श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  701214LE-INDORE--Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
इंदौर, 14-दिसंबर-1970
 
 
 
[Opening]

आज हमको लव, आनंद लोग, एक बड़ा भारी पार्ट... वो हमारे साथ में नहीं हैं, परन्तु वो Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare नाम को जप कर, और ख़बर मिला है, पार्टी सब में पहुँच गया। और जैसा हम लोग रहते हैं, शुद्ध विचार से, वो सब स्वीकार करके, मस्तक मुंडन करके, और हमारे जितने भक्त हैं, उनको साथ मिल गया। और उनके पास रुपया-पैसा भी था, वो भी कम नहीं है—चार लाख। वो भी इसलिए जो चैतन्य महाप्रभु की आशीष है: param vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam। कलयुग में खूब संकीर्तन, भगवान श्री कृष्ण का जय गान कीजिए।

सब श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं, वेद आदि शास्त्रों का उद्देश्य क्या है? भगवान श्री कृष्ण को समझना। यदि अपने धर्म को ध्यान करके, वेद-वेदान्त आदि को छोड़ करके, ज्ञान, यज्ञ, तपस्या, योग—सब साधन यदि कृष्ण-भक्ति नहीं हुई, तो सब śrama eva hi kevalam। dharmaḥ svanuṣṭhitaḥ puṁsāṁ viṣvaksena-kathāsu yaḥ / notpādayed yadi ratiṁ śrama eva hi kevalam। सब अपना-अपना धर्म है, धर्म या कर्म करो, परन्तु आख़िरी में यदि भगवद्-भक्ति, कृष्ण-भक्ति नहीं हुई, तो समझ जाओ सब कुछ नहीं हुआ।

ārādhito yadi haris tapasā tataḥ kim, nārādhito yadi haris tapasā tataḥ kim / antar bahir yadi haris tapasā tataḥ kim, nāntar bahir yadi haris tapasā tataḥ kim।

कहते हैं, यदि भगवान की आराधना हुई, भगवान से प्रेम हुआ, केवल भगवद्-चरण में आत्म-समर्पण कर लिया, फिर उसके लिए और कोई तपस्या की आवश्यकता है नहीं, सब तपस्या ख़त्म। और सब कुछ करके भी यदि भगवान की आराधना नहीं हुई, तो उस प्रकार की तपस्या का कोई मूल्य नहीं है। antar bahir yadi hariḥ—तपस्या वह है जिसको अन्दर में, बाहर में, सब जगह में भगवान का दर्शन हो रहा है। इस प्रकार जो स्थिति है, उसको और कोई तपस्या की आवश्यकता नहीं है। सब कुछ साधन करके भी बाहर-भीतर यदि भगवद्-दर्शन नहीं हुआ, तो उस अवस्था का कोई मूल्य नहीं।

ये जो भाव है, सब जगह भगवान का दर्शन, ये भगवान खुद भी श्रीमद् भगवद्गीता में कहे हैं। सप्तम अध्याय में भगवान अर्जुन से कहते हैं: mayy āsakta-manāḥ pārtha yogaṁ yuñjan mad-āśrayaḥ। इस प्रकार जो हमारे भक्त का आश्रय करके जो भक्ति-योग का साधन करता है, उसके लिए भगवद्-विषय में और कोई संशय नहीं रहता। और भगवान क्या वस्तु हैं, वो samagraṁ mām asaṁśayaṁ—भगवद्-भक्ति द्वारा आप भगवान को सम्पूर्ण समझ सकेंगे, और कोई संशय नहीं रहेगा उसमें।

और ये जो भगवद्-भक्त का आश्रय लेकर के वो योग करना है, भक्ति-तपस्या... यह यदि आपको tattvataḥ जानना है—tattvataḥ का अर्थ होता है भगवद्-वस्तु। tad viddhi... और शास्त्र कहता है: tad-vijñānārthaṁ sa gurum evābhigacchet। भगवद्-ज्ञान लाभ करने के लिए गुरु के पास अवश्य जाना चाहिए। गुरु कौन है? brahma-niṣṭham—जो वेद-शास्त्र को पढ़ के भगवान में पूर्ण निष्ठा रखता हो। तो ये शब्द-सागर, भक्ति-योग, सब शास्त्रों का विचार है जो कलयुग में है। केवल भगवद्-नाम कीर्तन करके आप सब साधन सम्पूर्ण कर सकते हैं। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: param vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam। श्री कृष्ण संकीर्तन की परम विजय लाभ, उसका प्रमाण स्वरूप देखिए पाश्चात्य देशों में ये जो विजय लाभ हो रहा है, सब भगवान कृष्ण के चरणों में आश्रय ले रहे हैं। इसका एकमात्र उपाय इसी से हो रहा है, विजय लाभ कर रहे हैं। परम चैतन्य महाप्रभु की वाणी कभी असत्य होने वाली नहीं है, विजय लाभ कर रहा है।

हमारे पूर्वज संन्यासी अमेरिका आदि देशों में प्रचार करने गए, पर विजय लाभ नहीं कर सके। श्री कृष्ण की विजय लाभ, param vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam। चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी है: pṛthivīte āche yata nagarādi grāma, sarvatra pracāra haibe mora nāma—ये पृथ्वी, सारा दुनिया में जितने ग्राम हैं, जितने शहर हैं, सब जगह में ये जो हमारा संकीर्तन है, हर तरफ़ फैल जाएगा। भविष्य में और फ़ायदा होगा, आप लोग इसका उपयोग कीजिए। बहुत सरल है, अपने-अपने स्थान में रहिए। जो काम आप कर रहे हैं, उससे विचलित होने की कोई ज़रूरत नहीं है, परन्तु भगवद्-कीर्तन कीजिए और भगवद्-भक्त के मुख से भगवान का विषय सुनिए, स्मरण कीजिए। आप लोग कृपा करके शुद्ध भक्तों के मुख से सुनिए, जिन्होंने भगवद्-सेवा को ही अपनी जीविका कर लिया है, जिन्होंने भगवान के लिए सर्वस्व त्याग किया है। उनके मुख से भगवद्-भक्ति सुनने से बहुत जल्दी काम होगा।

और सदाचार का पालन करना भक्ति की विधि है। भगवद्-भक्ति साधन करने के लिए फिर भी आपको ग्रहण करना चाहिए: utsāhād niścayād dhairyāt। उत्साह होना चाहिए कि इसी जीवन में मैं भगवान को लाभ करूँगा। धैर्य से विचलित नहीं होना चाहिए। जैसा-जैसा शास्त्र कहे, वैसा करो। उत्साह और निश्चय होकर, क्योंकि मैंने भगवान का आश्रय ग्रहण किया है, और भगवान कहे हैं कि जो हमारा भजन करते हैं, मैं उनको सब पापों से बचाता हूँ, और उसका कभी नाश होने वाला नहीं है। niścayāt—और शास्त्र में जैसा विधि है, उसका पालन कीजिए। sato vṛtteḥ—सदाचार और भक्ति-विधि को पालन करना, और साधु के संग में सत् होकर आप पालन करेंगे, तो ṣaḍbhir bhaktiḥ prasiddhyati—फिर आपकी भक्ति जो है, उससे काम बन जाएगा। हम लोगों का प्रचार आदमी को तैयार करना है। जैसे ये देखिए, अमेरिका और यूरोपियन लड़के-लड़की, जो पहले पाप कर्मों में युक्त थे, अब सब शुद्ध वैष्णव बन गए हैं। केवल सब कीर्तन—Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare—कीर्तन में सदा जीवन ऐसा बनाना चाहिए कि रास्ता में चलते-चलते Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare जपें। ऐसा करने से आपके काम का कोई नुक़सान नहीं होगा, परन्तु मनुष्य जीवन सफल हो जाएगा।

भगवान चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: param vijayate śrī-kṛṣṇa-saṅkīrtanam—संकीर्तन से परम विजय लाभ होता है। क्यों? भगवद्-कीर्तन जितना कीजिएगा, उतना ही आपका जो पहला मैल है, वो साफ़ हो जाएगा। अर्थात सब भ्रम मिट जाएगा। भ्रम क्या चीज़ है? देहात्म-बुद्धि। अभी हम लोग समझते हैं कि ये जो शरीर है, भौतिक शरीर, यही हम हैं। ये जो भ्रम है, ये भ्रम मिट जाएगा, इस भ्रम से मुक्त हो जाएंगे। आप मुक्त हो जाएंगे। ये दुनिया में दावानल है। जैसे जंगल में आग लगती है, उसमें कोई आग लगाने तो नहीं जाता है, परन्तु आग लग जाती है। इसी प्रकार इस दुनिया में सब कोई सोचते हैं कि मैं शान्ति में रहूँगा, परन्तु शान्ति में रहने का कोई उपाय नहीं है, वो आग ज़रूर लगेगी किसी न किसी कारण से। शान्ति से रहने की शिक्षा कीजिए, आग ज़रूर लगेगी। परन्तु इस दावानल को शान्त करने के लिए एक ही महत्वपूर्ण उपाय है—परम संकीर्तन। जैसा ही संकीर्तन शुरू हो गया, उसी समय आपका जो है, चन्द्रिका का किरण विकास होगा। जैसे चन्द्रमा अमावस्या के पश्चात् पृथ्वी से थोड़ा-थोड़ा निकलता है, इसी प्रकार जो आपका श्रेय-वस्तु है, वो बढ़ेगा।

दुनिया में दो चीज़ें होती हैं—एक श्रेय-वस्तु और एक प्रेय-वस्तु। जैसे ये बालक है, ये नहीं जानता है कि मैं किस गम्भीर विषय में बातचीत कर रहा हूँ, लेकिन उसका जो प्रिय है, वो उसे जानता है। वो बातचीत करना ही जानता है। तो दुनिया में दो चीज़ें हैं: 'प्रेय' का अर्थ होता है जो हमारे इन्द्रियों को अच्छी लगती है, वो प्रेय है; और जो आख़िरी में हमारा मंगल करता है, उसका नाम है 'श्रेय'। तो ये भव-महादावानल शान्त होने के पश्चात्, अर्थात मुक्त हो जाने के पश्चात्, जो आपकी श्रेय-वस्तु है, वो क्रमशः प्रकाश पाएगी। अर्थात चेतनता और आनन्द। असल आनन्द—ramante yogino 'nante satyānande cidātmani—योगी लोग जो हैं, वो भी आनन्द में रहते हैं। योगी का जो आनन्द है, वो अनन्त आनन्द है, वो इन्द्रिय का आनन्द नहीं है। जो असल सुख है, वो अतीन्द्रिय है। वो अतीन्द्रिय कब होता है? जब इन्द्रिय भगवद्-भक्ति द्वारा तत्पर होकर निर्मल हो जाती है, तब उस इन्द्रिय द्वारा आपको आनन्द मिलेगा, सुख मिलेगा। तो ये सब शास्त्रों का वचन है, सब विशेष है। आप ग्रहण करेंगे तो इसी जीवन में भगवद्-प्राप्ति हो जाएगी, और नहीं तो फिर जीवन केवल पशु का रह जाएगा—केवल खाया, सोया, बच्चा पैदा किया, मर गया। तो फिर पशु जीवन आगे जाके आपको क्या जीवन मिलेगा, क्या नहीं मिलेगा, जैसे-जैसे कर्म होंगे वैसा मिलेगा।

इसलिए जब तक ये मनुष्य शरीर है, जब तक हमारी बुद्धि ठीक है, ये सब ठाकुर का वचन मानकर हरि-कीर्तन कीजिए। कलयुग में बड़ा सरल उपाय है, देखिएगा बहुत जल्दी भगवद्-अनुभव हो जाएगा। जैसे रोज़ाना थोड़ा-थोड़ा, थोड़ा-थोड़ा चन्द्रमा बढ़कर एक दिन पूर्णिमा का पूर्ण चन्द्र उदय हो जाता है, इसी प्रकार जितना कीर्तन कीजिएगा, सदाचार से आपको वो जो चन्द्र है, वो बढ़ते-बढ़ते-बढ़ते पूर्ण चन्द्र के रूप में विकास पाएगा। और वो आनन्द क्या है? vidyā-vadhū-jīvanam—क्योंकि सच्चिदानन्द विद्या-आनन्द तभी हो सकता है जब पूर्ण ज्ञान हो। देखिए, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि vidyā-vadhū-jīvanam—जब पूर्ण ज्ञान हो जाता है, तो आपको वो सच्चिदानन्द आनन्द पूर्ण रूप से प्राप्त होगा।

ये सब होगा यदि आप उत्साह से करके हरि-कीर्तन करेंगे। जो कर रहे हैं, उसको आप लोग कलयुग का सरल उपाय मानकर चलिए। तो हम लोग कल इधर से जाने का विचार किया है, 12 तारीख से केवल लाभ आया है, तो भगवान की इच्छा से कल हम जाएंगे। और आप लोगों से निवेदन है, ये हरि-नाम जो हम लोग प्रचार कर रहे हैं, कोई नई वस्तु है नहीं, भारत में ही है। तथापि, जैसा शुद्ध भाव से प्रयास होना चाहिए, शुद्ध भाव होने के लिए ये चार चीज़ें हैं, इसको शास्त्र में कहते हैं पाप-चतुष्टय। चार प्रकार के पाप हैं, उसको छोड़ना होगा: द्यूत, पान, स्त्री-सङ्ग, सूना (हिंसा/मांसाहार)। इसके वश में मत रहिए, ये सब में हो गया तो कोई मुश्किल नहीं है। और सब सहज हो जाएगा, आपका जीवन सरल उपाय से बदल जाएगा। कोई ज़रूरत नहीं है कि आपको बहुत पढ़ना होगा, ये कलयुग में सम्भव नहीं है। और कलयुग के जो लोग हैं, उनको शास्त्र कहते हैं: mandāḥ sumanda-matayo manda-bhāgyā hy upadrutāḥ—उनका भाग्य जो है, मन्द है, ख़राब है। तो उनका कोई साधन सम्पूर्ण नहीं होगा, मात्र harer nāma harer nāma harer nāmaiva kevalam। कोई मुश्किल नहीं है, ये आप शास्त्र और महाप्रभु की आज्ञा मानकर कीजिए।

और नाम में सर्व-शक्ति है, भगवान का नाम और भगवान कोई अलग नहीं हैं। जैसे भगवान सम्पूर्ण सर्व-शक्तिमान हैं, इसी प्रकार नाम भी सम्पूर्ण है: nāma cintāmaṇiḥ kṛṣṇaś caitanya-rasa-vigrahaḥ / pūrṇaḥ śuddho nitya-mukto 'bhinna-tvān nāma-nāminoḥ। सब चैतन्य महाप्रभु का ये भारी विज्ञान है, सब हो जाएगा यदि आप जैसे माला कर रहे हैं, माला जप रहे हैं।

आप लोग डरते हैं कि हमारा मार्केट में जाने से क्या होगा, कोई मुश्किल नहीं है, बहुत सरल है। भक्ति लेने से क्यों डरते हैं? इसलिए कहते हैं, यदि आप माला जप रहे हैं और कोई आदमी आपका मित्र आपकी ज़िन्दगी में आता है, तो थोड़ा-थोड़ा सहन कीजिए। लोग माला ऐसे हाथ में लेने से शर्माते हैं, पर रेडियो ले जाते हैं तो उसकी लज्जा नहीं होती। और माला ले लिया तो बड़ी लज्जा आती है। क्यों? रेडियो लेकर घूमते हैं हाथ में, माला लेकर घूमना कोई अपमान नहीं है। नहीं, वो समझते हैं कि हमारा अपमान होगा। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, अगर अपमान हो तो थोड़ा सा ऐसा ध्यान दीजिए: tṛṇād api sunīcena taror api sahiṣṇunā / amāninā mānadena kīrtanīyaḥ sadā hariḥ। जैसे रास्ता में तृण है, घास है, पैर दबा के चला जाता है, कुछ बोलता है क्या घास? उससे भी करोड़ गुना सहनशील बनिए। पेड़ जैसा सहिष्णु बनिए—कोई उसको फूल ले लेता है, कोई उसका फल लेता है, कोई उसको काट डालता है, पर वह कुछ नहीं बोलता। इसी प्रकार सहिष्णु होकर, सबको मान देकर, स्वयं अमानी होकर, सदा Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare / Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare कीर्तन कीजिए। यूरोपियन लोग हमसे ज़्यादा आगे बढ़े हैं, उनका तो अच्छा है। अब देखिए, ये हो गया उनको, जो कपड़ा नहीं पहनने से नहीं चलता था, अब वो वैष्णव कपड़ा पहन रहे हैं। उनका कोई भय नहीं है कि पुलिस पकड़ ले जाएगी। चलो, पुलिस अब नहीं पकड़ती है, पहले बहुत पकड़ लिया करती थी।

लोग नहीं जानते हैं भगवान का नाम और कीर्तन करके भगवान से क्या प्रार्थना करनी चाहिए। भगवान से क्या प्रार्थना कीजिएगा? "हे भगवान, हमारे पास धन नहीं है, हमको धन दीजिए। हम बहुत तकलीफ़ में हैं, हमारा दुःख दूर कीजिए।" नहीं, ये सब प्रार्थना नहीं। क्या प्रार्थना कीजिए? na dhanaṁ na janaṁ na sundarīṁ kavitāṁ vā jagad-īśa kāmaye / mama janmani janmanīśvare bhavatād bhaktir ahaitukī tvayi। जो भगवद्-भक्त हैं, भगवान से कुछ नहीं चाहते। वो कहते हैं, "भगवान, मैं धन भी नहीं चाहता हूँ, और जन भी नहीं चाहता हूँ, और सुन्दरी स्त्री भी नहीं चाहता हूँ।" जो दुनिया के लोग चाहते हैं, भक्त वो सब नहीं चाहते। फिर क्या चाहते हैं? "जन्म-जन्म में, जहाँ भी मेरा जन्म हो, बिना किसी कारण के आपके चरणों में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।" भगवान के सामने ऐसे प्रार्थना कीजिए। ऐसे जीवन हो जाता है। भगवान से माँगना क्या? भगवान क्या नहीं जानते कि आपको क्या चाहिए? भगवान सब जानते हैं। केवल भगवद्-सेवा कीजिए, सबका पूर्ण काम होगा। आप जो भोग करना चाहते हैं, वो भी कामना आपकी भगवान पूर्ण कर देंगे। आप व्यापार करते हैं, करोड़ रुपया कमाने की इच्छा रखते हैं, भगवान का चिन्तन कीजिए, आपको सफलता मिल जाएगी। sarva-kāmo vā mokṣa-kāma upādhi-rahitaḥ। और मोक्ष चाहते हैं, ज्ञानी लोग जैसा मोक्ष चाहते हैं, वो भी मिल जाएगा। और जो भक्त हैं, वो भगवान की सेवा चाहते हैं। क्यों न भगवान की सेवा करें? और भगवान की सेवा करने का मन्त्र है: Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare / Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare।

और क्या प्रार्थना करना है? ayi nanda-tanuja kiṅkaraṁ patitaṁ māṁ viṣame bhavāmbudhau / kṛpayā tava pāda-paṅkaja-sthita-dhūlī-sadṛśaṁ vicintaya। "हे नन्द-नन्दन भगवान कृष्ण! मैं तो आपका नित्य दास हूँ, परन्तु किसी कारणवश इस भव-समुद्र में गिर पड़ा हूँ। कृपा करके मुझे अपने चरण-कमलों की धूलि के समान बना लीजिए।" इस भव-समुद्र से उठने का और आपके चरणों का आश्रय लेने का, इसमें एक ही उपाय है। बस, आप अगर सोचते हैं कि हम पहलवान हैं, बहुत बुद्धिमान हैं, तैरना जानते हैं, तो ये हमारी ग़लत बात है। समुद्र बहुत भारी है, आप बहुत स्ट्रगल कर रहे हैं सुखी होने के लिए, पर कैसा है समुद्र? इस भव-समुद्र में आदि-भगवान की कृपा के बिना आप कभी पार नहीं पा सकते। इसलिए कहते हैं, भगवान का नाम लीजिए। और ऐसे भगवद्-नाम करते-करते जब भगवद्-प्रेम होगा, क्योंकि आपको लाभ होगा। परम महान भगवद्-प्रेम लाभ करना ही जीवन का एकमात्र महान लाभ है। और तो सब क्या होता है? नया-पुराना बदलता रहता है। ये प्रार्थना जो है, नाम करते-करते हमारे हृदय में प्रेम का प्रकाश करती है। तब आन्दोलन का प्रभाव केवल एकमात्र परम कल्याणकारी होगा।

[Closure]

लोग बहुत बड़े हैं, आप लोगों को जब मालूम होगा... और हम लोग प्रयास कर रहे हैं सब करने के लिए। आप लोग हम लोगों को सहयोग दीजिए। दुनिया बहुत दुखी है, दुखी लोगों को सुखी करने के लिए, इसको प्रचार करने के लिए सब मेम्बर बन जाएं। अपने जीवन में इसको पालन कीजिए, जो हमारे द्वारा किया जा रहा है, वो सफल होगा।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥