श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  721014LE-DELHI_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
दिल्ली, 14-अक्टूबर-1972
 
 
 
कल हम लोग ये श्लोक की व्याख्या कर रहा था कि मनुष्य के लिए परो धर्म जो है उसको ही ग्रहण करना चाहिए। पर और अपर। अपर का अर्थ होता है निकृष्ट, हाँ, और परो का अर्थ है उत्कृष्ट। तो अभी जो हमारी अवस्था है, निकृष्ट और उत्कृष्ट मिश्र; क्योंकि यह जो शरीर है यह निकृष्ट और आत्मा जो है यह उत्कृष्ट है। जैसे भगवान भगवत गीता में बताते हैं:

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। (BG 7.4-5)

भगवान जी के दो प्रकार की प्रकृति—अपरा और परा। जब अपरा प्रकृति में मैं आष्ट रहता हूँ, उस समय जो धर्म जाधन करता हूँ वो अपरा। जैसे हम लोग समझते हैं कि हमारा धर्म है हिंदू धर्म, कोई समझता है कि हमारा धर्म मुसलमान धर्म, Christian धर्म, कोई समझता है हमारा धर्म है देश की सेवा, देश धर्म, कोई समझता है हमारे समाज की सेवा ये हमारा धर्म। तो ये सब जितने धर्म हैं, क्योंकि ये शरीर से संपर्कित हैं, इसलिए सब अपरा, निकृष्ट धर्म। तो निकृष्ट धर्म में रहने से ठीक धर्म जाजन होता नहीं। इसको शास्त्र में कहते हैं कैतव धर्म। कैतव का अर्थ होता है छलना, cheating। भागवत में पहले कह दिया कि धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र। जितना cheating धर्म है, छलना पूर्वक धर्म है, ये धर्म के नाम से चलता है, असल में धर्म नहीं।

पहले थोड़ा समझिए धर्म किसको कहा जाए। धर्म में कहते हैं, धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतम्। जो भगवान की वाणी है, भगवान का जो हुकुम है, वो है धर्म। क्यों? जीव है भगवान का अंश मात्र। ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। जैसा कई आप लोग के सामने प्रस्तुत किया, ये जैसा हमारा उंगली ये शरीर का अंश है, और मैं चाहता हूँ अंग थोड़ा सिर में हमको खुजला दे, पैर में थोड़ा ऐसा करे। कि जैसा ये अंश का उचित है पूर्ण का हुकुम मानना। और भी बहुत सा उदाहरण हो सकता है। जैसे government हुकुम दिया, हाँ, आपको विधानसभा में सभापति जो हुकुम देगा उसको मानने पड़े। इसी प्रकार वही कानून है। तो धर्म का अर्थ होता है जिसको आप छोड़ नहीं सकता। आप ऐसा नहीं कह सकते हैं government का कानून नहीं मानता। नहीं, फिर आपको तकलीफ है पड़ने, दुखी और government शासन करेगी।

तो धर्म क्या चीज है? धर्म वही चीज है जो भगवान बना दिया, उसका नाम है धर्म। जैसा भगवान बना देते हैं, जैसा इमली है वो खटाई और ईख है वो मिठाई है, ये भगवान बना दिया। पानी जो है वो तरल है और पत्थर जो है कठिन है, ये कौन बनाया? भगवान बना दिया। तो पत्थर है और कठिनता है, नहीं ऐसा हो नहीं सकता, जहाँ पत्थर रहेगा वहाँ कठिनता रहेगी, जहाँ पानी रहेगी उधर तरलता रहेगी, जहाँ अग्नि है उधर ताप है, प्रकाश है। तो धर्म इसी प्रकार है, इसको समझना चाहिए। धर्म ही नहीं है मन माफी कुछ धर्म बना लिया। धर्म का अर्थ यह है दात मन जो कि जो चीज साथ में रहता है। जैसे आपका हाथ में थोड़ा सा चीनी कोई दिया, आप जानते हैं इसका धर्म है मिठाई। अगर वो चीनी को आप आस्वादन करके देखते मीठा नहीं, क्या तो चीनी है? क्योंकि वो धर्म नहीं है।

इसी प्रकार समझना चाहिए जीवात्मा का धर्म क्या है। सब चीज का अलग-अलग धर्म है। तो जीवात्मा जो है भगवान का अंश है, उसका धर्म क्या है? अंश का धर्म है पूर्ण की सेवा। यही धर्म, भगवत सेवा, यही असल धर्म। इसलिए शास्त्र में कहते हैं, स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। धर्म तो ऐसे बहुत से हैं ना प्रकार के, बाकी वो शास्त्र में कहते ये सब cheating धर्म, ये सब धर्म। इसलिए भगवान कहते हैं, सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। क्योंकि वो cheating धर्म सब पड़े हुए हैं। इसलिए भगवान खुद आ के उनको सिखा रहे हैं कि ये धर्म है। भगवान क्यों आते हैं? धर्मसंस्थापनार्थाय। धर्म को संस्थापन करने के लिए।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (BG 4.7-8)

तो भगवान तो आते हैं धर्म संस्थापन करने के लिए। यह भगवान का अवतार का अर्थ होता है वो धर्म संस्थापन का। और फिर जाके भगवान कहते हैं कि सर्वधर्मान्परित्यज्य। यदि भगवान धर्म को संस्थापन करने के लिए आए हैं, फिर सब धर्म को छोड़ने को क्यों कहते हैं? ये विचार करना। छोड़ने के लिए इसीलिए कहते हैं वो सब धर्म नहीं है। वो सब cheating है। हाँ, धर्म कोई अर्थात छलना, cheating, जिस धर्म में भगवत भक्ति सिखाया नहीं जाता है, भगवान का चरण में शरणागति सिखाई नहीं जाती, वो cheating धर्म। स्पष्ट बता दिया, स वै पुंसां परो धर्मो। वही श्रेष्ठ धर्म है, उत्कृष्ट धर्म, जिस धर्म द्वारा भगवत भक्ति सिखाए।

तो भक्ति अधोक्षजे। तो भक्ति का अर्थ होता है भगवान और भक्त और बीच में कार्यक्रम जाए उसका नाम है भक्ति। सब एकाकार नहीं। भगवान भी मौजूद हैं, भक्त भी मौजूद है, और भक्त से भगवान से जो कार्यक्रम है उसके नाम है भक्ति। और वो भक्ति कैसी? अहैतुक्यप्रतिहता। ये भगवान हमको कुछ दे, भगवान से कुछ अदा करना है, इसलिए मैं भक्ति कर रहा हूँ, नहीं, वो शुद्ध भक्ति नहीं। भक्ति अहैतुकी, कोई हेतु नहीं। भगवान हमारा प्रभु है, हमारा काम है भगवान की सेवा, ये शुद्ध अहैतुकी। जैसा हमारा अंश है, हम 10 दिन इसको खाने को नहीं देंगे बाकी सेवा करेगी, उंगली नहीं कहेगी अब तो हमको खाने को नहीं दिया हम सेवा नहीं करेंगे। भगवान चाहे जिस अवस्था में है हमको रखते हैं, हमारी काम है सेवा। जैसा महाराज कुलशेखर मुकुंदमाला स्तोत्र में कहते हैं, यद्भाव्यं तद्भवतु। जो होने वाला है हमारा कर्म फल का अनुसार वो होने दीजिए, वो हम परवाह नहीं करते, बाकी हमारा मन सब समय आपका चरण में अर्पित रहे, यही मैं चाहता हूँ।

श्री चैतन्य महाप्रभु भी सिखा रहे हैं, न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। ये जो आरती गीत गाते हैं, "जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का, स्वामी दुख बिनसे मन का, सुख संपत्ति घर आवे..."। जगदीश को भजन करके हमारा धन घर में आए, ये शुद्ध भक्ति नहीं। ये हेतुकी। मैं भगवान का आरती कर रहा हूँ, भजन कर रहा हूँ, कीर्तन कर रहा हूँ, इसलिए ना हमको धन आवे, ये शुद्ध भक्ति नहीं है। ये विद्धा भक्ति है, ज्ञान-कर्म का आश्रय है। कर्मी लोग जैसा कुछ profit मांगता है। हाँ, इतना जो परिश्रम करते हैं कर्मी लोग, उसका अगर कुछ profit ना हो, कुछ लाभ ना हो, तो वो कहते बेकार के काम है। परंतु भक्ति जो है इस प्रकार भौतिक profit लाभ करने के लिए, भौतिक लाभ करने के लिए नहीं। हमारा पैसा 20,000 है तो भगवान की भक्ति करके मैं 10,000 कर लूँगा, लाख रुपया कर लूँगा, इसको भक्ति नहीं कही जाती है, परंतु भजन कहा जाता है। चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। ये जो भजन है, ये सुकृतिमान करते हैं, ये भी पुण्यवान करते हैं। भगवान का पास मंदिर में जाते हैं, भगवान के पास जाते हैं कुछ मांगने के लिए, उसको भी शास्त्र में पुण्यवान कहा है, सुकृति। क्योंकि जो पापी है वो भगवान का पास जाता ही नहीं। इसलिए अगर भगवान का पास कोई कामना ले जाए तो भी पुण्यवान।

कृष्णा कीर्तन कोई भी भाव से अगर भगवान का नाम, गुण, लीला, परिकर, वैशिष्ट्य श्रवण किया जाए तो वो पुण्य होता है। बाकी भक्त के लिए पाप-पुण्य नहीं। पाप भी बंधन का कारण है, पुण्य भी बंधन का कारण है। इसलिए भगवत भक्त जो है पाप-पुण्य का ऊपर है। हाँ, वो पाप-पुण्य से उनसे मतलब नहीं है, उनका मतलब है भगवान को संतुष्ट करना। उसमें पाप हो, पुण्य हो, परवाह नहीं है। इसलिए कहते हैं शुद्ध भक्ति का जो विचार है, अन्याभिलाषिताशून्यं। कोई अभिलाष नहीं, बिल्कुल शून्य। अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। और ज्ञानी, ज्ञानी लोग का विचार है निर्भेद ब्रह्म अनुसंधान, ये ब्रह्म से मिल जाना, एक हो जाना, ये ज्ञानी का विचार। हाँ, ज्ञान-कर्म। और कर्मी का विचार है हमको भौतिक सुख मिले, हमको स्वर्ग लोक प्राप्त हो जाए, जनक महलों से खाने को मिले, ये कर्मी का विचार है। बाकी भक्ति का जो विचार है वो ज्ञान-कर्म, ज्ञान का, कर्म का जो फल है उससे अतीत। जैसा श्रीधर स्वामी बता रहे हैं श्रीमद्भागवतम् में, जहाँ धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र। उधर श्रीधर स्वामी कहते हैं, अत्र श्रीमद्भागवते मोक्षवाञ्छा अभिसन्धिरपि निरस्तः। जो मोक्ष कामना करते हैं वो भी निरस्त है, वो भी ठीक नहीं। मोक्ष तो ऊपर। इसको की अधोक्षजे। स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता। इस प्रकार की जो भक्ति है वो कभी प्रतिहत नहीं हो सकता है। "साहब, हम तो गरीब हैं, हम कैसे भक्ति जाना करें? अभी तो पेट के लिए धंधा कर रहा हूँ।" नहीं, अप्रतिहता। चाहे आप गरीब हैं, चाहे अमीर हैं, चाहे मूर्ख हैं, जो कोई है, चाहे नीच है, चाहे पापी है, सबके लिए खुला। अहैतुक्यप्रतिहता। कोई प्रतिहत नहीं हो सकता। केवल चाहिए हमको निश्चित करना कि आज से मैं भगवान का चरण में अर्पित हो जाऊँगा।

काम ये बात नहीं है, "हम मूर्ख हैं, अभी वेदांत पढूँगा, ज्ञान लाभ करूँगा, तब जाकर के हम भगवत भक्ति करूँगा।" कि "हम अभी हम गरीब हैं, अभी हमको दो-चार लाख, दस लाख कमाने दो, फिर भक्ति करूँगा।" "अभी हम बालक हैं, अभी हम भक्ति कैसे करूँगा?" ये बालक भी कर सकता। देखिए, ये एक बालिका चार वर्ष उम्र है, देखिए नाच रहे हैं। अप्रतिहता। यह बात नहीं है ये बालिका है, छोटी है, उसका भी ज्ञान लाभ करने पड़ेगा और उसको और और सब काम करने... भक्ति नहीं, immediately। क्योंकि इस जगत में बालक और वृद्ध का क्या विचार है? सभी वृद्ध हैं, सभी बालक। कोई बालक है, इसकी कोई गारंटी है क्या 100 वर्ष जिएगा? नहीं। जब जीवन है, प्रह्लाद महाराज कहते हैं, कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान्भागवतानिह। दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्। ये जो मनुष्य जीवन है, एक तो दुर्लभ, बहुत मुश्किल से मिला। 84 लाख की योनि भ्रमण करते-करते-करते... एक अगर वृक्ष हो गया तो 10,000 वर्ष खड़ा। America में वो Sequoia बगीचा में देखा, उसको परिचय दिया यह 7,000 वर्ष, उसको परमाणु अभी तगड़ा है, अभी चाहे और 7,000 वर्ष और
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥