श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर-भक्त-वृन्द॥
Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare।
Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare॥
[श्रील प्रभुपाद का प्रवचन]
श्रीमान भाई जी, सज्जनों, मातृगण! आज से कोई लाखों वर्ष पहले, जबकि यह भारतवर्ष का नाम भी नहीं हुआ था, उस समय की बात है। महाराज ऋषभदेव, जो पृथ्वी के सम्राट थे, उन्होंने अपने पुत्रों को जो उपदेश दिया था, उस विचार पर मैं थोड़ा आपके सामने बोलना चाहता हूँ। वहाँ कहते हैं—
नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामान् अर्हते विड्भुजां ये।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद् यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्॥
अपने पुत्रों को राज्य से retire करने के पहले, वे पुत्रों को उपदेश दे रहे हैं कि, "बेटा! यह जो शरीर है, अयं देहः, जो कि मनुष्य समाज में हमको मिला है... शरीर अनेक प्रकार के हैं। 9 लाख जलज (जल के जानवर), स्थावर (जो चलता-फिरता नहीं) वह 20 लाख किस्म का है। इसी प्रकार 84 लाख योनियाँ हैं। उसमें मनुष्य जाति जो है, वह 4 लाख योनियाँ हैं। उसमें भी सब मनुष्य आपस में शुभ नहीं हैं, उसमें म्लेच्छ, यवन आदि अनेक मनुष्य हैं। उनका विचार कुछ... बहुत थोड़े ही मनुष्य हैं जो कि वेद को मानते हैं।" यह चैतन्य महाप्रभु का विचार है।
तो वेद मानने वाले के भीतर भी वेद-निषिद्ध जो पाप का कार्य है, वह सब करते हैं। और जो वास्तविक वेद को मानते हैं, उनका विचार कर्मकाण्ड पर ज्यादा है। कर्मकाण्ड का विचार है कि इस जन्म में भी सुख भोग कर लो और आगे जाकर के स्वर्गलोक आदि में जन्म हो। यह कर्म है। तब चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—करोड़ों कर्मियों के भीतर एक ज्ञानी श्रेष्ठ, और करोड़ों ज्ञानियों के भीतर एक मुक्त श्रेष्ठ, और करोड़ों मुक्तों के भीतर दुर्लभ कृष्ण भक्त। [throat clearing] यह चैतन्य महाप्रभु का विचार है। कृष्ण भक्त होना बहुत ही... हाँ, मुश्किल है कृष्ण भक्त होना। क्योंकि भगवान कृष्ण स्वयं बोलते हैं—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
यह शास्त्र का सिद्धांत है। चैतन्य महाप्रभु ने जो कृपा की, उससे यह अत्यंत दुर्लभ जो कृष्ण भक्ति है, वह बहुत सरल और सहज उपाय में मिल सकती है। कलयुग में यही चैतन्य महाप्रभु का महादान है।
इसलिए जब चैतन्य महाप्रभु से रूप गोस्वामी प्रयाग तीर्थ में मिले थे, तो उनकी प्रार्थना थी—
नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः॥
वे बड़े भारी आदमी थे, नवाब हुसैन शाह के minister थे, और सब छोड़-छाड़ के चैतन्य महाप्रभु का चरण पकड़ लिया—रूप और सनातन, दोनों भाइयों ने। तो क्योंकि वे राजनैतिक समझ रखते थे, वे समझ गए कि चैतन्य महाप्रभु की दानशीलता कितनी बड़ी है। इसलिए वे चैतन्य महाप्रभु से कहते हैं—'नमो महा-वदान्याय'। महा-वदान्य वही है जो बहुत दान देने वाला हो। और चैतन्य महाप्रभु को 'महा' क्यों कहते हैं? 'कृष्ण-प्रेम-प्रदाय'—जो कृष्ण-प्रेम मिलना करोड़ों मुक्तों के भीतर भी होना मुश्किल है, वह कृष्ण-प्रेम चैतन्य महाप्रभु अपने हाथ से सबको [throat clearing] इस प्रकार दे रहे हैं, जो कोई साधारण मनुष्य नहीं दे सकता है। इसलिए रूप गोस्वामी कहते हैं कि 'कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने'—आप स्वयं कृष्ण हैं और अभी कृष्ण चैतन्य नाम लेकर के अवतीर्ण हुए हैं। इसलिए आप महा-वदान्य हैं, आपसे बड़ा कोई अवतार नहीं।
वही बात भागवत में आप लोग सभी जानते हैं। शुकदेव गोस्वामी जब कलयुग का वर्णन करते हैं, उस समय महाराज परीक्षित से उन्होंने बताया—
कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥
"महाराज! कलयुग का तो दोष इतना है कि यह दोषों का समुद्र है, 'दोष-निधि' है। परंतु इसमें एक महान गुण है, यह कलयुग के लिए ही विशेषता है।" क्योंकि कलयुग का जो मनुष्य है, वह अत्यंत पतित है, और इसलिए भगवान ने कृपा करके उनको ऐसा रास्ता बताया है—बहुत सरल और सहज उपाय से भगवान को प्राप्त करने का। वह क्या चीज़ है? 'कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्'—केवल कृष्ण कीर्तन करके, हाँ, वे मुक्त-संग हो जाते हैं। यह जो भौतिक जगत का जो त्रिगुण है, उससे मुक्त होकर के परमधाम में चले जाते हैं। और चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्॥
यह 'परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्' चैतन्य महाप्रभु ने खुद कृष्ण कीर्तन करके सबको बताया कि केवल मात्र कृष्ण कीर्तन द्वारा, वह पहली बात है कि 'चेतो-दर्पण-मार्जनम्'। चेतो-दर्पण मार्जन होने से वे मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि मुक्ति का रहस्य होता है—'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः'।
अभी जो हमारा रूप है, दुनिया से जो हमारा संपर्क है, वह विकृत है। मैं चाहता हूँ कि मैं भोक्ता बनूँ, सब कोई यही चाहते हैं। इस भौतिक जगत में जो कोई है, ब्रह्मा से शुरू करके और वह, हाँ, मल का जो कीड़ा है, वह सब कोई भोग करने को चाहते हैं।
कृष्ण भुलि' सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख।
अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥
माया और कुछ नहीं है, जब कृष्ण को हम लोग भूल जाते हैं, उसी का नाम है माया। और फिर कृष्ण में जब प्रपत्ति होती है, फिर माया... तो कृष्ण भक्त के लिए माया कोई कठिन बात नहीं। हाँ, माया... जब भगवान कृष्ण के चरणों में प्रपत्ति हो जाती है, उस समय माया बहुत दूर भाग जाती है। उसके लिए माया कोई समस्या नहीं।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
इसीलिए श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि ज्ञान की परिसमाप्ति क्या है? यह भगवान में प्रपत्ति होना है। तो बहुत ज्ञानी... हाँ, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—'कोटि ज्ञानी मध्ये एक जन मुक्त'। तो जो-जो मुक्त हो चुके हैं, उनके भीतर कोई-कोई अगर कृष्ण के चरणों में प्रपत्ति करते हैं, वे उसी वक्त माया से मुक्त हो जाते हैं।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
यह महात्मा का लक्षण है—एकांतिक भाव से केवल कृष्ण भजन करना। और वे सबसे बड़े योगी हैं, यह भी भगवान कहते हैं—
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
योगी कहिए, ज्ञानी कहिए, कर्मी कहिए, और भक्त ही हैं, सबका उद्देश्य है यह भगवद्-सेवा, भगवान कृष्ण की सेवा। यही उनका मुक्ति का परिचय स्वरूप है। चैतन्य महाप्रभु जैसे बताते हैं—'जीवेर स्वरूप हय—नित्य-कृष्ण-दास'। यह उनका स्वरूप है। यह दास-भाव छोड़ के और जो कुछ हम लोग अभिमान करेंगे, वह सब माया है और कुछ नहीं। माया छोड़ के और कुछ नहीं। इसलिए सबको उपदेश देना चाहिए। हाँ, चैतन्य महाप्रभु की यही वाणी है—
पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥
तो वह हो रही है भगवान की कृपा से, चैतन्य महाप्रभु के आशीर्वाद से। यह जो पाश्चात्य देशों में, विशेष करके अमेरिका में, जो इनको बताया जाता है कि कृष्ण भगवान स्वयं हैं, वे उनको मान लेते हैं। उसी वक्त वे और कोई competitor खड़ा नहीं करते कि क्यों कृष्ण को ही भगवान माना जाए। जैसा हमारे भारतवर्ष में है, यह आज नहीं, बहुत दिन पुराना है। इसलिए भगवान कृष्ण को फिर आना पड़ा चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति में। भगवान ने सबको बताया कि 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'। बाकी लोग माने नहीं। क्यों कृष्ण में प्रपत्ति नहीं करते? कोई-कोई बड़े-बड़े विद्वान कहते हैं sophistry, "यह कृष्ण की बहुत भारी demand है।" भगवान की तो ऐसी demand होनी ही चाहिए। बाकी आदमी समझ नहीं पाते, विपथगामी होते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण फिर कृष्ण चैतन्य नाम से आए कि किस प्रकार कृष्ण भक्ति करनी है, उसको सिखाने के लिए। 'आचारि' प्रभुजी सिखाए। तो हम लोगों को कहने का मतलब है कि वास्तविक दुनिया में यह जो अभी जो भाव चालू है—दिन भर परिश्रम करके केवल इन्द्रिय-तर्पण करने के लिए सब आदमी दिन भर परिश्रम करते हैं।
भगवान स्वयं श्रीमद् भगवद्गीता में बताए हैं—'न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः'। यह 'मूढाः' का जो अर्थ है, विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर यह 'मूढाः' बताए हैं जो लोग कर्मी हैं, क्योंकि दिन भर परिश्रम करते हैं और उसका लाभ क्या होता है? थोड़ी सी इन्द्रिय-तृप्ति। इसी बात को आज करोड़ों वर्ष पहले ऋषभदेव अपने पुत्रों को बताए थे कि, "बेटा, यह जो शरीर है, सूअर के जैसा नहीं होना चाहिए।" हाँ, हाँ, कहते हैं विशेष करके—'कष्टान् कामान् अर्हते विड्भुजां ये'। अत्यंत कष्ट करके केवल इन्द्रिय-तर्पण करने के लिए दिन-रात परिश्रम करना, यह सूअर का काम है, बेटा, ऐसा नहीं करना। तो हमारे देश में तो अभी उतना नहीं हुआ है, परंतु मैं परदेश में, पाश्चात्य देशों में देखा, दिन भर इसीलिए परिश्रम करते हैं—थोड़ा सा बस इन्द्रिय-तर्पण करने के लिए। और उनका काम है शराब और women, wine and money, बस। और कुछ नहीं जानते, उनको सिखाया नहीं जाता।
इसलिए वे लोग सब परेशान हो गए हैं। देख रहे हैं कि हमारे पिताजी बहुत रुपया कमाए हैं, और कोई शराब और औरत के पीछे है, उसमें भी उसको सुख नहीं मिलता है। वह भी रात में सोने का समय उसको पी लेना पड़ता है, तब वह सो सकता है। इसलिए नौजवान पाश्चात्य देशों में, अमेरिका में विशेष करके, ये लोग बड़े परेशान हो गए हैं, हताश हो गए हैं। हताश होकर ये लोग सब हो जा रहे हैं। बड़े-बड़े विद्वान रहते हैं, बड़े-बड़े अच्छे घरों के लड़के हैं, millions छोड़ देते हैं, इसमें कुछ है नहीं।
इसलिए इस समय पर उनको यह चीज़ मिली है कि चैतन्य महाप्रभु की वाणी—'हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्'। यह सुन के और जैसी विधि है, उसको समझा गया, वह ग्रहण भी किया। इसलिए आहिस्ते से वे लोग बहुत आगे बढ़ रहे हैं। और हमको अभी समय... अमेरिका से, इधर ही हैं, हमको बहुत उत्साहजनक पत्र मिलते हैं कि अभी तीन-चार centers और खुल गए। यही लोग सब कर रहे हैं। और कहीं center खोला जाता है, वे लोग इतने आग्रह से ग्रहण कर रहे हैं, जैसे बहुत तैयार हैं इसको लेने के लिए।
तो आप लोगों से यह निवेदन है कि भारतवर्ष में जो इतना भारी culture है, Krishna Consciousness, इसको हम छोड़ बैठे हैं, हाँ, यह उचित नहीं है। और भी एक बात है, भारतवर्ष के बड़े-बड़े minister लोग जब बाहर में जाते हैं, माँगने के लिए जाते हैं—"हमको थोड़ा गेहूँ दीजिए, हमको थोड़ा चावल दीजिए, हमको रुपया दीजिए, हमको सिपाही दीजिए।" यह सब भीख माँगने के लिए जाते हैं। बाकी आपके पास यह संपत्ति है कृष्ण की। आप यदि इसको देंगे, तो वे लोग बहुत ही आभारी रहेंगे। वे कहते हैं, "ऐसा संवाद हमको कभी नहीं मिला।" तो एक नहीं, हज़ारों इधर से जाने चाहिए, हज़ारों प्रचारक जाने चाहिए। इसका बहुत field है। हाँ, बहुत लेने के लिए तैयार हैं। हम तो खाली अमेरिका में थोड़ा घूमे हैं, और थोड़ा Europe में भी घूमे हैं। अभी तो न जाने कहाँ-कहाँ South America है, Africa है, Canada में हम भी थोड़ा घूम-घाम के आए हैं। तो अकेले जहाँ तक हो सका, मैं भगवान की कृपा से कुछ काम किया है। बाकी आपको यह संवाद देने के लिए मैं आया हूँ कि इसकी चाहत (demand) बहुत ही है।
जिधर से बड़े-बड़े हमारे भारतवर्ष में अनेक साधु हैं, संन्यासी हैं, वे जाते हैं। कभी-कभी जाकर के कोई जो gymnastic, यह सब दिखा-दिखा के कुछ पैसा लेकर के चले आते हैं। वास्तविक जो वस्तु है, वह भागवत से अभी तक समझ लीजिए। यही पहली बात जो कृष्ण भगवान की... वे लोग कहते थे भगवान मर गया, और "भगवान सभी हैं, रास्ता-रास्ता में घूम रहे हैं, तो दरिद्र-नारायण सब घूम रहे हैं।" और कोई कहते हैं भगवान नहीं है, भगवान निराकार है इत्यादि। भगवान को छोड़ने का सब मतलब। तो इसमें कभी सुखी नहीं हो सकेंगे। सुख का जो program है, भगवान खुद बताते हैं—
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
बड़े-बड़े सब नेता लोग होने को चाहते हैं, बाकी यह नहीं बताते हैं कि सुहृद् तो भगवान हैं, हाँ, उनसे संपर्क बनाओ तब सुखी होगे। यह बात कोई नहीं बताता। बाकी कुछ देर, कुछ दिन तक हम लोगों का यही बताना है कि भगवान के चरणों में आत्म-समर्पण करो। और भगवान की भक्ति, वह भी बहुत सरल है—केवल 'Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare, Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare'। ऐसा कोई कठिन बात नहीं है, सब कोई कर सकते हैं और कर रहे हैं। बाकी वे अपराध-शून्य होकर यह लोग सब करते हैं, इसलिए इनका काम बहुत जल्दी-जल्दी बढ़ रहा है।
तो आज भाईजी उपस्थित हैं, आप लोग सब उपस्थित हैं, आपकी संस्था भी बहुत बड़ी है। मैं चाहता हूँ कि सीधा-सीधा प्रचारक तैयार किया जाए और सारा दुनिया में भेजा जाए। तो उसमें भारत का जो मुख उज्ज्वल हो, सब कोई मानेंगे कि भारतवर्ष से हमको कुछ मिला। अभी कहीं भी हम लोग जाते हैं, वे लोग कहते हैं कि भारतवर्ष बड़ा दरिद्र है, यही उधर advertisement है कि भारतीय जो हैं, वे बहुत ही गरीब हैं। बाकी वास्तविक हमारे पास जो संपत्ति है, वह सब बड़े से बड़े जो धनी हैं, उसको भी कुछ दे सकती है, ऐसी संपत्ति है। यह संपत्ति वितरण करने के लिए सबको प्रयत्न करना चाहिए। यही आप लोगों से हमारा... Thank you. Hare Krishna!
[भाई जी (हनुमान प्रसाद पोद्दार) का वक्तव्य]
पर मैं अपने सौभाग्य से वंचित रहना नहीं चाहता था, इसलिए मैं नीचे आ गया। वास्तव में ही यह महान कार्य हो रहा है। सारा जगत इस समय अशांति के महान दावाग्नि से दग्ध हो रहा है। उसको बचाने के लिए उसमें यदि किसी प्रकार से भी, किसी रूप में भी शांति की आशा है, वह केवल और केवल इसी बात में है। अभी महाराज ने गीता का श्लोक सुनाया— [screaming sound] '...ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति'। शांति चाहिए तो श्री कृष्ण के शरणापन्न होना चाहिए। इसके सिवा धन में, ऐश्वर्य में, अधिकार में, साम्राज्य में कहीं पर शांति आज तक किसी को मिली नहीं, मिल सकती नहीं, क्योंकि है नहीं। गीताकार कहते हैं, भगवान—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
जितने भी संस्पर्शज भोग हैं, वे सब आद्यन्त वाले हैं और दुःख-योनि हैं, जिनसे दुखों का उदय होता है, उत्पत्ति होती है। उनमें सुखों की आशा करना मूर्खता है। तो आज का जगत, और उसी जगत के पीछे हमारा भारतवर्ष भी इसी मूर्खता की ओर जा रहा है। शांति चाहता है, सुख चाहता है, और चाहता है भोगों से। इसीलिए सारा प्रयास... आपका विज्ञान बहुत उन्नत है, और विज्ञान भी भोग-मुखी है, भगवद्-मुखी नहीं है।
तो सबसे बड़ी चीज़ इस समय यही है, हमेशा के लिए यही है—श्री कृष्ण के शरणापन्न हों। वे श्री कृष्ण आपकी वस्तु हैं। और सबसे बड़े सुख की चीज़ यह है कि उस वस्तु का वितरण महाराज कर रहे हैं वहाँ जाकर। एक भक्त ने कहा कि भाई, वहाँ सब है तो श्री कृष्ण का अभाव है। अगर उन्हें श्री कृष्ण मिल गए तो सब मिल गया। श्री कृष्ण वास्तव में सबके हैं, किसी एक के नहीं हैं। 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'—सबके श्री कृष्ण हैं। और यह बात बहुत ठीक कही, इसमें धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है, आत्मा का धर्म ही है श्री कृष्ण के शरणापन्न होना स्वाभाविक।
तो श्री कृष्ण का जो वितरण महाराज कर रहे हैं नाम प्रचार के द्वारा, और इसमें दो बात की कमी रहती थी—एक तो भगवान की भक्ति का, प्रेम का प्राधान्य नहीं रखा जाता था; दूसरे, अपराध-शून्य होने की बात नहीं कही जाती थी। मुझे तो सबसे अधिक प्रसन्नता हुई आपके नियमों को देखकर, आपकी आचार-पद्धति को देखकर, जो किसी भारतवर्ष की चीज़ का प्रचार करने के लिए नहीं, जो मानव मात्र के लिए कल्याण की वस्तु है, उस कल्याण की वस्तु का मानव मात्र को प्रदर्शन करा देना, उसे उसका अधिकारी बना देना, उसे दे देना, उसको प्राप्त करा देना—यह सबसे बड़ी सेवा है। यह सेवा श्री कृष्ण की सेवा है। यह सेवा महाराज कर रहे हैं और श्री कृष्ण की कृपा से कर रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने ही इनके द्वारा यह महान कार्य करवाना चाहा। उन्होंने कहा था कि सारे विश्व में मेरे नाम का प्रचार होगा, 500 वर्ष पूर्व कहा था। तो वह संभव है, यही उसका सूत्रपात हो, इसी के द्वारा प्रचार शुरू हो गया हो। और मैं इनको, इन भक्तों को देखता हूँ। अब इनके... अभी मैं देख रहा था नामकरण हो रहा था। इनके... इनकी दिनचर्या को मैंने पढ़ा है, देखा तो नहीं, मुझे बड़ा सुख मिलता है। मैं... मैं तो बल्कि उल्टा यह कहना चाहिए, कहना चाहता हूँ कि भारतवर्ष के लोगों को इनसे सीखना चाहिए। लोग... हम लोग कहते हैं, "ये यह करते हैं", तो करने वाले आदर्श होते हैं, कहने वाले आदर्श नहीं होते। हमारे पास वस्तु है, तो वह हमारे ग्रंथों में है, वह हमारे सिद्धांतों में है, हमारे जीवन में उसका आज अभाव ऐसा होता जा रहा है। यद्यपि नहीं है, अभी नहीं अभाव होता तो जाते कहाँ से? ये भी तो यहीं के हैं। तो है यहाँ पर, अभाव नहीं है। अभाव... न मालूम कितने महात्मा और पड़े होंगे। लेकिन इसका... और यह तमाम जगत इसका भूखा है।
मेरे पास भी बहुत से European लोगों से संबंध होता है, वे चाहते हैं कहीं पर भी हमें कुछ मिल जाए, शांति मिल जाए। वे अपनी सभ्यता से ऊब गए हैं, अपनी संस्कृति से ऊब गए हैं, और अपने धन-दौलत से, ऐश्वर्य से उनको अब परेशानी हो गई है। कैसे इससे मुक्त हों, रास्ता नहीं दिखता। और इसमें जो हज़ारों आदमी, हज़ारों नवयुवक-नवयुवतियाँ जो आ रही हैं, इसका कारण यही है कि उनको एक चीज़ दिख रही है सामने। मैंने कई लेख देखे जो आए थे महाराज के भेजे हुए, उनमें कई वहाँ के लोगों के लिखे हुए बड़े सुंदर, उनसे मालूम हुआ कि वे बड़ी... बड़े आश्वासन को प्राप्त कर रहे हैं इसके द्वारा। और उनका केवल कोई दिखावे की चीज़ नहीं है, बिल्कुल जो कुछ कर रहे हैं, मन से कर रहे हैं, अंतर्मन से कर रहे हैं।
तो यह बड़ा सुंदर कार्य है, इसमें सबको सहयोग देना चाहिए, जहाँ तक जितना हो सके। यह तो श्री कृष्ण की सेवा है प्रत्यक्ष। और कल्याण में कुछ विषय नहीं निकला है, एक परिचय पुस्तिका यहाँ से और निकलने वाली है, उसका संकलन हो गया है। प्रायः उसमें कुछ चित्र आदि और दे के उसको निकाल देना चाहते हैं, जिससे और भी ज़्यादा प्रचार हो जाए। और जो करेंगे श्री कृष्ण, उनका अपना काम वे करेंगे, हम लोग तो निमित्त मात्र हैं, हम लोग तो निमित्त मात्र हैं। उनका अपना काम तो वे करें, वही अभी कर रहे हैं।
तो बड़ी कृपा आपने की, दर्शन दिए यहाँ पर, आप भक्तों के दर्शन हुए, नाम सुना, नाम-कीर्तन सुना, हम लोग कृतार्थ हुए। और बस आशीर्वाद दें कि भगवान के चरणों में मति बनी रहे बस, और... और कुछ कहना-सुनना है नहीं। बहुत बड़ी... आशीर्वाद रहे और कुछ नहीं, सबसे बड़ी चीज़ है। विशेष बोलने में कुछ थकावट मालूम होती है, इसलिए मैं बोल नहीं सकता। आज भी बोला हूँ कई महीनों के बाद। यहाँ पर कीर्तन होता है, सब बंगाल के ही नवयुवक प्रायः हैं लोग, आठों पहर... आठों पहर हमारे यहाँ से कीर्तन मंडली भी निकली है, हिन्दी में भाग... और उन महाप्रभु की कृपा से थोड़ा-बहुत... आपने बहुत कुछ... और वे प्रायः श्री गोस्वामी के जो ग्रंथ हैं, उन्हीं के आधार पर हम लोग लिख के दिखाते हैं। हमारा जो... 'येइ भजे सेइ बड़, अभक्त हीन छार। कृष्ण भजने नाही जाति-कुलादि-विचार॥' कोई भी आकृष्ट... भगवान राधा-कृष्ण प्रणय जो है, गोस्वामी लोगों का जो उपदेश है, उसके भीतर से... कृपा से नहीं, बस कृपा से... वैसे कृपा से ही होता है, लेकिन बिना वैष्णव-कृपा के केवल विद्या से उपलब्ध नहीं होता, विद्या-मान होता है। अपने यहाँ से तत्त्व पर कुछ पुस्तकें भी निकली हैं हिन्दी में। अब अगला कार्यक्रम हो आपका।
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