ये आज का आदमी सब यही हो गया, वो अपना गला छुरी लगाता है। उसको मना करने से क्या कहे? भगवत दर्शन हर एक सेकंड में हो सकता है। क्या मुश्किल है भगवत दर्शन? भगवान तो सब जगह में हैं, खाली आँख बनाना चाहिए। जैसे एक मशीन है; एक बच्चा देखता है—एक बॉक्स है; जानने वाला है, वो देखता है—मशीन है, सुंदर-सुंदर सब पार्ट्स हैं, उसी में काम हो रहा है। बस इतना ही फर्क है। चीज तो एक ही है, देखने में फर्क है, अपना अवस्था के अनुसार। सब चीज है, श्रीमद् भगवद्गीता में बताया हुआ है। भगवत दर्शन कहीं मुश्किल नहीं, बिल्कुल मुश्किल नहीं, बहुत सरल। लोग आश्चर्य होता है, लोग छपा है ना—"He is God." वो झूठ मानता है कि कोई मानता है कि मानता है—"He is God, you can see also." आपको बता दिया कि देखो भाई, ये चीज देखो, ये चाँद देखो, ये है दरवाजा। देखिए चाँद, चाँद सबके लिए खुला है। देखो, कोई मुश्किल है क्या चाँद देखना? बात सुनें, अपना मतलब सब काम सरल रास्ता जो है उसको लें। मैजिक दिखाने वाला तो भगवान... आपको सवाल का जवाब मिला कि नहीं?
भगवत दर्शन के स्तर से जल्दी का भी हो सकता है। देखता नहीं? हाँ, जल्दी का तो बात अभी हो सकता है। उस तरह से देखेगा, किसी तरह से देखने की चाहता है। गया कोई इधर रहता नहीं पानी, वो आया।
"What do I want, something? Read that. Foresight, you have to preach here, you must learn here to preach."
R-A-S-A, rasa, R-S-R, sub... Kunti, Arjun—
"I am the taste of water." Krishna says, "I am the taste of water." Who has not tasted water? Krishna says, "I am the taste of the water." So, who has not tasted water? बोलिए।
"Everyone, guys, has seen God, but he does not know what is God."
तो वो तो God खुद ही बता रहा है—"Raso 'ham." पहले-पहले जैसा भगवान बताता है, ऐसा करो ना। एक गिलास पानी ले आओ, अभी भगवत दर्शन हो जाएगा। क्या मुश्किल है? अभी बात नहीं सुनेगा, बात बनाएगा उसमें। कैसे भगवान... कौन नहीं देखा? सवेरे उठकर ही तो देखता है, शाम को अगर नहीं है, चंद्रमा है।
"And those who are reading Vedic mantra, Omkara, bhagavan, paurusham nrishu..."
कोई व्यक्ति अपना हिम्मत से कुछ काम किया है, वो जो हिम्मत है, वो भगवान है। इस तरह से भगवान देखो ना। फिर आगे भगवान... भगवान तो सभी कुछ है। असल भगवान में पहुँच जाओ, सब असल है। देखने का आँख होना चाहिए। भगवत दर्शन कोई मुश्किल नहीं, एक सेकंड में हो सकता है। अभी देखने की आँख... भगवान बता रहा है। कल तो हमने बताया ना, जो-जो शराब पीता है, वो भी अगर वो शराब पीके जो आराम मिलता है, टेस्ट (taste), वो टेस्ट को अगर वो भगवान समझे, तो उसको भी एक दिन मंगल हो जाएगा। तो भगवत दर्शन इतना सरल है। वो जो आदमी शराब पीता है, उसका टेस्ट कर लिया ना? तो टेस्ट को अगर वो समझे—"ये भगवान है", फिर एक दिन उसको भी मुक्ति हो जाएगी। क्या भगवत दर्शन मुश्किल है? जैसा रास्ता बताया, ऐसा करो। भगवत दर्शन एक सेकंड... देखिए, भगवत दर्शन होता है। पानी, इसके अलावा भगवान का नाम, वो भी भगवान—हरे कृष्ण। सब समय भगवत दर्शन हो सकता है, अगर आदमी कोई देखने को जानता है और देखने के लिए सीखता है भगवान का, उसको सीखता है।
कहीं लिखा है इस तरह से—"सोना बनाता है वो भगवान है"? ऐसे लिखा तो उसको मानेगा, वो जो को मानेगा भगवान। भगवान जैसा बताता है, उसको सुनेगा। बोलिए, क्या होगा? भगवान ऐसे कोई बताया नहीं जो आके ऐसे सोना बना देगा वो भगवान, ऐसा बताया उसको मानता है भगवान। राक्षस, कोई राक्षस आके ऐसा ठगवा जाके ठगा दे रहा है, वो भगवान है! और भगवान जो सरल रास्ता बताते हैं, उसको नहीं। बोली जी, क्यों ऐसा मूर्ख हो? ऐसा नहीं, भगवान खुद आते हैं, सिखाते हैं—"देखो, ऐसा भगवान देखो, हमको देखो, हमारा शरणागत हो, तुम्हारा सामने मौजूद है देखो।" सब नहीं, वो जो ठगवा जाएगा, वो निकल जाता है। बल्कि वो गिरने को चाहता है, वो ठगने को चाहता है, इसलिए भगवान सब ठगबाज़ के भेज देता है—"ठगाओ इसको सारे अच्छी तरह से।" वो ठगने को चाहता है, वो सरल रास्ता में नहीं जाएगा। चाहता है—"हमको चीट (cheat) करे", ऐसे भगवान भेज देता है चीट करने वाला, सारे को चीट...
वो दिन किसका मकान में पहले ठाकुरदास... ठाकुरदास भागता है। एक कृष्ण का मूर्ति नहीं है, एक राक्षस का मूर्ति अभी लगाया गली में। नहीं, साईं बाबा सामने इधर था, साईं बाबा, साईं बाबा वो भगवान हो गया! अब कृष्ण भगवान हैं, लेफ्ट में शिव का लगा है, शिवबा... कृष्ण का तो मूर्ति नहीं था, गली में था, कहीं होगा पड़ा होगा। आपने पहले नमस्कार किया था, तो सामने होना चाहिए भगवान का। वो भगवान को मानता है, कृष्ण को बहुत, सभी को मानता है, सबको मानता है। वो कृष्ण के साथ-साथ वो साईं को भी मानता है, वही मानता है। तो भगवान ऐसे छोटा चीज है? सबका सवाल हो... आप लोग खाट के नीचे बैठें और हम ऊपर बैठे हैं, आप अगर सब इधर ही बैठ गए, आपका सब एक साथ वो सम्मान नहीं है। भगवान को पीछे छोड़ दिया कहीं, देखने दो, वो साईं को लगा दिया प्रोमिनेंट प्लेस (prominent place)। ये उचित है? हमारा भारतवर्ष में जितना मंदिर है, भगवान का सिंहासन होता है। शिव जी का मंदिर, शिव जी का भी स्थान नीचे होता है। सब मंदिर भगवान को स्थान देना चाहिए। जैसा जानता नहीं भगवान क्या है—"हो सकता है ये भी भगवान।" ये सब किसका उपदेश भी नहीं लेता है, अपने हिसाब से सीख लिया। जानना तो किताब माँगता है, लायक है जो किताब बोलने वाला, साधु-संत मानता है। किताब क्यों हुआ है? श्रीमद् भगवद्गीता किस तरह से, क्यों दिया गया? रास्ता ठीक-ठीक... जब तक गवर्नमेंट लॉ (government law) बुक देता है, तो कानून के अनुसार चलो, तकलीफ नहीं होगा। जो कानून जानता है... कानून नहीं जानता है, तो कानून जानने वाला वकील है, उनसे बातचीत करके अपना बिजनेस चलाता है, अपना काम चलाता है, उसको तकलीफ नहीं। वो अपना मर्जी जब चलाता है, तो भूल-चूक तो होगी ही, फिर उसको तकलीफ उठाना पड़ेगा। यही सब... ये श्रीमद् भगवद्गीता भारी किताब है, इसको देखता नहीं, पूछता नहीं है। कहीं भी लिखा है जैसा जुआचोरा आके जुआचोरी बात करके भगवान हो सकता है? है कहीं लिखा? जानता-सुनता भी नहीं और सीखेगा भी नहीं। "मूर्खोपदेशो हि प्रकोपाय..." मूर्ख को उपदेश देने से वो रंज होता है, शास्त्र में कहते हैं। जैसे साँप है, साँप को दूध पिलाइए—"तो बेटा, तू इधर रोज दूध पीके जा, किसी को काटो नहीं, बदमाशी ना करो।" तो उसका फल क्या होगा? वो जरा दूध पीके आएगा और उसका जहर बढ़ जाएगा। "भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम्।" इसी प्रकार, "मूर्खोपदेशो हि प्रकोपाय न शान्तये।" मूर्ख को उपदेश देने से उसका केवल रंज होता है, शांति नहीं होती। इसलिए सबके लिए गुरु करना चाहिए, जो मानना चाहिए अपने को कि "मैं मूर्ख हूँ, आप हमको सिखाइए।" इसलिए गुरु की जरूरत है। अब यदि अपने घर में बैठके सब समझके—"हम सब कुछ जानता है, हमको क्या गुरु की जरूरत है?" तो फिर वही हो गया, मूर्ख उपदेश, उसको कोई अच्छा बात बोला जाए तो रंज हो जाए। तो हम लोग तो जैसे शास्त्र में है, वैसे बोले। आप चतुर होइए, अच्छा सुखी होइए, तो दुखी होइए। विशेषके पारमार्थिक विषय में वो झूठ बोलना नहीं चाहिए, क्योंकि आदमी को उद्धार करना है। भाई, एक आदमी बीमार है, उसको अगर कोई कह दे—"तुम जो खुशी खाओ, जो खुशी करो", बात है यह? उसको मानना पड़ेगा, जो परहेज है उसको मानना पड़ेगा—"ऐसा खाओ नहीं, ऐसा काम नहीं करो, ऐसी दवाई पियो।" परहेज नहीं मानेगा, जो कुछ खाएगा, जो कुछ करेगा, और भगवत दर्शन हो जाएगा उसका? उसको वही भगवत दर्शन होगा जो... अच्छा, बस अब क्या? भगवान, असल भगवान दें। और पढ़िए, श्रीमद् भगवद्गीता है, पढ़िए इसको। Take it. और दूसरा, दूसरा श्लोक क्या है? भगवत दर्शन कैसा होता है? "रसोऽहम्..." अब संस्कृत पढ़ लेता है? संस्कृत नहीं, थोड़ी हिंदी आती है। अच्छा, अच्छा, पढ़ने की चेष्टा कीजिए। जी।
"This verse explains how the Lord is all-pervasive by His diverse material and spiritual energies. The Supreme Lord can be perceived by His different energies, and in this way He is realized impersonally. As the demigod in the sun is a person and is perceived by his all-pervading energy, the sunshine, similarly, the Lord, although in His eternal abode, is perceived by His all-pervading, diffusive energies. The taste of water is the active principle of water. No one likes to drink sea water because the pure taste of water is mixed with salt. Attraction for water depends on the purity of the taste, and this pure taste is one of the energies of the Lord. The impersonalist perceives the presence of the Lord in water by its taste, and the personalist also glorifies the Lord for His kindly supplying water to quench man's thirst. That is the way of perceiving the Supreme. Practically speaking, there is no conflict between personalism and impersonalism. One who knows God knows that impersonal..."
देखिए, ये निराकार साकार बोलता है ना, ये काम को पानी दिया, पानी समझ लीजिए निराकार, बाकी जो दे रहा है वो साकार। निराकार जो है, जैसे सूरज का किरण बताया, ये तो निराकार। सूर्य जब सोचते हैं, सूर्य का किरण किधर से आता है? तो फिर सूरज लोक में जाएँ। सूर्य लोक जो है ना, और फिर उसके आगे और बढ़ें, सूर्य लोक किसके लिए है? तो उसके भीतर देखेगा सूरज नारायण। तो आखिरी में आकार, पहले से जिसको दूर से दर्शन... अभी अनुभव नहीं है, उसके लिए निराकार। सूर्य का किरण ही सूर्य किरण... जो बुद्धिमान व्यक्ति होगा, वो सोचेगा—"सूरज किरण इतना सुंदर है, इतना प्रकाश है, और ये धूप से कितना आराम मिलता है, किधर से मिलता है, किधर से आ रहा है?" रिसर्च करे, तो फिर सूरज लोक में जाएगा। अगर उसको जाने का अख्तियार है, पहुँच सकता है। बाकी जाने का रास्ता भी है ही नहीं। क्यों? जब सूर्य लोक है, तो लोक माने उधर कोई जीव तो है ही। लोक का अर्थ होता है जीव। तो वो लोग सारा... जैसे चंद्रमा, चंद्र लोक में जाने के लिए तैयार। जैसे इंडोनेशिया पहले आया नहीं, कभी आया नहीं, दूर से सुनता है—"होगा कोई जगह।" बाकी जब उसकी इच्छा होती है—"चलो जी, देखो कैसे आता है", देखता है इधर सब कुछ है। इसी प्रकार जब असल जगह में पहुँचेगा वो, तो निराकार नहीं है, साकार है। दूर से जब देखेगा वो निराकार, चीज एक ही है। बाकी दूर से देखने वाला वो निराकार... पहाड़ दूर में है, दूर से देखिए मालूम होता है धुआँ एक है, एक बादल ऐसा है। आगे बढ़िए, देखिएगा कोई हरा-हरा चीज है। फिर उसके भीतर जाइए, तो देखिए उसके भीतर मकान है, पेड़ है, आदमी है, जानवर है। चीज तो एक ही है। दूर से देखिए और एक थोड़ा और आगे जाके देखिए और कुछ है, अब बिल्कुल वहाँ पहुँचके देखिए तो और कुछ है। तो यही निराकार साकार, जो दूर से देखने वाला है उसके लिए निराकार, चीज एक ही है। दूर से देखने वाला अज्ञान से देखने वाला, जिसका ज्ञान अभी पूरा नहीं है, उसके लिए निराकार। अब जब ज्ञान पूरा हो जाता है, वो साकार। इसलिए श्रीमद् भगवद्गीता में है देखिए—"बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते..." बढ़िया, ट्रांसलेशन (translation)।
"After many births and deaths, he who is actually in knowledge surrenders unto Me..."
इसी प्रकार भगवान के अंग ज्योति, ब्रह्म ज्योति, अनेक जन्म देखते-देखते-देखते जब बहुत आगे बढ़ जाएगा, तब भगवान कृष्ण को दर्शन देगा।
"...knowing Me to be the cause of all causes..."
भगवान कृष्ण को जब देखेगा, उसको समझ... ये जो ब्रह्म ज्योति है, यह कृष्ण से ही आता है, जैसे सूर्य किरण सूर्य से आता है, तब उसका ज्ञान पूरा होगा। अब जब तक भगवान को दर्शन नहीं होता, भगवान में प्रपत्ति नहीं होती है, तब उसका ज्ञान संपूर्ण नहीं है, अभी और आगे जाना। यह विचार...
"...knowing Me to be the cause of all causes, of sarva-karana..."
वो तब समझेगा ये जो ब्रह्म ज्योति निराकार है, इसका कारण है कृष्ण।
"...and all that is, yeah, everything, the original cause is Krishna. Such a great soul is very rare."
या, इसीलिए कृष्ण को दर्शन करने वाला बहुत कम होता है। अनेक जन्म तपस्या करके तभी कृष्ण को समझ पाए। तो जिसका तपस्या आगे बढ़ा है, वही भगवान को समझ पाए। बाकी ये पुस्तक पढ़ करके अगर किसी की बुद्धि ठीक है, वो अगर इसको समझ ले—"यदि कृष्ण ही आखिरी वस्तु हैं, तो शुरू से ही कृष्ण का भजन किया जाए, फिर इधर-उधर हमको जाने की क्या जरूरत?" वो बुद्धिमान, वो ज्ञानवान। और जो मूर्ख है, वो—"चलो, आगे आहिस्ता-आहिस्ता जाएँगे, फिर देखेंगे।" कृष्ण बेचारी आके सामने आके खुशामदी करके कहते हैं—"देखो, मैं ही ठाकुर हूँ, सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" वो नहीं है, इधर-उधर की बात करेंगे, तो फिर कैसे बोल काम चलेगा? चलेगा, देर होगा। "बहुनां जन्मनामन्ते..." होता है, अनेक जन्म ऐसा भटकते रहेंगे, आगे उसी में आना पड़ेगा, उसके बिना गति नहीं। जब तक उधर नहीं आता, तब तक पूर्ण...
"The living entity, while executing devotional service or transcendental rituals, after many, many births, may actually become situated in transcendental pure knowledge, that the Supreme Personality of Godhead is the ultimate goal of spiritual realization. In the beginning of spiritual realization, while one is trying to give up one's attachment to materialism, there is some lingering towards impersonalism. But when one is further advanced, he can understand that there are activities in the spiritual life and that these activities constitute devotional service. Realizing this, he becomes attached to the Supreme Personality of Godhead and surrenders. At such a time, one can understand that Lord Sri Krishna's mercy is everything, that He is the cause of all causes, and that this material manifestation is not independent from Him. He realizes the material world to be a perverted reflection of spiritual variegatedness and realizes that in everything there is a relationship with the Supreme Lord Krishna. Thus he thinks of everything in relation to Vasudeva, or Sri Krishna. Such a universal vision of Vasudeva precipitates one's full surrender to the Supreme Lord Sri Krishna as the highest goal. Such surrendered great souls are very rare. This verse is very nicely explained in the third chapter of Svetasvatara Upanishad. In this body, there are powers of speaking, of seeing, of hearing, of mental activities, etc., but these are all not important if not related to the Supreme Lord."
"Difficulty is that the Supreme Lord, when He comes, they... they think Krishna is an ordinary human being. Avajananti mam mudha manusim tanum asritam. Because they think Krishna is an ordinary human being, so fools, they take advantage that Krishna is a human being. 'If He can become God, I am also God. I can simply... I have to simply show some magic, then I become God.' And those who are thinking Krishna is an ordinary human being, they accept this magician as God."
इसलिए,
"Krishna comes among the human society just to show His favor, teach them personally. But these rascals, mudhas, they accept Krishna as... just like the example: in a prison house there are many criminals, so when Mahatma Gandhi went to prison, they thought that Mahatma Gandhi is also like one of them."
अजी, अब तो महात्मा गांधी भी जेल में आ गया, तो सब हम लोग एक ही हैं! ये बात...
"Krishna, out of His causeless mercy... yada yada hi dharmasya glanir bhavati bharata... abhyutthanam adharmasya tadatmanam srjamy aham... paritranaya sadhunam vinasaya ca duskrtam dharma-samsthapanarthaya sambhavami yuge yuge..."
कृष्ण आते हैं हमारे मंगल के लिए। मैं सोच लूँ—"कृष्ण हमारे ही जैसे कोई व्यक्ति हैं", और यही सोचने वाला कोई व्यक्ति को थोड़ा मैजिक दिखा दे, वो भगवान मान... ये सब कुछ, इसलिए कृष्ण को समझने के लिए सब ज्ञान होना चाहिए। परमात्मा, परमात्मा देवी ऐसी...
"This verse is very nicely explained in the third chapter of Svetasvatara Upanishad. In this body, there are powers of speaking, of seeing, of hearing, mental activity, but these are not... not related... and because Vasudeva is all-pervading and everything is Vasudeva, the surrender in full..."
तो आपको सवाल का जवाब मिला कि नहीं? बस ऐसे काम कीजिए। भगवत देखना है, भगवत दर्शन कोई मुश्किल है? भगवान को देखने के लिए जो तकलीफ है, वो तकलीफ लेने से ही भगवत... वो भगवान खुद बता रहा है, इससे बड़ा कौन होगा भगवान? उसको फॉलो (follow) कीजिए, भगवत दर्शन हो जाएगा उसी वक्त, क्या मुश्किल है?
"Many people think they must practice some yoga exercise to get peaceful mind and then..."
जो प्रैक्टिस (practice) करते हैं परफेक्ट एक्शन (perfect action) लेने के लिए, वो वाल्मीकि मुनि को मिला था, वो 60 हजार वर्ष तपस्या... बड़े-बड़े ऋषि लोग। तो आपको तो 60 वर्ष भी नहीं करते तो खत्म हो जाएगा, फिर भगवत दर्शन कहाँ से?
"So those who want to take such trouble, let them take. But Bhagavan gives the real prescription, very easy. That is the difficulty, they do not want to take the easy process. They want to take something complex in which they will never be successful, that they want."
उधर जैसे होम्योपैथिक डॉक्टर... दवाई होती है ना, और एलोपैथिक डॉक्टर होता है, तो एलोपैथिक दवाई तीक्ष्ण होती है, पॉइज़न (poison) होता है, तो कोई-कोई समझता है यही दवाई ठीक है। और होम्योपैथिक दवाई पानी का ऐसे थोड़ा—"ये क्या दवाई है?" तो भगवान खुद बता रहा है कि देखो जी, पानी पीते समय तुम भगवान के दर्शन कर सकते हो। तो क्या है भगवत... क्या हुआ? वो जो करो, ऐसा करो, ऐसा करो, वैसा करो, तभी तो भगवत दर्शन... वो समझते नहीं कितना दिन तुम करोगे, करते-करते तुम्हारा सब खत्म हो जाएगा, भगवत दर्शन के पहले तुम खत्म हो जाओगे। कलयुग में ये सब संभव है नहीं। पहले जब 1 लाख वर्ष आदमी का उम्र होता था, वो 60 हजार वर्ष तपस्या कर सकते थे। अभी तो तुम्हारा 60 बरस भी उम्र नहीं है, जल्दी-जल्दी काम खत्म करो जैसे भगवान बोलता है। थोड़ा शरीर को ठीक रखने के लिए थोड़ा-थोड़ा... नहीं, शरीर को ठीक रखो और ना रखो, शरीर तो खत्म हो जाएगा जी। तुमको चाहिए शरीर खत्म होने के पहले ही भगवान से संपर्क बनाना है। और शरीर ठीक रहके क्या करेगा? ऐसा तो हाथी का भी शरीर ठीक है, गेंडा का भी शरीर ठीक है, कुत्ता का भी शरीर ठीक है। थोड़ा शरीर ठीक रहता है तो भगवान को याद करने में महसूस करने... भाई, शरीर ठीक रहे या ना रहे, पानी तो तुमको पीना पड़ेगा। यदि शरीर जब ठीक रहता है तब भी पानी पीना पड़ेगा, और जब ठीक नहीं रहता है तब भी पानी पीना। तो पानी पीते-पीते भगवान को समझ लो, शरीर ठीक रहे ना रहे क्या जाता है? शरीर कहाँ ठीक रहता है, शरीर ठीक रहने वाला नहीं है। जितना ही ठीक से रखो, वो खराब हो ही रहा। खाली उसी का पीछा रखना चलना—"शरीर ठीक..." अरे, शरीर ठीक रहे तो अच्छा ही है, ना रहे तो उसमें क्या हर्ज? भगवान कहते हैं—"तांस्तितिक्षस्व भारत..." क्या है? ठीक है।
"Somebody must..."
हमारा 77 वर्ष उम्र है, शरीर क्या ठीक? 77 वर्ष उम्र में कोई घर से बाहर नहीं जाता। शरीर ठीक भी नहीं है हमको, बहुत तकलीफ होती है घूमने में। क्या करें? ठीक रहे ना रहे, चलो ऐसे ही करो। काम करते-करते शरीर तो जाने वाला ही है, बेहतर है भगवान की सेवा करते-करते चला जाए, तो ठीक है। जो सिपाही होता है, लड़ाई करते-करते मर जाता है, तो उसको फैमिली का पेंशन मिलता है, गवर्नमेंट रिकग्नाइज (recognize) करता है जो हमारा अस्त्र जान लिया है। तो शरीर तो जाएगा ही, तो भगवान का अस्त्र दे दो, तो भगवान समझ लेगा—"हाँ, ये व्यक्ति जो है, हमारे रास्ते जान भी दे दी।" वो अच्छा है कि नहीं? और शरीर को ठीक रखने के लिए भगवान की सेवा सब छोड़... खाली शरीर में साबुन लगाओ, उसमें क्या फायदा? शरीर अच्छा रहे ना रहे, कोई ज्यादा... भगवान की सेवा, ये आचरण। यह तो मिट्टी का शरीर है, किसी का ठीक रहता है, किसी का ठीक नहीं रहता। क्या ठीक रहता है? तीन प्रकार का जो तकलीफ है, वो तो लगा ही रहता है—आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक। अभी कोई बिजनेस करते-करते नुकसान हो गया, मन खराब हो गया, फिर अब क्या करेंगे? शरीर तो ठीक-ठाक है मजबूत, और भीतर में मन हो गया खराब, कोई काम में दिल नहीं लगता है, ये तो चलता ही है। अभी ज्यादा गर्मी हो गई, शरीर में तकलीफ हो गई; ज्यादा सर्दी हो गई, अरे वो भी ठीक नहीं लगता; ज्यादा पानी बरस रहा है, तो ठीक नहीं लगता बाहर में जाने के लिए। कभी अपना बिजनेस में जाने पड़ता है—"बिजनेस बंद कर दीजिए, आज बहुत पानी गिर रहा है, बिजनेस नहीं करेंगे।" ऐसा होता है। ये शरीर का मामला जो कुछ हो, होने दीजिए। वो भगवान कहते हैं—"तितिक्षस्व..." उसको सहन करो, उसके लिए ज्यादा दिमाग खर्च ना करो। वो आता है, जाता है, चला जाएगा। अभी पानी बरस रहा है, एक घंटा बाद वो रुक जाएगा। अभी थोड़ा ज्यादा गर्मी है, दो घंटा बाद ठंडा हो गया। इसी तरह से ख्याल करते... उसको सहनशील हो, उसके लिए ज्यादा दिमाग खराब... शरीर ठीक... शरीर जहाँ तक है, उस समय के भीतर में भगवान को उपलब्ध करो, वो तुम्हारा असल काम। शरीर ठीक है कि नहीं है, ये सब ज्यादा देखने की कोई जरूरत नहीं। भगवान की इच्छा होगी तो शरीर ठीक रहेगी, नहीं रहेगी नहीं। चलो, यह भगवान खुद... "आगमापायिनोऽनित्याः..." शरीर ठीक-ठीक जो है, यह चमड़े का संपर्क। और मैं तो चमड़ा नहीं हूँ, मैं... हमारा किसी तरह से चमड़े से संपर्क हो गया, इसीलिए वो चमड़े का सुख-दुख से हम भी सुख-दुखी हो जाते हैं, क्योंकि असल में हमारा सुख-दुख नहीं है। जैसे मोटर है आपके पास, और मोटर में कोई खराब हो गया, तो आप तो मोटर से अलग व्यक्ति हैं, बाकी मोटर में आपको अभिनिवेश है—"हमारा गाड़ी है।" इसलिए वो मोटर का नुकसान आप समझते हैं—"हमारा नुकसान।" वो समझने की बात है और कुछ नहीं है। आपका कुछ नुकसान नहीं हुआ, मोटर फिर मरम्मत हो जाएगा, नहीं हो जाएगा? और दूसरा मोटर हो जाएगा। क्या ये समझ... और जब मोटर टूट गया—"बस, हम सो गया, हमारा तो सब नाश हो गया!" तुम्हारा क्या नाश? तुम्हारा मोटर का नाश हुआ। वो भी जो समझता है—"ये हमारा मोटर नहीं है", उसे कुछ तकलीफ नहीं है। जो समझता है—"ये हमारा मोटर है", उसकी तकलीफ। इसी प्रकार शरीर तो हमारा है ही नहीं, ये सब कोई जानता है, बात सही है। जो समझता है—"यह शरीर हमारा है", उसको तकलीफ ज्यादा। वो जानता है—"शरीर तो मैं नहीं हूँ", उसको तकलीफ नहीं होता भी है तो सीख... असल में हमारा तो कुछ नुकसान नहीं है। शरीर खराब है, तो भगवत नाम स्मरण करने में क्या मुश्किल होता है? सोते-सोते होता ही है, ऐसा नहीं होता कि भगवान नाम स्मरण करो—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम... उसमें तो रोग नहीं होता भी है, थोड़ा सा सहनशील हो जाओ, ये विचार।
"Some man who wants to meet you, he is interested in spiritual discussion. He was for some time in India. I told him... He said he'll come. I said, 'You can come if possible, otherwise...' He was..."
अभी तक इंडिया का इतना इज्जत था स्पिरिचुअल लाने के लिए, सब कोई इंडियन इंडिया में जाने में... नहीं जाता है, विलायत-वाला भी उधर ही जाता है, इंडिया। अभी तक इंडिया का पोजीशन इज्जतदार है, बाकी आदमी सब खड़ा कर... वो कल लड़का पूछ रहा था—"मैं इंडिया में केवल होली मैन (holy man) क्यों? उतना क्यों? इतना नहीं है, बहुत कम है।" इंडिया में तो सब कोई को होली मैन होना था, इंडिया जगाए साहब। बाकी क्योंकि वो अपनी खुशी से अब अनहोली (unholy) हो गया। टेम्पटेशन (temptation) में हैं? टेम्पटेशन में आ गया, टेम्पटेशन माया का टेम्पटेशन में। अगर इंडिया को गवर्नमेंट होली मैन होने को सिखाता है, तो इंडियन का इज्जत हजारों गुना बढ़ जाता है। उसको सिखाया गया—"चोर बन।" बस, उसी से इंडिया का इज्जत बिगड़ गया। बस, तब भी इतना बिगड़ते हुए भी वास्तविक कुछ आध्यात्मिक ज्ञान चाहता है, इंडिया में व्यवस्था... अभी तो हम तो सब जगह घूमता है, इंडिया के विषय में सबको बड़ा उच्च कोटि आइडिया (idea) है। इंडिया में आध्यात्मिक... चाइनीज ऑथर (Chinese author), वो लिखा है जो धर्म का विषय में, आध्यात्मिक ज्ञान का विषय में अगर किसी को जानने का है, उसको भी इंडिया ही जाना।
"China man, very good scholar, that is recommended, New York University."
वो तो कोई भी सिंसियर (sincere) होगा, वो समझेंगे जो वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान के लिए इंडिया में जितनी संपत्ति है, वो तो दुनिया में... इधर भी चाइनीज बहुत कांटेक्ट (contact) में, इधर भी चाइनीज जो है, वो इंडिया के कांटेक्ट में आता है। उनको पता है कि स्पिरिचुअलिटी (spirituality) के लिए इंडिया... और हमारा इंडियन लोग बोलता है—"ये क्या है? क्या जरूरत है? गाय काटने में क्या दोष होता है?" ये इंडिया की दुर्दशा है, वो अपना-अपना कल्चर (culture) सब भूल गया है। अच्छा, आए थे ना मिनिस्टर आए थे, उनके साथ क्या लिखा है?
"Maha-guru... His Holiness from Krishna Consciousness arrived... Maha-guru... Bhaktivedanta Swami Prabhupada... Bhagavad-gita... Maha-guru... Director General..."
मशका डिपार्टमेंट...
"...warmly received Mr. ... Mr. ... Mr. ... Photo, this you can keep it, yes."
आज भी उधर गया था,
"But idhar, they are also interested..."
मौका मिले, काम होए तो जाएँ, उसमें सब सारा दुनिया में जाएँ। आज उधर भाइयों की इच्छा है कि आप हिंदी में भाषण... अच्छा, कल ऐसा था हिंदी में इधर जो अंग्रेजी समझने वाले पाँच हैं, दूसरा तो कल बोला नहीं—"हिंदी में बोलते, हाँ-हाँ।" ऐसा नहीं पूछा था, हम तो पूछा था—"हिंदी में बोलें?"
"They wanted in Hindi. Practically speaking, there also some Chinese people, some other people, very few, they are... majority of these are... requested..."
क्या है?
"We have come to the country of the Indonesians, so they must know. So far other Hindus are concerned, there some of them know English. So in that consideration, English necessary."
क्यों जी?
"If there is one foreigner, we should give him... necessary, I speak in English and again interpreted..."
अगर इसका श्लोक का मीनिंग ना आवे, वो भी चेंज करता जाए, क्योंकि भगवान के वाक्य वो भी तो खाली सुनने से शुद्ध... समझो ना समझो, सुनने से काम। मंत्र का ये मंत्र होता है, जैसे साँप काट देता है ना, वो मंत्र का अर्थ नहीं समझता, मंत्र उसको सुनाया जाता है, उसका चेतन हो जाता है। तो मंत्र का बल है।
"Which program? Think you will have evening... There are so many, give one, one. Why you give so many? Accha, Sri Krishna..."
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥