श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृंद। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे।
सज्जन वृंद, माताओं, हिंदी में बोलने में मेरा ज्यादा अभ्यास नहीं है, परंतु थोड़ा-बहुत बोलने की कोशिश करूँगा। जब मैं आ रहा था, इस व्यायाम मंदिर में, हनुमान व्यायाम मंदिर में, तो हमको बहुत आनंद हुआ कि यहाँ हनुमान जी का नाम है। हनुमान जी, बजरंग जी, हम लोगों के गुरु हैं वैष्णव संप्रदाय में। यद्यपि हनुमान जी मनुष्य समाज के कभी नहीं थे, तथापि क्योंकि वे भगवान रामचंद्र के एकांत सेवक थे, इसलिए वैष्णव परंपरा में हनुमान जी भी गुरु माने जाते हैं।
तो हनुमान जी प्रसिद्ध क्यों हुए? हनुमान जी प्रसिद्ध इसलिए हुए क्योंकि उनके पास जो शरीर का बल था, उस शरीर-बल से उन्होंने भगवान रामचंद्र की सेवा की। तो भगवद्-सेवा, Krishna consciousness, यह केवल एक तरह से नहीं है, हर तरह से है। जब भगवान रामचंद्र भी आए और भगवान कृष्ण भी आए थे, तो भगवान के अवतार का दो काम—"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्"—साथ-साथ में चलता है। जैसे government है, government दुष्ट का दमन करती है और शिष्ट का पालन करती है। इसी प्रकार भगवान का भी यही नियम है—दुष्ट का दमन करना और शिष्ट का पालन करना, "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्"। इसी प्रकार भगवान की सेवा करने के लिए हनुमान जी की भी जरूरत है और अर्जुन की भी जरूरत है।
कुछ दिन पहले एक सज्जन ने हमको थोड़ा attract किया कि "यह जो Hare Krishna movement है, यह केवल बैठ-बैठ के कीर्तन करना है और आदमी को बेकार बना देता है। वैष्णव होने से सब आदमी बेकार हो जाएँगे।" तो मैं उसको यही जवाब दिया था कि आपने वैष्णव देखा नहीं। भारतवर्ष में जो दो बड़ी लड़ाईयाँ हुईं—राम-रावण युद्ध और कुरुक्षेत्र युद्ध—इन दोनों लड़ाईयों में जो वीर हैं, हनुमान जी और अर्जुन, ये सब बेकार बैठने वाले नहीं हैं। अगर रावण है, तो उसको दमन करने के लिए सब बल का प्रयोग किया गया है। तो वैष्णव, भगवान के हुकुम से, जैसे भगवान चाहते हैं, बैठ-बैठ के Hare Krishna mantra भी जप सकते हैं और जरूरत होने से रावण जैसे जो दुर्दांत राक्षस हैं, उनके साथ लड़ाई भी कर सकते हैं। यह वैष्णव का विचार है—सर्वव्यापक, खाली एकमुखी नहीं, हर तरह से।
तो यह जो आपकी व्यायामशाला है, इसमें शरीर का बल किस तरह से प्रयोग होता है, जैसा आप लोग सिखाते हैं, साथ-साथ यह भी सिखाइए कि उस बल का किस तरह से प्रयोग करना चाहिए। भगवान की सेवा में लगने से ही वह बल सार्थक होगा, यह हमारे शास्त्र का नियम है। भागवत में बताते हैं:
"अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।"
वर्णाश्रम विभाजन जरूर होना चाहिए। मनुष्य समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सबकी जरूरत है। जैसे शरीर के लिए मस्तक की भी जरूरत है, हाथ की भी जरूरत है, पैर की भी जरूरत है, पेट की भी जरूरत है। खाली पेट ही पेट रह गया या केवल मस्तक ही मस्तक रह गया, तो काम नहीं चलेगा। सब चीजों की जरूरत है। समाज को ठीक-ठीक दुरुस्त रखने के लिए इन चारों की जरूरत है, इसलिए भगवान खुद बता रहे हैं:
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।"
तो यह जो व्यायामशाला है, यह व्यायामशाला क्षत्रिय लोगों के लिए है। तो जैसे एक श्रेणी को ब्राह्मण बनाना चाहिए, इसी प्रकार और एक श्रेणी को क्षत्रिय भी बनाना चाहिए। यह शास्त्र का नियम है और भगवान की भी इच्छा है।
तो आप लोग यह जो क्षत्रिय धर्म व्यायामशाला में शरीर को पुष्ट करना सिखाते हैं, जरूरत होने से दुश्मन से लड़ाई करना क्षत्रिय का काम है—"युद्धे चाप्यपलायनम्"। क्षत्रिय जो है, वह लड़ाई के सामने डट जाता है, भाग नहीं जाता। उसका नाम क्षत्रिय है। शरीर में बल है, तेज है, ओज है, तभी तो यह हो सकता है। यह भी सिखाना चाहिए, यह जरूरत है। परंतु चाहे ब्राह्मण हो, चाहे क्षत्रिय हो, चाहे वैश्य हो, चाहे शूद्र हो—इसमें कोई दोष नहीं है, सबको भगवान की सेवा में लगाना चाहिए। तभी "अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा..." यह भागवत का वचन सार्थक होगा। सूत गोस्वामी बड़े-बड़े ब्राह्मण पंडितों की सभा में, नैमिषारण्य में, जो एक बहुत भारी सभा थी और एक हजार वर्ष तक चली थी, उस सभा में सूत गोस्वामी ने यह सिद्धांत दिया कि "हे द्विजश्रेष्ठों! आप लोग सब बड़े-बड़े ब्राह्मण इधर बैठे हुए हैं, शास्त्र का जो सिद्धांत है, वह यही है कि 'अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः'।" समाज में, मनुष्य समाज में वर्णाश्रम जरूर होना चाहिए, नहीं तो वह animal society है, वह पशु का समाज है। और पशु के समाज में कभी आदमी सुखी नहीं हो सकता। मनुष्य का समाज होना चाहिए। तो मनुष्य के समाज में ये चीजें जरूर होनी चाहिए—चार नहीं, आठ: चार वर्ण और चार आश्रम। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—ये चार वर्ण; और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—ये चार आश्रम। यह बड़ा scientific है। इसको अगर हम लोग छोड़ देते हैं, तो यह पशु समाज हो जाता है। वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करने से मनुष्य आगे नहीं बढ़ सकेगा। इसलिए सब शास्त्रों में वर्णाश्रम का विचार बहुत जरूरी बताया गया है। विष्णु पुराण में भी यही वर्णाश्रम का विचार बताया है, भागवत में भी बताया है कि वर्णाश्रम बहुत ही आवश्यक है।
तो वर्णाश्रम विभाजन के अनुसार अपना-अपना काम करो—ब्राह्मण का काम करो, क्षत्रिय का काम करो, वैश्य का काम करो, शूद्र का काम करो, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ का पालन करो। बाकी उद्देश्य क्या है? "स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य..." अपना-अपना जो prescribed duty है, कर्तव्य है, उसका साधन करो। किसलिए? "स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्।" संसिद्धि यानी perfection, सिद्धि लाभ करने के लिए। सब चीज की एक संसिद्धि होती है। वह संसिद्धि नहीं हुई, तो क्या हुआ? केवल परिश्रम हुआ। सिद्धि होनी चाहिए। कोई भी काम कीजिए, जैसे आप business कर रहे हैं, तो उसमें profit होना चाहिए। profit नहीं है, तो केवल गधे की तरह परिश्रम करने से क्या फल? तो इसी प्रकार यह जो वर्णाश्रम विभाजन है, इसकी संसिद्धि क्या है? संसिद्धि है "हरितोषणम्"—भगवान को संतुष्ट करना।
"अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥"
तो व्यायाम कीजिए, नियम से कीजिए, शरीर को बलवान बनाइए—यह भी जरूरत है। बाकी उस बल का प्रयोग कीजिए भगवान की संतुष्टि के लिए, और कुछ बात नहीं। हमारे शरीर में बहुत बल है, और हम एक गुंडा बन गए, दूसरे को सताया, परेशान किया—यह बात नहीं होनी चाहिए। जो कुछ भी कीजिए, उसको संसिद्धि, सिद्धि लाभ करने के लिए कीजिए, यानी "हरितोषणम्"—भगवान को संतोष कराने के लिए कीजिए।
Krishna consciousness movement जो है, यह बहुमुखी है। सब चीजों से भगवान की सेवा की जा सकती है—"प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय-आचरणं सदा"—यह उद्देश्य है। प्राण से हो, धन से हो, बुद्धि से हो, वचन से हो—हर तरह से भगवान की सेवा। तो हम चाहते हैं कि हम लोग भी यह वर्णाश्रम school खोलने का प्रयास करें। जैसे engineering का school होता है, college होता है, medical का school होता है, college होता है, और other branches of department of knowledge होते हैं, इसी प्रकार ब्राह्मण का भी school-college होना चाहिए कि किस तरह से ब्राह्मण बना जाता है। इसी प्रकार क्षत्रिय का भी होना चाहिए कि किस तरह से क्षत्रिय बना जाता है। इसी प्रकार वैश्य का भी होना चाहिए। यह जात जन्म से नहीं होती, quality और गुण से होती है। गुणों का विभाग होना चाहिए, गुण होना चाहिए और कर्म भी होना चाहिए। जैसे कोई doctor साहब हैं, उन्होंने doctori पास कर ली, पर doctor का काम नहीं किया, वे पान वाले का काम करने लगे या कुछ और काम करने लगे, तो उनको doctor थोड़ी ही कोई कहेगा! नहीं, doctor का गुण भी होना चाहिए और doctor का काम भी होना चाहिए। इसी प्रकार जैसे क्षत्रिय लोग शरीर का बल साधन करते हैं, वह गुण है; और गुण के बाद जब क्षत्रिय का कर्म भी होता है, तब वह संपूर्ण होता है। और वह काम यदि भगवान की सेवा में लग गया, तब वह संसिद्धि है—"स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः"। तो संसिद्धि लाभ करने के लिए, वर्णाश्रम विभाग के विभाजन के अनुसार, जिसकी जिस तरह से प्रवृत्ति हो, उसमें expert बन करके, यानी सब काम करने में दक्ष होकर के, वह काम भगवान की सेवा में लगाया जाए, तो उसका नाम है संसिद्धि। क्योंकि मनुष्य जीवन जो है, यह सिद्धि लाभ करने के लिए है। और जो पशु जीवन है—खाओ, पीओ, बच्चा पैदा करो और मर जाओ—वह पशु जीवन है। मनुष्य जीवन तो सिद्धि लाभ करने के लिए है। क्या सिद्धि है? "संसिद्धिं लभते नरः"—वह जो भगवान हैं, उनको संतोष कराके संसिद्धि लाभ करना।
तो हमारा यही अनुरोध है कि आप लोग व्यायामशाला में जैसे शरीर का बल साधन करते हैं, साथ-साथ में भगवद्-कीर्तन भी कीजिए। उसमें आपका कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि आपका भगवान से संपर्क बना रहेगा। और भगवान का संपर्क बना रहने से ही सब काम की सिद्धि होती है। तो मैं चाहता हूँ कि इन लड़कों को जैसे आप लोग शरीर पुष्टि के लिए साधन सिखाते हैं, साथ-साथ में उनको Hare Krishna mantra का उच्चारण कराइए। जब वे march करें, तो उसमें भी Hare Krishna नाम जपा कीजिए—"Hare Krishna, Hare Krishna, left, right"। तो वह भी चाहिए। Hare Krishna consciousness से सब साफ रहेगा, उसमें यह जो बहुत ही गंदा विचार है, वह नहीं आएगा। तो सब काम की सिद्धि उसी में हो गई। तो हमारा यह request है कि आप लोग शरीर साधन के साथ-साथ इस Hare Krishna maha-mantra नाम को जपा कीजिए।
Thank you very much. Hare Krishna!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥