आने का कारण भोग। भोक्ता भगवान। तो भगवान की नकल करके जब हम लोग भोक्ता होने को चाहता हूँ, तभी हम लोग को ये भौतिक जगत में आने पर "कृष्ण भुलिया जीव भोग वांछा करे"। इसको समझने में कोई मुश्किल नहीं है। जैसे कोई नौकर है, हाँ, बहुत धनी मालिक के पास नौकरी कर रहा है। बाकी वो कोई ऐसा समझता है कि देखो जी, ये तो मालिक बन के है, मैं नौकर हूँ। अगर हमको ऐसा पैसा मिल जाता तो मैं मालिक हो जाता। होता है स्वाभाविक, जीव का जो स्वाधीनता थोड़ा सा, ज्यादा नहीं, ये है, ऐसे चिंतन कर सकता है। बाकी उनका जो स्वरूप है जीव का, वो भगवान का नौकर, जीव का स्वरूप है कृष्ण दास। बाकी वो कृष्ण दास जब नहीं कहने को चाहते हैं कि मैं कृष्ण का दास क्यों हूँगा? मैं खुद ही कृष्ण बन जाऊँ। इधर भी चलता है ऐसा। जो दुष्कृतिनः, जो लोग सब समय पाप के कार्य में लिप्त हैं, दुष्कृतिनः। कृति का अर्थ होता है जिसका दिमाग बहुत अच्छा है, बाकी दिमाग अच्छा होने से काम नहीं चलता, दिमाग को अच्छे काम में लगाना चाहिए। ताकि ऐसे बहुत से बड़े-बड़े चोर हैं, बदमाश हैं, smugglers हैं, उनका दिमाग तो बहुत अच्छा ही है, मानना चाहिए, बाकी खराब काम में लगा। दिमाग को आप जैसे काम में लगाइए, वो लग जाएगा। प्रकृति आपको सब सुविधाएँ दे देगी। आप अगर चोर होने का चाहते हैं, तो प्रकृति आपको ऐसा दिमाग देगी, खूब अच्छी तरह से खूब भारी चोर; और अगर भक्त होने का चाहते हैं, तो प्रकृति आपको ऐसा दिमाग देगी, तो बड़े से बड़े भक्त भी हो सकते हैं। यह आपके हाथ में है।
तो इसी प्रकार जब हमारा दिमाग भगवान की सेवा में नहीं लगाना चाहता हो, अपने भोग में लगाना चाहता हो, तभी हमको ये भौतिक जगत में आना पड़ता है। इसको जरा समझें। अगर कोई पूछे भौतिक जगत में क्यों हम लोग आए हैं? और इधर का भौतिक जगत का जो दुःख है, ये दुःख है, इधर सब समय हमको परिश्रम करना ही पड़ेगा। इसलिए इसको भगवान स्वयं कहते हैं—"दुःखालयम् अशाश्वतम्", दुःख का आलय। इधर जो सुख है, पहले तो कुछ दुःख भोगना पड़ेगा। अगर आप करोड़पति होने को चाहते हैं, तो पहले तो आपको बहुत दुःख भोगना पड़ेगा वो रुपया कमाने के लिए। फिर वो भी कमाया और 10, 20, 50 बरस आपने किसी तरह से भोग किया, वो भोगते-भोगते भी नष्ट हो सकता है और नहीं तो शरीर तो छोड़ना ही पड़ेगा। जहाँ का रुपया तहाँ ही रह जाएगा। फिर आपको और एक शरीर लेना पड़ेगा अपने कर्म के अनुसार। वह मनुष्य शरीर भी मिल सकता है और कुत्ता का शरीर भी मिल सकता है। वो तो अपने कर्म का। इसलिए इधर जो सुख भोगने की इच्छा है, वही माया है। क्योंकि सुख इधर है नहीं। भगवान स्वयं कहते हैं—"दुःखालयम् अशाश्वतम्", दुःख का आलय है, वो भी कुछ दिन के लिए। अगर आप ऐसा मान लें कि दुःख है, सुख है, मैं अपना जो रुपया-पैसा कमाया है, मकान आदि सब बनाया है, इस काम भोग करूँगा, तो वो भी आपको भोग करने को देगी ना प्रकृति, 10, 20 बरस, बस 50, इससे ज्यादा नहीं। इसलिए कहते हैं "अशाश्वतम्", नित्य काल के लिए नहीं, हाँ, कुछ दिन के लिए।
तो कहने का मतलब, जो भगवान को नकल करके जो भोग करने को चाहते हैं, भोक्ता भगवान, जैसे भगवान का रासलीला होता है उदाहरण से, तो ऐसे-ऐसे बहुत सा मूर्ख है, वो भगवान का रासलीला नकल करता है। तो ये जो इच्छा, जो भगवान को नकल करके, नकल भगवान होने का जो इच्छा है, वो इच्छा से हमको भौतिक जगत में आना पड़ता है और अपने-अपने कीमत अनुसार, जिसको कर्म कहा जाता है, सब आदमी भोग करता है। मुंबई शहर में मुंबई की मिट्टी, मुंबई का जल, मुंबई की वायु, ये सब एक ही है। बाकी कोई करोड़पति हो जाता है और किसी को रहने का भी ठिकाना नहीं है। वो समुंदर के किनारे में जाके उधर थोड़ा सा पानी में स्नान करते हैं, कपड़ा उधर ही धोते हैं, उसे जगह ही नहीं। जगह तो एक ही है मुंबई। बाकी आपके कर्म के अनुसार कोई खूब भोग कर रहे हैं, कोई कम भोग कर रहे हैं। ये दुनिया ऐसी है।
तो असल में जो कोई इधर आए हैं इस दुनिया में, ब्रह्मा से शुरू करके और जो मल का कीट होता है वहाँ तक, हम सब अपने-अपने कर्म के अनुसार इधर भोग कर रहे हैं। अब भोग क्या कर रहे हैं कि यह जो भौतिक चीज़ है—मिट्टी है, जल है, पानी है, अग्नि है, वायु है, मन है, बुद्धि है, अहंकार है। ये आठ चीज़। तो मन, बुद्धि, अहंकार ये सूक्ष्म हैं और ये मिट्टी, जल, अग्नि, वायु ये सब स्थूल हैं। तो पाँच प्रकार की स्थूल वस्तु और तीन प्रकार की सूक्ष्म वस्तु, यही हमारी भोग की सामग्री है—"भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥" बाकी ये जो चीज़ है, ये भी भगवान का है, ये हमारा नहीं है। हम मिट्टी लेकर के, जल लेकर के, ईंट-पत्थर बना के मकान बनाता हूँ। बाकी मिट्टी जो है, वो भगवान की है; जल जो है, भगवान का है; हाँ, अग्नि जो है, वो भगवान की है। भगवान कह रहे हैं—"भिन्ना प्रकृतिरष्टधा"। और मन भी जो आपका है, वो भी भगवान का है। तो अगर ये विचार कीजिए, तो आपका जो शरीर है, हाँ, पाँच प्रकार की स्थूल वस्तु से जो यह शरीर बना है, पाञ्चभौतिक, और सूक्ष्म वस्तु ये मन, बुद्धि, अहंकार, ये सब चीज़ भगवान की है, तो फिर आपका कैसे हो गया?
इसलिए जो समझदार है, वो भगवान के चरणों में प्रपत्ति करते हैं कि "मैं जो चीज़ भोग करने को चाहता हूँ, ये तो सब भगवान की ही चीज़ है।" इसलिए शास्त्र में बताया यज्ञ करो। यज्ञ करने का अर्थ होता है कि भगवान से जो तुमको चीज़ मिली है, उसको मानो कि "भगवान, ये आप ही की चीज़ है, हमारे व्यवहार के लिए आप दिए हैं, इसलिए आपको धन्यवाद।" इसका नाम है यज्ञ। और शास्त्र में इसीलिए यज्ञ की विधि है। यज्ञ का अर्थ होता है, यज्ञ का अर्थ होता है विष्णु। भगवान विष्णु का और एक नाम है यज्ञपति। जो हम लोग यज्ञ जो करते हैं, उसको "भोक्तारं यज्ञतपसाम्"। हम जो तपस्या करते हैं, उसका तपस्या का फल जो होगा, उसको भोगता है भगवान। हम लोग जो रुपया-पैसा कमाते हैं, अनेक तपस्या करके, अनेक तकलीफ करके, और वास्तविक उसको भोक्ता भगवान। ये जो समझदार है, जो समझ सकता है, उसको कहा जाता है कृष्ण का। "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"—कर्म करो, फल भगवान को दे दो। और जो लड़ाई करने को जानता है, बाकी लड़ाई करके उसके फल को दिया है भगवान को, अपने लिए लड़ाई करने को नहीं चाहता। इसलिए हाँ, कहते हैं—"अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः स संन्यासी च योगी च"।
संन्यासी किसको कहा जाता है? जो काम करते हैं, बाकी उसके फल का आश्रय नहीं लेते। काम कीजिए, हाँ, समझ लीजिए आप businessman हैं, करोड़ों रुपया कमाया, वो जो फल हुआ, वो फल आप ना लीजिए, वो भगवान को दीजिए—"अनाश्रितः कर्मफलम्"। कर्मफल जो है, उसका आश्रय नहीं लेते, संन्यासी, उसको संन्यासी कहा जाता है। ये पोशाक से संन्यासी नहीं होता। जो अपना कर्मफल वो भगवान को दे देता है, वो त्यागी, संन्यासी, वही योगी है। हाँ, वो हो सकता है बहुत भारी businessman, factory owner, बाकी फल अगर भगवान को देता है, तो वो सबसे बड़ा योगी है, सबसे बड़ा ज्ञानी है और सबसे बड़ा कर्मी है। ये विचार क्यों? चीज़ तो भगवान की है। जैसा आप मिस्त्री को, हम लोग मकान बनाते हैं, मिस्त्री को पैसा देते हैं उसको रोजाना, और ईंट, चूना, पत्थर, ये सब हम देते हैं। तो मिस्त्री अच्छी तरह से इनको मकान बना दिया। तो क्या मिस्त्री कहेगा, "क्यों जी, हमने बनाया है, ये मकान हमारा है"? नहीं होता है। क्यों? जो उसको पैसा दिया है, जो उसको सामान दिया है, उसका ही मकान होगा।
तो अगर भगवान कहते हैं कि "भूमिरापोऽनलो वायुः"—ये जो स्थूल वस्तुएँ हैं, भौतिक वस्तु, मिट्टी, अग्नि, जल, वायु, इसी से सब चीज़ हम लोग बनाते हैं। इसी का नाना प्रकार रूपांतर करके हम लोग भोग करते हैं। बाकी चीज़ तो भगवान की है। तो आप चाहे रकम फेर करके जो कुछ बनाइए, उसका मालिक कौन होगा? यदि चीज़ भगवान की है, तो भगवान का होगा ना? ये भी विचार। और जो इसको समझता नहीं, वो कहता है "हमारा है", वो चोर है। "भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्... यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः"। देखिए, व्यावहारिक जगत में हम लोग जो काम करते हैं, उसमें एक पाप जरूर होता है, हम इच्छा करें और ना करें। हाँ, कहते हैं, साधारण रास्ता में हम लोग चलते हैं, तो हमारी इच्छा है नहीं, तब भी हजारों-लाखों चींटियों को हम मार देते हैं हमारे पैर से दबाकर। हाँ, जब पानी लेते हैं, हाँ, वो घड़ा से, तो उसके नीचे बहुत से जानवर रहते हैं, वो घड़ा जैसा नीचे किया, बहुत से जानवर मर जाते हैं। हाँ, हमारे जैन भाई लोग, वो मुँह में ढक्कन देके रखते हैं कि कोई जानवर मर ना जाए। बाकी जानवर... हाँ, आप चाहे इच्छा करें या ना करें, खाने का, सोने का, चलने का, सब समान, हाँ, वो कुछ ना कुछ हम इच्छा करें ना करें, बहुत से जानवर मरते हैं, तो वो भी पाप है। इसलिए गृहस्थ के लिए शास्त्र में बताया पञ्चशूना यज्ञ। पाँच प्रकार की हिंसा जो हो जाती है हमारे कार्यक्रम में, उसके लिए पञ्चशूना यज्ञ करना चाहिए। तो खाली पञ्चशूना यज्ञ नहीं, शास्त्र में और सब यज्ञ का विषय बताया है—"यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः"। अगर यज्ञ के लिए आप काम नहीं करते हैं, तो जो कुछ आप काम कर रहे हैं, उसमें आपको बंधन हो रहा है। तो ये बंधन से छुट्टी लेनी चाहिए।
बंधन का अर्थ क्या है? कि ये शरीर बंधन, शरीर। अभी तो मनुष्य शरीर मिल गया है, ठीक है। और अगर ठीक-ठीक काम नहीं किया, अगर दूसरे जन्म में हमको कुत्ता का जन्म मिल गया, हाँ, और कुछ मिल गया, मिलता ही है, क्योंकि 84 लाख योनि है। ये सब जन्म किधर से होता है? वो हेरफेर करके उल्टा-सीधा सब हम लोगों को होता है। कभी तो हमको ब्रह्मा बनना पड़ता है, कभी कुत्ता बनना पड़ता है, कभी ब्राह्मण बनना पड़ता है, कभी शूद्र बनना पड़ता है, ये चलता है। ये ब्रह्मांड में भ्रमण हो रहा है। हाँ, इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—"ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन् भाग्यवान् जीव"। ये ब्रह्मांड में हम लोग भ्रमण कर रहे हैं, योनियों में और अलग-अलग लोकों में। कभी स्वर्गलोक में जाते हैं, कभी नरकलोक में जाते हैं, कभी पाताललोक में जाते हैं, कभी मनुष्य शरीर मिलता है, कभी देवता का शरीर मिलता है, कभी चींटी का शरीर मिलता है, ये सब चल रहा है। तो इससे बचने के लिए यह मनुष्य जीवन जो है, उस समय उसको काम में ले आना चाहिए। शास्त्र है इसीलिए। यह जो Bhagavad-gita भगवान छोड़ के गए, क्या हम लोगों को समझने के लिए ना? बाकी इसमें टाइम नहीं। कोई कुत्ता-भेड़ी के लिए जैसा काम है—दिन भर परिश्रम करो और दो-चार रोटी खा जाओ और सो जाओ, दो-चार बच्चा पैदा करो और मर जाओ, बस ये काम करना। "आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्"। तो इसलिए वेदादि शास्त्र जो है, यह हमको जगाने के लिए है। जब तुमको मनुष्य जीवन मिला है, इसको अच्छी तरह से इसको व्यवहार करके, ये जो तुम्हारा जन्म-मृत्यु-मरण माला चल रहा है, इससे बचो। असल मनुष्य जीवन का यही कर्म है।
शास्त्र में कहते हैं—"नायं देहो देह-भाजां नृलोके कष्टान् कामान् अर्हते विड्-भुजाम् ये"। देखो जी, ये जो मनुष्य शरीर तुमको मिला है, ये मनुष्य शरीर वो सूअर के जैसे दिन भर केवल परिश्रम करके इन्द्रिय-तर्पण करने के लिए नहीं है। ये सूअर का शब्द व्यवहार क्या है? विशेषकर, हाँ, सूअर देखिए, आप लोग सूअर तो देखे ही होंगे। दिन भर परिश्रम करते हैं, कहाँ गू है देखो खाने के लिए, यही इनका काम। और जहाँ गू खा के थोड़ा शरीर में शक्ति आया, बस इन्द्रिय-तर्पण। हाँ, वो सूअर का बच्चा जो होता है ना, वो चरते-चरते अपनी माँ के ऊपर चढ़ जाता है, इन्द्रिय-तर्पण, कोई ज्ञान नहीं है बिल्कुल। इसलिए किसी को सूअर कहा जाता है, आदमी किसी को गाली देता है तो उसको बोलता है, जिसमें बिल्कुल ज्ञान नहीं है, केवल परिश्रम करना और इन्द्रिय-सिद्धि करना, ये दो काम होता है। तो अगर मनुष्य ऐसा हो जाए, तो दिन भर परिश्रम करे और इन्द्रिय-तर्पण करे, तो फिर मनुष्य जीवन का क्या कर्तव्य रहा? प्रार्थना करो। तो शास्त्र में इसलिए, इसलिए कहते हैं—"नायं देहो देह-भाजां नृलोके कष्टान् कामान् अर्हते"। ये जो शरीर है, हाँ, नृलोके, मनुष्य समाज में, बहुत तकलीफ करके काम का अर्थ होता है जो कि आहार, निद्रा, भय, जो शरीर के लिए जरूरत है। शरीर के लिए खाने की जरूरत है, अगर बिना खाए शरीर हमारा नहीं चले, तो आहार तो चाहिए। और जहाँ आहार हुआ, थोड़ा आराम भी चाहिए, निद्रा। आहार, निद्रा, और हम लोग सब समय भयभीत भी रहते हैं, उसके लिए कुछ bank balance करना, कहीं रुपया-पैसा रखना, कहीं कुछ इंतज़ाम करना, वो भी जरूरत है, हाँ, विशेष करके गृहस्थ के लिए। हम लोगों को, संन्यासी के लिए ये सब की जरूरत नहीं है। कहीं भी चले गए, कोई जगह दिया तो रहा, कोई खाने को दिया तो खाया। देता है भगवान, देता है। भगवान की नौकरी करने से ये सब चीज़ का अभाव नहीं होता।
अभी देखिए, हम जब America में गए थे, उस समय हमारे पास ₹40 था, हाँ, और ये Sumati Morarjee एक ticket दिया था हमको जाने के लिए। इस अवस्था में हम America में गए थे और अभी सारा दुनिया में हम लोगों का हाँ, प्रायः 90 branch हैं और सब मिलके हमारा खर्च है सात से आठ लाख रुपया महीना। ये तो भगवान दे देता है, इसमें कोई मुश्किल नहीं होता। भगवान की सेवा करने से भगवान सब देता है। अभी देखिए, इस pandal में बहुत खर्चा होगा, तो ये सब चलता है। तो भगवान के भरोसे में रहने से कोई मुश्किल नहीं है। "योगक्षेमं वहाम्यहम्", भगवान कहते हैं, जो हमारे भरोसे में रहते हैं, उसको जो कुछ चीज़ की जरूरत है, मैं खुद, हाँ, हम उसको जाकर के दे आता हूँ। "वहाम्यहम्", ये नहीं कि नौकर-चाकर किसी से भेज देता हूँ, वो कहते हैं, "मैं जाकर के देता हूँ।" तो फिर कोई साधारण मनुष्य के पास हम लोग नौकरी करें, वो तो कुछ शंका देता ही है खाने के लिए। अगर भगवान की नौकरी हम लोग करें, क्या भगवान ऐसा बेवकूफ है कि हमको खाने को नहीं देगा? जरूर देगा, हाँ, ये विश्वास होना चाहिए। और देता भी है, भगवान सबको खाने को देता है। "एको बहूनां यो विदधाति कामान्", भगवान एक है और खाने वाले बहुत हैं, अनंत कोटि जीव हैं, सबको भगवान खाने को देता है। तो फिर भगवान का जो नौकर है, भगवान का जो भक्त है, उसको तो क्या अभाव? उसको देता ही है, ये हम लोगों को समझना चाहिए।
तो चीज़ जो है, ये सब भगवान की है। हाँ, ये उपनिषद में, वेद में भी यही कहता है—"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्"। ये दुनिया में जो कुछ चीज़ है, हाँ, खाली इस लोक में नहीं, आकाश में और जितने-जितने लोक हैं, वो सब भगवान की ही संपत्ति है। और संपत्ति से जो चीज़ पैदा होती है, वो हम लोगों के भोग के लिए ही है। भगवान जो ये समुद्र बनाया है, मिट्टी बनाई है, पेड़ बनाया है, ये भगवान वैकुंठ से इधर खाने को नहीं आता है, ये हम लोगों के लिए ही बना है, हाँ, हमारे ही खाने के लिए बना है। बाकी हमको तो थोड़ा सोचना चाहिए कि "भगवान, आप इतने कृपामय हैं जो हम आपको भूल करके इधर मज़ा करने को आए हैं, अपराध कर रहा हूँ। आपको भूल जाएँ तब भी आप खाने को दे रहे हैं।" इतना सोचना क्या मुश्किल है? इसका नाम है कृष्ण भावनामृत (Krishna consciousness)।
और हाँ, थोड़ा समझना चाहिए। ये भगवान कहते हैं—"भूमिraपोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च"—जो चीज़ है, भगवान कहते हैं, "भिन्ना प्रकृतिरष्टधा", ये हमारी प्रकृति है। हम लोग उसको लेकर के व्यवहार करना, तो थोड़ा तो सोचना चाहिए कि भगवान की चीज़ लेकर के मज़ा करना है, व्यवहार करना है, तो भगवान को थोड़ा अर्पण किया जाए, उसमें क्या मुश्किल होता है? इसका नाम है यज्ञ। चीज़ तो भगवान की है। पेड़ से नारियल लीजिए, अच्छी तरह से काटिए और साफ़ काट के भगवान के सामने रख दीजिए कि "भगवान, ये नारियल है, आप थोड़ा पान कीजिए।" हाँ, तो भगवान पीते हैं, ये बात नहीं है, बाकी भगवान पूर्ण वस्तु हैं, इसलिए भगवान वो नारियल को पिया भी और तुम्हारा वैसे के वैसा—"पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते"। तो तुम्हारा नुकसान क्या होता है? चीज़ भगवान ने बना दी नारियल तुम्हारे खाने के लिए, थोड़ा भगवान के सामने रखने से तुम्हारा क्या नुकसान हो जाता है? बाकी ये नहीं करेगा, इसका नाम है... इतना बेवकूफ है, हाँ, इतना पापी है कि ये भी नहीं कर सकता। इसलिए भगवान कहते हैं—"न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः"। जो महापापी है, दुष्कृतिनः, सब समय पाप करता है, और मूढ़ा, बिल्कुल rascal है, हाँ, और नराधमाः, और मनुष्यों में अधम है, "माययापहृतज्ञानाः"। और बड़े-बड़े scientific हैं, बोलने में तो बड़े-बड़े scientists हैं, अब उसको बताया जाए, "बताओ तो नारियल कैसा बनाया है? क्या साइंस से बनाया है, तुम बताओ थोड़ा? हाँ, किधर से पानी दिया है? तुम तो थोड़ा ही पानी उठाने के लिए तुमको pump करना पड़ता है और उसमें pipe होना चाहिए। दिखलाओ कहाँ pipe है, कहाँ pump है, किस तरह से होता है?" हाँ, ये समझने की बात है।
इसलिए जो दुष्कृति है, जो महापापी है, वो समझ नहीं सकता और जो भगवद्-भक्त है, वो समझता है। देखो जी, भगवान की कारीगरी देखो। वो सब समय देखता है जो भगवान का कार्य। एक फूल देखता है, कुछ नहीं, भगवान की कारीगरी देखता है; एक फल देखता है, तो भगवान का कार्य। इसलिए वो कुछ भी हो, फूल, फल जो कुछ उसको मिलता है, वो भगवान को देके फिर उसको लेता है—"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति... तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः"। चीज़ तो भगवान की है, बाकी जो भक्ति से, हाँ, भगवान से कहते हैं, "भगवान, ये चीज़ तो आप ही बनाए हैं, हमको खाने को दिया है, हाँ, तो आप थोड़ा इसको चख लीजिए, फिर हम खाएँगे।" इसमें क्या मुश्किल? इसका नाम है भक्ति, इसके नाम का और कुछ नहीं। गरीब से गरीब है, कहीं भी है, भगवान को दे सकता है—"पत्रं पुष्पं फलं तोयं"। भगवान नहीं कहते हैं, "जाओ, पूरी दो, कचौड़ी दो।" और तुम्हारे पास होए तो दो, भगवान का ही तो सब चीज़ है। अगर नहीं हो, तो तुम क्या एक पत्र, पुष्प को कहीं से नहीं ले आ सकते हो? जरूर ले आ सकते हो। हाँ, बाकी वही बात है, जो दुष्कृतिनः, जो सब समय पाप के कार्य में नियुक्त हैं, और मूढ़ा, rascal जो हैं, और नराधमाः, मनुष्य समाज में जो अत्यंत नीच हैं, और "माययापहृतज्ञानाः", और जिसका ज्ञान माया ने हरण कर लिया है, ये सब व्यक्ति भगवान के चरणों में प्रपत्ति नहीं कर सकते। ये शास्त्र का सिद्धांत है।
इसलिए भगवान स्वयं, भगवान को समझना साधारण बात नहीं है, परंतु भगवान कृपा करके अपने विषय में ये Bhagavad-gita में बता रहे हैं। इसको भी हम लोग सुन नहीं सकते, इसको भी ठीक... ज्यादा कोई बोलेगा तो अनर्थ इधर-उधर अर्थ करके, उसका मतलब है वो भी राक्षस है, वो भगवान को उड़ा देना चाहता है, बस। अब कुछ भगवान को उड़ा देके खुद भगवान हो। सब बड़े-बड़े Bhagavad-gita पढ़ने वाले हैं, हाँ, बाकी उद्देश्य क्या है? वो भगवान को मार डालो, कृष्ण को उड़ा दो, ये सब चल रहा है। तो उसमें Bhagavad-gita पाठ करने से क्या लाभ है? ये जो जैसे-जैसे, जैसे भगवान कहते हैं कि "देखो जी, ये चीज़ सब हमारी है—भूमि, वायु, बुद्धि, मन, हाँ, ये सब चीज़ हमारी है, तो तुम जो भोग कर रहे हो, किसका चीज़ भोग कर रहे हो?" तो भगवान की चीज़ है, तुम क्यों नहीं मानते? इसका नाम है दुष्ट, मूढ़ा, rascal। यहाँ सब चीज़ भगवान की ही है, बाकी हम कहते हैं "हमारा चीज़ है"—"अहं ममेति... जनस्य मोहोऽयम्"। इसका नाम है मोह—मैं और हमारा। तो और जो जीवात्मा है, जो हम लोग हैं, वो भी भगवान के। हम जीव, मैं भी भगवान का और जो चीज़ हमको मिली है, वो भी भगवान की। इसलिए "ईशावास्यमिदं सर्वं"—दुनिया में जो कुछ है, ये सब भगवान का है, मैं भी भगवान का हूँ। ये जो समझता है, "मैं भगवान का हूँ", वो मुक्त है, उसका नाम है मुक्ति। उसका स्वरूप ज्ञान हो गया—"मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः"। मुक्ति का अर्थ होता है जो अपने स्वरूप में अवस्थित है, उसका नाम है मुक्ति। हाँ, "हित्वान्यथारूपं", दूसरा रूप छोड़ के। अभी "अन्यथारूपं"—अभी जो भौतिक जगत में हम काम कर रहे हैं, मैं समझता हूँ मैं भारतीय हूँ, कोई समझता है मैं American हूँ, कोई समझता है और कोई देश का, वो इसी में फँसे हुए हैं। "अन्यथारूपं", "अन्यथारूपं" का अर्थ होता है वास्तविक वो चीज़ जो है, उसको भूल गया है और दूसरे से वो अपने को समझता है।
तो इसलिए "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥" ये सब उपाधि जो है, इससे सब जब मुक्त हो जाएँगे हम लोग—"सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्"—भक्ति का हाँ, अर्थ यही है। असल भक्ति जो है, शुद्ध भक्ति, उसका मतलब है जो उपाधि से मुक्त हो। लेकिन देखिए, जो हमारे पास American हैं, Chinese हैं, Japanese हैं, African हैं और सब देश के हैं, बाकी वो उपाधि भूल गए, उपाधि को छोड़ दिया। हाँ, वो नहीं समझते हैं, "American हैं हम, अंग्रेज हैं हम, German हैं हम, African हैं हम, Chinese हैं हम।" नहीं, ये भूल गए—"सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं"। क्यों? "तत्-परत्वेन निर्मलम्", क्योंकि भगवान की सेवा में लगे हुए हैं, भगवान का नाम कीर्तन कर रहे हैं, इसलिए वो निर्मल हो गए। "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं..." और हृषीक का अर्थ होता है इन्द्रिय। उपाधि शून्य हो के जो हमारी इन्द्रिय हैं, शुद्ध इन्द्रिय, वो इन्द्रिय से जो भगवान की सेवा होती है, उसका नाम है भक्ति। ये भक्ति का लक्षण है, हाँ, थोड़ा आँख घुमा के थोड़ा पानी निकाल दिया, भक्ति नहीं। सर्व उपाधि से मुक्त होकर के, हाँ, ठीक-ठीक समझ के, "मैं भगवान का नित्य दास हूँ, इसलिए भगवान की सेवा हमारा कर्तव्य है।" उस प्रकार से जो सेवा करते हैं, उसका नाम है भक्ति।
Thank you. Hare Krishna.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥