कल हम लोग यह श्लोक, प्रह्लाद महाराज की स्तुति, कल इस विषय में कुछ आलोचना किया था कि विप्र द्वादश-गुण-युत, उत्तम ब्राह्मण, विद्या-विनय-सम्पन्न, द्वादश-गुण-सम्पन्न, जैसे श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है: शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ और षट्-कर्म-निपुणो विप्रो मन्त्र-तन्त्र-विशारदः—यह सब होते हुए भी यदि अरविन्द-नाभ, पादारविन्द-विमुख है... भगवान जो अरविन्द-नाभ हैं, भगवान का अरविन्द पद, पलाश-लोचन, पद-पलाश, हस्त-पद-कमलम्... भगवान का सब अंग पद्म फूल से तुलना कीजिए। तो भगवान का और एक नाम अरविन्द-नाभ है। अरविन्द-नाभ जिसका नाभि से अरविन्द पद्म, पद्म फूल निकलता है और उसमें ब्रह्मा जी का अधिष्ठान होता है। और एक जगह में 'अरविन्द-नाभ' यह शब्द आया है: "तस्मिन् अरविन्दाक्ष, अरविन्द-नाभ..." और एक जगह 'अरविन्दाक्ष'—आँख भी अरविन्द, पद्म-पलाश-लोचन। तो भागवत में कहते हैं कि 'येऽन्ये'—'अन्य' का अर्थ होता है जो भगवद्-भक्त नहीं हैं, अन्य ज्ञानी, योगी, कर्मी। हाँ, भगवद्-भक्त और ज्ञानी, योगी, कर्मी से अलग, इनका एकमात्र ध्येय है भगवान। "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां..." "ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्..." यह भक्ति है।
जैसे गोपी लोग, ये लोग न तो ज्ञानी थे और न तो कर्मी, साधारण गाँव की लड़कियाँ थीं। बाकी कृष्ण उनका बहुत अपना, कृष्ण-कृष्ण उनका प्राण-धन, सब कुछ कृष्ण। चैतन्य महाप्रभु संन्यासी थे, स्त्रियों से बहुत दूर रहते थे, परन्तु चैतन्य महाप्रभु बताते हैं: "रम्या काचिद् उपासना व्रजवधू-वर्गेण या कल्पिता।" जैसे व्रज-गोपीगण जिस तरह से भगवान की भजना की, उससे बढ़कर कोई और भजन है नहीं। "रम्या काचिद् उपासना..." सब उपासना से श्रेष्ठ। क्यों? उनका एकमात्र ध्येय था कृष्ण, और कुछ नहीं जानते थे वो लोग। कृष्ण से प्रार्थना करते थे कि, "कृष्ण! बड़े-बड़े योगी लोग आपके चरणारविन्द हृदय में धारण करने के लिए अनेक तपस्या करते हैं, और हम लोग यही चाहते हैं कि आप थोड़ा हमारे हृदय से निकल जाइए, हम थोड़ा घर-गृहस्थी में मन लगाएँ।" वो होता ही नहीं था उनसे। सब समय कृष्ण-चिन्ता। कृष्ण गो-चारण में जाते थे, ये लोग घर में बैठ-बैठ के यही सोचती थीं कि कृष्ण का पादारविन्द कितना कोमल है और वो जंगल में चल रहे हैं, और उसमें बहुत पत्थर हैं, कंकड़ हैं और काँटे हैं, उनके चरणों में ज़रूर लगते होंगे, उनको ज़रूर तकलीफ होती होगी। यही सोच-सोच के घर में रोती थीं। "यद् ध्यानावस्थित-तद्-गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो..." जो सबसे बढ़िया योगी हैं, जो कि हर तरह से केवल कृष्ण-पादारविन्द का चिन्तन करते हैं, सब मन कृष्ण-पदारविन्द में... यही सर्वश्रेष्ठ जो क्रिया है कि सब समय कृष्ण का पादारविन्द हृदय में धारण करके चिन्तन करना। हाँ, इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "रम्या काचिद् उपासना व्रजवधू-वर्गेण या कल्पिता।" क्योंकि उनका यही एकमात्र काम है—केवल कृष्ण का चरणारविन्द चिन्तन, बस। इसलिए उनसे बढ़कर के और कोई उपासना नहीं कर सकता।
और भगवान खुद भी कहते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में कि: "योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥" वो सबसे बड़े योगी हैं। कौन योगी? जो सब समय अन्तरात्मा में, हृदय में केवल मुझको चिन्तन करता है, यही योग है। हाँ, केवल आँख मूँद के बैठ के रहने से... वो तो एक प्रक्रिया है, कभी भगवान का चरणारविन्द ध्यान में आएगा। बाकी असल जो सिद्धि है, वो कृष्ण का चरणारविन्द सब समय चिन्तन करना। इसलिए प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि: "मन्ये तदर्पित-मनो-वचनेहित-प्राणम्..." यह जो यदि कोई श्वपच-कुल में भी जन्म लिया है, परन्तु सब समय कृष्ण का चरणारविन्द मन में ध्यान करते हैं। "मन्ये तदर्पित..." मन तद् भगवान... केवल मन को अर्पित कर दिया। मन तो चिन्तन करेगा ही, एक $second$ भी कोई बिना चिन्तन किए रह नहीं सकता। इसलिए मन को लगा देना चाहिए भगवान के चरणों के चिन्तन में। "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।" यही योग है। "मन्मना भव..." भगवान खुद कहते हैं: "सब समय हमारा विषय चिन्तन करो, भगवान का रूप चिन्तन करो, भगवान का गुण चिन्तन करो, भगवान की लीला चिन्तन करो, भगवान का नाम स्मरण करो।" यही भक्ति-मार्ग है: "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म-निवेदनम्॥"
यह जो कीर्तन है, भगवान का नाम-कीर्तन, भगवान का नाम और भगवान एक ही वस्तु है, पृथक् नहीं है, हाँ, पृथक् नहीं। यदि कोई पृथक् समझे, तो उसको नाम-अपराध है, दस नाम-अपराध हैं। हाँ, यदि नाम को कोई शुभ क्रिया समझे, वो भी अपराध है। और दूसरे देवता का नाम और भगवान का नाम एक है, अगर यह कोई समझे, तो नाम-अपराध है। बहुत-से कहते हैं, "हरे कृष्ण बोलो और कुछ देवता का नाम बोलो, सभी एक हैं।" नहीं, यह नहीं। क्यों? शास्त्र में कहते हैं: "हरेर्नाम..." कीर्तन विष्णु का, यह बताया नहीं कि और कोई देवता का नाम। यह गलत बात है। भगवान का नाम—"हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम..." केवल भगवान का अनेक नाम है: राम, नृसिंह, वराह, कृष्ण, नारायण, अनेक प्रकार नाम हैं, विष्णु-सहस्र-नाम है, हम लोग सब जानते हैं। वो नाम, राम-नाम कीजिए, कृष्ण-नाम कीजिए, और जो भगवान का नाम सब शास्त्र में बताया, वो नाम। हाँ, और वो नाम में भगवान की सब शक्तियाँ हैं: "नाम्नामकारि बहुधा निज-सर्व-शक्तिस् तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।" चैतन्य महाप्रभु बताते हैं कि नाम और नामी एक ही वस्तु है, कोई फर्क नहीं। जब आप हरे कृष्ण नाम... शुद्ध हरे कृष्ण... शुद्ध का अर्थ होता है जो नाम को साधारण शब्द सामान्य न समझे। अगर हम लोग अपराध-युक्त समझें, तो वो नाम-अपराध है। नाम जप करने के लिए तीन अवस्थाएँ होती हैं: एक तो अपराध-युक्त, और एक अपराध-मुक्त, और एक शुद्ध नाम। शुद्ध नाम से भगवद्-प्रेम होता है, और अपराध-शून्य नाम से मुक्ति होती है, और अपराध-युक्त नाम से दुनिया का सुख-दुःख होता है, यह शास्त्र में विचार है। "साधारण-शुभ-क्रिया-मति-प्रमादः..." भगवान का नाम जो कोई अशुभ है संसार में... संसार तो अशुभ है ही है, तो अशुभ नाश करने के लिए भगवान का नाम लेने से अवश्य अशुभ नाश हो जाता है, बाकी वो अपराध हुआ शुभ क्रिया, क्योंकि उसमें नाम में प्रेम नहीं है। जब तक अशुभ अवस्था प्रस्तुत है, नाम करते हैं, फिर नाम को छोड़ देते हैं। इसलिए अपराध-युक्त नाम को अपनी सेवा में लगाना...
भगवद्-भक्ति जो है, वो भगवान की सेवा में अपने को लगा देना है। भगवान से कुछ सेवा लेना नहीं चाहिए, यह शुद्ध भक्ति का विचार नहीं है। भगवान को सब कुछ दो और भगवान से कुछ न माँगो। और विद्धा-भक्ति जो है, ज्ञान-कर्म... ज्ञान-कर्म द्वारा तो वो कुछ चाहते हैं, जो भगवद्-भजन करके कुछ सुविधाएँ माँगते हैं, यह शुद्ध भक्ति का विचार नहीं है। और जब तक हमारा माँगना, यह विचार रहेगा, तब तक हमको शान्ति नहीं मिलेगी। चैतन्य-चरितामृत में इसलिए कहते हैं: "भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकल 'अशान्त'। कृष्ण-भक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त'॥" शान्त और अशान्त। अशान्त कौन है? भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी। भुक्ति—जो दुनिया का भोग चाहते हैं, कर्मी। कर्मी केवल यही चाहते हैं कि हमारा किस तरह से खूब अच्छी तरह से भोग मिले, स्वर्गों में भोग मिले, और कहीं भोग मिले, और कहीं भोग मिले, इधर भी खूब भोग मिले। यह कर्मी का विचार है। अगर भगवान को कोई दुनिया के भोग के लिए ही भजन करता है, वो भी ठीक है, हाँ, क्योंकि तभी उसको भगवान का चरण मिलेगा। हाँ, जैसे ध्रुव महाराज। ध्रुव महाराज कोई दुनिया के भोग के लिए भगवद्-भजन किया, परन्तु जब भगवान का दर्शन मिला, असल चीज़, तो फिर वो बोलते हैं, जब भगवान ने कहा कि वर माँगो: "स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं... काचं विचिन्वन्नपि दिव्य-रत्नम्। स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे॥" हमको और कुछ ब्रह्माण्ड... यह भगवद्-भजन करने से यही लाभ है। अगर आप दुनिया की कोई चीज़ चाहते हैं, इसलिए भगवद्-भजन करते हैं, तब भी ठीक है। वो ठीक यद्यपि नहीं है, बाकी शुरू-शुरू में वो भी ठीक, क्योंकि भगवान कहते हैं: "चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।" चार प्रकार के व्यक्ति जो पुण्यवान हैं, वो हमारा भजन शुरू करते हैं। कौन? आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी। जो दुखी हैं, वो भगवान से प्रार्थना करते हैं, "भगवान, मैं बहुत दुखी हूँ, हमको थोड़ा कृपा कीजिए।" वो भी ठीक है, क्योंकि भगवान के पास आया न! और जो दुष्कृतिनः हैं... यह सब सुकृतिनः—"चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनो..." सुकृतिमान। सुकृतिमान माने अर्थात् जिसको कुछ पुण्य है, जो कुछ पुण्य कार्य किया है। क्योंकि पुण्य कार्य किए बिना भगवद्-भक्ति नहीं हो सकती, जैसा: "येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥" जो भगवान ही एकमात्र भजनीय हैं। जैसे चैतन्य-चरितामृत कह रहे हैं: "कृष्ण-भक्ति कैले सर्व-कर्म कृत हय।" केवल भगवान कृष्णचन्द्र का भजन करने से हमें सब सुख मिलेगा, यह विवेचना, यह बुद्धि, इसका नाम है श्रद्धा। इसका नाम है श्रद्धा। "असल अरे! भगवान को भी करेंगे, कृष्ण को भी करेंगे, इसको भी करेंगे, उसको भी करेंगे..." नहीं, यह विचलित है, यह शुद्ध भक्ति नहीं, विद्धा-भक्ति है।
चाहिए शुद्ध भक्ति। शुद्धा भक्ति: "अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥" यही उत्तमा भक्ति है। किसी प्रकार अन्याभिलाष—दुनिया का कुछ भोग माँग लेंगे भगवान से... "$God$ है, $God, give us our daily bread, God, give us...$" यह निम्न स्तर का भजन है। अरे, भगवान सब कुकर (कुत्ते) का रोटी देता है, तुमको क्यों नहीं देगा? इसके लिए क्या भजन करने का है? वो तो देता है भगवान। भगवान अगर खाने को नहीं देता, कोई खा सकता है क्या? "नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्।" जो कुछ हम लोग चाहते हैं, सब भगवान देते हैं। इसलिए हमको जन्म-जन्मान्तर में अनेक प्रकार शरीर धारण करना पड़ता है, क्योंकि हमारी वासना बहुत है—एक के बाद एक, एक के बाद एक। तो वो सब $record$ रहता है, वो सूक्ष्म शरीर में, जैसा $tape\ record$ में सब $record$ रहता है, वो आहिस्ते-आहिस्ते एक के बाद एक, एक के बाद एक वो आप श्रवण करते हैं। इसी प्रकार सब चीज़, जो कुछ हम लोग वासना करते हैं, वो सब हृदय में, मन-बुद्धि-अहंकार में, वो जो $tape$ है, वो सब $record$ हो जाता है। वो फिर आता है—एक के बाद एक, एक के बाद एक। भगवान का दोष नहीं है, क्योंकि हमारी अनेक प्रकार की वासनाएँ हैं, हम करते हैं, इसलिए हमको अनेक प्रकार शरीर धारण करने पड़ते हैं। हाँ, यह वासना... वासना को छोड़ देना चाहिए? नहीं, छोड़ भी नहीं सकते आप, क्योंकि आप जीवात्मा हैं। हाँ, इच्छा-वासना तो ज़रूर रहेगी, उसको आप छोड़ नहीं सकते। यह जो कहते हैं कि वासना छोड़ दो, वासना छोड़ देने से पत्थर हो गया, पत्थर की कोई वासना नहीं होती। हाँ, जो ज़िन्दा है, जीव है, उसकी वासनाएँ होती हैं। वो वासना को पवित्र करना चाहिए। हाँ, वासना छोड़ने का तो हो नहीं सकता, यह सम्भव है नहीं। वासना अगर हम छोड़ दिया, तो हम... हमारा जीव का जो... हम जो जीवित वस्तु हैं, फिर हमारा रह गया क्या? नहीं। हाँ।
इसलिए जो शास्त्र में बताया है: "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥" अभी हम लोग वासनाएँ करते हैं, जैसे हम लोग देश के भक्त होते हैं कि हमारे देश की उन्नति हो, कि हमारा जो $family$ है, परिवार है, उसकी उन्नति हो, कि हमारे शरीर की उन्नति हो—यह अनेक प्रकार की हैं वासनाएँ। हाँ, ये जितनी वासनाएँ हैं, ये सब उपाधि-युक्त वासनाएँ हैं, क्योंकि मैंने एक शरीर धारण किया है जिसका नाम है भारतीय, इसलिए हमारी वासना है सब भारतीय कल्याण के लिए। तो वो सब भौतिक वासना है। मैं चाहे जितना बड़ा $nationalist$, हाँ, देशभक्त हूँ, वो देशभक्त होने से हमको देशभक्त का जो मिलना है, वो मिलेगा—$minister$ हो जाएँगे, $president$ हो जाएँगे, बाकी उसमें भगवद्-भक्ति नहीं होगी। भगवद्-भक्ति और चीज़ है। इसलिए कहते हैं: "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्..." कोई उपाधि की वासना नहीं, शुद्ध वासना। शुद्ध वासना क्या है? "...निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते।" शुद्ध वासना ही है कि, "भगवान! आपके चरणों में किस तरह से मैं सेवा कर सकूँगा?" यह शुद्ध वासना है। यह जो हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—यह जो महामन्त्र है, इसका क्या अर्थ होता है? यही अर्थ है: "हे हरे!" 'हरे' सम्बोधन है 'हरा' शब्द का। 'हरा' भगवान की शक्ति है, 'हरे' भगवान... तो "हरे कृष्ण!" हे भगवान की शक्ति! क्योंकि भगवान सब समय शक्ति-सम्पन्न हैं: "परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च।" यह वेद-मन्त्र है कि भगवान की अनेक प्रकार शक्तियाँ हैं। हाँ, यह जो शक्ति, भगवान की स्वरूप-शक्ति, हाँ, यह राधा रानी, यह भगवान की स्वरूप-शक्ति है: "राधा कृष्ण-प्रणय-विकृतिर् ह्लादिनी शक्तिरस्माद् एकात्मानावपि भुवि पुरा देह-भेदं गतौ तौ। चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्-द्वयं चैक्यमाप्तं राधा-भाव-द्युति-सुवलितं नौमि कृष्ण-स्वरूपम्॥" यह जो राधा रानी हैं, यह भगवान की स्वरूप-शक्ति, ह्लादिनी शक्ति हैं। हाँ, भगवान को आनन्द देने के लिए शक्ति है, यह स्वरूप-शक्ति। तो 'हरा' का अर्थ होता है यह भगवान की ह्लादिनी शक्ति। हाँ, तो कहते हैं: "हरे! हे हरा! हे भगवान की ह्लादिनी शक्ति! और हे कृष्ण! आप लोग मुझे आपकी सेवा में नियुक्त कीजिए।" यह हरे कृष्ण मन्त्र का अर्थ होता है। 'हरे'—यह सम्बोधन वाचक है। "हे कृष्ण! हे हरे! हे राम! हे हरे! मुझे आपकी सेवा में नियुक्त कीजिए।" चैतन्य महाप्रभु यही सिखाते हैं।
क्यों हम लोग सेवा में नियुक्त हैं? इधर भी भौतिक जगत् में सब कोई सेवा में नियुक्त है। कोई शरीर की सेवा में नियुक्त है, कोई समाज की सेवा में नियुक्त है, कोई और देव-देवी की सेवा में नियुक्त है, किसी का कुछ भी नहीं है तो कुत्ता पाल लेता है, उसकी सेवा में नियुक्त है। तो नियुक्त तो रहना ही पड़ेगा, सेवा हम लोग छोड़ नहीं सकते। बाकी इस सेवा में कुछ लाभ नहीं होगा। हाँ, देखिए, गांधी जी कितनी सेवा की देश की, उनको गोली से मार दिया, गोली से मार दिया! देखिए, दुनिया की सेवा ऐसी है, आप किसी को सुखी नहीं कर सकते। हाँ, मतलब गांधी जी से बढ़कर देश की सेवा कौन कर सकता है? पर कोई तो असुखी था, जो कि उनको गोली से मार दिया। तो इसलिए निश्चित है कि दुनिया की आप जितनी सेवा कीजिए, जिसको आप सेवा कर रहे हैं, वो भी सुखी नहीं होगा और आप भी नहीं सुखी होंगे। इसलिए भगवान कहते हैं: "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" हमारी सेवा में आओ, तभी सुखी होगे, हाँ, नहीं तो नहीं सुखी होगे। इसलिए सेवा जो वृत्ति है हमारी, उसको छोड़ना नहीं, $zero$ नहीं हो जाना। निर्विशेष और शून्यवाद—सेवा को $zero$ नहीं करना है, $zero$ हो ही नहीं सकता। हाँ, निर्विशेष भी हो ही नहीं सकता। इसलिए सेवा को शुद्ध करना चाहिए। वो शुद्ध करने का जो तरकीब है, वो भक्ति है: "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं..." अभी हमारी सेवा की वृत्ति है कि देश की सेवा करो, समाज की सेवा करो, लोक की सेवा करो, दरिद्र की सेवा करो, ठीक है? कि कोई सेवा-वृत्ति है हमारे भीतर, हाँ, बाकी उसको शुद्ध करना चाहिए। उसको शुद्ध करने से क्या होता है? "...हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते।" वो भक्ति हो जाएगी। 'हृषीक' का अर्थ होता है इन्द्रिय, 'हृषीकेश-सेवनम्'—इन्द्रिय से सेवा। तो मैं इन्द्रिय से, हाथ-पैर से ही करता हूँ, आँख से, कान से, तो यही सब हाथ, पैर, आँख को शुद्ध करना चाहिए। हाँ, वो शुद्ध किस तरह से होगा? "...सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं..." यह जो अभी हम लोग सोचते हैं, "मैं भारतीय हूँ, मैं $American$ हूँ, मैं अंग्रेज़ हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमान हूँ, मैं यह हूँ, वह हूँ..." यह उपाधि छोड़ दीजिए। फिर है क्या? "गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर् दास-दासानुदासः।" यह परिचय होना चाहिए, जैसे चैतन्य महाप्रभु बताए। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि: "नाहं विप्रो न च नरपतिर् नापि वैश्यो न शूद्रो नापि वर्णी न च गृहपतिर् नो वनस्थो यतिर् वा..." मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, मैं क्षत्रिय नहीं हूँ, और मैं वैश्य भी नहीं हूँ, मैं संन्यासी भी नहीं हूँ, ब्रह्मचारी भी नहीं, सब 'नहीं' कर दिया। सब जो हमारा जो वर्णाश्रम है, चार वर्ण, चार आश्रम, यह चैतन्य महाप्रभु बता दिए कि ये सब उपाधि हैं। हाँ, इसीलिए कहते हैं: "सर्वधर्मान् परित्यज्य..." भगवान कहते हैं सब उपाधि-धर्म छोड़ दो। हाँ, ये जो हम हैं ब्राह्मण, तो ब्राह्मण का कुछ धर्म तो है—शम, दम, तितिक्षा आदि; क्षत्रिय का कुछ धर्म है—ईश्वर-भाव, युद्ध में अपलायनम्, क्षत्रिय लड़ाई करके देश की रक्षा करेंगे; और इसी प्रकार वैश्य का धर्म है—कृषि, गो-रक्ष्य, वाणिज्यम्, वैश्य-समाज; इसी प्रकार शूद्र का भी है; इसी प्रकार ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सभी का शास्त्र में सब बताया है अलग-अलग किस तरह से अपना-अपना काम, धर्म का याजन करना चाहिए। और भगवान कहते हैं: "सर्वधर्मान् परित्यज्य..." इसका अर्थ होता है कि यदि तुम उपाधि-शून्य हो जाओ, उसका नाम है मुक्ति। उपाधि-शून्य। तो उपाधि-शून्य होने से क्या मैं निराकार हो जाता हूँ? नहीं। यह जो हम लोग समझते हैं, "मैं यह हूँ, यह हूँ..." इसको छोड़ दो। जैसे चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि, "मैं तो ब्राह्मण भी नहीं हूँ, क्षत्रिय भी नहीं, संन्यासी भी नहीं हूँ, ब्रह्मचारी भी नहीं, ये सब कुछ नहीं हूँ।" तो फिर आप क्या हैं? "...गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर् दास-दासानुदासः।" वो जो गोपी-लोग के भर्ता हैं कृष्ण, जो गोपी-लोग को पालन करते हैं, गोपी-जन-वल्लभ। कृष्ण का काम है गोपी-जन-वल्लभ, गोपियों की सुविधा। जैसे गोपी लोग चाहती थीं किस तरह से भगवान सुखी हों, कृष्ण भी चाहते हैं किस तरह से गोपियों को सुख मिले, इसलिए उनका नाम है गोपी-जन-वल्लभ, गिरि-वर-धारी। भगवान ने गिरिराज को धारण किया, क्यों? गोपियों की सुविधा के लिए। गोपी लोग परेशान हो रही थीं कि बहुत बादल हैं, बहुत वृष्टि हो रही है, ये लोग सब परेशान हैं, कुछ परवाह नहीं, "हम तुमको रक्षा करते हैं।" हाँ, तो जैसा भगवद्-भक्त चाहते हैं भगवान किस तरह से सुखी रहेंगे, इसी प्रकार भगवान भी चाहते हैं भगवान का भक्त किस तरह से सुखी रहे। "न मे भक्तः प्रणश्यति।" भगवान सबके लिए समान हैं, भगवान का कोई दुश्मन भी नहीं है, कोई मित्र भी नहीं है: "समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।" भगवान का कोई द्वेष नहीं, भगवान हैं, वो किससे द्वेष करेंगे, किससे मित्रता? सभी को पालन करना है। उसमें भी जो भगवद्-भजन करता है, उनके ऊपर विशेष कृपा, उनके ऊपर विशेष कृपा: "ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।" उनसे, भगवान से कुछ अलग सम्बन्ध है। इसमें कोई भगवान का दोष नहीं है, इसमें भगवान का दोष नहीं, निरपेक्षता ही है। परन्तु जो भगवान को ज़्यादा चाहते हैं, भगवान अगर उसको ज़्यादा चाहते हैं, उसमें कोई दोष नहीं, यह स्वाभाविक है। "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।" जो भगवान से प्रेम करता है, भगवान भी उनसे प्रेम करते हैं। तो यह उपाधि-शून्य होना चाहिए। हाँ, सेवा-वृत्ति हमारी तो है ही है, हाँ, बाकी सेवा इस तरह से मैं करता हूँ, यह हाथ-पैर से करता हूँ, इन्द्रियों से। इन इन्द्रियों को शुद्ध करना चाहिए, शुद्ध करके भगवान की सेवा में लगाना चाहिए: "सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥" 'हृषीकेश' भगवान का नाम है। असल में भगवान ही इन्द्रियों के मालिक हैं। हमारा जो हाथ-पैर है, यह थोड़ा ही हमारा है, यह तो भगवान का है। अर्थात् जैसा नौकर-चाकर रहता है, उसका हाथ-पैर किसके लिए है? मालिक के लिए। इसी प्रकार हमारा जो हाथ-पैर है, यह तो भगवान के लिए है, हाँ, बाकी हम लगाते हैं दूसरे काम में, हम भगवान में नहीं लगाते, और दूसरे काम में लगाते हैं, इसीलिए हमारा दुःख है। हाँ, हमारा कोई नौकर है, हमसे पैसा ले और दूसरे की कोई नौकरी करे, उसकी सुविधा के लिए चला जाए, तो वो नौकरी कितने दिन चलेगी? कभी तक, कहाँ तक सुखी रहेगा? यही हमारी विपदा है। है तो जो कुछ हमारे शरीर में है, सब भगवान का दिया हुआ, और हम लगाते हैं दूसरी सेवा में, भगवान की सेवा में नहीं। इसका नाम है बद्धावस्था, बद्ध जीव। वो माया से, क्योंकि सेवा हमको करनी ही पड़ेगी। यह तो भगवान की सेवा, नहीं तो माया की सेवा। अगर भगवान की सेवा छोड़ देते हो, तो माया की सेवा, और माया की सेवा नहीं करते हो, तो भगवान की सेवा। सेवा हमको करनी ही पड़ेगी। जैसा कल हम लोग $jail$ में गया था, वो $jail$ में कौन गया है? जो राजा का, $government$ का कानून नहीं मानता है, वो उसको $jail$ में भर्ती किया गया। तो उधर भी $jail$ का कानून $government$ का कानून है, और $jail$ के बाहर में भी $government$ का कानून है। तो जो कहता है $government$ का कानून नहीं मानता, तो उसको बोलता है, "तब इधर आओ, जबरदस्ती तुमको मनाया जाएगा।" इसी प्रकार जीव जो है, वो तो भगवान का अधीन वस्तु है। वो अगर भगवान की सेवा नहीं करता है, तो माया की सेवा करो। और यदि माया की सेवा में तुम्हारा सुख नहीं मिलता, तो भगवान की सेवा करो। सरल बात है, हाँ, सरल बात है, इसमें कोई द्वन्द्व नहीं। जब तक आप भगवान की सेवा में नियुक्त नहीं होंगे, माया आपको तकलीफ देगी, खूब अच्छी तरह से सेवा करा लेगी, अनेक प्रकार से, अनेक प्रकार के शरीर आपको देगी, अनेक प्रकार की जगह में। "भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया..." ईश्वर है न! "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥" यह जो एक यन्त्र है, गाड़ी जैसा। आप लोग $motor$ गाड़ी चढ़ के इधर-उधर घूमते हैं, यह भी एक $motor$ गाड़ी है—शरीर, अनेक प्रकार की। किसी को $Ford$ गाड़ी मिली है, किसी को और कुछ मिला है, कुछ मिला है, अनेक प्रकार की गाड़ी है। इसी प्रकार अनेक प्रकार के शरीर हैं। तो हम लोग जैसे-जैसे भोग करने को चाहते हैं, अपने कर्म से, भगवान मौका देता है, "अच्छा चलो, यह गाड़ी में चढ़ो, यह सूअर की गाड़ी में चढ़ो और खूब खाओ।" भगवान की इच्छा से होती है।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥