म ये नहीं है कि मनमाना कुछ धर्म बना लिया। धर्म का अर्थ यह है—जो कि जो चीज साथ में रहती है। जैसे आपके हाथ में थोड़ा सा चीनी कोई दे, आप जानते हैं इसका धर्म है मिठास। अगर वो चीनी को आप आस्वादन करके देखते हैं, मीठा नहीं है, तो क्या ये चीनी है? क्योंकि वो उसका धर्म नहीं है। इसी प्रकार समझना चाहिए जीवात्मा का धर्म क्या है? सब चीज का अलग-अलग धर्म है। तो जीवात्मा जो है, भगवान का अंश है, उसका धर्म क्या है? अंश का धर्म है पूर्ण की सेवा। यही धर्म है। भगवद्-सेवा, यही असल धर्म है।

इसलिए शास्त्र में कहते हैं, "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" (Srimad-Bhagavatam 1.2.6)। तो ऐसे बहुत से हैं नाना प्रकार के, बाकी वो शास्त्र में कहते हैं ये सब cheating धर्म हैं, ये सब धर्म हैं, इसलिए भगवान कहते हैं, "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (Bhagavad-gita 18.66)। क्योंकि वो cheating धर्म सब पड़े हुए हैं, इसलिए भगवान खुद आकर उनको सिखा रहे हैं। धर्म... भगवान क्यों आते हैं? धर्म संस्थापन... धर्म को संस्थापन करने के लिए। "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥" (Bhagavad-gita 4.7-8)। तो भगवान तो आते हैं धर्म संस्थापन करने के लिए, ये भगवान के अवतार का अर्थ होता है कि वो धर्म संस्थापन करें। और फिर जाके भगवान कहते हैं कि "सर्वधर्मान्परित्यज्य..."। यदि भगवान धर्म को संस्थापन करने के लिए आए हैं, फिर सब धर्म को छोड़ने को क्यों कहते हैं? ये विचार करना। छोड़ने के लिए इसीलिए कहते हैं कि वो सब धर्म नहीं हैं, वो सब cheating हैं। हाँ, धर्म का अर्थ छलना, cheating... जिस धर्म में भगवद्-भक्ति सिखाई नहीं जाती, भगवान के चरणों में शरणागति सिखाई नहीं जाती, वो cheating धर्म है, स्पष्ट बताया। "स वै पुंसां परो धर्मो..." वही श्रेष्ठ धर्म है, उत्कृष्ट धर्म है, जिस धर्म द्वारा भगवद्-भक्ति सीखी जाए। तो भक्ति... तो भक्ति का अर्थ होता है—भगवान और भक्त, और बीच में जो कार्यक्रम है, उसका नाम है भक्ति। सब एक हैं—भगवान भी मौजूद हैं, भक्त भी मौजूद हैं, और भक्त से भगवान से जो कार्यक्रम है, उसका नाम है भक्ति। अब वो भक्ति कैसी? अहैतुकी। "भगवान हमको कुछ देंगे, भगवान से कुछ अदा करना है, इसलिए मैं भक्ति कर रहा हूँ"—नहीं, वो शुद्ध भक्ति नहीं है। भक्ति की कोई हेतु... हाँ, "भगवान हमारे प्रभु हैं, हमारा काम है भगवान की सेवा"—ये शुद्ध अहैतुकी है। जैसा उंगली हमारा अंश है, हम दस दिन इसको खाने को नहीं देंगे, बाकी सेवा करो, उंगली नहीं कहेगी, "अब हमको खाने को नहीं दिया, हम सेवा नहीं करते।" नहीं, भगवान चाहे जिस अवस्था में हमको रखते हैं, हमारा काम है सेवा। जैसा महाराज कुलशेखर मुकुंदमाला-स्तोत्र में कहते हैं, "यद्भाव्यं तद्भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्..." जो होने वाला है हमारे कर्मफल के अनुसार, वो होने दीजिए, वो हम परवाह नहीं करते, बाकी हमारा मन सब समय आपके चरणों में अर्पित रहे, यही मैं चाहता हूँ। श्री चैतन्य महाप्रभु सिखा रहे हैं, "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये..." (Siksastaka 4)। ये जो आरती गीत गाते हैं, "जो ध्यावे फल पावे... धन-धान्य घर आवे, जय जगदीश हरे..." जगदीश का भजन करते हैं कि हमारा धन घर में आए, ये शुद्ध भक्ति नहीं है। ये हेतुकी है। "मैं भगवान की आरती कर रहा हूँ, भजन कर रहा हूँ, कीर्तन कर रहा हूँ, इसलिए हमारे घर में धन आवे"—ये शुद्ध भक्ति नहीं है, ये विद्धा भक्ति है, ज्ञान-कर्म का आवरण है। कर्मी लोग जैसा कुछ profit माँगते हैं, हाँ, इतना जो परिश्रम करते हैं कर्मी लोग, उसका अगर कुछ profit न हो, कुछ लाभ न हो, तो वो कहते हैं, "बेकार का काम क्या?" परंतु भक्ति जो है, इस प्रकार भौतिक profit लाभ करने के लिए, भौतिक लाभ करने के लिए नहीं है। "हमारा पैसा अभी हज़ार है, भगवान की भक्ति करते हैं, मैं दस कर लूँगा, लाख कर लूँगा"—इसको भक्ति नहीं कही जाती है, परंतु भजन कहा जाता है। "चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन" (Bhagavad-gita 7.16)—ये जो भजन है, ये सुकृतिमान करते हैं, ये भी पुण्यवान करते हैं। भगवान के पास मंदिर में जाते हैं, भगवान के पास जाते हैं कुछ माँगने के लिए, उसको भी शास्त्र में पुण्यवान कहा है, सुकृति। क्योंकि जो पापी है, वह भगवान के पास जाता ही नहीं। इसलिए अगर भगवान के पास कोई कामना लेकर जाए, तो भी "पुण्य-श्रवण-कीर्तनः" (Srimad-Bhagavatam 1.2.17)—कोई भी भाव से अगर भगवान का नाम, गुण, लीला, परिकर, वैशिष्ट्य श्रवण किया जाए, तो वो पुण्य होता है। बाकी भक्त के लिए पाप-पुण्य नहीं। पाप भी बंधन का कारण है, पुण्य भी बंधन का कारण है, इसलिए भगवद्-भक्त जो है, पाप-पुण्य के ऊपर... हाँ, वो पाप-पुण्य से उनको मतलब नहीं है, उनका मतलब है भगवान को संतुष्ट करना, उसमें पाप हो, पुण्य हो, परवाह नहीं। इसलिए कहते हैं शुद्ध भक्ति का जो विचार है—"अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्..." (Bhakti-rasamrta-sindhu 1.1.11)—कोई अभिलाषा नहीं, बिल्कुल शून्य, अन्याभिलाषिता-शून्य, ज्ञान-कर्म से अनावृत। और ज्ञानी... ज्ञानी लोगों का विचार है—निर्विशेष-ब्रह्मानुसन्धान, ये ब्रह्म से मिल जाना, एक हो जाना, ये ज्ञानी का विचार है। ज्ञान, कर्म... और कर्मी का विचार है—हमको भौतिक सुख मिले, हमको स्वर्गलोक प्राप्त हो जाए, जनलोक, महर्लोक... वहाँ अच्छे से खाने को मिले, ये कर्मी का विचार है। बाकी भक्ति का जो विचार है, वो ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्—ज्ञान का, कर्म का जो फल है, उससे अतीत। जैसा श्रीधर स्वामी बता रहे हैं कि श्रीमद्भागवतम् में जहाँ "धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र" (Srimad-Bhagavatam 1.1.2), उधर श्रीधर स्वामी कहते हैं—"अत्र श्रीमद्भागवते मोक्ष-वाञ्छा-अभिसन्धिरपि निरस्तः।" जो मोक्ष कामना करते हैं, वो भी निरस्त है, वो भी ठीक नहीं। मोक्ष के ऊपर... इसको कहा जाता है अहैतुकी भक्ति, "अप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति" (Srimad-Bhagavatam 1.2.6)। इस प्रकार की जो भक्ति है, वो कभी प्रतिहत नहीं हो सकती। "साहब, हम तो गरीब हैं, हम कैसे भक्ति याजन करें? अभी तो पेट के लिए धंधा कर रहा हूँ"—नहीं, अप्रतिहता। चाहे आप गरीब हैं, चाहे अमीर हैं, चाहे मूर्ख हैं, जो कोई हैं, चाहे नीच हैं, चाहे पापी हैं, सबके लिए खुला है, अप्रतिहता, कोई प्रतिहत नहीं हो सकता। केवल चाहिए हमको निश्चित करना कि "मैं भगवान के चरणों में अर्पित हो जाऊँगा।" काम... ये बात नहीं है कि "हम मूर्ख हैं, अभी वेदांत पढूँगा, ज्ञान लाभ करूँगा, तब जाकर के हम भक्ति करूँगा", कि "हम अभी गरीब हैं, अभी हमको दो-चार लाख, दस लाख कमाने दो, फिर भक्ति करूँगा", "अभी हम बालक हैं, अभी हम भक्ति कैसे करूँगा?" इसमें बालक भी कर सकता है। देखिए, ये एक बालिका, चार बरस उम्र है, देखिए नाच रही है। अप्रतिहता। ये बात नहीं है कि बालिका है, छोटी है, उसका भी ज्ञान लाभ करना पड़ेगा और उसको और सब काम करने... भक्ति नहीं, immediately। क्योंकि इस जगत में बालक और वृद्ध का क्या विचार है? सभी वृद्ध हैं, सभी बालक हैं। कोई बालक है, इसकी कोई guarantee है क्या कि वो सौ वर्ष जिएगा? नहीं। जब जीवन है... प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतान् इह। दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्॥" (Srimad-Bhagavatam 7.6.1)—ये जो मनुष्य जीवन है, एक तो दुर्लभ, बहुत मुश्किल से मिला। चौरासी लाख योनियों में जो भ्रमण करते-करते... एक अगर वृक्ष हो गया, तो दस हज़ार बरस खड़ा रहेगा। अमेरिका में वो सफा बगीचा में देखा, उसको परिचय दिया—ये सात हज़ार वर्ष इसकी उम्र है, अभी तगड़ा है, अभी और सात हज़ार वर्ष रहेगा। और इस प्रकार जीवन मिलता है। ऐसे लंबा-चौड़ा जीवन मिलने से क्या लाभ है? बड़े-बड़े scientists लोग चाहते हैं कि मनुष्य समाज ज्यादा करके जिंदा रहे। तो जिंदा रहने से क्या फायदा होगा? ऐसे तो पेड़ भी जिंदा है। हाँ, जिंदा चाहे दो ही बरस रहा हो, भगवद्-भक्ति लाभ कर लो, तब जीवन सफल। नहीं तो पेड़ की तरह ऐसे दस हज़ार वर्ष खड़े रहने से क्या लाभ? शास्त्र में ऐसा विचार किया है, "तरवः किं न जीवन्ति..." (Srimad-Bhagavatam 2.3.18)—ये जो वृक्ष हैं, ये क्या जीते नहीं हैं? और अगर कोई कहे जीता है, बाकी ये जो मैथुन सुख इनको नहीं है, तो शास्त्र ही जवाब देता है—कुत्ता, सूअर का भी वो सुख है, क्या वो नहीं है? इसी प्रकार सब विचार किया। हाँ, तो मनुष्य जीवन का उचित है—"स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे"। भगवान का नाम है अधोक्षज, विज्ञान का पर्याय है। प्रत्यक्ष, परोक्ष, अपरोक्ष, अधोक्षज, अप्राकृत—सब ज्ञान एक नहीं है। साधारण व्यक्ति का ज्ञान जो है—प्रत्यक्ष, सामने आँख में जो कुछ देखता है, उसको ही समझता है सत्, और सब नहीं। वो प्रत्यक्ष ज्ञान, बाकी ये ज्ञान ठीक नहीं है। हमारा अप्राकृत कोई नाम है, हम आँख से कभी देखा नहीं, तो उसका मतलब वो नहीं है? नहीं, ऐसा नहीं है। इसी प्रकार भगवान को अगर हम देखते भी नहीं, उसका मतलब ये नहीं है कि भगवान नहीं हैं। "ये हमको भगवान को दिखाओ!" अरे, तुम भगवान को कैसे देखोगे? पहले तो practice करो कैसे भगवान को देखना होता है। "प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति" (Brahma-samhita 5.38)—भगवद्-प्रेम लाभ करो। किस तरह से भगवद्-प्रेम लाभ करना होता है, उसको सीखो, आगे बढ़ो, भगवान को जरूर देखोगे। कैसे देखोगे? हाँ, "भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव..." चौबीस घंटा भगवान ही खाली देखोगे। खाली आँख बनाओ। हाँ, आँख बनाने का तरीका क्या है? "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्..." (Narada-pancaratra)—ये जो अभी हमारी आँख है, आँख से मैं देखता हूँ, बाकी क्या देख रहा हूँ? "ये हमारा देश है, हमारा family है, हमारा शरीर है, हमारा बच्चा है, हमारा पुत्र है, हमारा धन है"—यही सब देख रहा हूँ। अब जब देखोगे कि यह शरीर भी भगवान का है, यह धन भी भगवान का है, यह देश भी भगवान का है, जो कुछ देख रहा है... तो जैसा भगवान सिखा रहे हैं, "रसोऽहमप्सु कौन्तेय..." (Bhagavad-gita 7.8)—कि ये जो पानी पीते हो, ये पानी का जो रस है, मैं हूँ। इसी प्रकार देखना शुरू करो। पानी तो सब कोई पीते हैं। जब पानी पियो, आस्वादन करो, उसी प्रकार भगवान को देखो। देखो जी, ये जो आभास है भगवान का, "प्रभास्मि शशिसूर्ययोः..." इस प्रकार शास्त्र में जैसा भगवान खुद निर्देश दे रहे हैं, इस प्रकार देखने को शुरू करो। सर्वतः... अगर ये देखते हो पानी को, "हमारे देश का पानी है", और जो भगवद्-भक्त है देखता है, "ये जो पानी का रस है, ये भगवान हैं"—इतना फर्क है। "प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन..." इसी प्रकार भगवद्-भक्ति, भगवद् अर्थात भगवद्-प्रेम। सब समय भगवान का स्मरण, श्रवण, कीर्तन। "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥" (Srimad-Bhagavatam 7.5.23)—अनेक प्रकार की भगवान सुविधा दिए हैं, वो अनेक प्रकार की सुविधा लें, चाहे एक लें, एक लें। जैसा इधर है, इधर श्रवण भी होता है, कीर्तन भी होता है, भगवान का अर्चन भी होता है, दास्य भी होता है, सख्य भी होता है, और सर्व समर्पण... इधर सब है, नवधा भक्ति पूर्ण। अगर ये पूर्णता कोई नहीं कर सकता है, तो भगवद्-भक्ति ऐसी अपूर्व वस्तु है जो नवधा के भीतर नौ करो, आठ करो, सात करो, छह करो, पांच करो, आगे एक... कम से कम एक भी तो करो। जैसा ये श्रवण का... सुनता... ये जो आप लोग सब, सब जगह में केंद्र खुल रहा, क्यों? ये आदमी को श्रवण का सुयोग दिया जाता है। कम से कम इधर आएँ, कुछ सुनें, वो सुनते-सुनते ही हो जाए। जैसा परीक्षित महाराज—"श्रीविष्णुः स्मरणे परीक्षित्..." अब जो परीक्षित महाराज, जब उनको मरने का समय हुआ, सात दिन notice मिला। देखो जी, सात दिन में तुमको मरना पड़ेगा, ब्राह्मण बालक उसको श्राप दे दिया कि तुमको मरना पड़ेगा। बड़ा अन्याय किया था, उसी से कलयुग शुरू हो गया। तो उनको सात दिन time मिला, तो सात दिन क्या करना चाहिए? तो सब बड़े-बड़े ऋषि, बड़े-बड़े सब देवता तथा बड़े पृथ्वी के सम्राट सब पहुँच गए। तो उस समय शुकदेव गोस्वामी पहुँच गए, क्योंकि परीक्षित महाराज भक्त थे, और शुकदेव गोस्वामी ने उस समय पहुँच गए कि इतना बड़ा भारी भक्त है कि अब देहत्याग करेंगे, मैं उनसे थोड़ा देखूँ... उनके पिताजी व्यासदेव भी मौजूद थे। तो अनेक प्रकार के ऋषि, अनेक मुनि... परीक्षित महाराज ने पूछा, "अब अंतिम समय में हमको क्या करना चाहिए?" तो कोई कहा, "आप योग करिए", कोई कहा, "ध्यान कीजिए", कोई कहा, "कर्म कीजिए, कर्मकांड का कीजिए।" बाकी शुकदेव गोस्वामी ने बताया, "महाराज, आप केवल भगवान का कीर्तन सुनिए, श्रीमद्भागवतम् सुनिए।" तो सब ऋषि लोग सहमत हुए कि ये जो शुकदेव गोस्वामी कह रहे हैं, यही चीज... तो महाराज ने सुना और कुछ कार्यक्रम नहीं किया, केवल बैठकर भागवत सुना। इसीलिए "श्रवणे परीक्षित्"—परीक्षित महाराज केवल श्रवण करके ही वो मुक्त हो गए, भगवान का चरण उनको प्राप्त हुआ। और शुकदेव गोस्वामी केवल कीर्तन करके। ये कीर्तन... ये जो हम अभी आप लोगों को सुना रहा हूँ, ये भी कीर्तन है। कीर्तन का अर्थ ये नहीं है कि ढोल और झाँझ देकर के कीर्तन। कीर्तनात्—भगवान का गुणगान जहाँ विचार होता है, वो भी कीर्तन है। "तस्मात् कीर्तनं विष्णोः..." और किसी का नहीं। जब हम लोग meeting में जाते हैं, कोई political leader का विषय सुनते हैं, वो श्रवण में... "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः" इसमें काम होगा, और नहीं तो वो United Nations में केवल श्रवण-कीर्तन ही होता है, अन्य इधर-उधर बताया सब बीस वर्ष से peace स्थापन करने के लिए, वो श्रवण से कुछ काम नहीं। वो चाहे हज़ारों वर्ष करते रहें, ये श्रवण से काम नहीं। "कीर्तनं विष्णोः"—ये शास्त्र का... इसकी meeting बनाइए, इसकी assembly बनाइए, इसका भी... "ये जो अग्नि जल रहा है, ये मेरे बाप..." तो यह सब विचार है, शास्त्रीय विचार है, बड़े-बड़े आचार्यों के विचार हैं। इसको छोड़ न दीजिए, इसको ग्रहण कीजिए। ये सब निर्भूल विचार हैं। साधारण व्यक्ति के चार दोष होते हैं—भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और विप्रलिप्सा। और जो मुक्त व्यक्ति है... इसीलिए 5000 वर्ष पहले ये भागवत को लिखा गया था और श्रीमद् भगवद्गीता भगवान स्वयं बताए थे, वो पुरानी नहीं हुई है, वो आज तक नवीन है। आज तक उसमें बड़े-बड़े ऋषि लोग, आचार्य लोग उसमें लाभ उठाते हैं। इसका क्यों? ये कोई मूर्ख बद्ध जीव का लिखा नहीं है, ये मुक्त जीव का लिखा है जिसका चार दोष नहीं है—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा। इसलिए शास्त्र उसको माना जाता है। देखिए, श्रीमद् भगवद्गीता, श्रीमद्भागवतम् में बुद्धदेव का विषय लिखा है—"कीकटेषु भविष्यति" (Srimad-Bhagavatam 1.3.24)। क्योंकि 5000 वर्ष पहले श्रीमद्भागवतम् की रचना की गई थी और बुद्धदेव आज से ढाई हज़ार वर्ष पहले उनका जन्म हुआ, इसलिए भागवत में भगवान का अवतार जहाँ वर्णन है, बुद्धदेव का भी नाम दिया है, परंतु लिखता है "भविष्यति"—आगे जाकर के होगा। इसका नाम है शास्त्र। त्रिकालज्ञ—तीन काल को जानते हैं, भूत, भविष्यत् और वर्तमान। सब कुछ... भगवान खुद कहते हैं कि "मैं भूत, भविष्यत्, वर्तमान सब कुछ जानता हूँ।" इसलिए उसी को ग्रहण करना चाहिए जो कि भूत, भविष्यत् और वर्तमान सब कुछ जानता हो। भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं कि "देखो अर्जुन, तुम क्यों इतना शोक करते हो? तुम, हम और जितने सिपाही, राजा लोग इधर आए हैं, ये पहले भी थे, अभी भी हैं और आगे भी रहेंगे।" इसका नाम है भूत, भविष्यत्, वर्तमान समस्त। जो इस प्रकार भूत, भविष्यत्, वर्तमान समझते हैं, जिनकी आँख तीन इंच की नहीं है—अभी बत्ती बुझ जाए तो आँख सब खत्म हो जाए—वो नहीं, वो बत्ती जले और न जले, देख सकता है भूत, भविष्यत्। उनसे सुनना चाहिए, उनकी बात लेनी चाहिए। और नहीं तो "अन्धा यथान्धैरुपनीयमानाः" (Srimad-Bhagavatam 7.5.31)—एक अंधा और अंधे को पार कर रहे हैं, सभी गड्ढे में गिर जाएँगे। हरे कृष्ण, thank you।

पशु जो होता है चार पैर वाला, वो 30 लाख किस्म का, और मनुष्य जो होता है, वो 4 लाख। तो मनुष्य जाति बहुत ही कम है। और सब जानवर जितने हैं, जल से शुरू करके आकाश तक—खेचर, भूचर, जंगम, स्थावर—उनका number ज्यादा है। तो भगवान सबको खाने को देते हैं। वो जो जल का जानवर है, स्थल का जानवर है, हाथी है, शेर है, सबको भगवान खाने को देते हैं। "नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्..." (Katha Upanisad 2.2.13)—ये वेद में कहते हैं। एक जो नित्य वस्तु है—भगवान, चेतन भगवान। जैसा चेतन वस्तु मैं भी चेतन वस्तु, और भगवान से हमसे फर्क क्या है? भगवान सबको खाने को देते हैं और हम खाने के लिए भटकते हैं, इतना ही फर्क है बस। और ये मूर्ख लोग कहते हैं, "मैं भगवान हूँ।" अरे, सबको खाने को दो! अपने परिवार को तो खाने को नहीं दे सकते हो, संन्यास लेकर बाहर चले जाते हो, और भगवान... ये सब मूर्खता है। "एको बहूनां यो विदधाति कामान्..." ये जो 84 लाख योनियों में जीवात्मा भ्रमण कर रहे हैं, सबके लिए खाने का, सोने का, आहार, निद्रा, भय, उनकी सब व्यवस्था भगवान करते हैं। "एको बहूनां..." इसलिए भगवान कहते हैं, एक जो... "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा" (Bhagavad-gita 7.6)—सारा विश्व ब्रह्मांड, अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा, उसकी सृष्टि, स्थिति, प्रलय जो कुछ होने वाला है, भगवान उसका कारण हैं। इसलिए भगवान का नाम है सर्वकारणकारणम्—सब कारणों के कारण। साधारण सृष्टि करते हैं ब्रह्मा जी, और स्थिति करते हैं विष्णु, और प्रलय करते हैं शिव महादेव। तीन काम, तीन गुणों के मालिक। जैसा government office में एक-एक department में director रहते हैं, इसी प्रकार जब सृष्टि होती है, ये official directors जो होते हैं—ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर। ब्रह्मा जी का काम है सृष्टि करना, विष्णु जी का काम है उसका पालन करना। पालन तो ब्रह्मा भी नहीं कर सकते, शिव भी नहीं कर सकते। "एको बहूनां यो विदधाति कामान्"—वो विष्णु। तो ब्रह्मा जी सृष्टि करते हैं और विष्णु पालन करते हैं, और शिव जी का काम है ध्वंस, बस। जब इसको ध्वंस की जरूरत होती है, वो शिव जी का काम है। जैसा कोई मकान बनाता है, और कोई उसको पालन करता है, और कोई मकान तोड़ता है, जैसा आप लोग जानते हैं। इसी प्रकार ये जो मकान है—विश्व ब्रह्मांड, इसको तैयार करने वाला ब्रह्मा जी, और इसको पालन करने वाला विष्णु, और इसको तोड़ डालने वाला वो शिव जी, महेश। ये काम चलता है। भव्यते... ये जो जगत है, भौतिक जगत, इसी प्रकार सृष्टि होती है, कुछ दिन ठहरता है, फिर प्रलय होता है। तो जैसा कोई भी हम लोग हों, एक मकान में आप गए और कुछ दिन ठहरे, और फिर संवाद आया, "चलो जी, मकान से निकलो, ये मकान तोड़ दिए जाएँगे।" उसको तोड़ना होगा, तो आपको ठीक लगता है क्या? "देखो जी, एक मकान में गया वो भी तोड़ दिया, और एक मकान में गया वो भी तोड़ दिया।" एक अपना मकान अगर बना लेता है तो ठीक होता है। ये जैसा भीतर में ये विवेचना होती है, इसी प्रकार समझना चाहिए कि ये जो हमको शरीर मिलता है, भौतिक शरीर, ये तो योनियों में, 84 लाख योनियों में हमको भ्रमण करना पड़ता है। इसको किस तरह से बंद किया जाए, वो बुद्धिमान सोचे। और नहीं तो चलो साहब, आप तो सेठ जी बन गए, और कल सूअर बन गए, परसों इंद्र बन गए, परसों उसके बाद... मूर्खता! एक शरीर मिलता है, कुछ दिन ठहरता है, फिर खत्म हो जाता है, फिर अपने कर्म के अनुसार और एक मिलता है, वो भी कुछ दिन ठहरता है, फिर तोड़ना पड़ता है। ये काम चल रहा है। बाकी हम लोग जो मूर्ख हैं, नहीं जानते हैं, इसलिए आचार्य से शिक्षण लेना चाहिए। जैसे चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—"ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोनो भाग्यवान् जीव। गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज॥" (Caitanya-caritamrta Madhya 19.151)। इसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं नाना योनियों में, और ऐसे ही भ्रमण करते-करते यदि कोई भाग्यवान हो, तो उसको ठीक-ठीक गुरु मिल जाता है कृष्ण की इच्छा से। और वो कृष्ण को मिला देते हैं, कृष्ण गुरु को मिला देते हैं और गुरु कृष्ण को मिला देते हैं। गुरु-कृष्ण-कृपा। जो ये समझता है, "देखो, ये बड़ा झंझट है, एक-एक बार जन्म लेना फिर मरना, इसका कोई उपाय है? भगवान, कोई उपाय बताइए।" जो वास्तव में भगवान से प्रार्थना करते हैं, उनके लिए भगवान अच्छा गुरु उनको मिला देते हैं। इसलिए कहते हैं गुरु-कृष्ण-कृपा, दोनों की कृपा होनी चाहिए—भगवान की कृपा और गुरु की कृपा, तब ये जो आवागमन का चक्कर है, बार-बार जन्म लेना और मरना, ये बंद हो सकता है, भक्ति-लता-बीज द्वारा। और किस तरह से वो भक्ति लता? भगवद्-भक्ति द्वारा।

तो भगवान कहते हैं, "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा..." देखिए, भगवान सब जगह में 'अहम्' किया है—मैं, माम्, "मामेकं शरणं व्रज..." ये शब्द व्यवहार किया। अहम्, माम्—भगवान अपने को बताते हैं। "अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा..." तो क्यों? "आप क्यों हो गए? और कोई नहीं? ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब बड़े-बड़े देवता हैं।" तो कोई पूछ सकता है, जैसा मूर्ख लोग अभी पूछते हैं, "कृष्ण अकेले ही भगवान हो जाएँगे? हमारा औरत भगवान है, अवतार है, दाढ़ी वाला भगवान है, वो अवतार है, एक बालक अवतार है।" ये सब आजकल अवतार तो रास्ते-रास्ते में घूमते हैं। "तो भगवान कृष्ण अकेले भगवान हो जाएँगे?" वो बोलते हैं ना कि "आप लोग कृष्ण को मान सकते हैं, बाकी हमारा मत अलग है, हमारा भगवान अलग है।" ये सब बोलता है। मूर्ख जानता नहीं कि वास्तविक कृष्ण क्या चीज हैं। इसलिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं—"ईश्वरः परमः कृष्णः..." और "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय" (Bhagavad-gita 7.7)—मुझसे बढ़कर के ऊँचे position में ना अन्य, और कोई है नहीं। भगवान के समान भी कोई है नहीं, और भगवान के ऊपर वाला भी कोई है नहीं, सब नीचे वाले हैं। इसलिए भगवान का और एक नाम है असमूर्ध्व। असमूर्ध्व—जब भगवान विराट रूप अर्जुन को दिखाए थे, उस समय अर्जुन ने तो बताया कि आप असमूर्ध्व हैं, आपका समान भी कोई है ही नहीं और आपके ऊपर भी कोई नहीं। तो भगवान खुद भी कहते हैं, "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय"—मुझसे बढ़कर के और कोई परतत्व है नहीं। तो जो बुद्धिमान है, वो कृष्ण को ही पकड़ के रखते हैं, उनके ही चरणारविंद को पकड़ के रखते हैं। बस, इतना अगर हम लोग समझ जाएँ कि कृष्ण से बड़ा और कोई है ही नहीं, बस कृष्ण का चरण पद्म ही है, उनको अच्छी तरह से हम पकड़ लें। और भगवान कहते हैं, "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते" (Bhagavad-gita 7.14)—उसी वक्त मुक्त, माया से मुक्त होना, इसका नाम है मुक्ति। हाँ, और कोई अगर समझ लिया ठीक-ठीक से कि कृष्ण से पर तत्व है नहीं, और कृष्ण के चरणों में प्रपन्न हो गया... वो जल्दी नहीं होता है, "बहूनां जन्मनामन्ते..." (Bhagavad-gita 7.19)। जल्दी हो तो बड़ा बुद्धिमान है। जैसे भगवान कहते हैं, "मत्तः परतरं नान्यत्..." और मुझसे परतत्व है नहीं, फिर हम दूसरे का क्यों भजन करें? क्यों ना कृष्ण का ही केवल भजन करें? "मामेकम्"—ये बुद्धिमान का काम है। और जो अबुद्धयः... भगवान जैसे कहते हैं कि "अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः" (Bhagavad-gita 7.24)—ये जो मूर्ख लोग होते हैं, वो कहते हैं कि जो परतत्व है वो निराकार है, और निराकार जब अपना सगुण, ये सत्-चित्-आनन्द से शरीर धारण करता है, उसका नाम है भगवान। तो उसका जवाब भगवान देते हैं—"अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।" उसकी बुद्धि कम है, less intelligent, poor fund of knowledge। वो कहते हैं भगवान निराकार हैं, अभी ये सगुण होकर, साकार होकर आए हैं। ये कौन बोलता है? अबुद्धयः, जो भगवद्-तत्व जानते नहीं, वो बोलता है। भगवान खुद कहते हैं, कृष्ण परतत्व हैं। "मत्तः परतरं..." सब शास्त्र में ही कहते हैं कि तत्व वस्तु क्या चीज है। "वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥" (Srimad-Bhagavatam 1.2.11)—वो जो तत्व है, जो तत्व को जानने वाले हैं, वो उस चीज को तत्व कहते हैं। क्या चीज है तत्व? तत्वज्ञानम् अद्वयम्, जो कि absolute knowledge, अद्वय ज्ञान। वो क्या चीज? "ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।" वो तत्व वस्तु जो है, अपनी बुद्धि के अनुसार कोई कहते हैं निराकार ब्रह्म, कोई कहते हैं परमात्मा, और जो असल हैं, वो जानते हैं भगवान। आखिरी में भगवान।

जैसे सूरज... भगवद्-तत्व ज्ञान आप थोड़ा अगर दिमाग को लगाइएगा, बहुत जल्दी मालूम हो जाएगा। देखिए, जैसे आपके सामने सूरज है, और सूरज की किरण भी है, और सूरज के भीतर भी लोक है। जैसा ये पृथ्वी एक लोक है, इधर बहुत आदमी हैं, इधर राजा हैं, इसी प्रकार सूर्यलोक जो है, उधर का जो राजा है, उसका नाम है सूर्यनारायण। साधारण नाम। अभी जो सूर्यनारायण हैं, उनका नाम भी श्रीमद् भगवद्गीता में बताए हैं—विवस्वान्। उनका नाम है विवस्वान्। "इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह..." (Bhagavad-gita 4.1)—तो ये सब शास्त्र में दिया है। अभी जो उधर governor हैं, उनका नाम है विवस्वान्। तो सूर्यनारायण, उनका तेज है, तेजस्वी। वो तेज सारा विश्व ब्रह्मांड में फैला हुआ है, और उसका नाम है सूर्य किरण। अब विवेचना कीजिए, वो सूर्यनारायण बड़ा है या सूर्य किरण बड़ा है? कोई कहेगा सूर्य किरण बड़ा है। नहीं, सूर्यनारायण बड़ा है, क्योंकि किरण कहाँ से आता है? जहाँ से किरण आता है, वही तो बड़ा होगा। नहीं, मान लो ये जो प्रत्यक्षवादी हैं, उसी को ग्रहण... इसी प्रकार भगवान की जो अंग-ज्योति है, जैसे सूर्यनारायण की किरण है, इसी प्रकार भगवान की भी एक अंग-ज्योति है जिसका नाम है ब्रह्मज्योति। इसलिए भगवान कहते हैं, "ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्" (Bhagavad-gita 14.27)—ये जो निराकार ब्रह्म है, उसकी प्रतिष्ठा मैं हूँ, क्योंकि हमारे अंग से ये ज्योति निकलती है। और ब्रह्मसंहिता भी कहती है—"यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि..." (Brahma-samhita 5.40)। ये सब विचार हैं। बाकी मूर्ख लोग जो नहीं समझते हैं—मैं मूर्ख नहीं कहता, भगवान कहते हैं—"अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्" (Bhagavad-gita 9.11)। क्योंकि यह जगत को कृपा करने के लिए मनुष्य जैसे आकार में लीला कर रहे हैं। मनुष्य जैसे नहीं, मनुष्य पहाड़ नहीं उठा सकते हैं, बाकी हाँ, ऐसा मालूम होता है कृष्ण वृंदावन में मनुष्य-लीला कर रहे हैं, द्वारका में। बाकी मनुष्य हैं नहीं। जब जरूरत होती है, भगवत्ता दिखाते हैं—सात वर्ष की उम्र में पहाड़ को उठा लिया, 16,000 रानियों से शादी कर ली। ये क्या मनुष्य से हो सकता है? और क्योंकि मनुष्य से हो नहीं सकता, जो मूर्ख मनुष्य है वो कहता है, "ये सब कहने की बातें हैं जी, ये कभी हो सकता है?" क्योंकि उसके दिमाग में घुसता नहीं, तो वो मिथ्या हो गया। हाँ, तो ये सब चलता है। इसलिए भगवान खुद आकर समझाते हैं। अगर हमारा दिमाग ठीक है, तो इसको पकड़ लें, समझें भगवान को। अब समझ गए भगवान को, तो फिर क्या बात है? "त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन" (Bhagavad-gita 4.9)। ये सब बातें हैं। भगवान कहते हैं, "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥" (Bhagavad-gita 7.7)—जैसा मणि का हार होता है, उस सूत्र में हज़ारों मणियाँ आप लगा दीजिए, गूँथ लीजिए, इसी प्रकार दुनिया में जो कुछ है, उसका सूत्र जो है, उसका मूल जो है—"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते" (Bhagavad-gita 10.8)। मूल पुरुष जो हैं—"गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि" (Brahma-samhita 5.29)—वो जो आदि पुरुष हैं, वो भगवान हैं। इसलिए भगवान खुद बताते हैं।

तो शास्त्र इसी प्रकार समझना चाहिए जो भगवान जैसे बता रहे हैं। इसलिए हमारी जो श्रीमद् भगवद्गीता है, Macmillan Company इसको publish करती है। वो Macmillan Company के जो trade manager हैं, वो कहते हैं कि ये जो श्रीमद् भगवद्गीता है, इसकी sale बहुत बढ़ती है, और श्रीमद् भगवद्गीता की sale कम नहीं होगी। और एक-एक वर्ष में एक-एक edition निकलता है, कम से कम 50,000 एक दफा छपता है। हाँ, तो क्योंकि हम लोगों ने Bhagavad-gita As It Is present किया है, इसकी माँग भी बहुत ज्यादा है। असल चीज है ना? कोई भी असल चीज है—असल सोना है, असल दूध हो, तो उसको ग्राहक बहुत जल्दी मिल जाता है। और मिलावटी नकली को canvas करके बेचना पड़ेगा। तो असल जो भगवान हैं, उनको तो जल्दी स्वीकार कर लेते हैं, चाहे इस देश में, परदेश में। और नकली भगवान को कोई स्वीकार नहीं करता, दो-चार लोग स्वीकार करेंगे, फिर लात मार के... ये समझना चाहिए। "मत्तः परतरं नान्यत्..." सर्वकारणकारणम्, जो ब्रह्मसंहिता में बताया—सर्वकारणकारणम्, वही भगवान खुद भी कहते हैं, "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।" तो भगवान मूल कारण हैं। "गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि"—इसलिए ब्रह्मा जी कहते हैं, "गोविंद जो आदि पुरुष हैं, मैं उनका भजन करता हूँ।" और ब्रह्मा... ये ब्रह्म संप्रदाय है, ये जो हम लोग गौड़ीय संप्रदाय हैं—ब्रह्मा से मध्वाचार्य, मध्वाचार्य से चैतन्य महाप्रभु। मध्वाचार्य के संप्रदाय में माधवेंद्र पुरी, उनके शिष्य ईश्वर पुरी, उनके शिष्य श्री चैतन्य महाप्रभु, और श्री चैतन्य महाप्रभु की शिष्य-परंपरा से हम लोग। तो इसको कहा जाता है—"एvem परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः" (Bhagavad-gita 4.2)। तो भगवद्-तत्व ज्ञान लाभ करने के लिए वो परंपरा सूत्र से लेना चाहिए, अपने मनमाना नहीं कि "मैं ऐसा समझता हूँ।" तुम क्या समझने वाले हो? तुम्हारा क्या दिमाग है? जैसे बड़े-बड़े आचार्य लोग समझे हुए हैं—चैतन्य महाप्रभु जैसे समझे हुए हैं, रामानुजाचार्य जैसे समझे हुए हैं, मध्वाचार्य... उस तरह से समझो। अर्जुन जैसे समझे हैं, उस तरह से समझो। तुम्हारा क्या दिमाग है? कोई कह दिया, "हमारे मत में..." अरे, तुम्हारे मत का क्या मूल्य? बाकी यही चलता है—"हमारे मत में..." और एक बात कह दिया, "हमारे मत में..." और कह दिया, "हमारे मत में..." कौन सा मत ठीक है? नहीं, बोले, "सब मत ठीक हैं।" तो मत जितना मत है, सब ठीक है—ये सब बेवकूफी चलती है। यह सब बेवकूफी छोड़ के, जैसे भगवान बताते हैं, उस प्रकार कीजिए, लाभ होगा, उसमें उपकार होगा, जीवन सफल। और नहीं तो भटकते ही रहेंगे, बस। "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय"—ये भगवान खुद कहते हैं, सब अर्जुन भी मानते हैं, और बड़े-बड़े ऋषि—व्यासदेव, नारद। व्यासदेव भागवत का "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" (Srimad-Bhagavatam 1.1.1) उसका टिप्पणी लिख रहे हैं, "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" (Srimad-Bhagavatam 1.3.28)। बड़े-से-बड़े विद्वान सब कृष्ण को मानते हैं, "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"—यही विचार है सब आचार्यों का। ये सब विचार छोड़ के, कोई एक गधा कहीं से आया है, उसका विचार लेने से क्या लाभ? बड़े-बड़े आचार्यों का विचार छोड़ के, कहीं से कोई आ गया मूर्ख और कोई कह दिया, "मैं भगवान हूँ, भगवान का अवतार हूँ", इसको मानने से क्या लाभ है? अरे, तुम तो भगवान के अवतार हो, मैं तो खुद भगवान का भजन करता हूँ, अवतार से हमारा मतलब क्या है? तुम झूठे हो सकते हो, बाकी कृष्ण तो झूठे नहीं हैं, सब कोई मानते हैं। तो कृष्ण को पकड़ लें, ये बुद्धिमान का काम है। दूसरे को हमको पकड़ने की क्या जरूरत है? नहीं, वो जो हमारी जो बदमाशी है, वो support करेंगे, इसलिए उसको भगवान मानें। और कृष्ण तो support नहीं करेंगे। कृष्ण कहते हैं, जो भगवान से द्वेष करते हैं, भगवान कहते हैं, "तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥" (Bhagavad-gita 16.19)—मैं उसको आसुरी योनि में भेज देता हूँ। इसलिए कृष्ण भगवान बड़ा कड़ा शासन करते हैं उसको, जो... और जो भगवान के अवतार आए हैं धोखा देने वाले, कुछ काम मानें... बाकी जो बुद्धिमान हैं, वो ये श्रीमद् भगवद्गीता अनुसार कृष्ण को मानेंगे। "मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय..."

फिर भगवान साधारण के लिए समझा रहे हैं जो जल्दी भगवान को समझ नहीं सकोगे। तो भगवान तो पहले बता दिया कि जो कुछ है—भौतिक प्रकृति और चित्-प्रकृति, ये सब हमारी शक्ति है, प्रकृति। तब किस तरह से सब जगह से, सब चीज से भगवान का अनुभव किस तरह से करना है, वो भगवान खुद समझा रहे हैं। सब चीज जब भगवान की... जैसे उदाहरण स्वरूप कि दुनिया में, भौतिक जगत में जो कुछ चीज है, ये सूर्य किरण का परिवर्तन है। ये scientific, वैज्ञानिक हिसाब देखिए। जिसमें सूर्य... सूर्य किरण नहीं होता है, होता नहीं माने कम होता है, जैसे पाश्चात्य देशों में—मैं तो सब जगह भ्रमण किया हूँ—हाँ, जहाँ सूर्य किरण नहीं होता है, विशेष करके शीतकाल में, सब पत्ती झड़ जाती है। आप लोग जानते हैं जहाँ बर्फ गिरता है, क्योंकि सूर्य किरण है नहीं, वो सब beauty, जो vegetation, greenness, सब नष्ट हो जाता है। ज्यादा सूर्य किरण जहाँ होता है, वो तो desert हो जाता है, मरुभूमि हो जाता है। और सूर्य किरण जहाँ ठीक-ठीक होता है, उधर पानी बरसता है और उधर हरियाली रहती है। ये सब दुनिया जो कुछ है, सूर्य किरण की सृष्टि है, जितने planets हैं। इसलिए सूर्य का नाम दिया है—"यच्चक्षुरेष सविता सकलग्रहाणां राजा समस्तसुरमूर्तिरशेषतेजाः..." (Brahma-samhita 5.52)। हाँ, समस्त ग्रहाणां राजा। ये सूर्य किरण से जितने planetary systems हैं, लोक हैं, ये जो weightlessness है, एक-एक लोक, ग्रह हवा में घूमते-फिरते हैं, ये भी सूर्य किरण के लिए। वो सूर्य किरण की गर्मी से वो घूमता-फिरता है, ये सब scientific है। हाँ, तो इसी प्रकार जब एक तरह से आप समझ लीजिए, सभी सूर्य किरण का ही एक-एक विकास है जो कुछ दुनिया में। इसी प्रकार भगवान यदि सबका विकास का कारण हैं, तो किस तरह से भगवान को मैं अनुभव कर सकता हूँ? यही सब भौतिक विचार से वो भगवान खुद हमको बता रहे हैं। क्या बता रहे हैं? "रसोऽहमप्सु कौन्तेय..." (Bhagavad-gita 7.8)। कृष्ण को भगवान मानने में अगर तुम्हारी आपत्ति है, तो इस तरह से भगवान को समझो। क्या है? ना, "रसोऽहमप्सु..." ये जो पानी है, इसका जो रस है, इसमें जो शांति मिलती है, क्योंकि हम लोग सब रस के पीछे जाते हैं। हाँ, द्वादश प्रकार के रस होते हैं, तो रस के पीछे हम लोग सब फँसे हुए हैं। "रसो वै सः" (Taittiriya Upanisad 2.7)—वेद में कहते हैं, सब रस का आधार भगवान कृष्ण हैं। और रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृतसिंधु में भी बताया—अखिल-रसामृत-सिंधु, सब रस के आधार हैं। तो सब रस का आधार होने के कारण, ये जो जल है, उसमें भी भगवान कहते हैं, "इसमें जो रस है..." जल क्यों पिया जाता है? उसमें कुछ रस है, तभी तो हम लोग पीते हैं। जब बहुत प्यास लगती है, तो जल चाहिए। जल लीजिए, सब जल... जीव-जंतु, हाँ, सभी जानवर भी जल पीते हैं, कीट-पतंग, सब जल... वृक्ष, सबको जल चाहिए। वृक्ष केवल जल पीकर ही रहता है, पादप। हाँ, तो जल बहुत ही जरूरी चीज है। इसलिए भगवान कहते हैं कि उसमें जो रस है, आस्वादनीय वस्तु, उसका जो active principle है, वो मैं हूँ—"रसोऽहमप्सु कौन्तेय..."। "प्रभास्मि शशिसूर्ययोः..." और ये जो शशि और सूर्य, चंद्र और सूर्य, इसके जो किरण हैं, वो मैं हूँ। तो क्यों ये लोग झूठ बोलते हैं कि "भगवान को मैं देखा नहीं, आप भगवान को दिखा सकते हैं?" अरे, भगवान तो खुद दिखाते हैं, देखो ना! अगर तुम आँख मूँद के रहोगे, तो तुमको कौन दिखाएगा? भगवान खुद कहते हैं, "यह जो रस, पानी का जो रस है, जल का जो रस है, मैं हूँ।" जब पानी पियो, उस समय क्यों ना भगवान का स्मरण करो? क्योंकि देखो जी, कृष्ण जी श्रीमद् भगवद्गीता में बताए हैं, "ये जो जल का रस है, यही भगवान कृष्ण हैं।" तो हमारा स्मरण तो हो जाएगा, बात भी तो ठीक है। तो कृष्ण दर्शन क्या केवल ये इधर आकर होता है? नहीं। "गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतः..." (Brahma-samhita 5.37)—जिसको बहुत भाग्य होता है, वो तो गोलोक वृंदावन में जाकर..."
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥