[प्रारंभिक विचार: श्रद्धा, विज्ञान और कृष्ण की सर्वोच्चता]
विश्वास, विश्वास, विश्वास नहीं—it is a fact. विश्वास भ्रम हो सकता है; भूल से कोई काम कर दिया, वो भी विश्वास होता है। Fact is, तो ये सब science है। उसको अच्छी तरह से समझने से कि भगवान कृष्ण क्यों सबसे बड़े हैं—well, this is a great science. वो तो भगवद्-भक्त लोग समझ सकते हैं, साधारण नहीं समझ सकते हैं। बाकी शास्त्र के विचार यही है कि:
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥
भगवान खुद भी बताते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में कि मत्तः परतरं नान्यत्—उनसे बढ़कर के कोई higher authority और है नहीं। ये बात, अहम् आदिर्हि देवानाम—"I am the original person of all the..." और भी बताया है भगवान ने श्रीमद् भगवद्गीता में, यान्ति देवव्रता देवान्—जो और दूसरे देवताओं का भजन करता है, वो देवलोक में जाएगा। मद्याजिनोऽपि यान्ति माम्—फर्क है ना? आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनो—देवलोक में आप जाइए, उधर से घूम के आना पड़ेगा, पुनरावृत्ति।
[भगवान का अवतार और उनका प्राकट्य]
विष्णु, कृष्ण का अवतार... भगवान तदात्मानं सृजामि अहम्—तो बार-बार जो अवतार लिखते हैं, भगवान का अवतार है। हाँ, "सृजामि" का अर्थ होता है कि "मैं उपस्थित होता हूँ", "आत्मानम्"—अपने को उपस्थित करता हूँ। वही कृष्ण भगवान की... हाँ, जब कृष्ण भगवान आते हैं, तो जैसा ये विष्णु हैं, ये ब्रह्मांड में एक विष्णुलोक है, उस विष्णु से अवतार होता है। जैसे पूर्व दिशा से सूर्य का उदय होता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पूर्व दिशा सूरज का पिता है या सूरज देव उदय से ही पैदा हुए। इसी प्रकार भगवान जब प्रकाश (प्रकट) होते हैं, तो किसी source से होते हैं। जैसे भगवान देवकी के पुत्र होकर के जन्मे, तो इसका मतलब यह नहीं है कि देवकी ने भगवान को पैदा किया। वो एक प्रथा है, विधि है।
[कृष्ण तत्त्व को समझना: Great Science]
तो great science असल बात है। इसलिए भगवान कहते हैं: जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः—तात्त्विक समझना चाहिए। अगर कोई तात्त्विक रूप से उसको समझ जाए, तो फिर त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति—तात्त्विक समझना चाहिए। मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां...—तात्त्विक समझना। This science, you have to understand this science. और जो इस science को समझ गया, तो वो मुक्त हो गया।
वैसे तो विष्णु ही सब जगह व्याप्त हैं। "व्याप्त" होने से ही "विष्णु" शब्द बनता है, जो सब जगह व्याप्त हैं, सब जगह पर हैं, उसी से विष्णु बनता है। तो विष्णु खास... सब विष्णु रहा, तो विष्णु के अवतार राम, कृष्ण—ऐसे ही उसी के अवतार माने गए हैं भागवत में। भागवत में अवतारों के विषय में बताया है और आखिरी में बताया गया है कि ये जितने अवतार हैं, यह सब कोई अंश हैं, कोई कला हैं—एते चांशकलाः पुंसः। जो परम पुरुष... चाहे किसी का परम पुरुष विष्णु किसी का अंश हैं, किसी का कला हैं, कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्—बाकी कृष्ण नाम दिया गया है, ये सब भगवान हैं। इसमें कोई... इसमें कोई तकरार नहीं है। राम भगवान हैं, विष्णु भगवान हैं, कृष्ण भगवान हैं। बाकी आदि जो हैं, वह कृष्ण हैं:
रामादि-मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन् नानावतारमकरोद् भुवनेषु किन्तु।
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो...
[अन्य देवताओं की पूजा और भस्मासुर की कथा]
ये बात को... जहाँ राम का वर्णन है, जहाँ राम हैं, कृष्ण का जो... जिसका विष्णु का, शंकर का जिसका, वो उसी में सबको बड़ा मानता है। शंकर को शंकर का बड़ा मानो ना, वो तो बात है कि शास्त्र का विचार जो है, उसको तो लेना होगा ना। जो जिसकी पूजा करते हैं, उसको बड़ा तो मानते ही हैं, नहीं तो क्यों पूजा करेंगे? वो तो दूसरी बात है। और दूसरे देवताओं की जो पूजा करते हैं, उसका विषय श्रीमद् भगवद्गीता में बताया: कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः—काम (भौतिक इच्छाओं) के द्वारा, क्योंकि दूसरे देवताओं का भजन लोग कुछ प्राप्त करने के लिए करते हैं।
जैसे शिवजी से प्रार्थना किया, "महाराज! हमको ऐसा वर दीजिए कि हम जिसके सिर पर हाथ रखें, वो भस्म हो जाए (उड़ जाए)।" शिवजी आशुतोष हैं, तो बोले, "अच्छा ठीक है, ले।" फिर वो बोलता है, "आपके सिर पर ही हम हाथ लगा के देख लें थोड़ा!" यही होता है। तो बड़ा मुश्किल किया, "ये हमारे ही सिर पर हाथ लगाना चाहता है!" सब भागे, विष्णु के पास गए महाराज। तो विष्णु से कहा, "महाराज! आप तो ऐसे-ऐसे सबको वर दे देते हैं।" तो विष्णु ने अपनी माया से उससे पृच्छा (प्रश्न) किया, "ऐसा कभी हो सकता है? तू अपने ही सिर पर हाथ लगा के देख ना!" इस प्रकार रावण को भी शिवजी ने खूब वर दिया, लेकिन आखिर में रामचंद्र जब उसको मारने को खड़े हो गए, तो कोई उसकी रक्षा नहीं कर सका।
[उपसंहार]
अच्छा, थोड़ा कीर्तन करो। थोड़ा कीर्तन कीजिए।
हरे कृष्ण!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥