श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  710130L4-ALLAHABAD--Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
इलाहाबाद, 30-जनवरी-1971
 
 
 
कृष्णभक्त निष्काम... चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा के प्रयाग क्षेत्र में आज से साढ़े चार सौ वर्ष पहले चैतन्य महाप्रभु जब वृंदावन से लौट रहे थे, बनारस की तरफ, तो पुण्य क्षेत्र में, प्रयाग क्षेत्र में, दशाश्वमेध घाट पर रूप गोस्वामी, जो कि चैतन्य महाप्रभु के प्रधान शिष्य थे, उनको सिखाया था भक्ति क्या चीज़ है। उस संपर्क में और इसके पहले आप लोगों को कुछ सुनाया था। और चैतन्य महाप्रभु विश्लेषण करते हैं कि कृष्णभक्त कौन हो सकता है। तो सब जीव का विचार किया—कितने जीव हैं, कितने तो जीव चल नहीं सकते, कितने जीव चल सकते हैं। जो चलने वाला है, उसके भी अनेक पशु हैं। मनुष्य जाति अत्यंत अल्प है। मनुष्य जाति का विचार... ज़्यादा म्लेच्छ, यवन, सबबद्ध ये सब हैं। उसके विचार में वेद-निष्ठा, वेद को मानने वाले कम हैं। और वेद को जो मानने वाले हैं, वे भी अनेक वेद केवल मुँह-ज़बानी मानते हैं और वेद के अनुसार कुछ कार्य नहीं करते हैं। वेद का निषिद्ध जो पाप का कार्य है, उसको ही ज़्यादा करते हैं। फिर जाकर के जो वेद-निष्ठ हैं, असल वेद मानने वाले हैं, उनके भीतर ज़्यादा कर्म-निष्ठ हैं, कर्मकांडी विचार। और जो कर्मकांड विचार में हैं, उनमें भी करोड़ों कर्मकांड विचार करने वालों में भी एक ज्ञानी होता है। और करोड़ों ज्ञानियों में भी एक व्यक्ति मुक्त होता है। और करोड़ों मुक्तों के भीतर एक कृष्णभक्त शायद मिल जाए। यह चैतन्य महाप्रभु का सिद्धांत है।

और वह जो कृष्णभक्त है, वह निष्काम है, उसकी कुछ कामना नहीं है। कर्मी, ज्ञानी, योगी जितने हैं, उनकी कामना है। कर्मी जो है, वह कर्म करके दुनिया को भोग करने को... इसका नाम है कर्म। बड़े-बड़े सेठ लोग हैं, दिन भर परिश्रम करते हैं, परंतु उनका उद्देश्य है कि अच्छी तरह से इंद्रिय-संभोग करें। मकान अच्छा बनाते हैं, खाने की चीज़ उनको अच्छी चाहिए, Rambler, sedan, car, motor, fridge... बाकी शास्त्र के अनुसार यह जो प्रयत्न है, शरीर को सुख देना, इंद्रिय को सुख देना, इसी का नाम है बद्ध जीव। हाँ, इसी का नाम है माया। हाँ, ऐसा भागवत में कहते हैं:
पुंसां स्त्रिया मिथुनीभावमेतत्तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः। अतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति॥ [SB 5.5.8]
यह जो कर्मी लोगों का काम है। साधारण व्यक्ति जो है, सारा दुनिया में, केवल मनुष्य समाज में नहीं, पशु समाज में, पशु-पक्षी, कीट-पतंग जो हैं, इसमें दो चीज़ है—स्त्री और पुरुष। तो स्त्री की आसक्ति पुरुष में और पुरुष की आसक्ति स्त्री में, यही आसक्ति संसार-बंधन का कारण है। पुंसां स्त्रिया मिथुनीभावम्—वह जो स्त्री-पुरुष का मिथुन भाव है, वही भौतिक जगत में यन्मैथुनादि-गृहमेधि-सुखं हि तुच्छम्। यह शास्त्र में विचार है सब अच्छी तरह से। वास्तविक मूल कारण क्या है? यह जो संसार में सब आदमी इतना कर्म भोग कर रहे हैं, सुख और दुःख के... कोई सुखी है, कोई दुःखी है। सब तकलीफ़ उठा के भी और समझते हैं बड़ा सुख है, और कोई समझते हैं बड़ा दुःख है। परंतु जो समझते हैं दुःख है, उनका विचार ठीक है; और जो समझते हैं सुख है, उनका विचार ठीक नहीं है। सुख तो इधर हो ही नहीं सकता। इसका माने जो समझता है यह सुख है, वह ज़्यादा भ्रम में है, उनके लिए माया बहुत ज़बरदस्त है। पुंसां स्त्रिया मिथुनीभावम्—दुनिया सब चल रही है, मिथुनी भाव, स्त्री-पुरुष का संभोग। और यह जैसा हम लोगों का शादी-विवाह करा दिया जाता है, तो यह वैदिक नियम ठीक है, क्योंकि संभोग की तो इच्छा है, स्त्री की भी है, पुरुष की भी है। उसको धर्मशास्त्र के अनुसार, वैदिक अनुसार अगर विवाह करा दिया जाए, वह वैध हुआ, वह ठीक है। और नहीं तो ऐसा कुत्ता-कुत्ती की तरह घूमते-घूमते स्त्री-पुरुष का जो संभोग है, वह बहुत ही पापमय भोग है। संभोग की इच्छा सबको है, उसको थोड़ा नियमित करना, नियमित करके आगे जाकर के भगवान से संपर्क बनाना। नहीं तो मन चंचल होने से भगवद्-संपर्क नहीं हो सकता। भगवद्-संपर्क तो उसी का हो सकता है जिसका मन चंचल नहीं है।

Yoga प्रक्रिया जो है, मन को किस तरह से स्थिर करनी है, उसकी पद्धति है। Yoga इंद्रिय-संयम... Yoga का अर्थ होता है इंद्रिय का संयम करना, यह असल योग है। और इंद्रिय का संयम करके फिर मन को भगवान की ओर लगाना, तब मन कृष्ण के आसन में... सब साधना का मूल है जो भगवान से संपर्क बना लेना और सब समय मन को भगवान के चरणारविंद में रखना। यह सब साधना-साधन की आख़िरी बात है।
आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्
यदि भगवान की आराधना हो गई, भगवान से संपर्क बन गया और भगवान के चरणों में सब समय मन निविष्ट हो गया, फिर जाकर के और उनको कोई तपस्या करने की ज़रूरत नहीं है, सब तपस्या का फल उनको मिल गया। आराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्—जब भगवान मिल गए, भगवान तो मिल गए, भगवद्-भाव जाग्रत हो गया। ऐसी नहीं कि भगवान आकर सामने-सामने बात करें, यह फ़िज़ूल है, क्योंकि इस अवस्था में भगवान को मैं दर्शन नहीं कर सकता। बाकी भगवान हैं, अनुभव होगा, वही भाव बढ़ा, भाव समझिए। इस भाव जिसका हो गया, फिर भाव के पश्चात् प्रेम। तो शास्त्र कहते हैं, यदि भगवान की आराधना हो गई और भगवान से आपका प्रेम-संपर्क बन गया, फिर आपको और कोई तपस्या की ज़रूरत नहीं, आपको सब तपस्या का फल मिल गया।
नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम्
और यदि सब तपस्या करके आगे जाकर के असल में भगवान से ही संपर्क नहीं बना, इधर-उधर की बातें सब करते रहे—'मैं भगवान हूँ, तुम भगवान हो, भगवान नहीं है, भगवान मर गया'—बहुत-से कहते हैं, इस प्रकार अगर सिद्धांत हो गया, तो क्या तपस्या का फल हुआ? वह तपस्या सब बेकार है, क्योंकि भगवान से संपर्क नहीं मिला।
अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्
यदि अंतर में और बाहर में सब जगह भगवान का ही दर्शन होता है, जो वास्तविक भगवान से प्रेम हो गया। प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन—जिसकी आँख में प्रेम रूपी अंजन लगा दिया गया है, वह सब जगह भगवान को ही दर्शन करता है, बाहर-भीतर। प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति। भगवान कौन हैं? यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं—वह भगवान श्यामसुंदर, मुरलीधर, श्याम, कृष्ण, श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि। इसी प्रकार अंतर... जिसको अंतर में, बाहर में, जो भगवद्-भक्त होता है, वह सब चीज़ केवल भगवान के ही संपर्क में देखता है और उसी वक्त उनको भगवान का स्मरण हो जाता है। और यही चीज़ चाहिए, सब समय भगवान के स्मरण में रहो।

तो जीवन को ऐसा बनाना चाहिए कि दुनिया में घूमते-फिरते रहो और कोई भी चीज़ देखो, वह भगवान के संपर्क से देखो और उसी वक्त भगवान का स्मरण हो गया, तुम्हारा जीवन ऐसा जीवन बना। जैसा एक फूल है, एक बगीचे में बहुत सुंदर फूल है। कर्मी, भोगी वह देखता है कि 'बड़ा सुंदर फूल है, इसको ले आओ, अपने coat में लगा लो और उसका सुगंध भोग करो।' यह कर्मी का दर्शन है। और ज्ञानी का दर्शन है, 'देखो जी, यह फूल है, किस तरह से फूल खिला हुआ है, इसका कारण क्या है, किधर से इसको पानी मिलता है, किस तरह से लाल हो गया, किस तरह से और रंग हो गया, कैसे इसको सजाया गया?' उसके खोज में scientist, वे लोग अनुसंधान करते हैं, 'यह फूल कैसे...' यह ज्ञानी का दर्शन है। और जो भगवद्-भक्त है, वह क्या देखता है? वह देखता है, 'कितना सुंदर फूल है, कितना सुगंधित है, चलो इसको ले जाकर भगवान के चरणों में दे दें।' यह भक्त का दर्शन है। एक ही फूल है, कर्मी एक दर्शन करते हैं, ज्ञानी और एक दर्शन करते हैं, और जो भक्त है, वह और एक दर्शन करता है। और असल में जो भक्त का दर्शन है, वही समुचित है, क्योंकि वह जानते हैं कि भगवान की कारीगरी कैसी है। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च—भगवान की इतनी शक्तियाँ हैं कि चीज़ मालूम होती है जैसे अपने आप सब हो गया। जैसे समझ लीजिए, एक बड़ा आदमी है, उसके पास कोई आया, कुछ रुपया चाहिए, और थोड़ा-सा कागज़ में ऐसे लिख दिया और उसको रुपया मिल गया, ₹100। नौकर अगर सोचता है कि 'इस कागज़ में क्या ऐसा कर दिया कि उसको रुपया मिल गया?' इसी प्रकार जो ज्ञानी हैं, वे जानते हैं कि भगवान की ऐसी शक्ति है जो केवल थोड़ा इच्छा करने से ही काम सब हो जाता है और ज़्यादा उनको परिश्रम करना नहीं पड़ता। परास्य शक्तिः... तो यह जो दुनिया का सब प्रकृति, सब काम चल रहा है, प्रकृति जो... तो बड़े-बड़े ज्ञानी लोग जो scientist हैं, वे देखते हैं कि nature, हाँ, nature से, प्रकृति से यह सब काम हो रहा है। परंतु श्रीमद् भगवद्गीता से हमको मालूम होता है कि यह जो nature है, यह nature स्वाधीन नहीं है, इसके पीछे एक व्यक्ति है। और भगवान भी कहते हैं:
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् [BG 9.10]
अध्यक्षता से बत्ती जल गई। यहाँ से कोई व्यक्ति switch टिप दिया, बत्ती जल गई। और जो मूर्ख है, वह देखता है बत्ती अपने-आप जल गई। हाथ से कुछ काम नहीं हो सकता है, जड़ की इतनी शक्ति है नहीं कि ग्राहक सा काम करे, जड़ वस्तु। इसीलिए जड़ को श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं अपरा प्रकृति, निकृष्ट। और जीवात्मा को कहते हैं परा प्रकृति। जैसे यह दुनिया जो है, इलाहाबाद शहर जो है, इसमें अगर कोई जीव नहीं रहता, तो जो कुछ कार्यक्रम चलता है, यह सब ऐसे मिट्टी की मिट्टी है। इसलिए जो द्रव्य शक्ति है, जड़ शक्ति, वह निकृष्ट है। भगवान कहते हैं:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्... [BG 7.4-5]
तो इसी प्रकार यह जो सारा विश्व-ब्रह्मांड रचना है और यह टूट भी जाता है, फिर बनता है, इसके पीछे भगवान की प्रेरणा है। भगवान खुद कहते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में, मयाध्यक्षेण। इसलिए जो भगवद्-भक्त होते हैं, उनको सब ज्ञान हो जाता है। वे पढ़े-लिखे नहीं होते हुए भी, क्योंकि वह ज्ञान भगवान खुद उनको बताते हैं। भगवान से ज़्यादा ज्ञान देने वाला कौन होगा? आपको ज्ञान लेना चाहिए किसी से, अगर आप अज्ञानी हैं, कोई माता के पास जाना चाहिए, कोई गुरु के पास जाना चाहिए, तो आपको दूसरे से ज्ञान लेना पड़ेगा। बाकी भगवान जो हैं, वे स्वतः ज्ञान, सदा अभिज्ञ हैं। भगवान को किसी से ज्ञान लेने की ज़रूरत नहीं, इसका नाम है भगवान। ऐसी बात नहीं है कि हम ज्ञानी होकर, योगी होकर भगवान बन जाएँ। भगवान ऐसे नहीं हो जाते हैं। जिसको ज्ञान लाभ करना है, योग से सिद्धि लाभ करनी है, वह भगवान नहीं है। वह कुछ भगवान की शक्ति को लाभ कर सकता है, इतनी ही बात है, वह भी बहुत... जो भगवान हैं, वे स्वतः सिद्ध योगी हैं, स्वतः सिद्ध।

तो इस प्रकार जिसका भगवान से संपर्क हुआ है, वे जानते हैं, अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्। सब वे जानते हैं कि बाहर में किस तरह से काम हो रहा है और भीतर में भी किस तरह से काम हो रहा है। यह जो जानते हैं, सब जगह में भगवान का संपर्क दिखता है। जैसे बताया—ज्ञानी का दर्शन, कर्मी का दर्शन। कर्मी का दर्शन है, फूल अपने भोग के लिए संग्रह करते हैं; और ज्ञानी वह समझने में चाहते हैं कि किस तरह से फूल बनी हुई है; और भक्त जो हैं, वे जानते हैं कि जो कुछ हो रहा है, सब भगवान की शक्ति द्वारा। हमको मालूम होता है अपने-आप फूल खिल गया, बाकी नहीं, भगवान की electric energy ऐसी है जो मालूम होता है... जैसा वह उदाहरण दिया कि बत्ती अपने-आप जल गई, बात यह है कि अपने-आप नहीं जलती, उसके भीतर कोई switch दबाने वाला है। इसी प्रकार जो कुछ दुनिया में संभव हो रहा है, वह सब भगवान की परा शक्ति से।
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते [गला साफ़ करने की आवाज़]
यह उपनिषद की वाणी है। जहाँ जो परम ब्रह्म भगवान हैं, परमेश्वर, उनको हाथ से कोई कार्य नहीं करना पड़ता। जैसे बड़े भारी आदमी हैं, लाखों रुपया का काम हो रहा है, factory चल रही है, ऐसी बात नहीं है कि वे जाकर के उधर जाकर खड़े होकर अपने हाथ से काम करें। यह तो बहुत सरल है। तो इस प्रकार यदि साधारण कोई दुनिया का एक बड़ा आदमी है, उसको जब हाथ से कुछ नहीं करना पड़ता, तो भगवान आकर क्यों परिश्रम करेंगे? इसलिए अनेक शक्तियाँ, परा शक्ति, इसलिए स्वाभाविक भाव से काम होता है। ताकि जो मूर्ख हैं, वे समझ नहीं पाते, वे देखते हैं अपने-आप सब हो रहा है। अपने-आप से कोई चीज़ काम होने वाला नहीं है। आप कोई experiment कीजिए, कोई चीज़ अपने-आप नहीं होती, किसी के निर्देश से होती है, किसी के हाथ से होती है, किसी के brain से होती है। हाँ, सभी चीज़ है। यह जो जानते हैं, और इसलिए वे जानते हैं दुनिया में जो कुछ चीज़ है, वह भगवान की है। जो द्रव्य है, और हम देख रहे हैं दुनिया में, आप लोग सब देख रहे हैं, यह प्रकृति का मालूम होता है कि प्रकृति से है, scientist... नहीं, यह सब भगवान की चीज़ है, भगवान की बनाई हुई है, और भगवान के निर्देश से प्रकृति काम कर रही है। जैसे ब्रह्म-संहिता में बताते हैं:
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साधन-शक्त्तिरेका छायाव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा [Bs 5.44]
सृष्टि, स्थिति, प्रलय साधन करने के लिए भगवान की एक बड़ी भारी शक्ति है, वह शक्ति क्या है? छायाव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा—वह दुर्गा शक्ति। और यह भौतिक जगत में जो कुछ काम हो रहा है, यह दुर्गा शक्ति द्वारा। दुर्गा का अर्थ होता है यह जो दुर्ग है, जेलखाना, उसके जो मालिक हैं, उनका नाम है दुर्गा देवी। इसलिए देवी धाम, यह भौतिक जगत का नाम है देवी धाम, और चिद्-जगत का नाम है वैकुंठ। वैकुंठ का अर्थ होता है भगवान, और देवी दुर्गा... यह तो भौतिक जगत है, यह देवी दुर्गा देवी के अधीन है, सृष्टि, स्थिति, प्रलय। इसलिए जो लोग भौतिक सुख चाहते हैं, वे देवी की उपासना करते हैं, यह सब... परंतु यह कर्मी की बात है। ज्ञानी जो है, वह देख लेता है कि बहुत कुछ देवी से ले लिया, बाकी सुख नहीं मिला। असल में देवी वह त्रिशूल ही हमारे छाती में रख देती हैं। आप लोग तस्वीर देखे हैं, जो असुर है, वह भी देवी के त्रिशूल से आहत है, बाकी उसका शासन, उसके लिए शासन है। इस प्रकार हाँ, हम लोग दुर्गा देवी को माँ कहते हैं, क्योंकि भौतिक जगत में जो हमारा शरीर है, वह माँ से जैसे शरीर मिलता है, वैसे देवी से हमको शरीर दिया गया। परंतु जो देवी यानी सात अवस्था से और आगे जाते हैं, वह आख़िरी अवस्था जो है, उस अवस्था का नाम वैष्णव है। यह सब विचार है।

तो इसलिए चैतन्य महाप्रभु अनेक विचार करके यह स्थापन किया कि:
कोटि-मुक्त-मध्ये दुर्लभ कृष्ण-भक्त
अनेक करोड़ों जो मुक्त हो गए, मुक्त... और मुक्त माने दो प्रकार के होते हैं। एक तो झूठ-मूठ अपने को समझते हैं कि 'मैं मुक्त हूँ' [गला साफ़ करने की आवाज़] और एक वास्तविक मुक्त। तो जो वास्तविक मुक्त हैं, उनके भीतर अगर एक कृष्णभक्त आपको मिल जाए, इस प्रकार इसलिए बताया है दुर्लभ। दुर्लभ का अर्थ होता है बहुत मुश्किल से मिलता है। सुलभ का अर्थ है बहुत सरलता से मिल जाता है, बहुत आसानी से मिल जाता है, उसका नाम सुलभ। ताकि इधर बताया जो दुर्लभ:
कोटि-मुक्त-मध्ये दुर्लभ कृष्ण-भक्त
और शास्त्र का प्रमाण भी दे रहे हैं श्रीमद्भागवतम् से:
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण-परायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ [SB 6.14.5]
अनेक मुक्तानां सिद्धानां—जो मुक्त हैं, इस प्रकार अनेक मुक्त-सिद्धों में एक व्यक्ति नारायण-परायण होता है। और वह कैसा है? सुदुर्लभः—बहुत मुश्किल से मिलता है। और उसका परिचय क्या है? प्रशान्तात्मा—प्रशांत आत्मा, विचलित नहीं होता। जब तक नारायण-परायण नहीं होगा, तब तक विचलित रहेगा। प्रशांत... यह भक्तियोग का यही लाभ है।
ययात्मा सुप्रसीदति [SB 1.2.6]
भागवत में यह सब...
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
तो कहने का मतलब, आप धर्म-याजन कीजिए, हाँ, परंतु उसका test है। यदि वह धर्म-याजन करके... आप हिंदू होइए, मुसलमान होइए, क्रिश्चियन होइए, यह कोई बात नहीं है। जिसको जैसा आपको अच्छा लगे, उस धर्म को ग्रहण कीजिए, धर्म को याजन कीजिए, परंतु आप जो धर्म में हैं, उसमें सफल हुए, उसका जो test है, वह भगवद्-भक्ति है। और किस प्रकार भगवद्-भक्ति? अहैतुकी, अप्रतिहता—कोई कारण नहीं, हाँ, कारण नहीं है और प्रतिबंध भी नहीं है। ऐसी बात नहीं है कि 'मैं गरीब हूँ, मैं कैसे भगवद्-भक्ति करूँगा?' कि 'मैं मूर्ख हूँ' और 'मैं म्लेच्छ हूँ' मैं और कुछ हूँ, बहुत कुछ आदमी का... भौतिक कारणों द्वारा भगवद्-भक्ति रुक नहीं सकती। घर में बंद कर दो या tight कर दो, तब भी मन से कर सकते हैं। तो इसलिए आत्मा है, और एक नाम है सर्वग, सब जगह जा सकती है, सर्वग। और भौतिक उचित कारण होने का तो कोई चीज़... भौतिक चीज़ उसको रोक नहीं सकती, उसके कार्य को, केवल चित्-कार्य में विविक्त होना चाहिए। फिर भगवान के पास पहुँचना कोई मुश्किल नहीं है। जैसे भगवान कहते हैं:
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन [BG 4.9]
जैसे ही शरीर त्याग कर दिया, उसी वक्त भगवान के पास, उसी वक्त, not even a second। जैसे समझ लीजिए, जैसे जड़ शक्ति आपका शरीर है, आप यहाँ से मुंबई जाने को चाहते हैं, तो बहुत देर लगेगा, चाहे aeroplane में जाइए, चाहे rail में जाइए। बाकी वहाँ पर जो मन है, वह चाहे मुंबई जाने को चाहते हैं, एक second में पहुँच जाता है। देखिए, यह जड़ शक्ति जो है, इससे मन बहुत सूक्ष्म है, और मन से भी और सूक्ष्म है आत्मा। उसकी कितनी शक्ति है, आप समझिए। हम लोग जानते ही नहीं। यह जो भगवान का अंश जो जीव है, उसकी कितनी शक्ति हो सकती है। वह जो शक्ति है, वह भगवान से संपर्क होने से उस शक्ति का अनुभव होता है। उसको पहले... अभी जो हमारा stage है, यह आत्म-बुद्धि, जड़-बुद्धि...
यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके [SB 10.84.13]
यह शरीर से आत्म-बुद्धि है, इसलिए शास्त्र उसको गधा कहते हैं, गो-खर, सब शास्त्र में विचार है। कहते हैं:
यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः। यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः॥
यह जो थैली है, काहे की थैली है? तीन धातुओं की—कफ, पित्त, वायु। तो वाणी से थैली बनी, धातु की। धातु की जो थैली है, इसमें जिसकी आत्म-बुद्धि है, स्वधीः कलत्रादिषु... और यह शरीर से जिसका संपर्क है—हमारे शरीर से स्त्री से संपर्क है, और स्त्री से बच्चे पैदा हुए, उससे संपर्क है, या हमारे शरीर से पिताजी से संपर्क है, और पिताजी के शरीर से हमारा भाई-बहन सब, उससे संपर्क है—यह सब जो समझते हैं कि यही हमारे आत्मीय हैं, ये हमको सब रक्षा करेंगे, वह भी शास्त्र में कहता है, स एव गोखरः—यह सब गो-गधा हैं। जब मरने का समय होगा, यह शरीर के संपर्क में से जो कुछ है, यह कुछ हमको काम नहीं देगा। हमारा देश काम नहीं देगा, हमारा bank balance है, वह भी काम नहीं देगा, हमारी स्त्री भी नहीं, हमारा पुत्र भी नहीं, हमारा स्वजन भी नहीं, हमारा बंधु भी नहीं, हमारे देश का आदमी कोई नहीं। हाँ, ऐसा जब आकाश में पक्षी उड़ता है, वह सब एक साथ में उड़ता है, बाकी अपनी शक्ति से उड़ना चाहिए। अगर विपद हो, तो कोई जो साथ-साथ में उड़ने वाला है, कोई सहायता नहीं कर सकता। इसलिए इसका नाम है आत्म-लब्धि। वह एकमात्र भगवान ही सहायता कर सकते हैं। इसलिए शास्त्र... भगवान खुद कहते हैं, 'सुहृदं सर्वभूतानाम्'—मैं सबका सुहृद हूँ। यह जो समझता है पहले से कि भाई, हमारा यह देहात्म-बुद्धि... 'आत्म-सैन्येषु असत्स्वपि'—हम समझते हैं दुनिया में लड़ाई कर रहे हैं और यह हमारा सब सैन्य है—हमारा देश का आदमी, हमारा जात, हमारी community और हमारा यह, वह बहुत कुछ हम लोग... 'यह हमारा सब सिपाही है, यह हमको रक्षा करेगा।' हाँ, तो वह भी कोई रक्षा नहीं कर सकता। निधनं पश्यन्नपि न पश्यति—सब समय मैं देख रहा हूँ कि हमारा पिताजी रक्षा करने वाला था, वह कहाँ चला गया? फिर अभी पिताजी हैं नहीं, कौन रक्षा करेगा? वास्तविक भगवान ही रक्षा करने वाले हैं, कोई रक्षा करने वाला नहीं। यह सब शास्त्र का विचार है। जो समझते हैं कि पिता-माता बालक को रक्षा करते हैं, यह भूल है। पिता-माता रहते हुए भी बहुत बालक दुःखी हैं, क्योंकि उसमें भगवान की कोई इच्छा ऐसी है। और कोई मरने वाला है, कोई मरीज़ है, रोग से भोग रहा है, और उसके पिताजी बहुत... कि उसका आदमी बहुत बड़ा आदमी है, बड़े-बड़े doctor ला रहे हैं, बड़ी-बड़ी अच्छी दवाई भी दे रहे हैं, फिर भी मर जाता है। क्यों? यह शास्त्र का विचार है। नाव में जाने के लिए बड़े-बड़े जहाज़ बनाए और क्यों डूब जाते हैं? तो इस प्रकार दुनिया में जो कुछ प्रतिविधि है, दुःखालय है, तो दुनिया केवल दुःख का आलय है। बाकी हम लोग कुछ प्रतिविधि उसकी बनाएँ कि इस तरह से हम लोग दुःख से बच जाएँ, हाँ, तो वह सब प्रतिविधि जो है, तब तक काम कर सकती है जब तक भगवान की अनुमति है, नहीं तो नहीं। पिता-माता जो हैं, यदि भगवान चाहते हैं कि यह जो बालक है, इसको पिता-माता द्वारा रक्षित हो, तभी हो सकता है, नहीं तो पिता-माता रहते हुए भी बड़ा दुःखी रहेगा। यह विचार है।

तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, विचार जो करने वाला जो भक्त है, नारायण-परायण, केवल जानते हैं नारायण इसका मूल हैं। वासुदेवः सर्वमिति—वासुदेव ही सब कुछ हैं, स महात्मा सुदुर्लभः। यह श्रीमद् भगवद्गीता में भाव है। केवल वासुदेव को ही सब समझ लिया, यही मूल कारण है सब कुछ काम के भीतर, यह वासुदेव की इच्छा है, पूर्ण है, नहीं तो... और वह नारायण... इस प्रकार वासुदेव-परायण, नारायण की बात है। यह शास्त्र में, भागवत में कहते हैं:
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण-परायणः। सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥
यह अनेक करोड़ के भीतर इस प्रकार नारायण-परायण होते हैं। और नारायण-परायण होने से उसका... ययात्मा सुप्रसीदति—जब नारायण-परायण हो जाए, शुद्ध भक्त नारायण को, केवल नारायण का है और चरण में... इसलिए भगवान कहते हैं, सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। क्यों? वह भगवान... भगवान, आप शरणागति करने से भगवान का कुछ उपकार हो जाएगा, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि भगवान चाहते हैं आपका मंगल हो। तो मंगल का रास्ता बताते हैं, इस प्रकार से तुम्हारा मंगल होगा और किसी तरह से हो नहीं सकता। बाकी हम लोग सुनेंगे तो भगवान... क्या भगवान से प्रार्थना करते हैं, 'भगवान, मैं दुःखी हूँ, भगवान, हमारे पास अर्थ नहीं है, भगवान, हमारे पास ज्ञान नहीं है।' तो यह भगवान से प्रार्थना... भगवान जब खुद कहते हैं तो 'सब तुमको हम दे देंगे, पहली बात है तुम हमारे शरणागत हो जाओ।' वह बात हम नहीं करेंगे, बस आपको [गला साफ़ करने की आवाज़] सब बात सुन लेंगे, बाकी आप जो दवाई बताएंगे, उसका आप... नहीं तो doctor बेचारी क्या करे? तो इसी... इसी प्रकार सब शास्त्र में यही निर्देश है कि भगवान के चरणों में शरणागत हो जाओ, तुम्हारा सब दुःख मिट जाएगा। भगवान खुद भी कहते हैं। और हम लोगों का जो कृष्णभक्ति यह प्रचार, यह संघ है, यही आदमी को समझाते हैं और कुछ हम लोगों का काम नहीं है। हम लोग इसको अपने भी समझने के लिए प्रसिद्ध करता हूँ और दूसरे को यही बात होती है। भगवान कहते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
सब छोड़ के हमारे चरणों में शरणागत हो जाओ, मैं तुमको सब पाप के फल से मैं रक्षा करूँगा। मतलब भगवान जब रक्षा करने के लिए प्रतिज्ञा कर रहे हैं, फिर हमारे डर की क्या बात है? यह बात नहीं है कि भगवान के चरणों में शरणागति भी करें और पाप भी करते रहें, नहीं, ऐसी बात नहीं। अगर भगवान के चरणों में मैं पूर्णतया शरणागत हो गया, अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया, तो ज़रूर हमारा पाप उसी वक्त सब नष्ट हो जाएगा। और फिर हमको चाहिए और पाप नहीं करना, फिर भगवान हमको रक्षा करेंगे, कोई हमारा दुःख नहीं है, सब सुखी-सुख है। Thank you very much. हाँ।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥