भगवान का नाम और भगवान अभिन्न हैं—"अभिन्नत्वान्नाम-नामिनोः"। जैसे इधर, भौतिक जगत में, नाम और वस्तु अलग होते हैं। जैसे यदि आप प्यासे हैं, आपको जल वस्तु चाहिए, और यदि आप केवल जल का नाम लेंगे—"जल, जल, जल, जल"—तो आपकी प्यास नहीं बुझेगी। क्यों? क्योंकि यह द्वैत जगत है। जल एक चीज है और जल का नाम दूसरी चीज है। और भगवद्-वस्तु क्या है? अद्वैत। भगवान, भगवान का नाम, भगवान का रूप, भगवान की लीला इत्यादि सब एक हैं।
यह न समझिए कि... अभी एक मित्र जी हमसे पूछ रहे थे कि "जिसका नाम में आस्था नहीं है, क्या उसको भगवान नहीं मिलेंगे? उसकी भगवान में आस्था है, बाकी भगवान के नाम में आस्था नहीं।" यह जो प्रश्न है, यह कोई विद्वान का प्रश्न नहीं है। क्योंकि भगवान का नाम और भगवान अलग नहीं होते। यदि भगवान में उसकी आस्था है, तो भगवान के नाम में जरूर आस्था होगी। क्योंकि जब तक वह ज्ञान-भूमिका में नहीं पहुँचता, तब तक उसको दर्शन केवल अद्वैतवादी होने से नहीं होगा। अनुभव करना चाहिए कि "शब्दब्रह्म"—सभी ब्रह्म हैं, तो भगवान का नाम भगवान से अलग कैसे? नाम भी ब्रह्म है। यह शास्त्र में मानते भी हैं कि "नाम चिंतामणिः कृष्णः"। जो यह भगवान का नाम है, यह स्वयं कृष्ण हैं—"नाम चिंतामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः"। चैतन्य, चेतन वस्तु है, जड़ वस्तु नहीं है। "चैतन्य-रस-विग्रहः"—और सब रस का आधार है, "रसो वै सः"। नाम करते-करते, नाम करने के कई स्तर होते हैं।
पहले नाम तो अपराध-युक्त होता है। अभी एक मित्र से बातचीत कर रहा था—नाम-अपराध। नाम को अगर कोई "शुभक्रिया-साम्य-प्रमाद" समझे, जो नाम करके मैं कुछ भौतिक लाभ उठा लूँ, वह अपराध है। भगवान दिव्य वस्तु हैं, भगवान को अपनी सेवा में आप नहीं लगा सकते। यह जो हमारे धर्म की अवनति हुई है, उसका क्या कारण है? भगवान से लोग अपना काम निकालना चाहते हैं। भगवद्-भक्ति करके दुनिया का कुछ लाभ उठाना चाहते हैं। और आखिरी में, कुछ नहीं तो मुक्ति चाहते हैं, वह भी एक लाभ उठाना है। जो चाहते हैं कुछ, उनके लिए भगवद्-भक्ति नहीं। कर्मी वो भी चाहते हैं, ज्ञानी वो भी चाहते हैं, योगी वो भी चाहते हैं—कुछ न कुछ माँग है। कर्मी लोग चाहते हैं कि हमको दुनिया की सब चीजें मिल जाएँ, दुनिया का जितना धन-दौलत है सब हमको मिल जाए, हम खूब भोग करें। और ज्ञानी, जो देख रहा है कि दुनिया के भोग में कुछ है नहीं, ब्रह्म-तत्त्व वस्तु है, तो "मैं ब्रह्म बन जाऊँ"—वह भी एक माँग है। ये दुनिया में चाहते हैं Prime Minister बन जाएँ, और वो चाहते हैं भगवान बन जाएँ! उनकी माँग और बहुत ज्यादा है। ये तो बेचारे गरीब हैं, Prime Minister हो जाएँ, या Birla हो जाएँ तो संतोष हो। वो चाहता है कि "मैं खुद भगवान हो जाऊँ, लक्ष्मीपति, हजारों लक्ष्मी हमारी सेवा में लगें।" देखिए, असल में वो चाहता है। और योगी, वो सिद्धि चाहते हैं—अणिमा, लघिमा, प्राप्ति इत्यादि। छोटे से छोटे हो जाएँ, बड़े से बड़े हो जाएँ, जो चाहें, बहुत धन-दौलत चाहें हमको मिल जाए, सिद्धि में सब होता है, अष्ट-सिद्धि हो, वो भी चाहते हैं। तो ज्ञानी, योगी जितने हैं, ये सब माँगने वाले भूखे हैं, वो चीजें माँगते हैं, इसलिए उनको शांति नहीं है। जब तक वो माँगेंगे, यह माँगना है, यह जो business है, बंद नहीं करेंगे, तब तक शांति नहीं है। चैतन्य-चरितामृत में कहते हैं: "भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकली 'अशान्त'"। चाहे कर्मी हो, चाहे ज्ञानी हो, चाहे योगी हो, ये सब अशांत हैं। क्यों? क्योंकि उनकी माँग है। "कृष्ण-भक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त'"। जो कृष्ण का भक्त होता है, वह शांत है। क्यों? उसकी कुछ माँग नहीं है। वह कृष्ण से कुछ माँगता ही नहीं।
जैसे चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये।" हे जगदीश! मैं धन नहीं चाहता हूँ, और न बहुत से आदमी हमारे पीछे-पीछे चलें—Leader, मैं Leader भी नहीं बनने को चाहता हूँ। "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां"—और बहुत सुन्दरी स्त्री, वो भी नहीं चाहता। यही दुनिया में सब कोई चाहते हैं—अच्छी स्त्री मिल जाए, बहुत रुपया मिल जाए, और बहुत आदमी हमको "हुजूर, हुजूर" करें—लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा, यही चाहते हैं दुनिया में। बाकी कृष्ण-भक्त जो हैं, वो ये सब नहीं चाहते। देखिए, इसलिए वो निष्काम हैं। निष्काम तो वही भक्त है, कोई भी कृष्ण-भक्त निष्काम है। देखिए, कृष्ण-भक्त, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां..." तो फिर क्या कहते हैं? "मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि"। "जन्मनि जन्मनि" का अर्थ क्या होता है? अगर मुक्त हो गया, तो फिर जन्म कहाँ? तो मुक्ति भी नहीं चाहते। जो कृष्ण-भक्त हैं, भगवान उसको अगर मुक्ति देना भी चाहें—"ले बेटा, ले मुक्ति ले"—तो भी नहीं चाहते। इसका कारण क्या है? उसका कारण यह है कि वह तो मुक्त है ही। जैसे बिल्वमंगल ठाकुर कहते हैं: "मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽस्मान्"—मुक्ति जो है, वह तो हमारे सामने हाथ जोड़कर खड़ी है, "हुजूर, बोलिए क्या चाहिए?" तो यदि आप शांति चाहते हैं, तो उसी धर्म का अवलंबन कीजिए। वह क्या चीज है? "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे"। हमें Christian धर्म से कोई मतलब नहीं है, हिन्दू धर्म से कोई मतलब नहीं है, और जितने धर्म हैं, इन सब धर्मों से हमारा कोई मतलब नहीं है। यदि हम देखेंगे कि Christian धर्म में, हिन्दू धर्म में भगवद्-भक्ति जाग्रत होती है, तब वह ठीक है। और नहीं तो बेकार हैं सब धर्म। इसीलिए भगवान कहते हैं, "सर्वधर्मान्परित्यज्य"। सब धर्म बेकार हैं जिसमें भगवद्-भक्ति नहीं है, कुछ काम के नहीं। भगवान कहते हैं, "धर्मसंस्थापनार्थाय"—धर्म को संस्थापन करने के लिए "सम्भवामि युगे युगे"। फिर कहते हैं, "सर्वधर्मान्परित्यज्य"। तो भगवान का यह काम नहीं है कि हिन्दू धर्म स्थापित करने के लिए कृष्ण आए थे, या मुसलमान धर्म स्थापित करने के लिए आए थे। नहीं, ये सब धर्म नहीं हैं। धर्म तो वही है जिसमें भगवद्-भक्ति है। बाकी सब बेकार, कुछ काम का नहीं है।
वही शास्त्र में कहा है, "केवल जीवन भर धर्म का आचरण किया और आदमी ने भगवान को नहीं समझा, भगवद्-भक्ति नहीं हुई," तो शास्त्र कहते हैं कि केवल, केवल श्रम हुआ, परिश्रम। उसका कुछ लाभ हुआ? लाभ नहीं हुआ। "धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन-कथासु यः। नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥" ये सब शास्त्र, कोई भी शास्त्र लीजिए। वेद-शास्त्र का, वेद का क्या अर्थ है? वेदांत का क्या अर्थ है? वेद का अंत। वेद माने ज्ञान, और उसका अंत—अंत में जो ज्ञान है, उसका नाम है वेदांत। ज्ञान तो अनेक प्रकार का होता है। "चोरी करो"—वह भी एक ज्ञान है। बिना ज्ञान के कोई चोर भी नहीं हो सकता, पकड़ा जाता है। तो ज्ञान अनेक प्रकार का है। असल जो ज्ञान है, वह है भगवद्-ज्ञान। इसलिए भगवान खुद कहते हैं: "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते"। अनेक जन्म परिश्रम करते-करते, ज्ञान का, कर्म का साधन करते-करते, जब उसकी बुद्धि पक्की हो जाती है—ज्ञानवान, बुद्धिमान, wise—उस समय भगवान में प्रपद्यते, "वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः"। वह भगवान कौन हैं? वह भगवान कृष्ण हैं, वासुदेव। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"। वासुदेव का अर्थ होता है कृष्ण। उनकी टीका में बताया है—"वासुदेवाय कृष्णाय"। तो जब इस परिस्थिति में आदमी पहुँचे कि भगवान कृष्ण ही असल चीज हैं, मूल वस्तु हैं। जैसे भगवान खुद कहते हैं: "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥" हमसे सब कुछ होता है—जितने देवता हैं, ब्रह्मा, शिव, नारायण, विष्णु इत्यादि, और मनुष्य, पशु—"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते"। जो बुधाः, भावसमन्विताः—विद्वान हैं, वो इसको समझते हैं कि "मैं, कृष्ण, ही मूल वस्तु हूँ।" वेदांत में कहते हैं, ब्रह्म-वस्तु क्या चीज है? "जन्माद्यस्य यतः"—जहाँ से सब चीज का जन्म होता है। और उसका उत्तर देखिए, भगवान खुद कहते हैं: "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते"।
तो इस प्रकार कृष्ण को आप लोग समझेंगे, और उनको समझने में कोई मुश्किल नहीं है, श्रीमद् भगवद्गीता मौजूद है। बाकी खेद का विषय है, श्रीमद् भगवद्गीता के अंश को सब इधर-उधर की बात बताते हैं। बड़े-बड़े साहब, commentator, विद्वान, विपथगामी कर देते हैं, कृष्ण को छुड़ा देते हैं। इसलिए हजारों वर्ष श्रीमद् भगवद्गीता पढ़ते हुए भी जस का तस ही रहता है। एक (1) जो है, उसको निकाल दिया, केवल zero। एक के साथ एक zero, शून्य रहे तो 10 होता है, 100 होता है। केवल zero है। जितनी commentary हैं, वो सब zero हैं। क्यों? क्योंकि वो एक जो कृष्ण हैं, उनको छोड़ दिया। आप लोग देखिएगा, आज का आधुनिक—आधुनिक का अर्थ होता है जो कृष्ण को मार डाले। वो तो आधुनिक नहीं, बहुत पुरानी बात है। कंस की बात थी—"कृष्ण को मार डालो, कृष्ण पर पहरा लगा दो। जहाँ-जहाँ कृष्ण का जन्म होगा, हमारे पास ले आना, उसे हम मार देंगे।" यह आधुनिक नहीं है, बहुत पुरानी बात है। कृष्ण को जो लोग असुर, राक्षस होते हैं, वो केवल कृष्ण को मारने के लिए तैयार रहते हैं। उनका काम यही है। सब छोड़ दीजिए, कृष्ण को मारने वाली बात छोड़ दीजिए, तभी सुखी होंगे। कृष्ण को पकड़िए। "कृष्णा भगवान"—सब अविश्वास कर रहे हैं, "भगवान कहाँ हैं? भगवान क्या हैं?" और भगवान खुद आश्वासन करते हैं, "मैं हूँ, मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।" सब गीता भी पढ़ रहे हैं, और हजारों गीता-भवन भी हैं, बाकी कृष्ण को उड़ा दो! असल काम है यह पागलपन छोड़ना। कृष्ण को पकड़िए, सब ठीक हो जाएगा। और नहीं तो "श्रम एव हि केवलम्"। और कृष्ण-भजन करते-करते... कृष्ण-भजन तो नहीं है, माया-भजन है। माया-भजन करते-करते-करते माया के हाथ में रह जाएँगे, और उनके हाथ से निकलना बहुत ही मुश्किल है। "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते..." जब तक भगवान कृष्ण के चरणों में शरणागति पूर्णतया नहीं होगी, तब तक वो माया के हाथ में रहेंगे। वो degree का खाली फर्क है—1% माया, 10% माया, और 100% माया। बाकी माया 1% भी रहेगी, तो भगवद्-धाम जाने का कोई उपाय नहीं। तो वह 1% को भी 0% करने के लिए क्या पद्धति है? वह भी श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं: "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते"। जो भगवद्-भक्ति, भगवान कृष्ण की अव्यभिचारिणी भक्ति करते हैं। व्यभिचारिणी भक्ति नहीं। अव्यभिचारिणी माने शास्त्र-निर्देश के अनुसार, हमारे मन-माफिक नहीं। जैसा आज है—जिसका जो जैसा मन चाहे, वह वैसे ही भगवान का भजन करे—यह गलत बात है। भगवान एक हैं, और भगवान को मिलने के लिए पथ भी एक ही है, वह है भक्ति। वह ज्ञान भी नहीं, योग भी नहीं, और कर्म भी नहीं। "भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः"। यदि भगवान को आप समझने को चाहते हैं, तो यह भक्ति-योग को आपको लेना पड़ेगा, दूसरे रास्ते से नहीं होगा। और दूसरा रास्ता जो है, उसमें ऐसे-ऐसे भक्ति-योग में जब तक आप नहीं पहुँचे हैं, तब तक वह भी सफल नहीं है।
मुक्ति भी भगवद्-भक्ति के बिना नहीं है। मुक्ति भी देने वाले भगवान हैं। अगर आप भक्ति जाग्रत करके भगवान से मुक्ति चाहते हैं, तो भगवान मुक्ति देने वाले हैं, दे देंगे आपको मुक्ति। क्या मुक्ति लाएंगे भगवान? और योग-सिद्धि भी चाहते हैं, वह भी भगवान देने के लिए तैयार हैं। जब भगवान हैं, सर्वशक्तिमान हैं, अगर आप योग-सिद्धि चाहते हैं, अगर दुनिया का भोग चाहते हैं, और ज्ञानी होकर मुक्ति चाहते हैं, ये सब चीजें भगवान दे सकते हैं। भगवान के पास कुछ कमी नहीं है। आपको जो चीज चाहिए, आपको मिल जाएगी। तो इसलिए शास्त्र कहते हैं:
"अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥"
चाहे आप अकाम हों—अकाम जो है, भक्त, उसकी कुछ कामना नहीं होती। और यदि आप सर्वकाम हैं—सर्वकाम का अर्थ कर्मी, सब चाहते हैं कि सब कुछ हो। और मोक्षकाम—जो मोक्ष चाहते हैं। इसी प्रकार है, जो कुछ आपको चाहिए, यदि आपको माँगना है, तो भगवान से ही माँगिए, कृष्ण से ही माँगिए, आपको मिल जाएगा। यह बात नहीं है कि भगवद्-भक्त होने से फिर हमको दुनिया का भोग नहीं मिलेगा। आप अगर दुनिया का भोग चाहते हैं, तो भगवान से ही माँगिए, जैसे ध्रुव महाराज ने माँगा। भगवान से माँगने से आपको यही फल होगा कि एक दिन आप भगवद्-भक्त हो जाएँगे। आज आपको कामनाएँ हैं, आप भगवान से माँगते हैं—"हमको यह दीजिए, वह दीजिए, वह दीजिए।" तो माँगते-माँगते एक दिन ऐसे दर्जे में आप पहुँच जाएँगे कि कहेंगे: "कदाहं... भगवान, अब अपवर्ग हो गया, अब हमारी कुछ माँग नहीं है।" जिसको मिलने से फिर कामना ही नहीं रहती, सर्व-कामना-पूर्ण-मूर्ति भगवान हैं, उनको मिलने से कामना समाप्त हो जाती है। इसलिए शास्त्र में निर्देश आ गया है कि यदि आपके भीतर कामना है, तब भी भगवद्-भजन कीजिए। आप जो सिद्धि चाहते हैं, तो भगवान जो एक हैं, उनसे बढ़कर योगी कौन हो सकता है? जो सिद्धि भगवान दे सकते हैं... और मुक्ति देना उनके लिए कुछ है ही नहीं, मुक्ति देकर तो वे जगाते हैं—"लो मुक्ति!" बाकी भक्त लोग मुक्ति लेते ही नहीं हैं। इस प्रकार से विचार है।
तो जो यह कितना दिव्य कृष्ण-शास्त्र में निर्देश है, वह भगवान को मिलने के लिए कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है। क्योंकि कृष्ण और कृष्ण-नाम में कोई भेद नहीं है—"अभिन्नत्वान्नाम-नामिनोः"। यह जो पद्धति है:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
इसका क्या अर्थ होता है? "हरे"—"हरे" का अर्थ होता है "हरा" से। "हरे" संबोधक है—"हे हरा! हे हरे!" यह भगवान की शक्ति है—राधा रानी, सीता देवी, लक्ष्मी देवी, भगवान की शक्ति। भगवान शक्तिहीन नहीं हैं, सब भगवान सशक्ति हैं, शक्तिमान हैं। "परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते"—यह वेद का वचन है। भगवान की अनेक शक्तियाँ हैं, विविध नाम अलग-अलग हैं। कहीं राधा रानी हैं, कहीं सीता, कहीं लक्ष्मी हैं, कहीं दुर्गा हैं। इसी प्रकार ये सब भगवान की ही शक्तियाँ हैं। एक-एक काम करने के लिए एक-एक संघ है। भगवान शक्तिमान तत्त्व हैं। श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं, प्रकृति है, शक्ति है। शक्ति भी तीन प्रकार की होती है—माया शक्ति, तटस्थ शक्ति और अंतरंग शक्ति। अंतरंग शक्ति से भगवान का वैकुंठ धाम है। माया शक्ति से भौतिक जगत है। और तटस्थ शक्ति कौन है? जीवात्मा। जीवात्मा तटस्थ शक्ति तत्त्व है, शक्तिमान तत्त्व नहीं है। जैसे शक्ति हमेशा शक्तिमान के अधीन रहती है, उसी प्रकार शक्ति तत्त्व यदि शक्तिमान के अधीन रहेगा, तो वह सुखी रहेगा। जैसे हमारे देश में है, अभी तक प्रकृति (स्त्री) जो अपने पुरुष के अधीन रहती है, वह शांति में है, सुख में है। और जिसने पति का स्थान छोड़ दिया, हाँ, स्वाधीनता चाहती है, वह दुखी है। अब देख लीजिए, हम Europe, America में बहुत देखते हैं, ये लड़कियाँ लोग बहुत दुखी हैं। क्या सब शादी है... और शास्त्र में कहते हैं, स्त्री को स्वाधीनता तो देनी ही नहीं चाहिए। वह सुखी रहे, वह अपने पिताजी के पराधीन रहे, और नहीं तो पति के पराधीन रहे, नहीं तो अपने पुत्र के पराधीन रहे, उसी में उनका सुख है। वह स्वाधीन हो जाएगी तो सुख नहीं होगा।
यही नियम है प्रकृति का। प्रकृति का अर्थ होता है जो पुरुष के अधीन रहे। इसी प्रकार हम लोग सब प्रकृति हैं, तटस्थ जीवात्मा। "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्"—श्रीमद् भगवद्गीता में और एक प्रकृति है, वह कौन है? जीव जो है, वह प्रकृति है, वह पुरुष नहीं हो सकता है। जैसे कोई औरत सजना करके पुरुष बन जाए, तो थोड़ा ही पुरुष होगी? पुरुष का काम थोड़ी कर सकती है! इसी प्रकार, हाँ, हम लोग सब प्रकृति हैं, जीवभूतः प्रकृति। परंतु "अपरा" और "परा" प्रकृति। उत्तम, यह अपरा जरा प्रकृति, अपरा और परा। शास्त्र कह रहे हैं, तो प्रकृति तत्त्व जो है, वह भगवान के अधीन में रहने से ही उसको सुख है। अब वह स्वाधीन होकर, ढोंग करके पुरुष होने को चाहते हैं, वह कभी नहीं हो सकते, क्योंकि वह कृत्रिम है। इसलिए सब शास्त्र का निर्देश है कि भगवान के अधीन होकर, भगवान के चरणों का आश्रय करके सुखी रहो। तभी सुखी रहोगे। और इधर-उधर की बात करेंगे, तो बात ही रह जाएगी—सुख भी नहीं, "न सुखं न परां गतिम्", सुख भी नहीं, सिद्धि भी नहीं, शांति भी नहीं, केवल सब वही..."
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥