श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  710213LE-GORAKHPUR--Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
गोरखपुर, 13-फरवरी-1971
 
 
 
[मंगलाचरण एवं प्रार्थना]

साग्रजं सावधूतं सपरिजनसहितं कृष्णचैतन्यदेवम्,
श्रीराधाकृष्णपादान् सहगणललिताश्रीविशाखान्वितांश्च।
हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते,
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते।
तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि,
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये।
श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु नित्यानन्द,
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

[प्रवचन]

सज्जन! ये जो कृष्ण भावना संघ हम लोग का चालू है, भगवद्-भक्ति दुनिया में प्रचार करने के लिए, ये वैदिक शास्त्र, समस्त शास्त्र में कहते हैं कि सबसे बढ़िया धर्म तो वही है जिसमें लोगों की भगवद्-भक्ति जगाए। भगवद्-भक्ति सबका हृदय में है। जैसा पिता-माता से संतान का प्रेम अवश्य रहता है—बचपन से छोटे बच्चे हैं और उनके माताजी हैं, साथ-साथ में सब प्रेम का व्यवहार—इसी प्रकार भगवान सबके पिता हैं। भगवान खुद कहते हैं—अहं बीजप्रदः पिता। ऐसी नहीं है कि भगवान केवल मनुष्य के पिता हैं, भगवान सब जीव मात्र के पिता हैं। अभी जीवात्मा भौतिक जगत में अपना कर्म अनुसार अनेक प्रकार शरीर धारण किए हैं—84 लाख योनि शरीर। परंतु जो पंडित हैं, वो जानते हैं कि उसमें आत्मा सब एक ही है।

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
विद्या-विनय संपन्न ब्राह्मण और एक चंडाल, एक सूअर, एक हाथी, एक गाय—ये सब भिन्न-भिन्न शरीर होते हुए भी आत्मा जो है, वो भगवान का अंश है। इसलिए जो पंडित व्यक्ति होते हैं, जिसको ब्रह्म-ज्ञान है, जिसकी भगवद्-भक्ति है, वो सबको एक ही देखता है। समः सर्वेषु भूतेषु... ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति... मद्भक्तिं लभते पराम्। तो भगवद्-भक्ति, भगवान से जो हमारा संपर्क है, वो भूल जाने से ही जितना हमारा तकलीफ है। हम लोग अभी तीन प्रकार की दुनिया में जो तकलीफ है—आध्यात्मिक, आदिभौतिक, आदिदैविक—तकलीफ ही तकलीफ है। माया से हम लोग समझते हैं हम लोग सुखी हैं, क्योंकि भगवान खुद कहते हैं ये जो दुनिया है—दुःखालयमशाश्वतम्—दुःख का आलय। जब भगवान कहते हैं दुःख का आलय है, तो इधर से सुख कहाँ मिलेगा?

बड़े-बड़े जितने आचार्य जो आए हैं, चाहे हिंदू धर्म में हों, चाहे और किसी धर्म में, कोई बताता नहीं कि तुम इधर रह के सुखी हो और कहीं जाने की जरूरत नहीं और कुछ करने की जरूरत नहीं। हाँ, जैसा हमारा हिंदू धर्म तो कहते ही हैं जो गोलोक वृंदावन है, भगवद्-धाम है, उधर जाना है, विष्णुलोक है, वैकुंठलोक है। इसी प्रकार मुसलमान धर्म भी कहते हैं जो अल्लाह को पहचानना है। Christian धर्म भी कहते हैं जो "Kingdom of God" उधर जाना है। बौद्ध धर्म भी कहते हैं कि दुनिया में जो संपर्क है इसको निर्वाण कर दो। कोई आचार्य बोलता नहीं कि इधर ठीक-टाक करके रहो, सब सुख हो जाए। ये आजकल के जो लीडर हैं, वो सब अभक्त हैं। इधर सुखी हो जाए! वास्तविक ये बात श्रीमद् भगवद्गीता की भी यही बात है। भगवान कहते हैं—यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम—जिधर जाने से फिर लौट आने नहीं पड़ता है, ये दुनिया में वही परमधाम है, वही हमारा परमधाम। तो हर तरह से भगवान... क्योंकि हम लोग भगवान की संतान हैं। जैसा किसी का संतान घर से निकल जाता है और पागल हो जाता है, तो उनके पिताजी-माताजी बहुत ही दुखी रहते हैं कि हमारा संतान ऐसे निकल गया और उसको न खाने का ठिकाना, न सोने का ठिकाना, इधर-उधर घूमता है। किसी तरह से अगर वो घर में आए, तो माता-पिता बहुत ही सुखी होते हैं।

इसी प्रकार भगवद्-भजन करने का मतलब ये नहीं है कि इधर से कुछ भौतिक सुख हमको लाभ हो। यही भ्रम है। सब आदमी मंदिर में जाते हैं, गिरजा में जाते हैं या क्या नाम, mosque में जाते हैं, सभी कुछ कामना लेकर के जाते हैं। और आजकल बड़े-बड़े वैज्ञानिक लोग, बड़े-बड़े दार्शनिक कहते हैं—यदि तुमको भौतिक सुख चाहिए, तो तुम मंदिर में और मस्जिद में और गिरजा में जाकर के क्या करोगे? अपना रोटी कमाओ, खूब अच्छी तरह से खाओ-पियो, मज़ा करो और ये सब मंदिर-वंदिर जाने की क्या जरूरत है? आदमी सीखता भी है। Russia में नास्तिक करने के लिए सब गाँव के आदमी के पास जाते हैं। पहले ऐसे किया था, अभी क्या किया था मालूम नहीं है। पहले सुना कि lorry भर के वो रोटी ले जाता था और गाँव के आदमी को कहता था, "जाओ, ये गिरजा में जाओ।" क्योंकि गिरजा में जाकर के यही प्रार्थना करते हैं—"भगवान! हमको हमारा रोटी, दैनिक जो हमको खाने का है, उसको दीजिए।" "God, give us our daily bread." तो आप लोग जानते हैं जो church में, गिरजा में रोटी कहाँ... ये लोग कहते थे कि "तुमको रोटी मिल गया क्या?" तो बोलते, "नहीं साहब, अभी तो रोटी नहीं मिला। प्रार्थना तो जरूर की कि हमको रोटी दीजिए, बाकी रोटी अभी तक नहीं मिला है।" तो बोलता है कि, "हमको प्रार्थना करो। हमारे पास रोटी माँगो, Government से।" तो गाँव के लोग भोले-भाले होते हैं—"Government साहब! हमको रोटी दीजिए।" तो lorry भर के रोटी ले जाते थे—"ले लो, जितना चाहिए।"

कहने का मतलब है जो आजकल का जो विचार है, यदि रोटी के लिए गिरजा में जाना, मंदिर में जाना, ये भौतिक सुख के लिए, तो बड़े-बड़े वैज्ञानिक कहते हैं जो आजकल वैज्ञानिक आविष्कार बहुत कुछ हुए हैं, उसमें मेहनत करो, जैसे हमारा देश का Government भी कहते हैं। परंतु बात यह है जो भौतिक सुख हमको कितना दिन भोगना है? समझ लीजिए हम बहुत कर्मठ हैं, काम करने वाले हैं। एक ही जीवन में 10 बरस में हम 10 लाख कमाए, ठीक है। 10 लाख का और 10 वर्ष में और 10 लाख, 20 लाख कमा लो। बाकी इधर कितना दिन रहोगे? ज्यादा से ज्यादा 50 बरस, 60 बरस, 80 बरस, 100 वर्ष रहोगे। उसके बाद जो कुछ तुम कमाया है, वो तो इधर ही रह जाएगा और तुम्हारा जो कर्म किया है—पाप-पुण्य, उसको तुम लेकर के जाओगे। अभी तो 20-50 लाख कमा करके कोई बड़ा धनी हो गया, ठीक है। और यदि तुम्हारा कामकाज नीच रहा, तो वो तो प्रकृति के नियमानुसार तुमको उसी प्रकार नीच योनि में जाना पड़ेगा। ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था... श्रीमद् भगवद्गीता से ये संवाद हमको मिलता है कि जब मरने का समय जिस प्रकार तुम्हारा मन का भाव रहेगा, फिर ऐसा ही शरीर तुमको मिलेगा। ये प्राकृतिक नियम है। प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा... सब प्रकृति का नियम है। नहीं तो क्यों अलग-अलग शरीर हम लोग को होता है? इधर हम लोग 50 आदमी अगर बैठे हैं, 50 आदमी का 50 किस्म का शरीर है। बाहर जाइए, और रकम-रकम। क्यों होता है? कुछ प्रकृति का नियम है, तभी तो होता है, नहीं तो सब एक ही किस्म का होता। नहीं होता?

मनुष्य का समाज छोड़ दीजिए, और जितना 84 लाख—80 लाख और जो है—अलग-अलग शरीर, ये शरीर हमको मिलता है—कर्मणा दैवनेत्रेण। जैसे-जैसे मैं कर्म किया है, और "दैव-नेत्रेण"—भगवान का, दैव का अर्थ होता है भगवान, ये भगवान का हुकुम, उसके अनुसार हमको शरीर मिलता है। तो कहने का मतलब है जो धर्म, धर्म-याजन करके जो दुनिया का भौतिक कुछ लाभ करना, वो धर्म शास्त्र में कहते हैं वो "कैतव धर्म" है, वो धर्म नहीं है। असल जो धर्म है, वो भगवान के चरण में शरणागति, वो असल धर्म है। इसलिए भगवान कहते हैं—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। असल जो धर्म है, भगवान के चरण में शरणागति। ये सब शास्त्र का नियम है। जिस धर्म से भगवान से कुछ संपर्क है नहीं, उसको हमारा वैदिक धर्म के अनुसार कहते हैं वो छलना धर्म है। वो छलना, छलना धर्म से भागवत धर्म से कोई संपर्क नहीं। भागवत धर्म कहते हैं वो धर्म सबसे ठीक—स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे—जिसमें भगवद्-भक्ति हो, वो धर्म। क्योंकि जब तक भगवद्-भक्ति नहीं होगी, तब तक आत्मा सुप्रसन्न नहीं हो सकेगी। यदि आप आत्मा को सुप्रसन्न करने को चाहते हैं, यदि आप शांति चाहते हैं, तब आपको भगवद्-भक्ति एकमात्र उपाय है और कुछ उपाय नहीं। इसलिए भगवान स्वयं कहते हैं—भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

तो हर तरह से, जिधर से आप जाइए, यदि आप सुखी होने को चाहते हैं, तो भगवान को केंद्र करके सुखी होइए। नहीं तो आप... भागवत का यही निर्देश है—अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः। हमारा वैदिक नियमानुसार वर्ण-आश्रम का विभाजन—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र; ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। चार प्रकार के आश्रम और चार प्रकार के सामाजिक विभाग। ब्राह्मण, क्षत्रिय... इसको हमारा हिंदू धर्म... अभी ये तो मुसलमान का दिया हुआ नाम है, असल में हमारा जो धर्म है उसका नाम है सनातन धर्म, वर्णाश्रम धर्म। तो वर्णाश्रम धर्म खाली भारत में नहीं, भारत में अच्छी तरह से उसको मानते हैं, और जगह में और तरह से मानते हैं। सब जगह में वर्ण-आश्रम है ही, ताकि इधर जो वर्ण-आश्रम है, नियमित है। ताकि वो नियम भी आजकल कलयुग के प्रभाव से सब टूट गया। जो कुछ है, शास्त्र में है। भगवान खुद कहते हैं कि चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं—भगवान का बनाया हुआ चीज टूट नहीं सकता। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चार वर्ण, चार प्रकार के जो वर्ण हैं, ये भगवान की बनाई हुई चीज है, वो टूट नहीं सकती। तो एक देश और सब देश में है, ऐसा नहीं समझा जाए कि केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये केवल भारतवर्ष में ही हैं, ऐसी बात नहीं है, सब जगह में हैं। जब भगवान की चीज बनाई हुई है न, वो सब जगह में ही है। जैसा भगवान की चीज बनी है वहाँ सूरज नारायण, वो America में भी उदय होता है, भारत में भी उदय होता है। ऐसी बात नहीं है कि केवल भारत में सूरज को देखा जाता है। जो-जो जीव... वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः—जैसे हवा है, हवा उधर भी चलती है, इधर भी चलती है; पानी उधर भी है, इधर भी है; अग्नि उधर भी है, इधर भी है, क्योंकि भगवान की चीज है। इसी प्रकार ये जो चातुर्वर्ण्य, चार वर्ण हैं, भगवान जैसे कहते हैं—मया सृष्टम्—"मैं इसको सृष्टि की है", वो सब जगह में है।

हाँ, अब देखिए, मैं चुन-चुन के ले आया हूँ उधर से, सब ब्राह्मण हैं। इसको मानना चाहिए ब्राह्मण, क्योंकि ये ब्राह्मण का गुण, उसको अनुशीलन कर रहे हैं—कृष्णानुशीलनम्। हाँ, देखिए, सब समय भगवान का नाम जप रहे हैं, उनको दीक्षा हुई है, उनका जनेऊ भी है, भगवान की सेवा करते हैं। सब जैसे-जैसे ब्राह्मण-वैष्णव का जैसे नियम है, सब कुछ कर रहे हैं। फिर आप इसको क्या मानेंगे? इसको हम मानेंगे वैष्णव। इसलिए शास्त्र में निर्देश है कि—अर्च्ये विष्णौ शिलाधीर्गुरुषु नरमतिर्वैष्णवे जातिबुद्धिः। जैसे भगवान की मूर्ति होती है मंदिर में, सब कोई जानते हैं पीतल की मूर्ति है, लकड़ी की मूर्ति है। तो लकड़ी को पूजा करने के लिए कितना आदमी मंदिर में जाते हैं? ये पीतल की कोई पुतली पूजा करने... कोई-कोई कहते हैं, "ये पीतल की एक पुतली है, ये लोग मंदिर में जाकर के इसको पूजा करते हैं। ये भगवान तो सब जगह में हैं, और ये मंदिर में क्यों जाते हैं?" हाँ, ये भी कोई-कोई कहते हैं। परंतु वो विचार ठीक नहीं है। भगवान यदि सब जगह में हैं, तो मंदिर में भी हैं। और इसलिए शास्त्र में मना करते हैं जो नारकी होते हैं—अर्च्ये शिलाधीः—भगवान को जो पूजन करने की जो मूर्ति है, अर्चा-मूर्ति जो अर्चा होता है, उसको विचार नहीं है कि ये पीतल का है, लकड़ी का है। अगर कोई ऐसा माने कि पीतल का है, लकड़ी का है, लोहा का है कि पत्थर का है, हाँ, तो अर्च्ये शिलाधीर्गुरुषु नरमतिः—और जो गुरु, आचार्य जो हैं, उनको साधारण जो मनुष्य बुद्धि कहते हैं, और वैष्णवे जातिबुद्धिः—और जो भगवान की सेवा में हैं, वैष्णव, शास्त्रानुसार वैष्णव हैं, उनको यदि कोई जाति-बुद्धि करे कि ये इस कुल से है, वो उस कुल से है।

अब देखिए इसका प्रमाण देखिए, जैसे हनुमान जी। हनुमान जी वो मनुष्य समाज में भी जन्म नहीं, बंदर कुल में। परंतु क्योंकि भगवद्-भक्त होने के कारण आज तक हनुमान जी की पूजा सब कोई करते हैं। इसी प्रकार जो विभाग गुण के अनुसार जो चार वर्ण भगवान सृजन किए, वो सब जगह में ही हैं। हाँ, ये बात नहीं है केवल भारतवर्ष में हैं, नहीं, ये बात सही नहीं, सब जगह हैं। इसलिए आप लोग को चाहिए जो दुनिया में सब जगह ब्राह्मण-वैष्णव कहाँ हैं, उनको भगवान का संपर्क देके उसको उठाया जाए। ये भारत का उचित है। चैतन्य महाप्रभु यही बात कहते हैं:
भारत-भूमिटे हैल मनुष्य-जन्म यार। जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार॥
तो परोपकार क्या चीज है? परोपकार यही है जो मनुष्य जो भगवान का संपर्क भूल गया है, उसको फिर जगा देना। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत—जो सोए हुए हैं भगवान से संपर्क भूल करके, वो समझता है, "मैं दुनिया का कोई व्यक्ति हूँ, दुनिया की कोई चीज हूँ, मैं American हूँ, Indian हूँ, German हूँ।" ये भौतिक संपर्क बना करके और त्रिधातुके ये शरीर को समझता है आत्मा। और सभी... और ये शरीर से जिसका संपर्क है, उसको आत्मीय मानते हैं। और जिस देश में जन्म हुआ, उसको पूज्य मानते हैं। इस प्रकार व्यक्ति को गधा माना गया है शास्त्र में—स एव गोखरः। ये सब बुद्धि छोड़ के सबको समझना चाहिए जो जीव मात्र ही भगवान का अंश है, भगवान का दास है। ये संवाद सब सर्वत्र प्रचार करना है और खुद भी समझना है। तभी जीवन का सार्थक होगा, तभी मनुष्य सुखी हो सकेंगे और तभी दुनिया का मंगल होगा।

इसलिए भागवत में कहते हैं—येनात्मा सम्प्रसीदति—यदि आप सुखी होने को चाहते हैं, आप दूसरे को सुखी बनाने को चाहते हैं, तो इस धर्म को प्रचार कीजिए जिसमें भगवद्-भक्ति का अनुभव हो। और नहीं तो जो कुछ हम लोग धर्म कहते हैं, वो तात्कालिक है और शास्त्रानुसार वो असल धर्म नहीं है। नहीं तो भगवान क्यों कहते हैं कि सर्वधर्मान्परित्यज्य? कि भगवान पहले तो बोले कि धर्मसंस्थापनार्थाय "मैं तो अवतार ग्रहण करता हूँ धर्म को संस्थापन करने के लिए।" फिर क्यों भगवान कहते हैं सर्वधर्मान्परित्यज्य? आप लोग थोड़ा समझ लीजिए। यानी वो जो भगवान कहते हैं कि मामेकं शरणं व्रज—"एकमात्र हमारे चरण में शरणागत हो", वही धर्म है, और सब धर्म नहीं है। नहीं तो भगवान क्यों कहेंगे सर्वधर्मान्परित्यज्य? थोड़ा आप लोग समझें। यही धर्म हम लोग सिखाते हैं। इसमें हम लोग बाहर जाके ऐसे नहीं करते हैं जो "तुम Christian हो, तुम हिंदू हो जाओ।" ये बोलने से वो लोग नहीं लेगा। "भगवान का भक्त बनो, भगवान को स्वीकार करो, भगवान की सेवा करो।" यही सब हम लोग को प्रचार में सफलता मिलती है। और वो लोग अच्छी तरह से सोच करके, देख के ये जो भागवत धर्म है, कृष्ण भगवान... भगवान कृष्ण हैं। तो आप जब बाहर में, परदेश में जिसको सब कोई ले रहे हैं, आप लोग को भी चाहिए जो गीता में जैसे-जैसे बताया, उसी प्रकार सबको भगवान के चरण में शरणागति लेनी चाहिए। तो आप लोग जो धर्म को याजन कीजिए, धर्म... कोई भी धर्म आप याजन कीजिए, यदि वो धर्म का पालन करके भगवद्-भक्ति का उदय नहीं होता है, तो समझ लीजिए केवल परिश्रम ही है, ये शास्त्र का निर्देश है।

और आप लोग से निवेदन है जो भगवद्-भक्ति आपके भीतर में जो है, अभी सोई हुई है, उसको जगाइए। और उसको जगाने का एक ही मात्र उपाय है कलयुग में, विशेष करके कलयुग में—सतयुग में भी यही है—श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। सब शास्त्र का ही नियम है जब भगवद्-भक्ति जगाने... भक्ति योग का प्रथम सोपान भगवद्-नाम श्रवण करना, भगवद्-नाम ग्रहण आदि। तो भगवद्-नाम ग्रहण करें:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
फिर आस्ते-आस्ते सब चीज आपको मालूम हो जाएगा। भगवान आपके भीतर में बैठे हुए हैं। यदि आप भगवान के शरणागत हो जाएंगे और भगवान का नाम जप करते रहेंगे जिसमें अपराध नहीं है, तो भगवान तो आपके भीतर में हैं। भगवान खुद भी कह रहे हैं—तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ सब समय उनको भगवान तो भीतर में बैठे हुए ही हैं, उनको बुद्धि योग देते हैं। वो बुद्धि योग क्या चीज है? जिस बुद्धि योग द्वारा... ये बुद्धि योग का अर्थ होता है भक्ति योग, क्योंकि भगवान कहते हैं—येन मामुपयान्ति ते—"जिसके द्वारा हमारे पास वो आते हैं।" तो भगवान के पास जाने के लिए एक ही मात्र उपाय है—भक्त्या मामभिजानाति—एकमात्र भक्ति है। कर्म, ज्ञान, योग से भगवान प्राप्ति नहीं, बाहर की भौतिक कुछ शक्ति, ज्ञान लाभ हो सकेगा। परंतु यदि आप भगवान को लाभ करने को चाहते हैं, तो वो भगवान जैसे कहते हैं—भक्त्या मामभिजानाति—"जो भगवद्-भजन करने वाला है, जो भक्ति योग को ग्रहण किया है, वो हमको तात्विक जानते हैं।" और सब आदमी और जितने हैं—ज्ञानी, योगी—वो भगवान को नहीं समझ सकेंगे, ये शास्त्र का विचार है।

इसलिए मनुष्य जीवन का उचित है... क्योंकि यह मनुष्य जीवन चले जाने से हम नहीं जानते हैं क्या जीवन हमको मिलेगा। हमारे कर्म के अनुसार अगर हमको मनुष्य जन्म मिल गया... जलजा नवलक्षाणि जो है, उसमें मैं अगर फिर चला गया, तो ये जो हमको मौका मिला था मनुष्य जीवन में, इसको हम miss किया, इसको हम भूल गए और इसका व्यवहार ठीक नहीं किया। हाँ, शास्त्र में कहते हैं ये सब जान-बूझ के जो मर जाते हैं, वो ब्राह्मण... अथ य एतदक्षरं गार्ग्य विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः और इसको नहीं जान के चले जाते हैं, कुत्ता-स्याल का ऐसा मर जाते हैं, वो कृपण हैं। कृपण क्यों कहा जाता है? जो उसको मौका मिला था... जैसे एक आदमी को लाख रुपया मिला है, उसको व्यवहार ठीक से नहीं किया, उसको बोला जाता है कृपण। और एक आदमी जो रुपया है और उदार भाव से उसको व्यवहार किया, उसको कहा जाता है उदार। तो ब्राह्मण का अर्थ होता है कि ये जीवन को अच्छी तरह से उपयोग करके, इसको व्यवहार करके परम लाभ को उठाना। और कृपण जो होता है, केवल खाया-पिया, सोया, बच्चा पैदा किया, कुत्ता-स्याल का ऐसा मर गया, तो उसको कृपण कहा जाता है।

[उपसंहार]

तो ये हमारा प्रचार जो विषय है, जो मनुष्य जीवन में आप लोग कृपण न होइए, ब्राह्मण हो जाइए, ब्राह्मण का अधिकार लीजिए। सबको अधिकार है। चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं—ब्राह्मण का गुण लीजिए। ये ब्राह्मण का गुण है—चार प्रकार पाप जो है, उसको पहले छोड़ देना। द्यूतं पानं स्त्रियः सूना—ये चार प्रकार का पाप विशेष करके ब्राह्मण, राजा और जो आध्यात्मिक हैं, उनको छोड़ देना चाहिए, शास्त्र का नियम है। राजा अगर पापी होगा, तो प्रजा सब मर जाएगी, जैसे आजकल हो रहा है। इसी प्रकार ब्राह्मण पाप कार्य करेगा, तो उसका जो ब्राह्मणत्व है, उसी प्रकार पतन हो जाएगा, वो शूद्र हो जाएगा। जब शूद्र हो गया, कोई क्षत्रिय नहीं है, सभी शूद्र हो गया, तो फिर कैसा राज्य चलेगा? सुखी कैसे होगा? हाँ, और कलयुग में यही बात है—कलौ शूद्रसम्भवाः—इसलिए शूद्र होते हुए भी यदि कोई ब्राह्मण होने को चाहते हैं, यदि कोई वास्तविक उच्च स्थान में जाने को चाहते हैं, उसको मौका देना चाहिए। ये भारत, भारतीयों का कर्तव्य है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
भारत-भूमिटे हैल मनुष्य-जन्म यार। जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार॥
ये भारत mission है। और ये हम लोग जो "International Society for Krishna Consciousness" ने चालू किया है, इसका यही उद्देश्य है—सबको उन्नत स्तर में ब्राह्मण-वैष्णव बनाने के लिए प्रयास है। आप लोग सब भारतीय हैं, आप लोग भी इसको लीजिए और इस प्रगति में आगे बढ़ें, उसके लिए प्रयत्न आप लोग भी कीजिए। यही हम लोग का निवेदन है।

Thank you.
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥