हरे कृष्णा। चैतन्य महाप्रभु और जीव प्रजा—कितना अलग-अलग जीव का प्रजा है। जीव एक ही है, परंतु अलग-अलग शरीर धारण करने के लिए उनका नाम सब अलग-अलग है। तो सब विभाजन करते-करते मनुष्य वो बहुत हो रही है। आप लोग जानते ही होंगे कि आप घर में अकेले होंगे और और जितना जीव है, वो आपसे बहुत ज्यादा है। उसका वोट ज्यादा है। हाँ, बहुत चींटी है, बहुत से मक्खियां हैं, बहुत से मच्छर हैं, खटमल हैं, छिपकली हैं। अनेक जीव हैं जो आपके घर में हैं। उनका अधिकार भी है, वो भी एक जीव हैं भगवान का।
इसलिए हमारा जो Spiritual Communism है, वो बहुत सुंदर भागवत में नारद जी बताते हैं युधिष्ठिर महाराज को। गृहस्थ का कर्तव्य कहते हैं कि जो आपके घर में एक चूहा है, एक खटमल है, एक छिपकली है, समझिए एक सांप भी है, उसको भी खाने को चीज मिलना चाहिए, वो भी भूखा नहीं रहेगा। हाँ, इसका नाम है कृष्ण भावना। और ये बेचारी छिपकली होकर हमारे कमरे में है, ये भी भूखी नहीं रहे, इसको कुछ खाने को तो देना। इसको भगाना नहीं है, इसको बाँटना है, सब भगवान के जीव हैं। जैसा आप लोग सोचते हैं कि गरीब को अन्न देना चाहिए, दुखी को सुख देना चाहिए—आपका welfare activity—तो ये भी तो भगवान का जीव है, उसको भी तो खाने को देना चाहिए, वो भी भूखा नहीं रहे, उसको खाने को मिले। वह आपको अपकार नहीं करेंगे, उनको जब खाने को नहीं मिलता है, तभी वे उपद्रव करते हैं।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं आपको कह सकता हूँ। हमारे पिताजी के बड़े भाई, उनके कपड़े का दुकान था। और वो रात में दुकान बंद करने के समय थोड़ा सा चावल, करीब सेर भर चावल (उस समय चावल का कुछ दाम ही नहीं था, तीन-दो रुपये मन बिकता था चावल), तो एक पात्र में सेर भर चावल वो दुकान के बीच में रख देते थे। जितने चूहे थे, वो रात में चावल खा लेते थे, कपड़े तो नहीं काटते थे। ये प्रत्यक्ष है, सब जीव का अधिकार है सबमें।
[भगवान की संपत्ति और मत्सराता]
भागवत में कहते हैं कि जो कुछ संपत्ति है दुनिया में, उसमें सबका अधिकार है, सब जीव का। जैसे पिताजी की संपत्ति में सब पुत्रों का अधिकार होता है, इसी प्रकार भगवान की सब चीजें हैं; आपकी नहीं हैं, हमारी नहीं हैं। ये मिट्टी जो है, आपकी थोड़ी है? हम लोग जबरदस्ती कहते हैं कि ये हमारी मिट्टी है। वैसे ही शासन है भगवान का। कितने आदमी आए, मर गए; कितने मुसलमान भी आए, राज किया; अंग्रेज भी आए। तो मिट्टी जहाँ की तहाँ रही। वो न तो मुसलमान की हुई, न अंग्रेज की, न आपकी, न किसी की; वो तो भगवान की है। हाँ, इसका नाम है कृष्ण भावना।
जब आदमी समझ जाएँगे कि जो कुछ दुनिया में संपत्ति है, उसके मालिक भगवान हैं, मैं नहीं; हमको भगवान केवल रहने की सुविधा दे रहे हैं, उतना ही ठीक है। हम दूसरे की संपत्ति पर और उसके उपहार पर अपना जोर नहीं लगाएँगे, उसका नाम है कृष्ण भावना। सब भगवान का है, हमको जितना भगवान ने दिया है, उतने में हम संतुष्ट रहेंगे। और बाकी जो समय है, भगवान से हमारा जो संपर्क है, उस विषय में चर्चा करेंगे।
द्वेष और मत्सराता—जिसके पास मत्सराता नहीं है, द्वेष नहीं है, वो यह नहीं सोचता कि 'वो क्यों तरक्की कर रहा है, उसकी संपत्ति हम हाथ में ले लेंगे।' ये जो मत्सराता है, यही भौतिक जीवन है। और जिसके पास मत्सराता नहीं है, जो जानते हैं कि भगवान की सब चीजें हैं, भगवान ने जिसको जो दिया है वो अपना भोग करे और मुझको भी जो कुछ दिया है उससे हमें संतोष है, उसका नाम है 'परमहंस'। वो किसी के उत्कर्ष में दुखी नहीं होते। भगवान ने जो दिया है ठीक है, हमको भी जो दिया है ठीक है—तो ये मनुष्य जाति का धर्म है।
[वैदिक सभ्यता और विस्मृत संबंध]
वेद में यही कहते हैं, जैसे Isavasya (ईशावास्य उपनिषद्)—सब भगवान की संपत्ति है, इसलिए भगवान की संपत्ति में सब जीव का बचने का, खाने का अधिकार है। बाकी हम लोग जो अपने को civilized कहते हैं, हम लोग कहते हैं 'दरिद्र नारायण की सेवा करो' और असली नारायण (पशुओं) को भेज दो slaughterhouse में और काट के खा जाओ! ये कृष्ण भावना नहीं है। कृष्ण भावना का अर्थ है 'सर्वभूतानां सुहृदं'—सबके मित्र हैं, सबको सुखी देखना चाहते हैं। यह है असली Spiritual Communism—सबको खाने को मिले, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः'। उसी का विषय हम लोग प्रचार करने के लिए प्रयत्न करते हैं कि सब सुखी रहें और सुखी होकर भगवत ज्ञान लाभ करें, जो कि मनुष्य जीवन की आवश्यकता है।
मनुष्य जीवन का एकमात्र कर्तव्य यही है कि भगवान से हमारा जो संपर्क है, जिसे हम भूल गए हैं (जो टूटा नहीं है और टूट नहीं सकता), उसे पुनः जाग्रत करें। जैसे एक पागल पुत्र अपने पिताजी के घर को छोड़ के रास्ता-रास्ता में घूमता फिरता है, तो पिताजी से उनका जो संपर्क है, वो पागलपन के कारण भूल गया है, परंतु पिता और पुत्र का संबंध टूट नहीं सकता। इसी प्रकार हमारे जो परम पिता हैं, वो भगवान हैं और हम लोग पागल होकर उनको भूल गए हैं। और पिता साधारण नहीं हैं—सर्वशक्तिमान हैं, उनका राज्य बहुत विशाल है, उनके पास पैसा भी बहुत है, शक्ति भी बहुत है। बस उनको छोड़ के हम लोग पागल होकर स्वतंत्र होने की चेष्टा कर रहे हैं, इसीलिए हम लोग को दुख है, माया जाल में हम लोग गिर गए हैं। "कृष्णा भुलिया जीव भोग वांछा करे, निकटस्थ माया तारे झापटिया धरे"—यह हमारा पोजीशन है।
इसलिए वो जो भगवान से हमारा संपर्क है, उसको जगाना चाहिए। ये मनुष्य जीवन का काम है। "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"—यह वैदिक आदेश है कि सो के नहीं रहो, अब जागो। कुत्ता के जीवन में, सूअर के जीवन में, अन्य योनियों में—कितना, 84 लाख योनियों में (जैसा कल आपको सुनाया था) घूमते-घूमते, फिरते-फिरते यह मनुष्य जीवन मिलता है। लोग जानते ही नहीं कि किस तरह से मनुष्य जीवन का विकास होता है। आजकल कॉलेज, स्कूल, यूनिवर्सिटी में यह पढ़ाया भी नहीं जाता और वे जानते भी नहीं। बाकी ये प्राकृतिक नियम है, घूमते-घूमते, अनेक जन्मों के पश्चात् यह जो मनुष्य जीवन है, यह मिला है। इसलिए इसको पशुओं की तरह बिता देना उचित नहीं है।
[भगवान बुद्ध का प्राकट्य और वेदों की व्याख्या]
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि जो सभ्य मनुष्य हैं, जो वेदों को मानने वाले आर्य जाति हैं, उनमें भी वास्तविक रूप से वेदों का पालन करने वाले बहुत कम हैं। क्योंकि बहुत से लोग जो वेदों को मानने वाले हैं, वे केवल 'वेद-मुख-मान' हैं (मुँह से मानने वाले)। जैसे हम लोग हिंदू हैं, भारतीय हैं, हम लोग कहते हैं कि हम वैदिक हैं, वेद मानने वाले हैं, बाकी वेदों के अनुसार काम करने वाले नहीं हैं। उनको भगवत गीता में कहा गया है—'वेद-वाद-रताः'। उनको कुछ समझ में नहीं आता कि वेद क्या है, खाली जुबान से कहते हैं कि हम वेद को मानते हैं।
इस प्रकार की स्थिति होने के कारण ही भगवान ने बुद्ध रूप धारण करके लोगों को समझाया। क्योंकि वेद में ऐसा निर्देश है कि विशेष परिस्थितियों में पशु-यज्ञ की विधि है, परंतु उसका मतलब यह नहीं है कि slaughterhouse खोलकर पशुओं का हनन करके उनको खाया जाए। यज्ञ में जो पशु हनन किया जाता था, वो वेद मंत्रों की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए होता था, जिससे उस पशु को पुनः नया जीवन (युवा शरीर) दे दिया जाता था। गोमेध यज्ञ का शास्त्र में यही मतलब है—एक बूढ़े बैल या गाय को यज्ञ में आहुति देकर वेद मंत्रों के तेज से उसे नया जीवन देकर निकाला जाता था। यह दिखाने के लिए कि वेद मंत्रों में कितना तेज है। यह पशु को मारकर खाने के लिए नहीं था।
परंतु ये जो वेद मानने वाले थे, एक समय में वे केवल वेद की दुहाई देकर पशु हनन करके खाने लगे, जैसा आजकल भी बहुत से लोग करते हैं। देवी जी या काली जी की मूर्ति रख दी और पशु काटकर बेचते हैं कि 'यह काली जी का प्रसाद है'। ऐसी बात नहीं है। जब ऐसी विकृत स्थिति हो गई थी, तब भगवान बुद्ध ने अवतार लिया—"सदय-हृदय-दर्शित-पशुघातम्"। पशुओं का घात देखकर भगवान का हृदय दया से भर गया, इसलिए बुद्ध रूप में अवतार लेकर उन्होंने 'अहिंसा परमो धर्मः' का प्रचार किया।
बुद्ध देव भगवान के अवतार होते हुए भी हम उन्हें (उनके दर्शन को) 'नास्तिक' कहते हैं। नास्तिक क्यों कहते हैं? क्योंकि उन्होंने वेदों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया। यदि वे वेदों को स्वीकार करते, तो मूर्ख लोग वेदों का हवाला देकर पशु-हिंसा जारी रखते। इसलिए बुद्ध देव ने कह दिया कि 'हम तुम्हारे वेदों को नहीं मानते।' "निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्"—श्रुति-जात का अर्थ होता है वेद। जयदेव गोस्वामी अपने वैष्णव गीत में गाते हैं—"केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे"। तो वैष्णव जानते हैं कि बुद्ध देव भगवान के अवतार हैं, परंतु साधारण लोग उन्हें नास्तिक कहते हैं क्योंकि उन्होंने वेदों को नहीं माना।
बुद्ध धर्म का प्रचार भारतवर्ष से ही शुरू हुआ था और बुद्ध देव का वर्णन श्रीमद्भागवतम् में भी है कि वे भविष्य में अवतार लेंगे। उन्होंने वेदों को क्यों नकारा? क्योंकि उनको ऐसी policy लेनी ही पड़ी। जो केवल 'वेद-मुख-मान' थे—simply they accept Vedas only—वे असल में वेदों का कुछ जानते ही नहीं थे।
[कर्मी, ज्ञानी, मुक्त और कृष्णभक्त की श्रेणियाँ]
चैतन्य महाप्रभु का विश्लेषण है: वेद-निष्ठ माने जो केवल मुख से वेदों को मानते हैं, वे वास्तव में वेदों को नहीं जानते। फिर कहते हैं—"वेद-निष्ठ मध्ये बहुत 'पाप' करे, धर्म नहीं जाने"। अगर वेद को मानते हो, तो वेद जैसे बोलते हैं वैसा मानो। वेद ऐसे नहीं कहते कि तुम घर में पशु हन करो या दुकान खोलो। यज्ञ में पशु हन की जो तामसिक पुराणों में विधि है, वो एक विशेष नियम के तहत है। लेकिन लोगों ने तो दुकान खोल दी काली जी की मूर्ति रखकर। काली पूजा की विधि तो महीने में एक बार अमावस्या की रात को होती है, उसमें बहुत नियम-कानून हैं। इसलिए वे वेद तो केवल मुँह से मानते हैं, काम अपनी मनमर्जी का करते हैं। चैतन्य महाप्रभु निर्देश कर रहे हैं कि ऐसे लोग वेद-निषिद्ध पाप करते हैं और वास्तविक धर्म को नहीं जानते।
अच्छा, जो वास्तव में वेदों को मानते हैं, उनके लिए महाप्रभु कहते हैं—"धर्मचारी-मध्ये बहुत 'कर्मी'।" जो वेदों को मानते हैं, उनमें अधिकांश 'कर्मी' (सकाम कर्म करने वाले) होते हैं। वेद में तीन कांड हैं—कर्मकांड, ज्ञानकांड और उपासना कांड। कर्मी लोग स्वर्ग लोक जाने के लिए बड़े-बड़े यज्ञ और अनुष्ठान करते हैं।
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—"कोटि कर्मी-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ।" करोड़ों कर्मियों में एक ज्ञानी श्रेष्ठ है। ज्ञानी जानता है कि सकाम कर्मों से कर्म-बंधन होता है। ज्ञानी को यह समझ में आता है, जैसा भगवत गीता में कहा गया है—"यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः"। केवल यज्ञ (विष्णु) के लिए कर्म कीजिए, यदि अपनी इंद्रिय-तृप्ति के लिए कर्म करेंगे तो बंधन होगा। इसलिए कर्मी से ज्ञानी श्रेष्ठ है।
और ज्ञानियों के विषय में महाप्रभु कहते हैं—"कोटि ज्ञानी-मध्ये हय एक 'मुक्त' श्रेष्ठ।" करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक वास्तव में मुक्त होता है। ऐसा नहीं है कि केवल यह समझ लेने से कि 'मैं ब्रह्म हूँ' कोई मुक्त हो गया। भगवान कहते हैं—"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते"। केवल ब्रह्म-ज्ञान होने से ही पूर्ण मुक्ति नहीं होती; मुक्ति तभी पूर्ण होती है जब भगवान की भक्ति की जाए। बिना भक्ति के कोई पूर्ण मुक्त नहीं हो सकता।
हमारा जो जीवन-प्रवाह है, वह एक link की तरह है, जैसे cinema की रील में एक picture के बाद दूसरी picture आती है और हजारों pictures मिलकर एक चलती हुई फिल्म दिखाई देती हैं। इसी प्रकार हमारा जीवन बदलता रहता है, शरीर बदलता रहता है। अनेक जन्मों के पश्चात् जब वास्तविक ज्ञान लाभ होता है, तब ज्ञानवान व्यक्ति भगवान के चरणों में प्रवृत्त होता है।
[कृष्णभक्त की दुर्लभता और वास्तविक शांति]
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—"कोटि-मुक्त-मध्ये 'कृष्णभक्त' दुर्लभ।" करोड़ों मुक्त पुरुषों में कोई एक कृष्णभक्त होता है। कृष्णभक्ति कोई साधारण या सहज बात नहीं है। इसलिए भगवान भी कहते हैं—"वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः"॥ जो महात्मा अनेक जन्मों तक ज्ञान की चर्चा करते-करते अंत में भगवान कृष्ण के चरणों में आत्मसमर्पण करते हैं, वे महात्मा अत्यंत दुर्लभ हैं।
मुक्ति के बाद ही वास्तविक भक्ति शुरू होती है। मुक्ति का अर्थ क्या है? भागवत में कहा गया है—"मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः"—अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होना। जो माया के प्रभाव में स्थित है, वह बद्ध है; और जो अपने स्वरूप में स्थित है, वह मुक्त है। स्वरूप की स्थिति के विषय में भगवत गीता में बताया गया है कि जब मनुष्य ब्रह्मभूत अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब उसे परा-भक्ति प्राप्त होती है—"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा... मद्भक्तिं लभते पराम्"।
शुद्ध कृष्णभक्त का लक्षण बताते हुए शास्त्र कहते हैं—"अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा"॥ उत्तम भक्ति वह है जिसमें कृष्ण की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा न हो, जो ज्ञान और कर्म के आवरण से रहित हो, और जो केवल कृष्ण की प्रसन्नता के लिए अनुकूल भाव से की जाए।
कर्मी लोग स्वर्ग और भोग चाहते हैं, ज्ञानी लोग भगवान में लीन होना (merging into existence) चाहते हैं, और योगी लोग सिद्धियाँ चाहते हैं। ये सब अशांत हैं। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—"कृष्णभक्त — निष्काम, अतएव 'शान्त'। भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी — सकली 'अशान्त'॥"
शांति का जो formula है, वह भगवत गीता में भगवान बताते हैं—"भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति"॥ भगवान ही एकमात्र भोक्ता हैं, भगवान ही एकमात्र मालिक हैं, और भगवान ही सबके परम सुहृद हैं। इस प्रकार जिसका दृढ़ विश्वास है, उसे ही शांति मिल सकती है।
कृष्णभक्त निष्काम होता है, उसकी कोई भौतिक कामना नहीं होती। चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं प्रार्थना की है—"न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि"॥ कर्मी लोग धन, अनुयायी (जन), और सुंदर स्त्री चाहते हैं। लेकिन शुद्ध भक्त कहता है कि मुझे यह सब नहीं चाहिए, यहाँ तक कि मुझे मुक्ति भी नहीं चाहिए; मुझे तो जन्म-जन्मांतर केवल आपकी अहैतुकी भक्ति प्राप्त हो। इसलिए भक्त ही वास्तव में निष्काम और शांत है।
जब तक कोई कामना रहेगी, तब तक अशांति रहेगी। जो केवल निष्काम भाव से भगवत भक्ति में सदा नियुक्त रहता है, वही सबसे बड़ा योगी है और वही वास्तव में शांत है।
Thank you.
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