वही हिसाब-किताब करने से, मनु की जो आयु है उसको हिसाब करने से, कोई 40 करोड़ वर्ष पहले भगवान श्री कृष्णा ने ये जो कृष्ण भक्ति, सूर्य भगवान को कहा—विवस्वान। सूर्य, जो आप लोग सब देखते हैं, इधर भी राजा है, इधर भी प्रजा है और राजा का नाम है विवस्वान। नाम भी बतलाया गया है शास्त्र में। जितने यह सब गोलोक हैं, भूगोल हैं, नक्षत्र, तारा इत्यादि, सब जगह में ऐसे राजा भी हैं, प्रजा भी हैं, शहर भी हैं, गाड़ी, घोड़ा सब कुछ है। कि सूर्य लोक में भी, आजकल के जो वैज्ञानिक हैं, वह तो स्वप्न में भी नहीं समझ सकते कि सूरज में कोई जा सकता है, क्योंकि वह अग्निमय है। परंतु उधर जो जीवात्मा है, जो रहने वाला है, वे लोग देवता विशेष हैं। उनका शरीर अग्निमय है। हमारा शरीर मिट्टी में है, या हमारे शरीर में ज्यादा मिट्टी है। इसी प्रकार पांच भौतिक जो द्रव्य हैं—क्षिति, मट्टी, जल, अग्नि, वायु, आकाश—यही शरीर जैसा आपका बनाया, हमारा बनाया है, इसी सभी का ये पांच चीज से बनाया हुआ है। किसी के शरीर में कोई चीज ज्यादा हो, जैसे आयुर्वेदिक हिसाब से किसी का पित्त अधिक है, किसी का कफ अधिक है। इसी प्रकार शरीर भी अलग-अलग भूगोल में, अलग-अलग लोक में अलग-अलग शरीर होता है। तो सूरज लोक में भी शरीर है। यह बात नहीं है कि वह खाली पड़ी है। नहीं, कोई जगह खाली नहीं है, सब जगह जीव हैं।
तो भगवान कृष्ण चंद्र पहले सूरज भगवान को भी श्रीमद् भगवद्गीता का विषय सुनाया था और वह फिर नष्ट हो गया। इसको रखिए, बातचीत ना कीजिए, ये कोई important चीज नहीं है, सुनिए। तो भगवान खुद कह रहे हैं कि:
ये जो श्रीमद् भगवद्गीता, भगवद्-भक्ति... श्रीमद् भगवद्गीता माने भगवद्-भक्ति। श्रीमद् भगवद्गीता कोई politician की किताब नहीं है कि श्रीमद् भगवद्गीता दिखा के अपना कोई राजनैतिक मतलब है उसको हासिल कर लिया जाए। नहीं, श्रीमद् भगवद्गीता है भक्त के लिए। कई प्रकार के आदमी होते हैं—ज्ञानी होते हैं, कर्मी होते हैं, योगी होते हैं और भक्त भी होते हैं। ये जो श्रीमद् भगवद्गीता है, इसमें ज्ञान और कर्म की बात सब बताई गई है, परंतु आखिरी में श्रीमद् भगवद्गीता का सिद्धांत है—भगवद्-भक्ति।
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"
ये श्रीमद् भगवद्गीता का सिद्धांत है। "हर समय हमारा चिंतन करो (मन्मना), हमारे भक्त बन जाओ (मद्भक्तो), हमारी पूजा करो (मद्याजी) और हमको नमस्कार करो (मां नमस्कुरु)।" चार चीजें हैं। जैसे भगवान की मूर्ति इधर है, सब कोई अपने घर में भगवान की मूर्ति रख सकते हैं, कोई मुश्किल नहीं है। और ये चार चीजें साधन हैं। क्या चीज है? भगवान की मूर्ति को देख के हृदय में एक छाप होती है। कहीं भी जाइए, भगवान की मूर्ति का दर्शन कीजिए—मन्मना। और मद्भक्त—बिना भक्त हुए कौन भगवान को स्मरण करेगा? इसलिए भक्त होना पड़ेगा। भक्त का अर्थ होता है जो भगवान की सेवा में सब समय नियुक्त है।
तो भक्तिविनोद ठाकुर जैसे बताते हैं: "कृष्ण संसार करो छाड़ि अनाचार।" संसार, अपना बाल-बच्चे लेकर के जीवन पालन करना है, करो। परंतु भगवान कृष्ण को center करके, बीच में रखो। "कृष्ण संसार करो छाड़ि अनाचार।" अनाचार जो है, इसको परित्याग करो, क्योंकि शुद्ध होना पड़ेगा। भगवान परम पवित्र हैं, शुद्ध हैं। भगवान के पास पहुंचने के लिए जो भक्त हैं, जो भगवान के पास जाने को चाहते हैं, उनको भी शुद्ध होना पड़ेगा, अशुद्ध नहीं। श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है:
"येषां त्वन्तगतं पापं..."
जिसका पाप बिल्कुल नष्ट हो गया है, जो पापी नहीं है।
"...जनानां पुण्यकर्मणाम्"
और पाप से निर्मुक्त कौन हो सकता है? जो केवल पुण्य कार्य करते हैं, पाप कार्य करते ही नहीं, वो पाप से मुक्त हो सकते हैं। एक दफे पाप कर लिया, थोड़ा पुण्य कर लिया, तो ठीक-ठाक हिसाब-किताब ठीक हो गया—ऐसा नहीं। केवल पुण्य कार्य कीजिए, पाप ना कीजिए। इसका नाम है "जनानां पुण्यकर्मणाम्"।
"ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः"
इस प्रकार जो व्यक्ति हैं, केवल पुण्य कार्य ही करते हैं, पाप का कोई नाम ही नहीं है, इस प्रकार जो व्यक्ति हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त हो जाते हैं। वे जानते हैं कि ये जो द्विभुज मुरलीधर कृष्ण हैं—"कृष्णस्तु भगवान स्वयम्"। वे समझ जाते हैं। भगवान, ऐसे बहुत से देवताओं को भी कभी-कभी कहा जाता है, जैसे भगवान शिव जी को भी कहा जाता है, ब्रह्मा जी को भी कहा जाता है, नारद को भी कभी कहा जाता है। परंतु भगवान, जो मूल भगवान हैं—"ईश्वरः परमः कृष्णः", "कृष्णस्तु भगवान स्वयम्"। और सब भगवान के कला-अंश हैं, और जो स्वयं भगवान हैं, वो स्वयं कृष्ण हैं। यह शास्त्र का सिद्धांत है।
इसलिए भक्तिविनोद ठाकुर बता रहे हैं कि "कृष्ण संसार करो छाड़ि अनाचार।" हम लोगों की ये संसार करने की जो प्रवृत्ति है, ये जो हम लोग भौतिक जगत में सब आए हैं, कुछ भोग करने के लिए आते हैं। इसलिए पहले ब्रह्मा के जैसा जन्म होता है। पहले तो ब्रह्मा ही का जन्म हुआ था। तो पहले जब दुनिया में आते हैं भौतिक जगत में, ब्रह्मा के जैसा जन्म मिलता है। फिर अपने कर्म-विपाक से ब्रह्मा से वो जो मैला का कीड़ा होता है, वह भी जन्म लेने पर... वो करते-करते-करते-करते इतना नीचे आ जाता है।
इसीलिए चैतन्य महाप्रभु बता रहे हैं: "एइ रूप ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोनो भाग्यवान् जीव।" इसी प्रकार भ्रमण कर रहा है। कभी ब्रह्मा हो रहा है, कभी इंद्र हो रहा है, कभी चंद्र हो रहा है, कभी ये सब देवता होते हैं, फिर नीचे गिर जाते हैं। इधर भी आकर के कभी कोई बड़ा नाम, ज्यादा व्यवसाय हो गया, बाकी कर्म का विपाक ऐसा है कि थोड़ा ही असावधान होने से फिर उसको नीचे गिरना पड़ता है। 84 लाख योनियाँ हैं—"जलजा नवलक्षानि, स्थावरा लक्षविंशति"। तो फिर जाके जो गिर जाते हैं, वो जन्म-मृत्यु के चक्र में कभी कीड़ा होता है, कभी ब्राह्मण होता है, कभी शूद्र होता है, कभी जानवर होता है, कभी देवता होता है। इसी प्रकार घूमता-फिरता रहता है ब्रह्मांड में।
इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "एइ रूप ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोनो भाग्यवान् जीव।" इस प्रकार भ्रमण करते-करते कोई भाग्यवान अगर जीव हो, तो उसको एक मौका मिल जाता है। क्या मौका मिल जाता है? "गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज।" यदि भाग्यवान हो, तो उसको गुरु मिल जाते हैं, और कृष्ण की कृपा से, जो वास्तविक इस संसार चक्र में भ्रमण करते-करते जो थक जाता है और भगवान से प्रार्थना करता है, "भगवान, अब हमको उद्धार कीजिए," उसके लिए भगवान गुरु भी दिखा देते हैं। इसलिए कहते हैं गुरु-कृष्ण। कृष्ण की कृपा से... कृष्ण सबके हृदय में बैठे हुए हैं।
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"
भगवान जो हैं, सबके हृदय में बैठे हुए हैं, देखते हैं ये क्या कर रहा है। भगवान चाहते हैं, "ये मूर्ख जो है, ये संसार भोगने को आया है, चलो इसको दो।" जो चाहता है, दो। जब थक जाएगा, तब हमारे पास आएगा। इसलिए शास्त्र में कहते हैं, श्रीमद् भगवद्गीता में:
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥"
अनेक जन्म ऐसे भ्रमण करते-करते-करते-करते जब वास्तविक ज्ञानवान होता है, तब "वासुदेवः सर्वमिति"—वह भगवान के चरणों में प्रपत्ति करता है। जो अनेक जन्मों के पश्चात् भगवान के चरणों में प्रपत्ति करनी है, यही असल सिद्धांत है।
तो भगवान खुद बताते हैं, जब भगवान इस लोक में प्रकट थे, उस समय क्या बताया?
ये सब छोड़ो। यदि सुखी होने को चाहते हो, तो यह सब भोग की वासना छोड़ के हमारे चरणों में प्रपत्ति करो और तुमको हम सब चीज देंगे। भोग का कुछ अभाव नहीं रहेगा। भगवान के जो भक्त होते हैं, उनको कोई अभाव नहीं है। साधारणतः आप लोग सब कोई नौकर-चाकर रखते हैं, तो आप लोग देखते हैं कि भाई, हमारे पास ये काम कर रहा है, सब समय सेवा में नियुक्त है, इसको कोई असुविधा ना हो। इसी प्रकार यदि भौतिक जगत में इस प्रकार का व्यवहार है, तो जो भगवान की सेवा में लगे हुए हैं, उनको कोई अभाव हो सकता है? कभी नहीं! भगवान खुद कहते हैं: "कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।" हमारे भक्त का कभी दुख नहीं होगा। इसलिए भक्तिविनोद ठाकुर का कहना है कि ये जो हम लोगों ने दुनिया का सब भोग का plan बनाया है, करो, बाकी कृष्ण को center करके करो और अनाचार-व्यभिचार को छोड़ दो। फिर जीवन में सुखी हो जाओ, फिर कभी दुख नहीं होगा। "कृष्ण संसार करो छाड़ि अनाचार।"
तो अनाचार शास्त्र में जो कहते हैं कि चार प्रकार का जो पाप है, उसको छोड़ दीजिए:
"स्त्री-सून-पान-द्यूतानि यत्र पापश्चतुर्विधः"
एक तो अवैध स्त्री-संग करना। विवाहित स्त्री छोड़ के कोई स्त्री से संपर्क रखना नहीं, यह शास्त्र का नियम है। चाणक्य पंडित ने बताया है कि पंडित कौन होता है? तो तीन चीजें बताई हैं: "मातृवत् परदारेषु"—जो दूसरी स्त्री को अपनी मां के समान समझता है। ये हमारा वैदिक सिद्धांत है। इसलिए ब्रह्मचारी कोई भी हो, और जो दूसरी औरतें हैं, उनसे 'मां' बोल के संपर्क करते हैं—"माताजी"। ये नियम है। यह महापाप है जो अपनी धर्मपत्नी छोड़ करके और कोई स्त्री से संपर्क रखता है। महापाप है, इसको छोड़ना चाहिए, यदि आपको भगवान को चाहिए। और यदि नरक में जाना चाहिए, वो दूसरी बात है, जाइए, खुद जाइए।
तो इसको छोड़नी चाहिए—अवैध स्त्री-संग। और सूना—वृथा पशु-मांस को खाना। मनुष्य के लिए पशु-मांस खाना नहीं है। मनुष्य के लिए भगवद्-प्रसाद खाना चाहिए। भगवान कहते हैं:
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति"
इस प्रकार भगवान का प्रसाद खाना चाहिए और अवैध स्त्री-संग छोड़ देना चाहिए। और किसी प्रकार का नशा—चाय भी पीना छोड़ना चाहिए, और coffee और cigarette, बीड़ी—ये भी सब छोड़ना चाहिए। शराब आदि तो छोड़ना ही चाहिए। सूना, पान... पान माने, पान भी खाना छोड़ना चाहिए। पान, ये शास्त्र में लिखा है। इस प्रकार शुद्ध हो जाइए और भगवान का नाम कीर्तन कीजिए।
ये लड़की हंसती है क्यों? ठीक नहीं लगती है? नहीं, मैं cigarette पीता हूं। अच्छा, उसके लिए ठीक है। पिताजी का उसने मुझे सुना कि ये cigarette छोड़ दे। ठीक है, very intelligent है। Yes, ये सब छोड़ दीजिए। इसे छोड़ देने से क्या आदमी मर जाता है? नहीं। ये सब असत्संग से सीखते हैं। और सत्संग कीजिए, भूल जाएंगे। देखिए, ये सब European, American लड़के-लड़की हमारे साथ बहुत हैं, हजारों हैं, 10,000, सब छोड़ दिया। कभी आप लोग हमारे Europe, America मंदिर में जाइएगा, देखिए 250 से कम नहीं, 200, 300, 400 सब हैं, सब छोड़ दिया, बिल्कुल शुद्ध हो गए। बिल्कुल।
तो इसी प्रकार हम लोग यही प्रचार करते हैं कि जो भगवान कृष्ण हैं, और कृष्ण का संसार कीजिए। रोजगार खूब कीजिए, भगवान की खूब सेवा कीजिए, भगवान की मूर्ति को सजाइए, खूब भोग लगाइए। और भोग लगाने से भगवान तो भूखे नहीं हैं कि सब खा जाएंगे, आप ही लोग खाएंगे—प्रसाद। तो इस प्रकार संसार कीजिए और यह सब पाप छोड़ दीजिए, तो सुखी हो जाएंगे। यह हमारा Krishna Consciousness का प्रचार है, और कुछ नहीं है। यह सब के लिए है, ऐसी बात नहीं है कि केवल ब्राह्मण के लिए है, कोई विद्वान के लिए है, कि हिंदू के लिए है, मुसलमान के लिए है। सबके लिए है। ये चार प्रकार का पाप छोड़ दो और भगवान की सेवा करो। सेवा माने सब समय भगवान का चिंतन करो, भगवान में भक्ति करो। पैसा है तो भगवान का खूब अच्छी तरह से मंदिर बनाओ, खूब सेवा करो, खूब अच्छी तरह से भोग लगाओ। यह हमारा भारतीय कृष्ण-भावना है। यह सब छोड़-छाड़ करके जो हम लोग बैठे हुए हैं, इसीलिए भारत की दुर्दशा है। तो फिर हम लोग सिखाने की चेष्टा कर रहे हैं, आप लोग कृपा करके लीजिएगा।
तो धन्यवाद। Thank you very much. हरे कृष्णा। सही बात।
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