This evening, 11-2-1971, morning 11, just moving Krishna... [संगीत] वंदे [संगीत]
हम लोग जो इधर आते हैं, अनेक जीव, अनंत जीव का कोई संख्या नहीं है। अनंत कल्प से जीव भाग-भाग... सभी अनंत जीवात्मा जो है, उसका माप जो भी है शास्त्र में, कितना बड़ा, कितना लंबा है। निराकार नहीं, जो लोग कहते हैं निराकार, उनको ज्ञान कम है, जानते ही नहीं। जो जीवात्मा एक वस्तु है, भगवान एक वस्तु है। नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् (नित्या नित्याना चेतना चेतना नाम) भगवान प्रधान सिद्ध वस्तु हैं और जीवात्मा भी उनका अंश स्वरूप है—ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः (जीव लोक जीव भूत सनातन)।
तो जीवात्मा का स्वरूप है, शास्त्र में वर्णन है जो एक केश का अग्र भाग दस हजार विभाजन करके जो एक भाग होता है, वो जीवात्मा का परिमाण है। शरीर हम लोग तो कह देते हैं—"point has no length, no breadth." और दिशा का भाग जो है, वो बहुत ही क्षुद्र है। उसको दस हजार भाग करना भी मुश्किल है। ये सब हम लोग कर नहीं सकते, देख नहीं सकते, इसलिए कहते हैं निराकार। कोई-कोई कहते हैं कि भौतिक चीज का संजोग से जीवन लक्षण दिखाई देता है, ये बात नहीं है। जीवात्मा एक अलग चीज है और उनका भौतिक शरीर जो है, जैसा हम लोग का कुर्ता है, साया है, उसी प्रकार सूक्ष्म और जड़ शरीर से हम लोग का आवरण है। भगवान भगवत गीता में भी यही बात बताते हैं—देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा तथा देहान्तरप्राप्तिः (देन जरा तथा देहंत प्रा)।
जीवात्मा किसी तरह से ये शरीर में बद्ध हो गया भौतिक जगत में, तो इसका क्या कारण है? कृष्ण भुलिया जीव भोग वांछा करे (कृष्णा भिया जीव भोगवान), जब जीवात्मा भगवान को भूल जाता है, ये भगवान से competition करने के लिए... जैसे अनेक मूर्ख हैं, कहते हैं "हम भगवान हैं।" भगवान का कुछ competition दिखाओ तो नहीं, meditation करके भगवान! तो कहने का मतलब है, ये सब अज्ञान का स्वरूप है। अज्ञान अनेक प्रकार के होते हैं और आखिरी अज्ञान जो है, वही है कि "मैं भगवान हूँ।" [गला साफ़ करने की आवाज़] ये माया का एक प्रहेलिका है। जब सब बात में परेशान हो जाता है, तब आदमी सोचता है "हम भगवान हैं।" वास्तविक ये बात नहीं है।
इसलिए शास्त्र में कहते हैं—येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः (अभिशुद्ध बुद्ध जन विमुक्त मानना सभा... अविशुद्ध बुद्धि जन वृंदा विक्त मान अभाव)। ऐसे जो आदमी सब अपने को मुक्त मानते हैं, वो शास्त्र सिद्धांत में उनकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—अविशुद्ध-बुद्धयः। क्योंकि भगवान का संधान उनको मिला नहीं, भगवान का चरण की सेवा उनको मालूम नहीं है, इसलिए उसको कहा जाता है अविशुद्ध बुद्धि, शुद्धि नहीं है। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदंघ्रयः (आरक्ष परम पद त पत अधा... पत अनाद जिस्म)। ये जैसा अनेक साधन करके, अनेक वैराग्य करके, अनेक त्याग करके परम पद तक पहुँच जाता है, परंतु पतन्ति—फिर उससे नीचे गिर जाता है। पतन्ति अनादृत—क्योंकि भगवान के चरणों का अनादर किया। ये शास्त्र का सिद्धांत है।
इसलिए भगवान स्वयं आ के बता रहे हैं भगवत गीता में—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज (सर्व धर्मान परितज मांग)। गिरे हुए [गला साफ़ करने की आवाज़] जितने जीव हैं, सब संसार में अनेक योनि में भ्रमण कर रहे हैं, अनेक प्रकार कष्ट उठा रहे हैं। और वो कष्ट क्यों उठा रहे हैं? केवल आहार, निद्रा, भय, मैथुन के लिए। आहार करने के लिए और सोने के लिए अच्छा-अच्छा मकान बनाते हैं, जिसका जैसा ताकत है। वो जो पक्षी है, वो भी अपना कुछ मकान बना लेता है, और जो बड़े-बड़े scientists हैं, वो भी मकान बनाते हैं। बाकी है चीज वही सोने के लिए ही। ये सब सारा दुनिया में चल रहा है, सारा ब्रह्मांड में चल रहा है—आहार, निद्रा, भय के लिए।
बाकी वो जो अपना स्वरूप है, वो भूल गया। वो जो स्वरूप है—जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्य दास (नित कृष्ण दास)—वो भूल गया। भूल करके अपना-अपना ताकत अनुसार कर्म का चक्र बनाते हैं और उसमें फँस जाते हैं। नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं—सत्संग छाड़ि' कइनु असत्ये विलास, ते-कारणे लागिल ये करम-बन्ध-फाँस (सत्संग को असत विलास के कारण लाल मोर कर्म बंद)। सत्संग छोड़ दिया, भगवान का संग छोड़ दिया, और असत—असत जो तात्कालिक माया वस्तु है, उसमें ज्यादा ध्यान लगा दिया, इसलिए हम कर्म बंधन में फँस गए। उस कर्म बंधन में फँस जाने से केवल एक शरीर धारण करना, कुछ दिन भोग करना, फिर अपने कर्म के अनुसार और एक शरीर को धारण करना, इसी प्रकार चल रहा है।
तो चैतन्य महाप्रभु का कहना है—इसी प्रकार जीव सारा ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहा है। कभी ब्रह्मा भी हो जाता है और कभी वो मैला का कीड़ा भी हो जाता है, अपने कर्म के अनुसार। यही भ्रमण करते-करते यदि उसकी कुछ सुकृति हुई, तो गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज (गुरु कृष्ण कृपा पाए भक्ति)। तब उसको भक्ति का बीज लाभ होता है। और वो भक्ति-लता-बीज को प्राप्त करने से, यदि उसको अच्छी तरह से रोपण करके, पानी डाल के, वो बीज को वृक्ष रूप में परिणत करके, जाकर के भगवत-प्रेम फल रूप वो खा सकेंगे, और उसका जीवन सफल हो जाएगा, जीवन सार्थक हो जाएगा।
Krishna Consciousness Movement जो हम लोग का चल रहा है, और कुछ नहीं, जो जीव का भगवान से जो संपर्क है, प्रेम संपर्क है—क्योंकि संपर्क बहुत intimate है। भगवान कहते हैं—अहं बीजप्रदः पिता (अह पिता), पिता से पुत्र से संपर्क बहुत ही घनिष्ठ होता है। इसी प्रकार भगवान से हमारा संपर्क है, केवल हम लोग भूल गए हैं और कुछ नहीं। तो वो जो भूल गए हैं, उसको जगाने के लिए ये कलयुग में यही एकमात्र महामंत्र है। जैसा कोई आदमी साँप अगर उसको काट दिया है, वो जैसे बेहोश हो जाता है, और उसको मंत्र से फिर जाके उसको जागृत किया जाता है, इसी प्रकार हम लोग माया, महादेवी के आश्रय में बिल्कुल बेहोश हो गए हैं। ज्ञान हो गया अज्ञान, और लुप्त हो गया दर्शन। चेतन, चेतनता जो है हमारी, वो आवरित हो गई, ढक गई। वो ढकना जो है, उसको उठाने के लिए कलयुग में यही एक साधन है—हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ (हरे नाम हरे नाम हरे नाम केवलम)।
कलयुग में और कोई साधन सफल नहीं हो सकेगा। अनेक साधन का नियम है—कर्म, ज्ञान, योग इत्यादि, ये सब कुछ काम में नहीं आएगा कलयुग में। जैसा शास्त्र में कहा है—कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् (लिव कृष्ण मुक्त संग पर)। केवल मात्र हरे कृष्ण मंत्र कीर्तन करके आदमी मुक्त-संग हो जाते हैं, बिल्कुल मुक्त हो जाते हैं और अपने स्वरूप को प्राप्त करते हैं।
मुक्ति का अर्थ होता है अपने स्वरूप का ज्ञान लाभ करना। अहं ब्रह्मास्मि—ये हमारा पहली ज्ञान है कि मैं ब्रह्म हूँ, और आगे और बढ़ना चाहिए। तो वो जो ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा (ब्रह्म भूत प्रसुद), तो आगे बढ़ने के पश्चात तो भगवत भक्ति, भक्ति योग जो है, उससे संपर्क होता है। और भक्ति योग में साधन करने से मुक्त हो जाता है, और मुक्त होने के बाद कृष्ण-प्रेम लाभ होता है। इसमें उसका जीवन सफल होता है।
और भागवत में बताते हैं—स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे (सब पु धर्म भक्ति)। आप चाहे हिंदू हैं, चाहे मुसलमान हैं, चाहे क्रिश्चियन हैं, जो आपको पसंद हो, उस धर्म में रहिए। बाकी देखना चाहिए कि कैसे आपको भगवत-प्रेम बढ़ रही है या कम रही है, ये देखना चाहिए। यदि भगवत-प्रेम आपको ठीक है, भगवान से संपर्क आपका ठीक है, तो जो कुछ धर्म कर रहे हैं, सब ठीक है। और नहीं तो श्रम एव हि केवलम् (समय वही केवल केवल परिश्रमी), उसमें कुछ लाभ नहीं है, केवल परिश्रम ही है।
तो ये हमारा जो Krishna Consciousness Movement है, सबको हम लोग यही सिखाते हैं जो भगवत-प्रेम है—प्रेमा पुमर्थो महान्। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जो है, ये परम पुरुषार्थ नहीं है, ये चतुर्वर्ग है, आदमी को आगे बढ़ा देते हैं। ये है पंचम पुरुषार्थ—वो भगवत-प्रेम। चतुर्वर्ग मुक्ति तक दुनिया से हो सकती है, परंतु जब तक भगवत-प्रेम न लाभ हो, फिर इधर ही घूम के आना पड़ेगा। जैसा पहले आप लोग को बताया—आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदंघ्रयः (आ परम पद तत पतती अभि)। ऐसे बहुत सन्यास लिया, "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" (ब्रह्म सत्य जग मिथ्या), आ के छोड़ दिया जगत को, फिर आ के ये जगत में आ के वो जो philanthropic work है, welfare work है, उसी में फिर लग जाते हैं। फिर जगत मिथ्या ही हुआ, फिर ये सब जगत का जो philanthropic work, welfare work उसमें लगने का कोई मतलब नहीं होता। ब्रह्म सत्य का उपलब्धि नहीं होने से, ये फिर मिथ्या जगत में ही फँस जाते हैं।
इसलिए भगवान कहते हैं कि जितने-जितने आप लोग सब धर्म बनाए हैं—कर्म, ज्ञान, योग आदि, सब छोड़ के केवल हमारे चरण में शरणागत हो जाओ—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज (सर्व धर्म परित माम)। और भगवान खुद अपने हाथ में आपका charge लेते हैं—अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः (अह सर्व पाप मोक्षम मा)। तो ये भगवत भक्ति प्रचार करने के लिए एक संस्थान है और हम लोग सारा दुनिया में कर रहे हैं, और सब-सब आदमी आग्रह से ले रहे हैं। और आप लोग से निवेदन है, क्योंकि ये तो भारत की संपत्ति है, आप लोग भी इसको ठीक-ठीक से लीजिए और अपने जीवन को सफल कीजिए। हम लोग की जहाँ तक सेवा करने के लिए... Thank you.
[Question & Answer Session]
प्रश्नकर्ता: राम का नाम तो हम लोग भी जपते हैं। लेकिन हरे राम हरे राम राम राम हरे...
प्रभुपाद: वो सब ठीक है, ठीक है। सीताराम सीताराम बोले तो ठीक है। बाकी अपराध शून्य होकर बोलना चाहिए। ठीक है, सीताराम जपिए। नाम बहुधा, भगवान के नाम अनेक हैं—राम हैं, कृष्ण हैं, गोविंद हैं, मधुसूदन हैं, विष्णु हैं, अनंत भगवान के नाम हैं। और ऐसी बात नहीं कि भगवान राम... भगवान तो राम ही हैं। लेकिन लोग जो पूजा करते हैं... लेकिन एक्चुअली जो है, नाम और नामी एक ही वस्तु है—अभिन्नत्वान्नामनामिनोः (अभिनता नाम भगवान)। भगवान राम और भगवान का नाम जो राम, एक ही वस्तु है। भगवान कृष्ण और कृष्ण नाम absolute है।
तो जब आप भगवान का नाम शुद्ध, अपराध शून्य नाम जप करेंगे, तो समझ लीजिए नाम रूप से भगवान आपके साथ में ही हैं, आपकी जीभ में भगवान नाच रहे हैं। इस प्रकार, इस प्रकार भगवान को सब समय... यदि आपका भगवान का संग हो, तो आप पवित्र हो ही जाएंगे। जैसे आग के साथ रहने से गर्म हो जाता है, फिर आखिर जाके आग ही हो जाता है। इसी प्रकार, जैसे उदाहरण स्वरूप, एक लोहा को आग में दीजिए, गरम होता है। गरम होते-होते जब लाल हो जाता है, वो आग ही है।
तो भगवान का नाम यदि आप शुद्धता से करेंगे, तो भगवान का संग होने के कारण आप पवित्र हो जाएंगे। पवित्र होकर मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् (मुक्त संग पर)। संग जो है, त्रिगुण का जो संग होता है, उसमें हम लोग फँस जाते हैं—माया। और जब भगवान का संग करेंगे, जैसे सूरज के सामने आने से अंधकार का कोई संपर्क नहीं रहता। अब अंधकार में आप बैठ जाइएगा, तो फिर तो आपको माया से छुट्टी नहीं है, मुक्ति नहीं है। आप थोड़ा सूरज के प्रकाश में आइए, तो अंधकार अपने आप चला जाएगा—कृष्ण सूर्य-सम; माया हय अन्धकार। याहाँ कृष्ण, ताहाँ नाहि मायार अधिकार॥ (माया तर प्रती)।
तो ये सहज उपाय है, सब समय भगवान से और आपसे बिल्कुल साथ-साथ रहना। कलयुग में ये सरल उपाय है कि सब समय 24 घंटा—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे—इसको जपिए। बहुत सरल होता है, इसमें आपको कोई नुकसान नहीं है, लाभ बहुत है। एक बार देख लीजिए, क्या मुश्किल है? नुकसान तो कुछ है नहीं, लाभ बहुत है। देखिए, प्रमाण देखिए कितना लाभ है। चार वर्ष पहले हमको... हम लोग जिसको कहते हैं म्लेच्छ, यवन, अनाचारी (मृत्य जवान अनाचार) और पापी और पाप योनि, जो कुछ हम लोग को कहना चाहिए कह दीजिए, बाकी भगवान का नाम लेकर भगवत प्रेम में... ये सब कोई कर सकते हैं।
प्रश्नकर्ता: हमारा जीवन का जितना कर्म है, वो सभी कोई भगवान कहिए, श्री कृष्ण कहिए, वही कराता है, वही है। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा... हमारा तो कोई नहीं... जो कराते हैं, वो हम करते हैं, ये सब। और हम कर सकते... वही हमें पाप हो और पुण्य हमारे लिए पुण्य हो सकता है, दूसरे के लिए पाप हो सकता है। दूसरे के लिए पाप है, हम उसको पुण्य समझते हैं। ये तो समाज के हिसाब से हमारा बहुत दिन से...
प्रभुपाद: भगवान आपको कुछ कराते नहीं, भगवान आपको कुछ कराते नहीं। आप करने को चाहते हैं, भगवान सुविधा देते हैं। आप यदि चोरी करने को चाहते हैं, भगवान अच्छी तरह से आपको बुद्धि देंगे—खूब अच्छी खासी चोरी कीजिए, फिर फँस जाएंगे। यही बात है। भगवान की कृपा है, आप चोर होने को चाहते हैं, तो अच्छी तरह से पक्का चोर आपको बना देंगे। और साधु होने को चाहते हैं, तो भगवान आपको पक्का साधु भी बनाएंगे। पहले इस बात को समझ लीजिए, भगवान कुछ नहीं करते। आप जैसे चाहते हैं, आपको वैसा करा देते हैं। भगवान का कोई resource है नहीं... प्रबंधन।
आप चोर होने चाहते हैं, तो भगवान कृपा करके पक्का चोर आपको बना देंगे। आप साधु होने को चाहते हैं, तो आपको पक्का साधु भी बना देंगे। सो आप चाहते हैं... आप क्यों इधर आए हैं? आप और सब क्यों नहीं आए? Independence आपके पास है। आप इधर बैठे हैं, आप इधर से चले जा सकते हैं। ये थोड़ा सा... क्योंकि आप भगवान के अंश स्वरूप हैं, भगवान पूर्ण स्वतंत्र हैं, और भगवान का अंश होने के कारण आपकी भी थोड़ा-बहुत स्वतंत्रता है। वो स्वतंत्रता कहाँ... जब आप misuse करेंगे, तब आपकी अवस्था और कुछ है, और जब स्वतंत्रता का ठीक-ठीक व्यवहार करेंगे, तो आपकी अवस्था और कुछ है।
इसलिए भगवान कहते हैं—ये स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके तुम फँस गया है, इसलिए आओ, सब धर्म सब छोड़ दो। चोर, साधु—ये सब छोड़ दो, केवल हमारे चरण में शरणागत हो जाओ। तुमको चोर भी होना नहीं है और साधु भी नहीं होना है। दो प्रकार का धर्म चलता है—एक तो चोर होने का धर्म चलता है, एक साधु होने का धर्म चलता है। तो भगवान बोलते हैं कि सब चोर भी न हो और साधु भी न हो, हाँ, हमारा भक्त बनो। इसमें तुम्हारा बस... हम जैसा कहता है।
अर्जुन ने यही किया था। अर्जुन सोचा था कि "मैं लड़ाई नहीं करूँगा, अपने आदमी हैं, इनको मारने से हमारा पाप होगा, ये सब विधवा हो जाएँगी, ये सब हो जाएँगे।" बहुत कुछ सोचा। और भगवान उनको भगवत गीता समझाए, और समझ के यही बात बताया—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। तो अर्जुन उसको स्वीकार कर दिया—"ठीक है, हमारा जो विचार है, ये सब छोड़ दिया।" करिष्ये वचनं तव (आई करने के बाद कर वचन)—इतना करने से आपका जीवन... आप स्वतंत्रता छोड़ दीजिए, भगवान के चरणों में शरणागत हो जाइए, तभी आपका जीवन सफल होगा।
अब जब तक आप स्वतंत्रता में रहिएगा, कभी चोर बनना पड़ेगा, कभी साधु बनना पड़ेगा, कभी गरीब बनना पड़ेगा, कभी धनी बनना पड़ेगा। इसी प्रकार अनेक प्रकार ऊपर-नीचे यही चलता है। एक ही आदमी कभी स्वर्ग में भी जाता है, कभी नरक में भी जाता है, वो स्वतंत्रता का भगवान उनको सुविधा देते हैं। इसलिए भगवान कहते हैं—ये सब छोड़ दो, आपकी स्वतंत्रता छोड़ दो। स्वरूप है—जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्य दास (नित कृष्ण दास)। आपका जो स्वरूप है, वो भगवान का दास है। दास बन जाओ, केवल भगवान का हुकुम सुनो, आपका काम complete।
प्रश्नकर्ता: जब हम होते हैं उनके नाम में और उनके ख्याल में, तो होते-होते ये स्थिति हो जाती है और फिर कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती। और इतना बेचैन होने लगते हैं कि उन्हें देखने के सिवा, उन्हें सोचने के सिवा करने की इच्छा नहीं होती। और जब ऐसी स्थिति हो जाती है, घर का चलना या और काम बंद हो जाता है, तो उस स्थिति को कैसे क्या... उसके लिए क्या?
प्रभुपाद: आपकी स्थिति जो है ना, असल में स्थिति आत्म-समर्पण है। उसमें जैसे अर्जुन आत्म-समर्पण करके बोला कि करिष्ये वचनं तव (वचन का), उसमें उनकी जो स्थिति है, कुछ change नहीं हुआ। वो पहले भी सिपाही थे और भगवत गीता समझने के बाद भी सिपाही रहे। स्थिति तो कुछ change नहीं हुई, खाली उसका जो consciousness था, वो change हो गया। समझ गया—"हम भगवत दास हैं।"
स्थिति change करने की कोई जरूरत नहीं है, केवल यही स्थिति को change करना है—अभी हम लोग समझते हैं "मैं भोक्ता हूँ, मैं मालिक हूँ और मैं करता हूँ।" इसी प्रकार जो ये जो हमारा mentality है, इसको खाली change करना है। सर्व-धर्मान् परित्यज्य। जैसा पूर्व सज्जन ने बताया—भगवान कराते हैं कि भगवान की जो शक्ति है, प्रकृति सब कराती है। जैसा आप चाहते हैं, पहली बात है आप जैसे चाहते हैं, उसी प्रकार करा देते हैं। तो स्थिति खाली यही change करनी चाहिए कि "मैं अपनी खुशी से कुछ काम नहीं करूँगा, जैसा भगवान बताते हैं, वैसा करूँगा।" यही, और कुछ नहीं। अपने स्थान पर रहिए और भगवान जैसे बताते हैं, वैसा काम कीजिए, तभी आपको सुख मिलेगा।
और ज्ञान पूरी होनी चाहिए—भगवान एकमात्र भोक्ता हैं, भगवान एकमात्र मालिक हैं, भगवान एकमात्र मित्र हैं—भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ (सर्वो सर्व नाम जता मान शांति)। ये शांति के लिए... येनात्मा सम्प्रसीदति (ज आत्मा सम प्रसत्ता)। येनात्मा सम्प्रसीदति—भक्ति, भगवान के चरणों में संपूर्ण निर्भर। यही होने से आपको शांति मिलेगी।
और "हमारा घर है, हमारी संपत्ति है, हमारी-हमारी..." बहुत आती है। तो कहते हैं—मानस, देह, गेह, यो किछु मोर। अरपिलूँ तुआ पदे, नन्द-किशोर॥ (मानस देह गह जो किु मोर और छुआ पद नंद किशोर)। जो कुछ हमारे पास है—सबके पास कुछ न कुछ है—तो वो कहता है। और मारबी राखबी यो इच्छा तोहार। नित्य-दास-प्रति तुआ अधिकार॥ (और नंद मार रा जो नित दास अधिकार)। अब मार डालिए और फिर जीवित रखिए, जैसी आपकी खुशी कीजिए, सब आपका अधिकार है।
तो भगवान क्या मार देगा? भगवान कहते हैं—कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति (कौन न)। ये शरणागति जो है, भगवान के होने से जीवन होगा, फिर आपका कुछ ही नहीं है। भगवान आपकी रक्षा करेंगे, भगवान आपको खाने को सब कुछ देंगे। इसमें क्या... आप यदि भगवान के चरणों में समर्पण करके आपका सब problem मिट जाता है, तो उसमें क्यों आप deny करते हैं? क्या है इसमें? क्या कारण है? बोलिए, ये हमारा question है।
प्रश्नकर्ता: आप लोग complete surrender का जो विचार है, वो मनसा, वाचा, कर्मणा शुरू से नहीं हो पाता। वाक्य रूप तो हम लोग कर देते हैं, लेकिन वास्तविक रूप से उसको नहीं कर पाते। और जब नहीं कर पाते, इसीलिए वो सब कष्ट होते हैं।
प्रभुपाद: तो होगा ही। सोचते हैं... अच्छा, आप थोड़ा किया, फिर सोचते हैं "अहम्" भाव आ जाता है, या जो भी भाव आ जाता है, आता ही है। complete surrender नहीं हो पाता है, और जब complete surrender नहीं होता है, तभी ये सब व्याधियां आती हैं। नहीं, complete surrender होता नहीं, तो ठीक है, बाकी भगवान हैं। कुछ percentage शुरू कीजिए, फिर आगे जाके होगा।
प्रश्नकर्ता: सरेंडर नहीं करते... "मैं भगवान हूँ" इतना अहम् तो नहीं आ पाया है, लेकिन कुछ अंश तक ये इतना दांभिक सब होगा... "भगवान क्या चीज है? भगवान तो मर गया, मैं भगवान हूँ"...
प्रभुपाद: नहीं, नहीं, बहुत से सोचते हैं। उधर तो हम अमेरिका में गया, लोग बोलते हैं "भगवान तो मर गया।" नहीं, "सोऽहम्" कहने में कोई दोष नहीं है, क्योंकि भगवान... भगवान जो वस्तु हैं, मैं भी वही वस्तु हूँ, इसमें कहने में दोष नहीं है। भाई, "मैं भगवान हूँ" इसमें दोष... तो भगवान चेतन वस्तु हैं—नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् (नित्य नित्याना चेतन चेतना)। ये उपनिषद का वचन है। हम भी नित्य हैं, भगवान भी नित्य हैं; हम चेतन हैं, भगवान चेतन हैं।
बाकी भगवान की चेतनता, भगवान की नित्यता... हमारी नित्यता कभी-कभी चुक जाती है, जैसा अभी हमारी भौतिक अवस्था में नित्य वस्तु होते हुए भी ये तात्कालिक शरीर हमको धारण करना पड़ता है। भगवान को इस प्रकार मायिक शरीर धारण करने को नहीं पड़ता, इतना फर्क है। और जैसा अग्नि, अग्नि है, अग्नि का स्फुलिंग है, वो स्फुलिंग जब गिर जाता है अग्नि से, वो बुझ जाता है। इसी प्रकार जब हमारा भगवान से संपर्क किसी तरह से अलग हो जाता है—अलग तो होता नहीं, भ्रम हो जाता है कि भगवान से हमारा संपर्क नहीं है—तो तभी हम भगवान भूल जाने से हमारा तप नहीं होता। क्योंकि वहाँ जो अग्नि स्वरूप है, जो चेतनता है, वो बुझ जाती है। उसको फिर जाग्रत करते हैं।
उसको जाग्रत करने का एक ही है कि फिर अग्नि में वो जो स्फुलिंग अग्नि से इधर गिर गया था, उसको उठा के फिर अग्नि में दे दीजिए, जलेगा। प्रक्रिया यही है कि "मैं भगवत दास हूँ, भगवान हमको सब समय रक्षा करेंगे, और भगवान की खुशी के लिए, भगवान के संतोष के लिए सब काम हम करेंगे। और भगवान जिसमें नाराज हो जाते हैं, ऐसे काम कभी नहीं करेंगे किसी प्रकार से।"
तो शास्त्र है, शास्त्र है जैसे भगवान कहते हैं—सर्वधर्मान्परित्यज्य। आप नहीं करेंगे तो नाराज होंगे, तो फिर समझने में कोई फेर नहीं पड़ता है। भगवान कहते हैं—ऐसे-ऐसे सात्विक चीजें हैं, भोजन करो। आप तामसिक क्यों भोजन करते हैं? गीता में सब list दे दिया है—इस प्रकार भोजन है सात्विक, इस प्रकार भोजन है राजसिक, इस प्रकार भोजन है तामसिक। तो आप तामसिक भोजन क्यों करेंगे? तो भगवान नाराज क्यों नहीं होंगे? क्योंकि तमोगुण में आप जब तक रहिएगा, तो आप आगे नहीं जा सकेंगे, आपको सात्विक गुण में आना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता: भगवान देंगे जब सरेंडर करेंगे, लेकिन इसको छुड़ाया नहीं... ये तो गो-मांस खाने वाला बचपन से, कैसे छुड़ा दिया? सरेंडर किया, छोड़ दिया।
प्रभुपाद: आप सरेंडर कीजिए, हो जाएगा। भगवान को शरण... भगवान कहते हैं—अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः (अहंकार सर्व पाप खुश)। भगवान assurance दे रहे हैं। हम सरेंडर नहीं करते, तो फिर भगवान क्यों करें? लोग जब आराधना... "देवी की आराधना कीजिए।" कहने का मतलब है, जैसा गोपी लोग देवी की आराधना... तो वो उनसे वर माँगे थे—"कृष्ण को हमको पति रूप में दे दीजिए।" तो आप सब देवता से माँगिए जो "कृष्ण हमको दे दीजिए", तो वो साधना ठीक है। और "नहीं, हमको तो धन दे, रूप दे..." मुश्किल तो यही है।
इसलिए भगवान कहते हैं—अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् (तद भवती अल्पमेद)। जिसका मस्तिष्क में गोबर भरा है, वो सब माँगने वाला है—अल्पमेधसाम्। मैं बताता हूँ, उसको कोई brain substance है नहीं। तुम धन ले लिया, समझ लो तुमको धन खूब मिल गया, तुम कितना दिन भोग करोगे? अभी तुम समझ लो बिड़ला आ गया, और next life में तुमको कुत्ता होने को पड़ता है, तो तुम्हारा क्या लाभ हुआ? इसलिए कहते हैं—अन्तवत्तु फलं। 10, 20, 50, 100 वर्ष के लिए भोग करके फिर यदि आपको और शरीर लेना पड़ेगा ही—शरीर तो आपको लेना ही पड़ेगा जब तक आप मुक्त नहीं होते हैं—तो फिर 10, 20, 50 वर्ष के लिए बहुत धन लेकर आपको क्या लाभ होगा? इसलिए उसको कहते हैं—हतज्ञानाः, उसकी बुद्धि नाश हो गई। थोड़े दिन के लिए सब लेकर क्या लाभ होगा तुम्हारा? तुम तो नित्य वस्तु हो, तुमको तो नित्य वस्तु चाहिए, तुमको ख्याल नहीं है। इसी अल्पमेधसाम्—तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
और आखिरी में भगवान कहते हैं—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। सब तुमको ठीक हो जाएगा। तो भगवान की बात हम लोग नहीं सुनते, तो क्या किया जाए? कि सब आते हैं, अपनी-अपनी बात बताते हैं। तो हम तो भगवान की बात बताते हैं, तो हमारी बात हो जाती है, तो गड़बड़ क्यों होता है? आप भगवान की बात सुनिए, उसमें आप क्यों गड़बड़ी लगाते हैं?
इसलिए तो हम लोग Bhagavad-gita As It Is... सबसे जितना गड़बड़ी लगाने का आता है, वो सब फेंक दीजिए। जो As It Is सुनिए, भगवान जो बोलता है, वो उसको सुनिए, बस आपका काम बन जाएगा। ये लोग सुनता है, इसलिए काम बन जाता है। ये लोग... उनके दिमाग में और कुछ नहीं है, बस सुनते हैं—"भगवान हैं, कृष्ण भगवान हैं", मान लिया, competition नहीं खड़ा करते।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥