श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  761204ED-HYDERABAD_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
दर्शन
हैदराबाद, 04-दिसंबर-1976
 
 
 
अब तो कहीं है ही नहीं। हम लोग Christian धर्मों को प्रचार किया, कितना खर्च किया! अभी तक खर्च करते हैं। जितना foreign business firm है, लाखों-करोड़ रुपया ये Bible Society प्रचार करने... नहीं, वो जो उनका जो उत्थान हो रहा है, उसका कारण ये है कि उनमें विचार-भेद नहीं है। जैसा कि हम आनंद से निकालते हैं, आनंद से निकालते हैं, हो जाता है, तो "भेदः पण्डित-विचारः मूर्खाणाम्..."। बाकी कौन से विचार हमको ग्रहण करने चाहिए? वो जो परंपरा है, वो विचार हमको... तब हमारा मंगल होगा। और आप, हम अगर अपना विचार रखते हैं—"हम जो समझे वो"—नहीं, वो कभी success नहीं। ये भगवान का "एवं परम्परा-प्राप्तम्" [श्रीमद् भगवद्गीता 4.2], जो नष्ट... वो विचार नष्ट हो... जो ही नष्ट, इसलिए भगवान अर्जुन के through से फिर परंपरा बनाया। और ये भी होता है, वो परंपरा में कौन आके करेगा? "भक्तोऽसि मे सखा चेति" [श्रीमद् भगवद्गीता 4.3]। वो परंपरा भगवद्-भक्त हो। Scholar, politician से लेने ही नहीं। अर्जुन कोई scholar भी नहीं थे और वेदांती जानने वाले... क्षत्रिय। उनको भगवान परंपरा किया: "भक्तोऽसि मे... क्योंकि तुम हमारा भक्त है, इसलिए तुमको इसको दे रहा हूँ।" अब अर्जुन को authorized परंपरा से, और अर्जुन जैसा समझा, वो भी लिखा हुआ है।

अर्जुन कहते हैं कि, "आप जो हैं, परं ब्रह्म।" तो अर्जुन के हिसाब से भगवान को मान लिया जाए—"परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्" [श्रीमद् भगवद्गीता 10.12]। तो फिर काम बन जाएगा। और अर्जुन जो बताते हैं कि परं ब्रह्म हैं, और कोई politician बोल दिया, "हमारा जो कृष्ण है, वह कोई और कुछ है, हमारा imagination का कृष्ण।" भला, भगवान किसी का imagination... करो, ये सब एक-एक आदमी अपना imagination करता है, कल्पना। कल्पना से भगवान... भगवान किसी का कल्पना नहीं। तो भगवान के... और बड़े-बड़े स्वामी लोग बोलते हैं, "हाँ, जो कुछ आप कल्पना कीजिए, सब ठीक है।" अब भगवान बोलते हैं, "मूढ़ाः"। एक मूढ़ कुछ कल्पना किया, ठीक है? "मूढ़ोऽयम्..." हम कल्पना किया, "कृष्णा, कृष्णा", तो वो तो हम तो मूढ़ हैं, तो हमारी हमारी कल्पना ठीक है? ये तो कल्पना क्यों देंगे? तो कल्पना क्यों मान लेंगे? कल्पना तो होता ही है, मन का काम ही है कल्पना करना, छोड़ देना। यही तो मन का काम है, और क्या काम? एक चीज़ कल्पना करे, दो मिनट बाद फिर छोड़ दे। "चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्" [श्रीमद् भगवद्गीता 6.34]। मन का काम ही है चंचलता। छोटा बच्चा है, तो उनको तो उसका कल्पना का क्या अर्थ होगा? बेकार है। जो चंचल मन है, उसको कल्पना से क्या असर है? जानवर है। कल्पना के अर्थ से कुछ काम नहीं चलेगा। जो असल अर्थ है, जो मनोधर्म से आगे... मनोधर्म में जो है, mental, उसका अर्थ कुछ नहीं है। वो सब बेकार है। छोटे बच्चे को नहीं होता? होता तो है, लेकिन उसका कोई लेता... तो वो खिलौना लोग देता है, वो भी लेता है। छोटा बच्चा माँ को बहुत... "दिया चाहिए।" अभी नहीं सके, तो माताजी उसको चायना ला दिया, "ले।" उसने जो परछाया है, वो समझा, "चार दीजिए।" `[गला साफ़ करने की आवाज़]` क्योंकि कल्पना करता है, इसलिए उसको ठगाना पड़ता है। माँ-बाप भी ठगाते हैं, क्या नहीं? तो रोएगा।

कुछ लोग पूछते हैं कि Krishna Consciousness में रामायण क्यों नहीं छपा? कौन हुकुम देने वाला है? पूछते हैं कि इतने सारे भागवत निकाले, तो बहुत लोग ही बोलते हैं। और जो जानते हैं, जानते हैं राम भी तो हैं, कृष्ण भी वही। अलग रामायण बोलने का कोई ज़रूरत नहीं। श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है, जो लड़ाई करने वाले का भी, "मैं रामचंद्र।" तो भगवान जो बोलते हैं, भगवान रामचंद्र भी भगवान हैं, कृष्ण भी। उसमें कोई फ़र्क नहीं। ऐसे बोलने के लिए तो बहुत किताबें हैं। एक ही किताब नहीं समझ सकता, सब बोले तो मर जाए। एक श्रीमद् भगवद्गीता ही नहीं समझ पाता। वाल्मीकि रामायण और महाभारत, कितने किताबें हैं! सब कुछ सिखाना है, सब बताते हैं, मौका होता है। नहीं तो एकमात्र तो श्रीमद् भगवद्गीता नहीं, सब कुछ है। वो कौन बोलता है? जो रामायण नहीं पढ़ता है, जो जानता नहीं कि राम कौन है, कृष्ण कौन है, वो बोलता है। जो जानता है, तो भगवान कभी राम रूप से आते हैं, कभी कृष्ण रूप से। "रामादि-मूर्तिषु कला-नियमेन तिष्ठन्..." [ब्रह्म-संहिता 5.39]। राम मूर्ति से भगवान का अनंत रूप है। खाली एक राम है क्या? राम, बड़ा इत्यादि... बहुत लोग, यही तो भगवान हैं ना? अनेक रूप से स्थित होते हुए भी भगवान एक हैं—अद्वैत, अच्युत, अनादि, अनंत-रूप। अनंत रूप हैं, जैसे एक समुद्र में अनेक प्रकार तरंग हैं, वही समुद्र... समुद्र अलग नहीं, तरंग बहुत हैं, बाकी यही समुद्र एक ही है। इसी प्रकार भगवान एक ही हैं, अनेक प्रकार होता है उनका प्रतिष्ठान, सब समान। तो इसलिए शास्त्र पढ़नी चाहिए, शास्त्र-ज्ञान लेना चाहिए, ज्ञान होगा। जाइएगा, फिर आइएगा। गीता सब शास्त्र का निचोड़ है। उसका चित्त से पढ़िए, इसको समझिए। सब शास्त्र-ज्ञान कलयुग के लिए दिया गया है। हर एक शास्त्र कलयुग में पढ़ नहीं सकेगा। एक श्रीमद् भगवद्गीता भगवान अपने मुखारविंद से बता दिया। उसी को, उसी का कदर... एक है तो उसको बहुत कदर मुश्किल... भगवान सरल भाव से, बड़ा सुंदर भाषा में और सब चीज़ समझा... उसको भी कदर... कितना दुर्भाग्य! "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय" [श्रीमद् भगवद्गीता 1.1]। और कुरुक्षेत्र की लड़ाई जो है, history है महाभारत में। महाभारत का अर्थ होता है Greater India। और ये लोग सब उड़ा देते हैं। अभी गाड़ी... कितना बड़ा बदमाश! उड़ा देते हैं। अब क्या किया? महाभारत, Greater Indian history, उसमें कुरुक्षेत्र की लड़ाई हुई थी। और कुरुक्षेत्र अभी तक मौजूद है, जो लोग पंजाब गए हैं, एक station भी है। और सब बड़े-बड़े आचार्य जो लोग, उसी को मानते हैं। और एक politician बोल दिया कि बस, कुरुक्षेत्र तो लड़ाई कभी हुई नहीं थी, ऐसे imagination है, कृष्ण... उसके लिए क्या बड़े-बड़े आचार्य लोग—रामानुजाचार्य सब हैं, चैतन्य महाप्रभु, सब हमारे जो भारतवर्ष के बड़े-बड़े मुख्य व्यक्ति, सब मानते हैं। और एक बीच में कोई मूर्ख बोल दिया... अभी कलकत्ता में डॉक्टर चटर्जी हैं, वो बोलते हैं, "सीता-राम भाई-बहन।" ऐसे सब हमारे देश में विद्वान! बहुत आदमी उसके पीछे लग गया, "डॉक्टर चटर्जी बोल दिया।" `[गला साफ़ करने की आवाज़]` अब ये डॉक्टर चटर्जी विद्वान हैं ना मूर्ख हैं? इसको विचार करना। ये सब हमारे वेदादि शास्त्र में वर्णन है—सीता-राम का विषय और राम-रावण से लड़ाई, सब history वर्णन है। ये लोग बोलते हैं, "कुछ नहीं है।" भाई, ये कलयुग है, अपना-अपना मत... क्योंकि शास्त्र का शास्त्र से कुछ मतलब नहीं है। एक-एक मत सब निकालते हैं और सब बोलते हैं, "जितना मत, उतना पथ, वो सब ठीक है।" इसको बहुत मानते हैं, "बड़ा उदार है! जितना मत है, सब ठीक है।" कोई बोले तो बड़ा उदार है। और कोई बोले, "नहीं, यही मत, एक मत..." `[गला साफ़ करने की आवाज़]` तो होगी। बाकी हम लोग वही बोलते हैं, कृष्ण जो बोलते हैं, ठीक है। "सब बैठ, तुम मानो नहीं मानो, तुम्हारी इच्छा।" हम लोग यही बोलते हैं, काम हो रहा है। जो लोग बोलते हैं, "सब मत ठीक है," ऐसे बड़े-बड़े साधु जो भी, सब यूरोप-अमेरिका बहुत गए, एक भी कृष्ण-भक्त नहीं बना, एक भी! एक history में नहीं। और हम लोग बोलते हैं, "यही मक्षिका है" और कोई... हजारों बन रहे हैं। हम compromise नहीं करते, "सब ठीक है।" हम लोग, "एक भगवान श्रीकृष्ण भगवान भी बोलते हैं, वो ठीक है, बस। तुम्हारे कुछ..."

There is no need of compromise. Stick to the words of Krishna. Why should you make... We never `[Music]` somewhere spoken in the Bhagavad-gita, correct? You like, take; you don't like, don't.

"God in many forms exists, in many forms. God, many God exists in many forms."

All right, but many forms Krishna has come. Why should you not take that? Why should you go to... "God has many forms." All right, why do you say like that? God says, "Mam..." He has many forms, that I have already explained. But you take this form of God, that is your Krishna. God has... Otherwise, how is God if He has no many forms? That I have already explained: advaitam acyutam anādim ananta-rūpam [Bs. 5.33]. Limitless, limitless. So, you, limitless के पास किधर जाओगे? वहाँ हमको... उसमें तुम्हारा काम बन गया। God का बात छोड़ देते हैं, God का main रूप है, हम उसका... ये कोई बुद्धिमान... जब God बोलता है directly, "Mam..." Many... He has many forms, undoubtedly. But how you go to many forms? He says, as He says, "Mam, take Me alone." That is... There is no doubt He has many. How you go after many? It is only in the Bhagavad-gita where the Lord has emphasized this: "I am God." No other book, because He is God and that is from His lips. But "more than God" बोल रहे हैं और इधर आके history में है, कृष्णा... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` मथुरा, अभी दूतों का वृंदावन में जाके कुछ... ये सब दीजिए, इसको आप छोड़ देते हैं। क्या कारण? Many है, तो many का पीछे हम जाएँ? Many का पीछे जाना ठीक है, सरल है, सहज है ना एक का पीछे जाना? Europe में, America में, it is called super market. एक दुकान में जाइए, सब चीज़ मिल जाएगा, super. फिर दस जगह में जाने का ज़रूरत क्या? "अहं सर्वस्य प्रभवो..." [श्रीमद् भगवद्गीता 10.8]। Root, root में पानी दीजिए, सब जगह पानी पहुँच जाएगा। पेट में आहार दीजिए, सब अंग पुष्ट हो जाएँगे। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां [श्रीमद्-भागवतम् 4.31.14]। आँख में रसगुल्ला नहीं पड़े, वो अंधा हो जाए। पेट में दीजिए। हमारा इंद्रिय सब है, तो कान में रसगुल्ला दीजिए, आँख में दीजिए, दाँत में... ये process है ना? एक जगह में दीजिए, यहाँ रसगुल्ला सब जगह पहुँच... कौन ठीक है? अगर कोई argument बोलता है, "ये सब शरीर का अंग-प्रत्यंग है, तो छिद्र है, ये छिद्र में कहाँ दिया जाए? कोई भी छिद्र में दें, उसमें काम बनेगा।" गधा का काम! अलग-अलग छिद्र हैं, अलग-अलग काम के लिए हैं। बाकी जब आप आहार करेंगे, तो एक ही छिद्र। "मामेकम्..." [श्रीमद् भगवद्गीता 18.66]। यदि भगवान से संपर्क बनाना चाहते हैं, "मामेकम्..."। "भगवान का करोड़ों रूप है, सब चीज़ों में..." ये गधा का काम! जब भगवान स्वयं बोलता है, "मामेकम्..." उसको क्यों नहीं? ये सब बदमाशी है।

"शरणम्..." शरणम् माने क्या है? माने है... आप पंडित हैं, अपना बात... शरणम् का अर्थ नहीं जानते हैं? शरणम् तो बहुत... आप कुछ जानते नहीं? नहीं, इसका मतलब आप कुछ जानते नहीं।

"I want to ask why you ask..."

सरल, सरल अर्थ नहीं जानते? सरल अर्थ जानते हैं, फिर जानते हैं, फिर बदमाशी क्या होता है? तो इतना ये सब बदमाशी, crossing नहीं... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` समय नष्ट। Crossing नहीं, मालूम... मालूम... crossing नहीं. If you have got any doubt, clear it. समय नष्ट। This is... Lord has been asked, "Madhusudana, clear all the doubts." You ask any doubt. होने का विचार... "Surrender yourselves" का मतलब surrender, surrender. If that ego goes above everything, right? I must... सब कोई लिखता ही है, "हरि शरणम्", अपना-अपना इष्टदेव का। और आप अगर कहें, "शरणम् का अर्थ क्या?" तो कौन आपको समझाए? भगवान बोलते हैं, "मामेकं शरणं व्रज" [श्रीमद् भगवद्गीता 18.66], उसका मतलब, "यहाँ तुम्हारी खुशी, हमारा शरण आओ।" नहीं, "यथेच्छसि तथा कुरु" [श्रीमद् भगवद्गीता 18.63]—जैसी तुम्हारी... भगवान जबरदस्ती नहीं करते। क्यों जबरदस्ती? भगवान आपको स्वाधीनता दिया है, उसको हाथ नहीं लगाते। `[खांसने की आवाज़]` `[गला साफ़ करने की आवाज़]` आपको उपदेश कर रहे हैं कि, "आपको इसमें मंगल होगा, हमारा आइए।" और आना नहीं आना, तो आपकी खुशी है। उसमें तर्क करने से कोई क्या फ़ायदा है? भगवान... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` "...व्रज।" Now He depends upon you, if you like to surrender. That is in the last adhyaya, on the 18th adhyaya, if I am not mistaken, Lord has said this: "Those who don't want to hear Me, don't tell Me... don't tell My upadesha to anyone." Yes, तपस्या है, जिसका तपस्या है ही नहीं, उसको बोलो नहीं, समझ नहीं पाएगा। And if you reservoir, you won't go to the tank, right? तपस्या... मना किया, जिसकी तपस्या है, उसको बोलो नहीं, वो समझ नहीं पाएगा। 68 और 67 [श्रीमद् भगवद्गीता 18.67-68]—जो भक्त नहीं है, राक्षस है। दो चीज़ होता है, एक भक्त होता है, राक्षस... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` जिसका तपस्या ही नहीं, अभक्त है। जब अभक्त है, "न च मां योऽभ्यसूयति" [श्रीमद् भगवद्गीता 18.67]—जिसको सुनने की भी इच्छा नहीं है, "न च शुश्रूषवे वाच्यं..." जो हमको हिंसा... क्यों सहन करें? `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` वो तो हिंसात्मक है। वो हो गया ना? जिसकी तपस्या ही नहीं, जो अभक्त है, जो मुझको हिंसा करता है, उसको बोलो... वो गधा समझ नहीं पाएगा, मना कर दिया। ताकि हम risk लेके गधा को भी बोलते हैं कि, "सुनो, तो तुम्हारा मंगल होगा।" और उसके लिए मारने के लिए तैयार, तब भी ठीक है, चलो, भगवान का कथा उसको सुना देते हैं, होता है। भगवान मना कर दिए, "राक्षस लोग को सुनाओगे..." हम लोग rascals के पास जाते हैं, मारने के लिए तैयार। "हम तो नौकर हैं, उसको सुना दो, चलो, हम मार खा लेंगे।" ये... लेकिन भगवान मना करते हैं। बाकी जो प्रचार करते हैं, उनके लिए... भगवान: "मनुष्येषु..." जो ये सब बाधाएँ उपस्थित होते हुए भी प्रचार करते हैं, "उससे बढ़कर प्रिय हमारा कोई नहीं।" Either for a business... ये भी कह दिया, अगर कोई business के लिए मेरा नाम लेना चाहता है, कोई बात नहीं। नहीं, business की बात नहीं। हाँ, business नहीं, कोई-कोई कोई किताब छापता है, कोई कुछ करता है, like that. किताब छापता है प्रचार के लिए, प्रचार के लिए। वो पैसा कमाने के लिए वो करते हैं, business के लिए, जो उसका किताब नहीं बिकता। और जो प्रचार के लिए छापता है, उसका बिकता है। हम लोगों की किताब बिकती है रोजाना 5 to 6 lakhs, सारा दुनिया। History में है, जो धार्मिक पुस्तक 5 lakhs रोज़ बिकता है। कितने businessmen हैं जिसका collection है 5 to 6 lakhs of daily business? क्या करें?

"Why body and spirit are not compatible while in body? Why we are not able to realize this?"

Not compatible? Spirit is using your body. You are talking, spirit, you are talking. Why you say it is not compatible? Your body is there and you are still talking. And as soon as you will go, same mouth will be there, but it will not talk. Same ear will be there, but he will not hear. So, why do you say it is incompatible? So long the spirit is there within your body, you are `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` talking, you are hearing, you are challenging. And as spirit will go, then it is... If I kick on your face, you'll not challenge. Because spirit is there within the body, therefore you are so proud of challenging God. As soon as spirit is over, everything finished. It is not incompatible, but it can exist. But `[गला साफ़ करने की आवाज़]` it is different, just like you are existing with your apartment. This apartment is different from you, but still say you are keeping your service in this apartment. You are utilizing this for your movement. As soon as you are out of this apartment, no need of that. Your... `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` `[गला साफ़ करने की आवाज़]` But if you understand the apartment is yourself, then you are a fool. That people are doing. This body has nothing to do with the spirit, but they are accepting this body, unity with the body, with spirit, with the body. Life separation is death. "ज्वर-प्रकृति..." प्रकृति, यही तो भगवान पहले ही समझा रहे हैं: "देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा तथा देहान्तरप्राप्तिर्..." [श्रीमद् भगवद्गीता 2.13] `[खांसने की आवाज़]` यही समझता नहीं। Spirit एक शरीर से और एक शरीर में जाता है। And there are 8,400,000 forms of शरीर. You can be transferred to any शरीर. There is no knowledge. Today I have got this nice, beautiful शरीर, and tomorrow I will get शरीर of dog. So, what I am doing for that, to save me transmigrating on this beautiful human body to the body of the dog? What you are doing? We are sleeping. "Let it happen, let us..." That is not human life, that is cats and dogs. Cats, dogs, they do not know what is going to happen. Human life, in that way, like... and law... That is the greatest loss. Go-buddhi. By having a human life, still we are going below the standard of the beast. वो जानता ही नहीं कि what is standard of life of a human being, what is the distinction between the dog's life and human. That he does not know. There is no education. How the dog's body and human's body distinct, that they do not know. No education. Education to educate people, the human life distinct from the dog's life. Who educate? The dog also eating, and you are teaching how to eat. The dog, without being taught how to eat, eating. `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` Eating, sleeping, mating and defending. Dog and we are educated for these things. Well, there is difference between dog and me. There is no education. We are distinguishing: "The dog is dying on the street, and `[गला साफ़ करने की आवाज़]` I am dying in..." They think this. They do not consider that while I am sleeping, sleeping of dog and sleeping of myself is the same. Rather, dog is not dreaming pieces, I am dreaming some pieces. Education, human life distinct from the dog's life, there is no education. Dog is jumping with four legs, and we are running with four wheels. That is they think, "We have four wheels, motor..." `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` But what is difference? Business... He is jumping four legs, you are jumping four wheels, that's business. Present, no... and they do not know standard.

"स्वामी जी, मनुष्य रोज़ाना, प्रतिदिन के अंदर समय, कितने समय में क्या-क्या चीज़ करना? क्योंकि श्रीमद् भगवद्गीता में सारा चीज़ है, लेकिन कम से कम समय में कितने नियमों से चलने का विषय के अंदर कुछ..."

हम लोग तो बोलेंगे, 24 hours केवल श्रीमद् भगवद्गीता पढ़िए।

"उसमें मुख्य विषय के अंदर कुछ, क्योंकि मुख्य वही तो आसान..."

मुख्य श्रीमद् भगवद्गीता छोड़कर... केवल श्रीमद् भगवद्गीता पढ़िए। `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` उसमें क्या मुश्किल है, बोलिए? हम लोग तो वही करते हैं। हमारा आज्ञा सारा दुनिया में ही श्रीमद् भगवद्गीता प्रचार करते हैं, तो हमारा मुश्किल क्या है? मुश्किल है? हमारा मुश्किल कुछ नहीं है। फिर, फिर आप क्यों टाइम...

"मुख्य विषय के अंदर कुछ सारांश..."

मुख्य विषय है: आप शरीर हैं नहीं, आप चेतन वस्तु हैं, ये मुख्य विषय है। आप जानते ही नहीं, हम जानते ही नहीं। हम समझते हैं शरीर हैं, जैसे कुत्ता समझता है हम body हैं। हम लोग वही समझते हैं हम शरीर हैं—हम Indian हैं, हम American हैं, हम हिंदू हैं, हम मुसलमान हैं। ये शरीर का... कोई असल में हमारे शरीर नहीं है, ये कौन जानता है? वो अपने को परिचय... आप कौन हैं? "ना, हिंदू हैं, हम मुसलमान हैं, family हैं, हम Indian हैं, हम काला हैं, सब गोरा हैं।" सब शरीर का परिचय। पर आत्मा का परिचय कौन देता है? कोई जानता भी? तो कम से कम इतना तो जान लीजिए। भगवान यही तो बताते हैं पहले ही: "देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा" [श्रीमद् भगवद्गीता 2.13]। "देहिनः" माने ये शरीर के भीतर जो शरीर का मालिक है, वो है। इसी को समझिए एक बार, और फिर आगे और सब इसी को समझिए, इसको सोचिए। भगवान first गीता में: "अस्मिन देहे... अस्मिन देहे देहिनः..." "देहिनः" माने जिसका शरीर। एक बच्चा पूछा जाए, उसको उँगली से, "क्या है?" वो कहेगा, "हमारी उँगली है।" वो नहीं बोलेगा, "हम उँगली हैं।" नहीं बोलेगा, naturally. तो "हम" कौन हैं? उसको कोई संधान नहीं है। "वो हमारा अंगिका... बस हमारा शरीर है।" सब बोलेगा, "हमारा coat है।" Coat में खूब साबुन लगाओ और हम भूखे जाएँ, उसको खाने को नहीं, तो कितना दिन चलेगा? ये चलता है। "हमारा coat है, coat में खूब साबुन लगाओ।" और हमारा भी है, धोखा में रहो, अंधकार में। कुछ जानता ही नहीं हम क्या हैं, उसको जानता नहीं। और हमारा coat को खूब जानता है, तो coat में साबुन लगा ले, तुम्हारा वो उपकार हो जाएगा? चलता है, coat में साबुन लगाओ और हम भूखा हैं। इसलिए चिल्लाता है, "भूखा है, भूखा है, भूखा है, भूखा है!" कहाँ शांति मिलेगा? coat पहनने वाले को भूखा रख दिया और coat का खूब साबुन, उसका क्या लाभ होगा? इसी को तो समझिए कि हम coat नहीं हैं, हम coat पहनने वाले हैं। एक बात को समझिए, यही तो मुख्य बात है। आप समझने नहीं देते। coat को ही हम सब... दुनिया देखिए, लड़ाई-झगड़ा क्यों? "हम पाकिस्तानी हैं, हम हिंदुस्तानी हैं, American हैं, हम Russian हैं।" दुनिया ही सब मूर्ख है, इसलिए तो कृष्ण consciousness movement का बहुत ही ज़रूरत है। सब मूर्ख हैं, उसको सिखाने के लिए पहली: "भगवान, तुम coat नहीं है, गधा! तुम coat पहनने वाला है।" किसी एक बात को समझ जाए, तो सब... वो नहीं समझे। वो केवल, "नहीं, हम coat, हम..." सब तरह से समझाइए कि तुम coat नहीं है, तुम coat पहनने वाला है, वो समझेगा। कुत्ता को समझाइए, "भाई कुत्ता, तुम ये शरीर नहीं है।" वो समझेगा? वो भोंकेगा, "भाऊ-भाऊ!" यही हम लोग... हम लोग को समझाते हैं, body नहीं है, वो भोंकता है। क्यों? इधर ये position है। "उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।" समझाओ तुम, "भाई, शरीर नहीं..." वो जलाहार आएगा, वो ये... किन्तु उसका समझ में, समझने में उसको शक्ति ही नहीं है। इसी प्रकार अगर मनुष्य भी ऐसे रह गया, तो फिर कुत्ते से उससे फ़र्क क्या है? जहाँ ये नहीं, फिर उसे कुत्ते से उससे क्या फ़र्क है? बड़ा कठिन सा... `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` In the fifth chapter, Lord has written, no difference: dog, chandala, like that. paṇḍitāḥ sama-darśinaḥ [श्रीमद् भगवद्गीता 5.18]। In the fifth chapter. क्या? "तुम तो शरीर नहीं है, तुम तो आत्मा है।" जो आत्मा-दर्शन, वो समदर्शी। वो देखता है जो कुत्ता के भीतर भी जो आत्मा है और मनुष्य का शरीर... नहीं, वही आत्मा है। Coat different, जैसे आपका coat different from his coat, different... coat तो जो देखने वाला है, सब coat अलग-अलग हो सकता है, लेकिन coat के भीतर जो है, वो एक मनुष्य है। ये समदर्शी। समदर्शी का अर्थ होता है जो coat को देखता नहीं, coat के भीतर में क्या है, उसको देखता है। "Coat के भीतर एक gentleman है।" इसलिए समदर्शी। नहीं तो ये पंडित बोलता है वो: "विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः" [श्रीमद् भगवद्गीता 5.18]। एक ब्राह्मण पंडित है, बहुत भारी पंडित है, वो भी बैठे हैं, कुत्ता भी बैठे हैं, समदर्शी पंडित हुआ। एक ब्राह्मण और कुत्ता को देखता है? नहीं, वो ब्राह्मण का शरीर भी नहीं देखता, कुत्ता का शरीर भी नहीं देखता। वो देख रहा है कि ब्राह्मण के भीतर आत्मा है और कुत्ता के भीतर भी आत्मा है, इसलिए समदर्शी। और अगर कोई बोल दे, "हम तो ब्राह्मण और कुत्ता, ऐसे ही समझता है," तो साला पागल है! उसका coat दर्शन नहीं है, वो पंडित... वो coat के भीतर जो व्यक्ति है, उसका दर्शन है, इसलिए समदर्शी। नहीं तो अगर कोई बोले, "हम तो एक बड़े विद्वान, भारी विद्वान ब्राह्मण, कुत्ता को समान देखते हैं," तो उसको बोले, "साला पागल!" वो उसका शरीर का दर्शन... वो शरीर के भीतर जो व्यक्ति है, उसको... आइए, आइए ना। आत्म-दर्शन, ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा... [श्रीमद् भगवद्गीता 18.54] आइए। `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` और थोड़ा सवाल... `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` तो श्रीमद् भगवद्गीता खूब अच्छी तरह से पढ़िए। सारा प्रश्न का उत्तर है, ज्ञान भगवान खुद बता रहे हैं, उसका ध्यान से पढ़िए। और ज़्यादा पंडित ना मानिए, "कुरुक्षेत्र का अर्थ ये है, पांडव के लिए ये..." सब मूर्खता छोड़ दीजिए। जैसा भगवान बताते हैं, उसके... काम भारत... ज़्यादा पंडित हो जाएगा, मूर्ख है ही है, और ज़्यादा मूर्ख हो जाएगा। एक चीज़ का interpretation ज़रूरत होता है जब समझ में नहीं आता। जब चीज़ हमको स्पष्ट मालूम होता है, उसमें और interpretation करने का क्या ज़रूरत है? कोई ज़रूरत ही नहीं है। उसको बोलता है तकिया, ये सब कोई जानते हैं ये तकिया है। अब इसमें interpretation, "तकिया का अर्थ होता है हकिया।" ये क्या? ये गधापन है कि नहीं? अभी सब कोई जानता है तकिया है, फिर इसका अर्थ क्यों लगाते हैं? अर्थवाद... सब कोई जानता है कुरुक्षेत्र जगह है, उधर लड़ाई हुई थी, उसमें अर्थ लगा... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` कितना बड़ा मूर्खता है! सब तो कोई जानकारी... तकिया, तकिया, तकिया का अर्थ क्या है? वो है... `[खांसने की आवाज़]` `[गला साफ़ करने की आवाज़]` ज्ञान-भंडार मौजूद है, उसको लीजिए। जैसे भगवान बताया, उसमें आपको जगह में... `[खांसने की आवाज़]` `[गला साफ़ करने की आवाज़]` घर में सिखाइए, सब बाल-बच्चे को सिखाइए। सभी गुरु हो सकता है घर में। ठीक-ठीक ज्ञान जो दे सकेगा, वो गुरु है। ज्ञान का भंडार... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` तो श्रीमद् भगवद्गीता है। जब जैसे श्रीमद् भगवद्गीता है, उसको अपने बाल-बच्चे को सुनाइए, तो उनका उपकार होगा, आपका उपकार होगा। ऐसे नहीं है कि आपको भी विदाई देनी पड़ेगी। आपके चार अगर कर सकें, कीजिए। नहीं तो अपना friends हैं, family हैं, मोहल्ले हैं, उसको समझाइए। यही mission है, फिर खत्म। चैतन्य महाप्रभु का mission है: "सब गुरु बनो।" ठीक-ठीक ज्ञान... `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` जहाँ तक तुमसे हो... नहीं, सभी को जानेगा। इंडिया के बाहर जाने से बाकी चीज़ ठीक सिखाओ, उसमें गलत-सलत... ज़्यादा पंडित हो गया और अनशन में शुरू कर दिया, उसमें क्या आदमी को पुकारता है?

"Speech has got only one speech. There are many men... concentrate the mind..."

ओ, mind इधर-उधर भागेगा, उसको पकड़ के... ये mind का काम ही है भाग जाना, चंचल। इसलिए yoga practice, mind को... योगा, इंद्रिय... ताकि mind तो control हो। Mind को control नहीं करने से, वो mind भी आपका दुश्मन। Mind को control करके, वो आप खाली उसको train करना। `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` लड़का को आप अच्छी तरह से education दीजिए और बर्बाद कीजिए, दुश्मन। उसको mind control नहीं होता है, उसके लिए जो और भक्त होते हैं, "समय, mind को भगवान के चरण में रख लेता हूँ।" बस, उसको subject... जो नाम, जो mind को सब भगवान के चरण में लगा रखते हैं, बस उसको सब... जो first class, भगवान खुद बताते हैं: "योगिनामपि सर्वेषां..." [श्रीमद् भगवद्गीता 6.47]। इसलिए कलयुग में... को भगवान के चरण में लगा रखना सब... `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` "कृष्ण-पदारविन्दयोः..." ये भक्त नहीं कर सके, इसलिए भगवान बता रहे हैं श्रीमद् भगवद्गीता।

"Not fasting also? Not emphasized in the Gita?"

Fixing mind. Fasting वही है जो restaurant ना खाइए, भगवान के प्रसाद... ये food, food which is offered to Krishna. Don't take food from the market. से जिव्हा... भगवान को प्राप्त के लिए बताया, जिव्हा भगवान को पाने के लिए... जिव्हा क्या बताया? "अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः" [भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.234]। और सब जो इंद्रिय हैं, वो इंद्रिय से भगवान को संधान नहीं मिलेगा। आप भगवान को देखने को चाहते हैं, तो आँख से भगवान का दर्शन नहीं; और कान भी है, भगवान का सुनना भी ठीक से... सब इंद्रिय failure हो। अच्छा, एक इंद्रिय है, उसको... वो क्या है? जिव्हा से। "जिह्वादौ हि..." जिव्हा, ये बहुत सा... क्या process है? जिव्हा से भगवान से मिलेगा, आँख से दर्शन नहीं मिलेगा, कान से नहीं मिलेगा, हाथ से नहीं मिलेगा, पैर से नहीं मिलेगा, जिव्हा से मिलेगा। यही बात। क्योंकि जिव्हा को अगर control कीजिए... भगवान प्रसाद छोड़कर कुछ खाएँ नहीं, और भगवद्-कथा बिना कुछ बोलें नहीं। भगवान... taste करना और कुछ उच्चारण करना, दो चीज़ हम control करें। जिव्हा से भगवद्-नाम बिना और कुछ बोलें नहीं, जिव्हा में जो भगवद्-प्रसाद नहीं है, उससे हम touch नहीं करें। दो काम कीजिए।

"स्वामी जी, संग ऐसा मिलता है ज़्यादातर लोगों का, कोई दुकान में, कोई स्कूलों में, ज़्यादातर संग... ये वैष्णव संग मिलने से प्रभाव उन लोगों का ज़्यादा पड़ जाता है।"

ये तो ज़्यादातर साधु-संग किया जाए। जब जाकर के... साधु-संग बिना भगवान कैसे... नहीं मिलेगा। ये संग... संग अगर आप चोर का संग नहीं करेंगे, चोरी कैसे सीखेंगे? चोर से मिलिए, चोरी बहुत अच्छी तरह सीख जाएँगे। इसलिए भगवान... भक्तों से मिलिए, तो भगवान समझ जाएँगे। "ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते" [श्रीमद् भगवद्गीता 2.62]। तो... "सङ्गात् सञ्जायते..." हम लोग association बना रहे हैं, जो आदमी को मौका मिले कि साधु-संगत करने। इधर आएगा, रहेगा, भगवान की आरती भेजेगा, भगवान प्रसाद खाएँगे, भगवान की कथा सुनेंगे। ऐसे करते-करते कुछ मिल जाएगा, step by step है। जैसा आप लोग आए हैं, श्रद्धा है। अब इसको आगे बढ़ाइए। इधर जो साधु हैं, उसको संग करेंगे, फिर आगे बढ़िए तो भजन-क्रिया, फिर आगे बढ़िए अनर्थ-निवृत्ति, फिर आगे बढ़िए निष्ठा, फिर आगे बढ़िए रुचि, फिर आगे बढ़िए आसक्ति, और आगे बढ़िए भाव... भगवान नहीं, भाव। भाव stage में आ गया, तो ठीक, पक्का। तो भाव stage में आने के लिए सब stage, साधु-संग किया, तो फिर साधु-संग से भजन-क्रिया, तो तथा... आसक्ति, भाव... ये सब क्रम है, भगवान मिल जाएँगे।

"इसका अर्थ क्या है, स्वामी जी? 'सर्वशक्ति नामे दिया करिया विभाग'?"

"सर्वशक्ति नामे दिया करिया विभाग।" जी हाँ, विभाग... कोई किताब में पढ़ा था बंगाली में? "नामे दिया करिया विभाग।" नाम में शक्ति है। जो नाम है, वही भगवान। "नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता..." [शिक्षाष्टक 2]। भगवान के नाम... अपराध को भगवान... `[गला साफ़ करने की आवाज़]`

"Swamiji, I am more than anyone, you see, who can give on this subject, Veda, sarva..."

वो खज़ाना लिखिए, बाकी subject में अगर कृष्णा है, तो सब ठीक है, नहीं तो बेकार। First, this `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` is just to convince different types... some Krishna, not anything. May write books, many, central point Krishna. Find any, will find simply Krishna, Krishna. Similarly, anyone who written such Krishna... "तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि। नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यच्छृण्वन्ति गायन्ति गृहन्ति साधवः" [श्रीमद्-भागवतम् 1.5.11]। "न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित्। तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमन्त्युशिकश्रियाः" [श्रीमद्-भागवतम् 1.5.10]। The book in which there is no Hari is this... very nice book, grammatically, metaphorically very nice, citra-padam. vacaḥ means svacaḥ citra-padam harer yaśo na pragṛṇīta, but there is no discussion of the Supreme Lord, vāyasaṁ tīrtham. That is the garbage, it is enjoyed by the crow. vāyasam means crow. uśanti mānasāḥ—in that place, the white swan does not go. Where the crows take pleasure, swan, white swan does not go. Is it not? Swan require very nice water, very garden, charging power. Swan will be there, and the crows will be there where all garbage, all nasty things, they... When they are there, as there is division between the birds, there are divisions of men. Those who are devotees, they will take pleasure in this transcendental... those who are crows, they will take pleasure in what is that? Detective, जासू... Crows, meant for the crows. And this is meant for the swans. There are two classes of birds: the white swan, black crow. There are two classes of men: the white swan takes pleasure in this book, Krishna described, and black will take pleasure...

"लेकिन स्वामी जी, अपने रामायण में, सब में कहा है कि बिना गुरु के तो ज्ञान होता नहीं। कृष्ण को, भगवान को बिना किसी के माध्यम के तो जान नहीं सकते, अपनी बुद्धि से थोड़ी जान सकते हैं? और कृष्ण जगद्गुरु हैं, लेकिन उन्होंने कहा है उसी में कि 'राम से अधिक राम का दासा'। गुरु मिला तो ठीक, संगो या संता, उसका भी गुरु चाहिए सर। तो गुरु तो सबके... भगवान को मिलने के लिए गुरु नहीं चाहिए?" `[नाक से की जाने वाली आवाज़]`

महा नीच कार्य करने के लिए गुरु चाहिए, और इतना बड़ा भारी कार्य जो भगवान को मिला देगा, उसके लिए गुरु नहीं चाहिए? मूर्ख! जो भी काम करो, उसके लिए... "कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः" [श्रीमद् भगवद्गीता 7.20]। जिसका मूर्ख... मूर्खता है, मूर्ख है, वो दूसरा देवता... "जगत् तुम क्या मूर्ख होना चाहते हो ना पंडित?" मूर्ख दूसरे देवता का नाम... मानते ही हैं। "कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः"—जिसका ज्ञान नाश हो गया, भगवान खुद बोल रहे हैं। तो तुम अपना ज्ञान को नाश करने को चाहते हो, करो, कौन मना करता है? Real Krishna, Krishna सब बोल देता है, तुम्हारी मूर्खता से नहीं समझ... क्या अन्य देवता? देवता जो भजन करता है, मूर्ख है। भगवान बोलते हैं। तुम मूर्ख होना चाहते हो, कौन मना करता है? Do not go... very practical. `[नाक से की जाने वाली आवाज़]` God has given... रास्ता में एक constable, वो हाथ दिखा दिया, सरकारी, रुक गया। `[गला साफ़ करने की आवाज़]` अगर कोई मूर्ख उठाकर समझे, "यही government, ये जो constable है, हाथ ऐसे कर दिया और बड़े-बड़े जमींदार, business, सब कार्य..." तो constable का वो समझे, "यही भगवान।" तो भगवान है, practically हाथ ऐसा कर दिया, बड़े-बड़े judge, magistrate, सभी... तो अगर कोई मूर्ख समझे, "यही सब कुछ हो जाएगा..." `[गला साफ़ करने की आवाज़]` मूर्ख लोग समझते हैं, "यही सब कुछ।" जानता है इसका बाप का बाप, बाप का बाप बहुत है। इसी प्रकार ये जो देवता लोग को जो समझते हैं, "यही भगवान," वही है जो constable को समझता है, "यही governor, यही..." इसलिए hṛta-jñānāḥ। थोड़ा सा power देख के समझें, "यही सब..." क्योंकि भगवान का power नहीं जानता है। वही constable का देख के समझें, "यही सब..." जानता नहीं सारी पूर्ण भगवान, उसका ज्ञान नहीं। वही कूप-मण्डूक! नहीं तो कभी out देखा नहीं, समुद्र क्या है, वो समझे कूप है। इसलिए उसको कूप-मण्डूक। कुआँ का जो मण्डूक है, वो कुआँ का तीन फुट पानी समझे। इसलिए hṛta-jñānāḥ—ज्ञान... क्योंकि साधारण देवता को भगवान समझता है, उसका ज्ञान... भगवान इसलिए chief, भगवान। हम लोग आज्ञा ले लेते हैं। कोई आदमी बोल दिया, "हम भगवान हैं।" थोड़ा सा सोना बना दिया, बनाता नहीं मैं, बस उसको भी भगवान! अगर सोना ही बनाने में भगवान होता है, तो हम एक छटाँक सोना बनाने का क्यों? सोना का mine बनाया, हज़ारों उसके पास नहीं... सोना, यही साधारण पृथ्वी है, ना जाने कितना सोना कमाए। और एक planet है, ये करोड़ों planet हैं, ऊपर में सब planet हैं, वहाँ मुक्ता का रास्ता होता है, ये सब है। तो एक छटाँक सोना बनाने वाला काम भगवान क्यों बना? और और सब हज़ारों-करोड़ हो सकता है, जहाँ हीरा का रास्ता है, का... उसको भगवान माने? तो ज्ञान... ज्ञान नहीं है, मूर्ख है, जानता नहीं भगवान। जहाँ पेड़ नहीं है, वो रेड़ी का चारा देख के, "यही सबसे बड़ा..." अज्ञान! इसलिए बताइए text, Bhagavad-gita, acharya, Bhagavad-gita acharya, Ramanuja, any acharya, Bhagavad-gita. Where is the difference? Mahacharya say that Krishna is not Bhagavan? He say... Where is the difference? No difference, actually. That's all. Life... he may not read all, is not understood. Why not understood? If we accept Krishna as the Supreme Lord, then he belong to Madras, and if after reading all the Madras has been any darkness whether Krishna is God or not, then what is use of reading? Because those precious texts... Yes, it is precious text only for the person who has understood it. Simply letter, one bundle of books, one learned pandit, well, and what help to the gadhā? Simply bearing the bundle of books. Those books also simply... simply carrying the books is not knowledge. You must know what is there in the book, that is knowledge. "I am carrying so many books, I have..." And ask me, "I know the books." "You know this subject matter?" "What is daily..." Then you know. Simply, "I am carrying so many books." But you... Gita has been considered as the essence of all the Vedas, Upanishads and Puranas. sarva-upaniṣado gāvo... [Gītā-māhātmya 6]. If you understand Krishna, then you understand all. Krishna, Dvapara-yuga, Kali, any difference? Yuga, Bhagavad-gita respect yuga, Dvapara-yuga. Is there anything? I did not read Bhagavad-gita completely, so I want everyone say Bhagavad-gita yuga-yuga difference will not be. It is for this Krishna, Bhagavad-gita, just beginning of the Kali-yuga, because people of Kali-yuga less intelligent. Personally speaking, the whole, all of... `[गला साफ़ करने की आवाज़]` for all yugas, all, all, all time, all time. At the time of creation, at the time dawn, the Lord has already told to Vivasvan, the sun-god, and to Ikshvaku, the Manu, and like that. It was lost, this knowledge. Again the Lord has told to Arjuna, and through Arjuna to mankind in general. Rama also? Yeah, there is no difference between all time type. सारे वेदांत का सार निवेदन करूँ:

"सर्ववेदान्तसारं हि श्रीमद्भागवतमिष्यते। तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित्" [श्रीमद्-भागवतम् 12.13.15]

"परं दृष्ट्वा निवर्तते" [श्रीमद् भगवद्गीता 2.59]

यानी सारे वेदांतों का सार तो श्रीमद्भागवतम् जी है, और श्रीमद्भागवतम् जी में सारी श्रीकृष्ण की तो कथा है।

"आप सर्ववेदान्तसारं श्रीमद्भागवतम्..."

सारे वेदों का... वेद में मेरे ख्याल से राम या कृष्ण, there is no difference. Only Rama, Krishna.
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥