श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  720114LE-JAIPUR_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
जयपुर, 14-जनवरी-1972
 
 
 
है सब वो भगवान को जो तात्विक समझने का कोई जरूरत नहीं है, क्यों? वो तो असल चीज समझ लिया—भगवत प्रेम। तो भगवत प्रेम जिसको हो गया है, उनको ये समझना कोई आवश्यकता है नहीं कि भगवान कितना बड़ा है। भगवान तो वो जानते ही नहीं जो ये भगवान... जैसे यशोदा, यशोदा माई जब कृष्ण पूतना को मार डाला तो यशोदा माई उस वक्त पहुंच गई। तो यशोदा माई समझती हैं कि कोई दैवी शक्ति हमारा जो लड़का है उसको रक्षा किया। वो नहीं समझती हैं कि ये बालक जो भाई... ये जो शिशु बालक भी है कि भगवान। उनको कोई जानने का आवश्यकता नहीं। असल जो चीज है—प्रेम। वो उनके साधारण के लिए जो कि भगवान को मनुष्य समझता है।

"अवजानन्ति मां मूढाः" (avajānanti māṁ mūḍhāḥ)—साधारण व्यक्ति जिसको ज्ञान नहीं है, "परं भावमजानन्तो" (paraṁ bhāvam ajānanto)—जो कि भगवान का परम भाव समझता नहीं, वो कृष्ण को ऐसे ही कोई साधारण व्यक्ति समझता है, "हमारा ही जैसा कोई होगा, ज्यादा कुछ पावर है।" नहीं।

इसका नाम है कूपमंडूक, कुएं का मेंढक। कुएं का मेंढक, वो तीन फुट पानी में उसका अवस्थान है। वो क्या समझेगा कि प्रशांत महासागर क्या चीज है? वो खाली सोचते ही जाएगा। कोई अगर प्रशांत महासागर कभी देखा नहीं, तो उनको कहे कोई, "देखो जी, एक बड़ा भारी समुद्र देख के आया है।" वो तो कभी देखा नहीं। बोलता है, "कितना भारी? ये जो तीन फुट पानी में हम रहते हैं, इससे कितना ज्यादा है? इतना होगा? और थोड़ा दो-चार इंची ज्यादा, दस इंची?" तो वो सोचते ही रहेगा—ऐसा दो इंची, चार इंची, दस इंची। बाकी उसको कभी समझ में नहीं आएगा कि प्रशांत महासागर क्या चीज है। इसलिए जो मूर्ख होते हैं, वो कृष्ण को साधारण मनुष्य समझते हैं, और नहीं तो कोई समझ लिया कि कोई महान पुरुष होगा ऐतिहासिक, हाँ। बाकी वो जो स्वयं भगवान हैं, वो उनके दिमाग में नहीं घुसता। इसलिए उनको समझाने के लिए भगवान खूब अपनी महिमा बता रहे हैं:

"भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥"

भगवान तात्विक अपने को समझा रहे हैं ना। ये जो भूमि (मिट्टी) है और जल है—भूमि, आपः, अनल (अग्नि), वायु (हवा) और अहंकार। अहंकार जो हम लोग अभी समझते हैं कि "मैं हूँ।" English में कहते हैं Law of Identity—"मैं हूँ।" सब कोई अपना अहंकार है। अरे, मिथ्या अहंकार! वास्तविक ये चीज "मैं हूँ" नहीं। वही भूमि, आपः, अनल, वायु का एक आवरण है। ये जो शरीर, ये शरीर ये भूमि, आपः, वायु... तो ये जो "तेजो-वारि-मृदां यथा विनिमयो", भागवत में कहते हैं, जो अग्नि, जल और मिट्टी, इसको मिलाकर के एक वस्तु जो है, वही शरीर। ये सब दुनिया, दुनिया यही है। हमारा शरीर नहीं, आपका शरीर नहीं, सारा दुनिया यही चीज है। यही भूमि, आपः... कहीं भी जाइए, यही सब चीज मिलकर के ये शरीर भी होता है, और मकान भी होता है, और पहाड़ भी होता है। जो कुछ आप भौतिक चीज आप देख रहे हैं, ये बस इसी का समावेश, एकत्रित मिलकर के। इसलिए जो लोग मूर्ख होते हैं...

वो सब समझते हैं ये भूमि, आपः, अनल, वायु, ये मिट्टी, जल, अग्नि, वायु, ये सब मिलकर के, हाँ, एक परिस्थिति में उसका जीवन बन जाता है। ये आत्मा कोई चीज नहीं है। ये बड़े-बड़े सब जो पाश्चात्य दार्शनिक हैं, वो दार्शनिक लोग यही विचार करते हैं कि मिट्टी से, जल से ही आत्मा पैदा होता है। आत्मा और कोई अलग चीज नहीं है। और ये बुद्ध, बुद्ध का भी यही विचार है जो मिट्टी, जल, पानी, अग्नि, हवा, ये सब मिलकर के एक परिस्थिति हुई है, इसको तोड़ दीजिए, ये जो सब अलग-अलग हो जाएगा, फिर सुख-दुख का अनुभव नहीं। क्योंकि भगवान कहते हैं, नहीं, ये जो मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और सूक्ष्म—अहंकार, बुद्धि, मन, हाँ, स्थूल और सूक्ष्म। ये शरीर है स्थूल और इसके भीतर में एक सूक्ष्म शरीर होता है। वो सूक्ष्म शरीर क्या चीज है? मन, बुद्धि, अहंकार। यह शरीर, स्थूल शरीर जब नष्ट हो जाता है, तो जो सूक्ष्म शरीर है, उसमें जीवात्मा रह जाता है। वो सूक्ष्म शरीर—मन, बुद्धि, अहंकार—फिर उसको दूसरा शरीर दिलाता है। जैसे गुलाब के खेत से यदि हवा बहती है, वायु, तो उसका सुगंध ले जाती है, और पखाने की जो हवा है, वो दुर्गंध ले जाए। इसी प्रकार इस जीवन में मैं जैसा कर्म कर रहा हूँ, उसका सुगंध-दुर्गंध वो मन, बुद्धि, अहंकार, वो उसको लेकर के और दूसरी शरीर उसको प्राप्त हो। ये जन्मांतरवाद—"कर्मणा दैव-नेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये"—अपना-अपना कर्म का। इसलिए कर्म अच्छा करना चाहिए। उस विषय में भगवान बताते हैं:

"यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥"

बड़ा सरल है। इस जीवन में जैसा कर्म कीजिएगा, यदि देवता को अर्चन कीजिएगा—अनेक देवता हैं—तो "यान्ति देवव्रता देवान्", तो देवलोक में आप जाइएगा। "पितॄन् यान्ति पितृव्रताः", जो श्राद्ध आदि होता है, हाँ, वो श्राद्ध करके पितृलोक को संतोष करते हैं, वो पितृलोक में जाएंगे—कर्मकांड विचार। और जो भौतिक हैं, इस दुनिया में परिश्रम करते हैं, तो वो यहीं रहेंगे, चाहे मनुष्य शरीर हो, चाहे जानवर शरीर हो, कोई भी शरीर है। और भगवान कहते हैं, "यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्", और जो हमारा भक्त है, केवल हमारी ही सेवा में नियुक्त है, वो हमारे पास आएगा। ये बात नहीं है जैसे मूर्ख लोग कहते हैं, "किसी प्रकार कोई भी काम करो, आगे जाके सब भगवान में मिल जाएंगे।" ये भगवान इतना सस्ता नहीं है। हाँ, जैसे रामकृष्ण कहते हैं, "यतो मत ततो पथ"—कोई भी मत आप निकाल लीजिए और अपना काम कीजिए, भगवान के पास पहुंच जाइए। ये तो भगवान बन गए! ये सब धोखाबाजी।

भगवान जो कहते हैं कि "यान्ति देवव्रता देवान्", तो देवलोक जो सबसे उच्च लोक है भौतिक जगत में, ब्रह्मलोक। ब्रह्मलोक का विषय अब भगवत गीता में भी कहते हैं:

"सहस्र-युग-पर्यन्तम् अहर् यद् ब्रह्मणो विदुः।"

ये जो हमारा युग होता है—सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि—ये चार युग में इसको युग कहा जाता है, दिव्य चतुर्युग, ऐसा अलग-अलग नाम होता है। इस प्रकार हजार चतुर्युग में ब्रह्मा का एक दिन होता है, जो कि हमारा बारह घंटा है समझ लीजिए। सवेरे सूर्योदय तक, सूर्य से शुरू करके और शाम को सूर्यास्त तक बारह घंटा समझ लीजिए—कभी तेरह होता है, कभी चौदह होता है, तो साधारण बारह। ये जो ब्रह्मा जी का बारह घंटा है, वह हमारा जो चतुर्युग है—सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि—यह सब मिलकर के हजार गुणा करने से ब्रह्मा जी का बारह घंटा। अब समझ लीजिए उनका आयु सौ वर्ष है, तो कितना लंबा-लंबा उनका दिन, रात, महीना, बरस! तो ब्रह्मलोक में जाने से जैसे ब्रह्मा जी की आयु है, वो आपको मिल सकती है। चंद्रलोक में जाने से आपको दस हजार वर्ष परमायु मिल सकती है, परंतु मरना होगा, ये बात नहीं कि ब्रह्मा जी को नहीं मरना है। ब्रह्मा जी को भी मरना है और हम लोग को भी मरना है, सबको। इसलिए भगवान कहते हैं:

"आब्रह्म-भुवनाल् लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।"

अगर ब्रह्मलोक में भी जाओ—स्वर्गलोक, चंद्रलोक, महर्लोक, जनलोक तो बात ही नहीं—सबसे जो आगे है, वो ब्रह्मलोक में भी जाओ, तो आवागमन उसमें लगा है। और यदि हमारे धाम में आओ, तो फिर "पुनर्जन्म न विद्यते... यद् गत्वा न निवर्तन्ते।" इसलिए मनुष्य जीवन को चाहिए कि इसी जीवन में भगवत भक्ति को अच्छी तरह से पालन करके भगवान के पास... समझें। ये सब जानते ही नहीं। भगवत गीता में सब कुछ बताया हुआ है। ये तो आदमी इसमें ध्यान देता नहीं और नहीं तो जानता ही नहीं। बाकी सब चीज भगवत गीता में बताया है, हाँ। केवल उसको अच्छी तरह से समझ करके और अगर काम किया जाए, तो इसी जीवन में हमारा जीवन सफल हो जाता है।

जीवन सफल क्या है? मैं जीवात्मा, भगवान का स्वरूप। भगवान जो वस्तु हैं, मैं भी वही वस्तु हूँ। भगवान विभु हैं, मैं अणु हूँ। मैं किसी तरह से इस भौतिक जगत में फँस गया, यही बात है। और इससे उद्धार होकर फिर हमारा जो सच्चिदानंद शरीर है, उसको प्राप्त करके फिर भगवान के पास जाकर अच्छी तरह से रहो, परम नित्य काल। "नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्"—वेद में कहते हैं। भगवान नित्य वस्तु हैं, हम लोग भी नित्य वस्तु हैं। तो फिर क्यों अनित्य संसार में हम लोग इधर इतना तकलीफ उठाते हैं? ये दिमाग में नहीं घुसता, इसका नाम है पशु जीवन। जैसे पशु के दिमाग में नहीं घुसता कि "ये क्यों इतना परिश्रम कर रहे हैं?" हाँ। इसी प्रकार जो व्यक्ति, हाँ, यह जिज्ञासु नहीं है कि "हम दिन भर क्यों परिश्रम करते हैं?" और भगवान के विषय में बिल्कुल ध्यान नहीं है, वो पशु ही है। समझो पशु ही, उसको पशु ही कहा जाता है—आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च।

इसलिए भगवान खूब विश्लेषण कर रहे हैं, इसका English में कहते हैं analysis, हाँ, एक-एक पुङ्खानुपुङ्ख विचार करके समझा रहे हैं कि ये जो दुनिया है, पांचभौतिक—भूमि, आपः, अनल, वायु, खं, मन, बुद्धि—पांचभौतिक वो स्थूल है और सूक्ष्म भौतिक है—मन, बुद्धि, अहंकार। तो भगवान कहते हैं, "इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा"—ये जो आठ प्रकार की प्रकृति है, ये हमारी ही चीज है, थोड़ा अलग, हाँ। जैसे उदाहरण स्वरूप, जैसे आप लोगों को हम सुना रहे हैं और एक टेप रिकॉर्डर में ये सब जो वचन हैं, वो सब रिकॉर्ड हो जाते हैं। वो टेप रिकॉर्डर को जब play, replay किया जाएगा, मालूम होगा मैं ही बोल रहा हूँ। मैं... हमसे वो अलग है, वो चीज अलग है, यदि शब्द से मालूम होगा कि मैं ही बोल रहा हूँ। इसी प्रकार ये जो भौतिक जगत है, ये क्योंकि भगवान परम सत्य वस्तु हैं और उनकी प्रकृति से, भिन्ना प्रकृति द्वारा ये प्रस्तुत है, इसको बनाया गया है, मालूम होता है ये सच है। बाकी भगवान कहते हैं, "भिन्ना।" ओम् तत् सत्। चित् वस्तु सत् है, अचित् वस्तु सत् नहीं है। सर्व विकार संपन्न है, सब प्रकार का विकार—जन्म होता है, स्थिति होती है, वर्धन होता है, अपक्षय होता है, परिणाम होता है और नष्ट होता है।

जैसे हमारा शरीर, आपका शरीर, हाँ, माँ के गर्भ में बहुत छोटे से, जैसा समझ लीजिए एक चला ऐसे पहले शरीर होता है, फिर आस्ते-आस्ते बढ़ती है, उसमें सब छेद होता है, छेद होकर नाक, कान ये सब बन जाता है, नौ छेद होता है। फिर वो शरीर बढ़ता है, बढ़ते-बढ़ते-बढ़ते जब पूरा हो जाता है, तब माँ के गर्भ से निकल आता है, फिर अपना-अपना काम शुरू हो जाता है, हाँ। तो यह जो शरीर है, भौतिक शरीर, यह जन्म हुआ, फिर आस्ते-आस्ते बढ़ता है—जन्म, वृद्धि और स्थिति। कुछ दिन रहेगा—बीस, पचास, सौ, ज्यादा से ज्यादा स्थिति। और परिणाम—इससे बच्चा बहुत कुछ पैदा होगा, परिणाम। फिर अपक्षय—बुढ़ापे आ जाएंगे, क्षय होगा। क्षय होते-होते एक दिन खत्म। यह शरीर का, भौतिक शरीर का यह नियम है। चाहे अपना शरीर लीजिए, चाहे हाथी का शरीर लीजिए, चाहे जगत का शरीर लीजिए, ये सब चीज एक ही नियम से—जन्म, स्थिति, परिणाम, वृद्धि, अपक्षय, नाश। परंतु जीवात्मा जो है, "अविनाशि तु तद्विद्धि", वो अविनाशी है। ये मूर्ख लोग नहीं समझते हैं। वो समझते हैं कि शरीर नाश हो गया, सब नाश हो गया, अब कुछ नहीं, सब खत्म हो गया। नहीं, सब खत्म नहीं। जीवात्मा, वो फिर अलग शरीर लेता है अपने कर्म के अनुसार। ये मूर्ख लोग नहीं समझते। और समझना कोई मुश्किल भी नहीं है। भगवान कहते हैं, इसको समझा रहे हैं कि:

"देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तर-प्राप्तिर् धीरस्तत्र न मुह्यति॥"

ये समझने में कोई देर नहीं लगती है। "देहिनोऽस्मिन यथा देहे"—ये शरीर, ये जो हमारा शरीर है, आपका शरीर है, हाँ, पहले बहुत छोटा था। फिर वो छोटा शरीर थोड़ा और कुछ बढ़ गया, कुछ और बढ़ गया, बालक का शरीर हो गया। फिर शरीर तो पलट गया। वो छोटा शरीर, माँ के गर्भ से निकलता है, वो तो नष्ट हो गया। फिर उससे थोड़ा बड़ा शरीर मिल गया, और उससे और थोड़ा बड़ा शरीर। तो उसी प्रकार मुझको तो ठीक-ठीक मालूम है देखो, कि मैं माँ की गोद में ऐसे छोटे शरीर में लेटा रहता था। हमको ख्याल है। तो मैं जो हूँ, हमारा ख्याल है, मैं नित्य वस्तु हूँ, शरीर पलट गया। इसी प्रकार ये शरीर पलट जाएगा, मैं रह जाऊँगा। इसमें समझने में क्या देर है? बताइए। भगवान यही समझा रहे हैं: "देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा तथा देहान्तर-प्राप्तिर्।" जैसे इसी जीवन में अनेक देह परिवर्तन होता है, इसी प्रकार ये शरीर परिवर्तन हो जाने से मैं नष्ट नहीं होता। "न हन्यते हन्यमाने शरीरे"—शरीर नष्ट हो जाने से मैं जो हूँ, आत्मा वस्तु, आत्मा, मैं नष्ट नहीं होता।

बाकी आजकल भौतिक सभ्यता में वो ये सब जानते भी नहीं और जानने के लिए कुछ प्रयत्न भी नहीं करते हैं। और कोई अगर उनको समझाया जाए, तो वो हँसी उड़ाते हैं। ऐसे मूर्ख होंगे, वो क्या भगवद्-भजन करेंगे, क्या तपस्या करेंगे, क्या उसको ज्ञान तो है ही नहीं। इसलिए कलयुग में शास्त्र में यही बताया है:

"हरेर् नाम हरेर् नाम हरेर् नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥"

जो दिमाग तो कलयुग में बहुत ही खराब है। "मन्दाः सुमन्द-मतयो मन्द-भाग्या ह्युपद्रुताः"—ये लोग समझते हैं हमारा दिमाग खूब बढ़ गया, हम मोटर गाड़ी बना लिए। नहीं, कलयुग में दिमाग सब खराब, नष्ट-बुद्धयः। "मन्दाः सुमन्द-मतयो मन्द-भाग्या ह्युपद्रुताः"—कलयुग का ये लक्षण है। एक तो मंद हैं, कुछ समझते नहीं, मूर्ख हैं। और जो कुछ समझने के लिए प्रयत्न करते हैं, तो उनका मत भी मंद है। वो एक मत निकाल दिए, "देखो जी, मिट्टी से ही चेतन पैदा होता है।" अरे, मिट्टी से चेतन पैदा होता है, तो laboratory में क्यों नहीं बनाते हैं? एक चींटी तो बनाओ मिट्टी से चेतन! बाकी अपनी जिद करेंगे। बड़े-बड़े सब Darwin theory और ये theory, सब बड़े-बड़े पाश्चात्य सब तथाकथित सब विद्वान हैं, एक नंबर सब मूर्ख हैं। ये मिट्टी से चेतन बनाने को चाहते हैं, ये संभव है नहीं। चेतन वस्तु अलग है। इसलिए भगवान कहते हैं:

"अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।"

ये जो भौतिक चीज है—भूमि, आपः, अनल, वायु—ये निकृष्ट प्रकृति है, अपरा। अपरा, हाँ, इसका value कम है, निकृष्ट, inferior quality, अपरा। "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्"—इसके अलावा और एक प्रकृति है, वो परा, उत्कृष्ट। वो कौन चीज है? "जीव-भूताम्"—ये जो जीवात्मा, "जीव-भूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।" ये जो प्रकृति, परा प्रकृति जीव है, यही दुनिया को भोग कर रहे हैं। भोक्ता तो नहीं, भोग के लिए प्रयत्न करते हैं।

सब कोई चाहते हैं दुनिया की चीज हम खूब भोग करें। इसलिए कहते हैं उनकी ज्ञान है, उनकी बुद्धि है, इसलिए उनको परा प्रकृति कहा जाता है। तो जीव परा प्रकृति, जीव भी प्रकृति, बाकी परा प्रकृति। यह भूमि, पांचभौतिक जो चीज है, ये अपरा प्रकृति और जीवात्मा जो है, परा प्रकृति। बाकी प्रकृति पुरुष नहीं। पुरुष का अर्थ होता है भोक्ता और प्रकृति का अर्थ होता है भोग्य। तो भगवान पुरुष हैं—"गोविन्दम् आदिपुरुषम्"—भगवान पुरुष हैं। ये भगवान की ये परा प्रकृति, अपरा प्रकृति जो कुछ है, ये सब भगवान की भोग्या है, भगवान इसको भोग करेंगे। और जो जीव समझता है कि "मैं भोक्ता हूँ", इसका नाम ही है माया। और भगवान पुरुष हैं और ये जड़ प्रकृति और चित् प्रकृति, दोनों ही भगवान की भोग्य वस्तु हैं। तो हम लोग ये जब भूल जाते हैं कि भगवान कृष्ण भोक्ता हैं और मैं जब भोक्ता बनने के लिए प्रयत्न करता हूँ, उसका नाम है माया। वही माया का चक्र। जो चीज मैं हूँ नहीं, उसको यानी कृत्रिम भाव से, artificially we are trying to do, that is called maya. We are not bhokta. Bhokta, ekmatra bhokta bhagavan. "भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम्।"

तो भगवान तो सर्वलोक... क्योंकि भगवान की प्रकृति जो कुछ है दुनिया में, सब कुछ बनी हुई है, हाँ। दुनिया में है क्या चीज? यही भूमि, आपः, अनल, वायु, उसको मिला-जुला करके एक चीज खड़ा कर देते हैं बस। तो वो तो भगवान का है। और आगे जाके भी भगवान बता देंगे, यह भी बताया है कि जीव है, ये भी हमारी प्रकृति है। तो मैं भी भगवान का और दुनिया भी भगवान की है, तो हमारा उचित क्या है? जो भगवान जिस तरह से हमको भोग कर सकें, उस काम में लग जाने से हमारी मुक्ति। मुक्ति का अर्थ यही होता है कि स्वरूप में अवस्थित होना। "मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः"—ये जो हम प्रकृति हैं और पुरुष होने के लिए जो हम प्रयास करते हैं, यही हमारा बंधन का कारण है, माया। और यदि मैं प्रकृति, प्रकृति रूप से भगवान की भोग्या हो जाता हूँ, तो उसका नाम है मुक्ति। और कुछ मुक्ति और कुछ नहीं, स्वरूप में अवस्थित रहना। जब मैं प्रकृति हूँ और भगवान पुरुष हैं, तो मैं भगवान की भोग्या हूँ। इसलिए भगवान जिस तरह से हमको भोग करने को चाहें, जिस तरह से हमको हुकुम करें, उस प्रकार हम काम करें, तो बस हमारा वो मुक्ति है और कुछ नहीं। मुक्ति कोई अलग चीज नहीं है, हाँ। थोड़ा समझ देखिए कि "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् / जीव-भूतां महाबाहो।" ये जो जीव है, जीव प्रकृति, बाकी पुरुष होने... पुरुष का नकल करके इस दुनिया में भोग करने को चाहते हैं। इसलिए ये इतना झगड़ा। आपस में झगड़ा का कारण क्या? आप भी प्रकृति, मैं भी प्रकृति, भगवान की भोग्य वस्तु। परंतु मायाजाल में फँस के मैं भी पुरुष होने को चाहता हूँ, आप भी पुरुष होने को चाहते हैं, इसलिए आपसे-हमसे झगड़ा है।

और यदि उभय, हम लोग दोनों ही समझ जाएँ कि "भाई, हम तो भोग नहीं कर सकते हैं, आप भी भोग नहीं कर सकते हैं", तो बिना आपस में झगड़ा किए, जो भोग्य... जो भोक्ता है, वो तो भगवान है। इसलिए आप और हम सब मिलकर के भगवान की सेवा में लग जाएँ, तो फिर झगड़ा की कोई बात ही नहीं। ये सब समझते... इसलिए भगवत गीता अच्छी तरह से समझना चाहिए। और समझ कर के जैसे यदि हम लोग अपने जीवन में इसी प्रकार काम करेंगे, तो शांति है, तभी शांति मिलेगी। भगवान खुद कहते हैं:

"भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम्।
सुहृदं सर्व-भूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥"

अगर शांति चाहते हैं, तो इसको अच्छी तरह से समझना चाहिए कि भोक्ता हैं भगवान और हम लोग भोग्य। यही एक चीज अगर हम लोग समझ जाएँ—भोक्ता भगवान, भोक्तारं सर्व-लोक—और सब जितने लोक हैं...

ये जो एक लोक है, पृथ्वी लोक है, भूलोक है, भुवर्लोक है, जनलोक है, महर्लोक है, तपोलोक है, अनंत कोटि लोक हैं, तो भगवान कहते हैं, "भोक्तारं यज्ञ-तपसां सर्व-लोक-महेश्वरम्"—सब लोक का मालिक मैं। यदि भगवान सब लोक के मालिक हुए, और फिर हमारा भोग वस्तु क्या रह गया? तो ये समझ सकें, इसलिए भगवत भक्ति, जो कृष्णभावनामृत की दुनिया में प्रचार करने की बहुत आवश्यकता है। आदमी सब भूल से चल रहा है, वो जानते ही नहीं। झूठ-मूठ लड़ाई-झगड़ा, अशांति, ये सब बनाए हुए हैं और सब समय दुखी हैं। अब जब कृष्ण को जान लें, कृष्ण को मान लें, "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्", उनकी सेवा... तो किसी भी अवस्था में सुखी रहेंगे, किसी भी अवस्था, कोई भी अवस्था। ये बात नहीं है जो धन रहने से ही सुखी रहेंगे और धन नहीं रहने से दुखी रहेंगे, ये बात नहीं है। हम लोग सब किस्म के आदमी से मिलते-जुलते हैं, बड़े-बड़े धनी से भी मिलते हैं, तो वो भी दुखी हैं, हाँ। सब आप लोग सब जानते हैं, सभी दुखी हैं। क्यों दुखी हैं? वो अपनी जो परिस्थिति है, जो वास्तविक जो उनका स्वरूप है, वो भूल गए।

इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि जीव का जो स्वरूप है—"जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्य-दास'"। नित्य का ये नहीं है कि आज दास बन के भगवत भक्ति करें, कल खुद ही भगवान हो जाएँ। नहीं, ये बात नहीं है। नित्य दास—आज भी दास और मुक्त होने के पश्चात भी दास। बाकी वो जो दास है, वो स्वरूप है, और ये जो दास है, ये विद्रूप है, मायामय है। परंतु मैं समझता हूँ कि मैं मालिक हूँ। सब कोई दास हैं। हम जितने आप लोग इधर बैठे हुए हैं, देखिए कोई मालिक है? सब दास हैं। कोई दुकानदारी का दास है, कोई government service का दास है, कोई औरत का दास है, कोई minister का दास है। वो minister भी दास है। वो यानी जो कोई हो, सब कोई दास हैं, हाँ। अभी governor, वो भी दास है, nation का दास है। उनको अगर vote नहीं दिया जाए, तो उसकी नौकरी छूट जाए। सभी दास हैं। बाकी सब मानते हैं, "मैं मालिक हूँ।" इसका नाम है माया। और कुछ भी व्यक्ति हो, तो दास है, हाँ। बाकी वो भगवद्-दास स्वीकार नहीं करेंगे, वो लोक का दास हो जाएगा, nation का दास हो जाएगा, घर में परिवार का दास हो जाएगा, और कुछ नहीं तो कुत्ते का दास हो जाएगा, घोड़े का दास हो जाएगा। बाकी भगवान का दास... बस यही लोग। दास तो है, दास उनको रहना ही पड़ेगा।

जैसे हम लोग civil disobedience किया था, आप लोग को मालूम है। वहाँ government को नहीं मानता। तो government को मानता नहीं, सब पकड़-पकड़ के सब जेल में भर्ती कर दिया और उधर खूब पीटा गया। तो दास नहीं मानते, government को नहीं मानता, "आप ये रूल से मानो।" जैसे होता है, ये साधारण example। तो और एक खुशी से government का कानून मान के हम लोग चलें, तो जबरदस्ती police के हाथ में, military के हाथ में हमको जाने नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार दास जीव का स्वरूप है—दास। जब वो भगवान से विरोध करके वो कहते हैं, "नहीं, दास नहीं हूँ, मैं मालिक हूँ", उस समय माया उसको पकड़ करके अच्छी तरह से... उनका माया के हाथ में जो त्रिशूल है, खूब अच्छी तरह से उनको सजा देती है। वो त्रिशूल का नाम है त्रिताप यंत्रणा, तीन प्रकार के ताप—आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक।

इसलिए जो बुद्धिमान व्यक्ति है, वो समझता है कि "मैं तो सब दुख नहीं चाहता हूँ।" क्योंकि तीन प्रकार के दुख हमारे ऊपर सब समय जबरदस्ती बैठ जाते हैं। यह मनुष्य जीवन का काम है। जैसे सनातन गोस्वामी जाकर के चैतन्य महाप्रभु से पूछे थे: "‘के आमि’, ‘केने आमाय जारे ताप-त्रय’"। "महाराज, आपके पास आए..." तो गुरु के पास जाकर के यही पूछना है—वास्तविक हमारा स्वरूप क्या है और मैं तो दुनिया का कुछ दुख नहीं चाहता हूँ, क्यों हमारे ऊपर दुख जबरदस्ती बैठ जाता है? यही पूछना। ये गुरु, गुरुकरण का अर्थ होता है जिससे समाधान हो।

जैसे अर्जुन, अर्जुन पहले भगवान कृष्ण से मित्रता के हिसाब से बातचीत कर रहा था। जब उसका समाधान नहीं हुआ, तो कृष्ण को गुरु माना: "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वाम् प्रपन्नम्"—"जो आपको मैं शिष्य बन जाता हूँ, आप हमको उपदेश दीजिए।" जिस तरह से ये जो हमारा चंचल मन हो गया, लड़ाई के क्षेत्र में आकर के हम लड़ाई करने को नहीं चाहता हूँ, तो इसका अर्थ... इसलिए भगवान ने गीता समझाया। इसी प्रकार हम लोग को समझना चाहिए कि मैं तो दुख नहीं चाहता हूँ, और किधर से कौन दुख भेज देता है जो कि जबरदस्ती हमको भोगना पड़ता है, इसका समाधान क्या है? यह जब प्रश्न होगा, फिर आस्ते-आस्ते वो भगवान का प्रश्न भी आएगा, भगवान से हमारा क्या संपर्क है, वो भी समाधान होगा। फिर भगवान की सेवा में लग जाने से हमारा सब दुख मिट जाएगा। इसलिए कलयुग में वो भगवत प्राप्ति के लिए एक ही उपाय है, बड़ा सरल उपाय:

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

Thank you very much. हरे कृष्ण।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥