हो सकता है उसको दिमाग में घुसता ही नहीं, इसलिए वो निराकार... बुद्धि उसका कम है ना, वो समझ नहीं पाता। इसलिए भगवान कहते हैं— manuṣyāṇāṁ sahasreṣu kaścid yatati siddhaye। वो सिद्धि लाभ किए हुए भी वो समझते नहीं जो कृष्ण भगवान, बड़ा मुश्किल। इसलिए स्वयं भगवान आ के समझाना... हाँ, तो भगवान की कृपा होने से सब समझ में आता है। नहीं तो साधारण सिद्धि लाभ करने से भी वह कुछ नहीं समझ में आया।
जैसे ब्रह्मसंहिता— panthāstu koṭi-śata-vatsara-sampragamyo vāyor athāpi manaso muni-puṅgavānām... बड़े-बड़े मुनि-पुङ्गव, साधारण मुनि नहीं, मुनि श्रेष्ठ, पुङ्गव— पुङ्गव मतलब श्रेष्ठ कहा जाता है, बहुत भारी— वो भी भगवान को समझ नहीं पाए। बिना भगवान की कृपा, भगवान को कोई नहीं समझ पाए। और जगह भगवान ने बताया— bhaktyā mām abhijānāti। वो समझने का उपाय यही भक्ति है, और नहीं— ज्ञान नहीं, कर्म नहीं, योग नहीं। ये सब पद्धति से कोई भगवान को समझ नहीं पाए। इसलिए भगवान कहते हैं— manuṣyāṇāṁ sahasreṣu kaścid yatati siddhaye। सिद्धि लाभ करने से क्या है? योग-सिद्धि आप लाभ कर सकते हैं कि हवा से उड़ जाएँ, ये जो सिद्धि है, लघिमा सिद्धि, हाँ, और कुछ magic दिखा रहे हैं, ये सब आप कर सकते हैं योग-सिद्धि से। बाकी, उसके द्वारा भगवान को नहीं समझ पाएँगे, ये संभव नहीं है। आप ज्ञान की बहुत बड़ी-बड़ी बातें कर सकते हैं— "ये ब्रह्म है, ये ब्रह्म नहीं है।" बाकी, उसके द्वारा भगवान को नहीं समझ पाएँगे। ये भगवान खुद बताते हैं— manuṣyāṇāṁ sahasreṣu।
बाकी ये जो Krishna consciousness movement है, आंदोलन है, इतना सरल है! ये जो भगवान कृष्ण को समझ गया और उनके चरणों में आत्म-समर्पण कर दिया, इसका कारण है कि भगवान की कृपा। वो जो भगवान चैतन्य महाप्रभु रूप से आकर के सबको कृष्ण-भक्ति, कृष्ण-प्रेम दे रहे हैं, यह चैतन्य महाप्रभु का आश्रय करने से बहुत जल्दी भगवान कृष्ण को समझ पाएँगे। इसलिए उचित है— श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद, श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर-भक्तवृन्द, इनको नमस्कार करके फिर जाके:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
ये मंत्र जपा जाए तो बहुत जल्दी काम... ये आप लोग कीजिए, कोई मुश्किल नहीं है। हाँ, केवल शास्त्र-विधि जो है, उसको ग्रहण करके ज्ञान-विज्ञान, विज्ञान से काम कीजिए। तो भगवान... वो तो खुद ही आते हैं हमको लेने। भगवान कृष्ण आ के खुशामद कर रहे हैं कि, "देखो, हम तुम्हारे सामने हैं। ये देखो हमारा वृंदावन लीला देखो। और तुम भी इधर आ के हमारे साथ वो राखाल बालक हो के हमारे साथ खेल सकते हो, गोपी बन के हमारे साथ आनंद ले सकते हो, और हमारा माँ भी बन सकते हो, हमारा बाप भी बन सकते हो, हमारा मित्र भी बन सकते हो, हमारा गाय भी बन सकते हो। जो चाहे तुम, उसी तरह से आओ हमारे पास।" इसीलिए भगवान आते हैं और लीला प्रकट करके हम लोगों को दिखाते हैं।
बाकी और चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "अगर कुछ भी नहीं समझते हो, तो केवल भगवान का नाम ग्रहण करो।" हाँ, केवल:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
इसको जपा करो। एक दिन तुम्हारा भाग्य सुप्रसन्न हो जाएगा, भगवान से दर्शन... ये चैतन्य महाप्रभु का इतना सरल शास्त्र-सिद्धांत है:
harer nāma harer nāma harer nāmaiva kevalam
kalau nāsty eva nāsty eva nāsty eva gatir anyathā
कलयुग में यही साधन है। भगवान को... भगवान बहुत सस्ता कीमत हो गया ये कलयुग में। जैसा कलयुग महापाप युग है, तो महापाप युग होते हुए भी भगवान भी अपने को बहुत सस्ता कर दिया। तो तुमको योग, यज्ञ, ध्यान, धारणा कुछ नहीं करना पड़ेगा, वन में नहीं जाना पड़ेगा, जंगल में नहीं जाना पड़ेगा। कहीं भी बैठ के:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
अपराध-शून्य होकर नाम जपा करो। भगवान की कृपा से एक दिन तुम्हारा भाग्य सुप्रसन्न हो जाएगा और भगवान के दर्शन हो जाएँगे। ये शास्त्र का मत है।
इसलिए ये जो... ये जो आप लोग देखते हैं, जवान सब वैष्णव हो गए, ये चैतन्य महाप्रभु की कृपा है। चैतन्य महाप्रभु की ऐसी कृपा है। चैतन्य महाप्रभु ने सबको बताया— sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja— "सब छोड़ो, सब झूठा धर्म सब छोड़ो। एकमात्र जो असल धर्म है— dharmaṁ tu sākṣād bhagavat-praṇītam— उसको ग्रहण करो।" इधर-उधर बाद में क्यों फँसते हो? हाँ, भगवान खुद कहते हैं कि जो दूसरी देवताओं का भजन करता है, उसकी बुद्धि नष्ट हो गई है— kāmais tais tair hṛta-jñānāḥ yajante 'nya-devatāḥ। और दूसरे देवताओं को... दूसरे देवताओं का कोई अपमान करना नहीं है, बाकी भजनीय वस्तु जो है, वो भगवान एक ही हैं। हाँ, इसलिए भगवान कहते हैं— sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja। और नहीं... ये नहीं समझे कि थोड़ा इसकी भी भक्ति कर लें, उसकी भी भक्ति कर लें, उसकी भी पूजा कर लें, जहाँ से जो कुछ मिल जाए। ये... इसमें एकाग्रता नहीं होती है। हाँ, एकांत भाव से भजन करना चाहिए— bhajante mām ananya-bhāka। और मन दूसरे में नहीं। ये चीज़ इनको सिखाया जाता है। देखिए, एकाग्र भाव से केवल कृष्णमय मन को उत्पन्न कर दिया, और कितना जल्दी इसका काम हो गया, आप लोग सब देख सकते हैं।
ये जो भगवान को नहीं समझ सकते हैं, बाकी भगवान खुद चैतन्य रूप में आके अपने व्यवहार से दिखा रहे हैं कि किस तरह से भगवान को तुम प्राप्त कर सको। हाँ, चैतन्य महाप्रभु का कुछ काम नहीं था, हाँ, केवल कीर्तन करना, संकीर्तन। तो saṅkīrtana-pitarau— वही संकीर्तन के पिता हैं, चैतन्य महाप्रभु। और सफल भी है सब जगह में। देखिए, जहाँ-जहाँ संकीर्तन हो रहा है, बहुत जल्दी... अभी हमारा Africa में, Nairobi में बहुत उत्सव होगा ये 26 तारीख से, 26 January से और 30, 31 January तक बहुत भारी उत्सव होगा। और मैं भी उधर जा रहा हूँ, हमारा आदमी सब जा रहे हैं। तो सारा दुनिया में ग्रहण करना है। क्यों? ये चैतन्य महाप्रभु की कृपा है। क्योंकि ये संकीर्तन के माध्यम से:
ये कलयुग में श्रीकृष्ण-संकीर्तन विजय लाभ करेगा, और कोई चीज़ विजय लाभ नहीं कर सकती।
इसलिए सरल है। कलयुग का आदमी सब पतित है— mandāḥ sumanda-matayo manda-bhāgyā hy upadrutāḥ। ये उसको मत... सब स्वमत, बहुमत हो गया। भगवान को छोड़ के अपना-अपना सब अलग-अलग सब धर्म निकाल के— "ये धर्म है, वो धर्म है, वो धर्म है।" इसलिए... इसलिए कहते हैं— sumanda-matayo। एक-एक मत सब, वो सुमंद है। और manda-bhāgyā— भाग्य भी बहुत मंद है। इतना सरल से भगवान मिल सकते हैं, वो उसमें नहीं जाएँगे, इधर-उधर की बातें सब ले आएँगे। इसलिए मंद भाग्य, वास्तविक मंद भाग्य। देखिए, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि मंद भाग्य का विषय:
nāmnām akāri bahudhā nija-sarva-śaktis
भगवान चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "देखो, भगवान के नाम में सब भगवान की शक्तियाँ हैं।" भगवान अनंत शक्तिमान हैं, सर्वशक्तिमान हैं। भगवान के नाम में भी, क्योंकि भगवान का नाम और भगवान में कोई अंतर नहीं है, पृथक नहीं है— abhinnatvān nāma-nāminoḥ। तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
nāmnām akāri bahudhā nija-sarva-śaktis tatrārpitā
भगवान के नाम में अनेक भगवान की जो शक्तियाँ हैं, सब उसमें हैं। हाँ, हाँ। और niyamitaḥ smaraṇe na kālaḥ— अगर पूजा-पाठ करना है तो उसका बहुत नियम है, हाँ, और नाम जप करने के लिए कोई नियम नहीं है। कहीं भी, किस समय, किसी अवस्था में, कोई देश में, कोई व्यक्ति भी नाम ग्रहण कर सकता है— niyamitaḥ smaraṇe na kālaḥ। etādṛśī tava kṛpā bhagavan mamāpi— तो कहते हैं, "भगवान, ये कलयुग के लिए आप इतनी कृपा किए हैं।" durdaivam īdṛśam ihājani nānurāgaḥ— "परंतु हमारा दुर्भाग्य ऐसा है कि नाम ग्रहण करने में हमारी रुचि नहीं है।" ये चैतन्य महाप्रभु का इतना सरल उपाय है भगवान को लाभ करने के लिए, उसमें हमारी रुचि नहीं है। और इधर-उधर की बात में और बाज़ में— "देखो जी, तुम भगवान हो, मैं भगवान हूँ, भगवान कहाँ ढूँढते हो? भगवान रास्ते पर घूम रहा है, और भगवान मर गया है," इत्यादि-इत्यादि। "अब हम भगवान होकर आए हैं, हमको ग्रहण करो।" ये सब धोखाबाज़ी में आदमी सब फँस जाएँगे। और जो सरल उपाय है, जो केवल मात्र भगवान का नाम ग्रहण करने से भगवान को मिल सकेगा, शास्त्र निर्देश अनुसार, बड़े-बड़े आचार्यों का निर्देश, उसको हम लोग ग्रहण... ये सब दुर्बुद्धि छोड़-छाड़ के एकांत भाव से भगवान का नाम ग्रहण कीजिए। देखिए कितना जल्दी भगवान का अनुभव होता है और आगे जाकर के कितना जल्दी भगवान का दर्शन होता है।
Thank you very much. Hare Krishna.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥