भगवान कहाँ जा? "भगवान दरिद्र है, रास्ता में बैठे हुए है, खाने को नहीं मिलता है।" एक दरिद्र-नारायण... अस भगवान है, उसको नहीं माने आप। सबको ये न भगवान, भगवान कृष्णा, कृष्णा भगवान, "ईश्वरः परमः कृष्णः" शास्त्र सिद्धांत, उसको भगवान नहीं और किसको मानेंगे? तो जो जीव है, भगवान कौन सा है, ये माना जा उसको भगवान। इसलिए भगवान विशेष करके बताते हैं, "न मां..." कृष्णा कृष्ण कहते हैं, "मुझको जो नहीं मान, हमारा चरण में, कृष्ण का चरण में प्र..." और सब चरण में... एक आखरी भाग शुरू न क्यों बढ़ा मूढ़ का, गधा। गधा किसी बुद्धि नहीं है। कोई आदमी बुद्धिहीन हो तो उसको गधा कहा जाता है। गधा स्कूल में मास्टर, teacher, कोई लड़का ठीक से पढ़ता नहीं—"गधा!" तो गधा उसी को कहा जाता है जो बुद्धिहीन। बुद्धिहीन क्यों? गधा को बताते हैं। दिन भर डिस्टर्ब करता है, बहुत तकलीफ... बाकी अपने के लिए नहीं, धोबी के लिए गधा खूब परिश्रम करता है, खूब कपड़ा लाने के लिए। एक कपड़ा भी उनका [नहीं], सब दूसरे का। इसलिए गधा का example दिया, उदाहरण दिया। जो बहुत मूर्ख होता है उसको गधा कहा, क्योंकि परिश्रम तो जरूर करता है बाकी उसमें उनका कुछ लाभ नहीं। "न मां दुष्कृतिनो मूढाः..." और क्यों ऐसे गधा होते हैं? बड़े-बड़े पढ़े-लिखे, college में case भी है, गधा कैसा हो गया? ना, "दुष्कृतिनः"। वो पढ़े-लिखे जरूर है परंतु काम उनका क्या है? दुष्कार, पाप का। इस तरह से धोखा दिया जाए। बड़े-बड़े वकील लोग जो... बड़ा वकील कौन है? जो ज्यादा धोखा देने, कानून को छिपा करके, कानून को इधर-उधर करके जो काम बना देता है, उसको बड़ा वकील [कहा जाता है]। तो आजकल का जो विद्वान होते हैं, वो उसका काम ये है। बड़े scientist कौन है? जो atom bomb बनाए आदमी को मारने के लिए। तो दुष्कृति। कृति, कृति का अर्थ होता है जिसका दिमाग बहुत अच्छा, बाकी वो दिमाग किस में लगाता है? दुनिया को खतरा, दुनिया का अच्छा [नहीं]। उसको कहा दुष्ट।
जैसा ये भगवत भक्ति प्रचार है, ये दुनिया का मंगल के लिए। जो आदमी भगवान को भूल गया है, इसलिए उनका हर तरह से तकलीफ में है। किस तरह से भगवत भक्ति हो, भगवान से उनसे कृष्ण संपर्क हो, भगवान की सेवा में किस तरह से लगे, इसका नाम है सुकार, दुनिया का मंगल। और आदमी को फसा लेना—जाओ देखा देशभक्ति, फसा दिया। अभी पाकिस्तान-हिंदुस्तान में लड़ाई हुई, लाखों आदमी मर गया देशभक्ति का नाम से। मूढ़! हजारों लाखों आदमी मर गया, करोड़ों रुपया नुकसान हो गया, बाकी वो सब leader है। अब वो leader को, जो Yahya Khan, उसको फांसी में चले... पहले तो पूज्य था, थोड़ा एक गड़बड़ कर दिया तो उसको फांसी में चला। उसके बाद छोड़ दीजिए, नाम दीजिए, इतना बड़ा भारी अच्छा आदमी, उसको भी गोली से मार दिया। क्यों ये हो रहा है? जो कुछ कार्य हो रहा है, सब दुष्कृति, दुष्कृति। इसलिए मोह, झगड़ा, लड़ाई, मारपीट, धोखाबाजी, ये सब। इसलिए कहा जाता है दुष्ट। दिमाग तो बहुत ठीक है, दिमाग लगाता है दूसरे को फसाने के लिए, दूसरे को दुख में डालने के लिए, उसमें दिमाग। "न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः" क्योंकि दुष्कार का अर्थ है... दुष्कृति माने, कृति का अर्थ होता है बहुत बड़ा काम करना, बाकी दुष्का... सुकार, 'सु' का अर्थ होता है जो जगत का मंगल हो, उसका नाम सुकृति।
"नराधमाः"। नर माने मनुष्य, जानवर नहीं होता। लड़ा और अधम का अर्थ है—उत्तम, मध्यम, अधम। उत्तम जो बहुत ऊंचे तरीके होता है उसको उत्तम कहा जाता है, जो बीच में है मध्यम, और बहुत नीच है उसका अधम। तो नर का अधम, नर। नर शरीर जो है, मनुष्य शरीर जो है, ये भगवत भजन करने के लिए। मनुष्य शरीर ये दिन भर केवल परिश्रम करके और इंद्रियों का भोग के लिए सारा जीवन को खो डालना, इसको कहा जाता है नराधम। परिश्रम करके रोटी खाना, ये तो सूअर भी करते हैं, दिन भर परिश्रम करते हैं। आप लोग सूअर देखे होंगे गांव में, दिन भर घूमता है—कहां गू है, कहां गू है। इसलिए मना करते हैं इतना परिश्रम। आजकल यही सिखाया जाता है—industry, खूब परिश्रम, factory। factory में जाओ, बहुत भारी factory, लोहा का कारखाना है, आग ज्यादा है उसमें, क्योंकि तनख्वाह कुछ ज्यादा मिलेगा। ये सब सिखाया जाता है। उसको जो जीवन है, इतना कीमती जीवन है मनुष्य जीवन, ये जीवन में भगवान से संपर्क बना सकता है, उसको [फैक्ट्री में] लगा दिया। इसलिए दुष्कृ... नराधमा। वो जानते नहीं, क्योंकि मानते भी नहीं, "फिर हमारा और जन्म होने वाला है। इस जन्म में जैसे मैं काम करूंगा, उसी प्रकार और एक जन्म मिलेगा।" कर्मणा... सूअर का ऐसे काम करे तो दूसरे जन्म का सूअर बनने पड़ेगा, ये सब वो जानता भी नहीं, सिखा भी नहीं जाता है। उसको लगा देते हैं। मूर्खता नहीं? वो भी मूर्ख है, दुष्कृति है, दूसरे को मूर्ख बनाते हैं। "अन्धा यथान्धैरुपनीयमानाः"—एक अंधा और दूसरे अंधे को बोलता है, "चलो हम पार [करा देंगे], हम leader बन [गए]"। दोनों सब गड्ढे में, यहां का भी गिर गया और वो भी। उनका जो देशभक्त था, वो भी देखिएगा साक्षात कुर्बान दे... इसी प्रकार हमको भी गिरना है। ऐसा ना समझिए तो हमको ठीक-ठीक सब हमारा leader जो है सब ठीक है। अभी कुछ हो गया, फिर ऐसे कुछ हो जाएगा, तुम भी गिर जाओगे। ये सब दुष्कृति, भगवत भक्ति नहीं है, सब दुष्कृति, नराधमा। बिल्कुल "भगवद्भक्तिहीनस्य जातिर्जपस्तपः क्रियाः। अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम्॥" ये लोक रंजन है, जैसे मुर्दा को सजाया जाता है। इसमें लाभ क्या है? मुर्दा को सजाकर ढाक-ढोल बजा के ले जा रहे हैं जलाने के लिए, उसमें लाभ क्या है? लोक रंजन।
इसी प्रकार जो मनुष्य जीवन जो है, केवल भगवत भजन करने के लिए, सूअर के लिए नहीं। ऐसे सूअर दिन भर परिश्रम करके भूखा... बस भूख खाने का मतलब क्या है? उसका कोई विचार नहीं, जो चीज मिल जाए खाओ। मनुष्य के जीवन में विचार होना चाहिए। सूअर गू खाता है, तो हमको भी गू खाना नहीं। सूअर खाता होगा, मैं तो मनुष्य है, हमको चाहिए भगवत प्रसाद, भगवान जो खाते हैं। यज्ञ... भगवान को भोग लगाता है, उसका नाम है यज्ञ। यज्ञ का अर्थ होता है भगवान को संतुष्ट करना, इसका नाम है यज्ञ पुरुष। भगवान का नाम... तो मनुष्य है, जप-तप करने के लिए। देखिए, जैसा मंदिर में होता है, इधर भी वही बात है। इधर भी रसोई होती है, इधर भी रोटी बनाया जाता है, साग बनाया जाता है, चावल बनाया जाता है, बाकी भगवान... "यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।" पाप तो हमको करना ही पड़ेगा, क्योंकि दुनिया जो है, इच्छा करे और ना करे, आपको पाप [लगेगा]। कैसा? जैसे रास्ता में चल रहा है, आपकी इच्छा नहीं है जो जानवर को मारे, बाकी हजारों चींटी मर जाते हैं, वो पाप है। ये नहीं है जो आप नहीं जानते हैं, चींटी को मार दिया, उसमें पाप नहीं है; नहीं, उसमें पाप है। इसलिए मनुष्य के लिए उचित है यज्ञ। आप जब रास्ता में चले गए, यदि यज्ञार्थ... आप रास्ता में चल रहा है, क्यों? "नहीं, ये कृष्ण की सेवा करते हैं, कृष्ण के लिए बाजार में जाना है, कृष्ण के लिए भोग बनाना है, कृष्ण के लिए पुस्तक छपाना है, कृष्ण के लिए आदमी को समझाना है।" सब कृष्ण के लिए, तो यज्ञ के लिए। तो आप जो वो जो चींटियां मारते हैं, उसमें आपको पाप नहीं लगेगा। दूसरे को पाना... और जो अपने के लिए बाजार में जाते हैं, चल गया, "आज अच्छा-अच्छा चीज, रविवार है, आज अच्छा चीज..." सुबह पतकार... भगवान के लिए नहीं, अपना जिह्वा के लिए। "भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्"—सब पाप खाते हैं। तो जो पाप खाते हैं, वो कभी सुखी हो सकता है? केवल पाप भीतर में बढ़ता है, वो कभी सुखी नहीं। इसलिए उसको कहा जाता है नराधम। वो सूअर को अगर बताया जाए, "देखो जी, चलो तुमको हम प्रसाद [देंगे], तुम गू नहीं खा।" तो क्या समझेगा? नहीं समझेगा, सूअर है। आदमी को समझाया जाता है। आप लोग क्योंकि मनुष्य हैं, आपको समझाया जा सकता है। इसलिए जो आदमी इसको समझता नहीं, समझने के लिए प्रयत्न नहीं करता—नराधम, मनुष्य में से बहुत नीच। जो कृष्ण भक्ति नहीं समझता है, भगवान को नहीं समझता है, और कृष्ण को नहीं समझाता है, अपने को ही भगवान मानते हैं।
"माययापहृतज्ञाना..." तो विद्वान है साहब, बड़ा स्वामी है और बड़े पंडित हैं, की है, सब कुछ है। "माययापहृतज्ञाना"—ये जो सब ज्ञान लाभ किया है ना, वो माया उसको अपहरण कर [लिया]। क्यों? जो ज्ञान का जो असल बात है, वो समझा नहीं, इधर-उधर बात को समझे। वो समझने से क्या फायदा? जब कृष्ण को नहीं समझा, भगवान को नहीं समझा, तो उसका ज्ञान का कुछ किंतु बिल्कुल... आखिरी में ज्ञान का अर्थ होता है वेद। वेद का अर्थ होता है ज्ञान। "वेदविद्" ज्ञान, "वेदविद्" शब्द होता है, उसका अर्थ होता है ज्ञान। वेद ज्ञान। तो वेद का अर्थ होता है ज्ञान और भगवान कहते हैं, "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः"—जो वेद पाठ करके, वेदांत पाठ करके उनको आखिर में क्या ज्ञान होना चाहिए? कृष्ण कहते हैं, "मुझको समझना चाहिए।" कृष्ण क्या? कृष्ण को समझा नहीं, तो फिर उसका ज्ञान क्या हुआ? वेद-वेदांत पाठ करने से क्या फायदा? कुछ नहीं। इसलिए कृष्ण कहते हैं, "माययापहृतज्ञाना"। परिश्रम तो बहुत किया, वेद पाठ किया, वेदांत पाठ किया, असल में कृष्ण को ही समझा नहीं। अगर कृष्ण को समझा, जैसे भगवान खुद बताते हैं, "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः"—"हम क्यों आते हैं? क्यों हम देव, पिता, पुत्र होते हैं? क्यों मैं आता हूं? क्यों हम इधर काम करता हूं?" जन्म भगवान... तो कर्म भी है, साधारण कर्म नहीं, "दिव्यम्", असाधारण। भगवान इधर आ के लड़ाई करते हैं, हम भी लड़ाई करते हैं, एक हो गया? भगवान का काम जो है, दिव्य। किसको समझना है? "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः"—उसको तात्विक जो समझता है, in truth, not superficial, ऊपर-ऊपर से नहीं, truth। और truth समझने के लिए भगवान कहते हैं कि, "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया"—वो truth समझने के लिए आपको पहले प्रणिपात करना पड़ेगा, परिप्रश्न। प्रणिपात करके फिर पूछिए हाथ जोड़ [कर]। और केवल प्रणिपात हाथ जोड़ नहीं, "सेवया"—सेवा, जिससे पूछे गुरु, गुरु को सेवा करो, सेवा करो, प्रणिपात करो, संतुष्ट करो, फिर पूछो। है कि नहीं? किसी के पास, "क्या आप हमको बता सकते हैं?" अरे, बताने से क्या तुम समझ गए हो? तुमको तो प्रणिपात नहीं हुआ, परिप्रश्न नहीं हुआ, सेवा नहीं हुआ, समझोगे कैसे? नहीं समझ [सकते]। इसलिए ये जो America और Africa सब सारा दुनिया के कहते हैं, देखिए कितना इनका प्रणिपात है, कितने इनका सेवा है। जो बात कहते हैं उसको... अभी हम कहें तो, "मर जाओ कृष्ण [के लिए]" तो मर जाए। ये बात... "उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः"—जो तत्त्वदर्शी हैं, जो भगवान को तात्विक जानते हैं, ऐसी व्यक्ति के पास जा के। नहीं तो गुरु बना लिया शौक से, "चलो जी, गुरु बना लिया।" जैसे कुत्ता पालता है, गुरु... वैसे गुरु होने से काम नहीं चलता। गुरु तो ऐसा होना चाहिए जिसके सामने जाकर के आप सिर झुका सकते—हां, ठीक। फिर उसको पूछिए, सेवा कीजिए सब 24 hours, देखिए।
तो ये सब विचार... यदि आप लोग कहो कि जैसे भगवान कहते हैं, "दैवी सम्पद्विमोक्षाय..." विमोक्षाय का अर्थ क्या होता है? हमारा जो स्वरूप है, मैं जो जीवात्मा भगवान का अंश है, हम स्वरूप में स्थित, उसका नाम है मोक्ष। "मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः"—इसके नाम मुक्ति, स्वरूप। तो अभी जो है, हम हमारी जो अवस्था है, स्वरूप नहीं है। ये 84 लाख योनि में कभी हम देवता हैं, कभी हम सूअर हैं, कभी हम गधा हैं, कभी हम American हैं, कभी हम Indian हैं, कभी ब्राह्मण, कहीं शूद्र हैं। ये सब स्वरूप... ये जैसा हमको शरीर मिल जाता है, उसका परिचय से एक स्वरूप मैं उपाधि पैदा करता हूं। तो "विमोक्षाय", विमोक्षाय कहते हैं मोक्ष। मोक्ष का ये असल में अपने जो स्वरूप है, उसमें स्थित होना। तो स्वरूप क्या चीज है? स्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि, "जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्य-दास'"—जीव का जो स्वरूप है, वो नित्य कृष्ण दास। जीव का जो स्वरूप है, वो नित्य कृष्ण [दास]। तो अभी वो स्वरूप में हम लोग जब तक नहीं जाएंगे... कोई कहता है, "हम सूअर हैं", कोई कहता है, "हम American हैं", कोई कहता है, "हम भगवान हैं", कोई कहता है, "हम और कुछ हैं, और कुछ हैं।" ये सब विप... सब जो समझे हुए हैं कि मैं भगवान का दास हूं, उसको "जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्य-दास'"। और स्वरूप हम भूल जाते हैं, भगवान का दास भूल जाते हैं, तब हमको दासत्व तो जरूर करना पड़ेगा। दास तो जरूर होना पड़ेगा। कोई देश का दास हो गया, कोई आपका समाज का दास हो गया, कोई अपना family का दास हो गया, आदमी निकल जाना... कुत्ता का दास हो गया, wife का दास हो गया, गधा का दास हो गया। दास तो उनको होनी पड़े, बाकी वो दासत्व यदि भगवान का करे, वो स्वरूप है। और जितना दास है, सब विरोध, सब विरोध। वो और सब दासत्व से जब मुक्त हो जाते हैं, उसका नाम है मुक्त, जो अपने को समझ लेते हैं। "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा..." तो समझता है कौन? जो जिसको ब्रह्म ज्ञान... "अहं ब्रह्मास्मि" हो गया तो सबका काम खत्म हो गया? नहीं, वही ब्रह्म... ब्रह्म ज्ञान होने से जो काम शुरू होगा, वही असल काम है, वो असल स्वरूप का काम है। और अभी जो काम जब तक हम ब्रह्म ज्ञान हमारा है नहीं, जो-जो कुछ हम कर रहे हैं, वो सब उपाधि। "आप पाकिस्तानी आए, हिंदुस्तानी हैं।" मैं ये शरीर को लेकर के हम समझते मैं हिंदुस्तानी, आप समझते पाकिस्तानी, चलो [लड़ो]। स्वरूप ज्ञान हो जाने से फिर लड़ाई... स्वरूप ज्ञान होने [पर लड़ाई नहीं होती]। तो स्वरूप ज्ञान नहीं, तो स्वरूप ज्ञान क्या है? जब हम लोग समझ जाएंगे जो मैं कृष्ण दास हूं, आप भी समझ गए तो मैं तो भगवान का दास हूं, सब चीज भगवान का है, तो फिर झगड़ा की क्या बात है? हम भगवान का दास हैं, तो भगवान से हमको तो मिलना ही चाहिए, भगवान देता भी है। फिर आपसे... आपको देता है, हमको देता है। "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्"—आपसे धन मैं क्यों लूंगा? आपके ऊपर क्यों मैं आक्रमण करूंगा? आप हमारे ऊपर क्यों आक्रमण करेंगे? आप भी भगवान की कृपा से आपको जो मिलता है आप खाते हैं, हमको भी भगवान की कृपा से जो मिलता है हम खाते हैं। आराम से... झगड़ा क्या है? ये तो स्वरूप अवस्थित, इसका नाम मुक्ति। सभी मुक्त हो गया, "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा"—प्रसन्नात्मा हो गया, "न शोचति न काङ्क्षति..."
ये जो कृष्ण का कृष्ण भावना है, ये स्वरूप जीव को सब मनुष्य के... मनुष्य के लिए है, ये गधा के लिए नहीं। गधा वो सब नहीं समझे, जो वास्तविक मनुष्य है। इसलिए श्री रामानुजाचार्य कहते हैं, जब भगवान कहते हैं, "मनुष्याणां सहस्रेषु..." करोड़ों मनुष्य के भीतर कोई मनुष्य... "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये"—कोई व्यक्ति सिद्धि लाभ करने के लिए प्रयत्न करता है। ये जो मनुष्य, "मनुष्याणां सहस्रेषु" क्यों बताया? उसका रामानुजाचार्य बताते हैं—मनुष्य हां, "शास्त्राधिकार योग्यः मनुष्यः"—मनुष्य उसी को कहा जाएगा जिसको शास्त्र में अधिकार हुआ, क्योंकि शास्त्र है मनुष्य के लिए। जैसा चैतन्य महाप्रभु [कहते हैं], "अनादि-बहिर्मुख जीव कृष्ण भूलि गेला, अतएव कृष्ण वेदे-पुराणे करिला।" अनादि, अनादि का माने सृष्टि का पहले से ही जीव है, बहिर्मुख जीव है, भगवान को भूल गया। "अनादि-बहिर्मुख जीव कृष्ण भूलि गेला..." कृष्णा भगवान को भूल गए, "अतएव कृष्ण वेदे-पुराणे करिला।" इसलिए भूल गए हैं, जैसे भगवत गीता भगवान छोड़ गए। क्यों? हम लोग भगवान को मानते नहीं, भगवान को छोड़ दिया, इसलिए भगवान कृपा करके इधर से जाने का पहले अर्जुन को लक्ष्य करके भगवत गीता छोड़ [गए], जो आगे जाकर मनुष्य उसको पढ़ेंगे, फिर हमको समझेंगे, फिर हमारे पास आने के लिए कोशिश करेंगे। इसलिए शास्त्र। तो मनुष्य का अर्थ होता है जो ये जो हमारा वेद-वेदांत शास्त्र है, इसको ग्रहण करें, इसको सुने, इससे फायदा उठाए, वो मनुष्य है। नहीं तो मनुष्य से गधा से क्या फर्क है? गधा भी दिन भर परिश्रम करते हैं, मनुष्य भी दिन भर परिश्रम करते हैं, खाते हैं, सोते हैं, बच्चा पैदा करते हैं, मर जाते हैं। ये तो गधा भी करते हैं, सूअर भी करता है। मनुष्य कौन है? जो शास्त्राधिकार योग्यः। विशेष शास्त्र, जो शास्त्र अधिकार का योग्यता जिसको जितना है, उस हिसाब से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। जिसको शास्त्र अधिकार ज्यादा है, संपूर्ण है, उसको ब्राह्मण कहा। "जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् भवेद् द्विजः, वेद-पाठाद् भवेद् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।" विप्र, ब्राह्मण कौन है? जो वेद आदि शास्त्र तरह से पाठ... पठन-पाठन, खाली पढ़ना नहीं, दूसरे को सुनाना, दूसरे को पढ़ाना—पठन-पाठन, यजन-याजन—भगवान का सेवा खुद भी करे, दूसरे को भी सिखाए—यजन-याजन, दान-प्रतिग्रह—दूसरे से दान ले और उसका दान करे, ये ब्राह्मण का काम। तो जिसका जितने अधिकार है शास्त्र में, वो उतना ऊंचा। इसलिए ब्राह्मण हर तरह से जो असल ब्राह्मण है, "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः"—गुण ब्राह्मण का गुण है और कर्म भी है। इस प्रकार ब्राह्मण, इस प्रकार क्षत्रिय, इस प्रकार वैश्य, इस प्रकार शूद्र, सब भगवत गीता में बताया कौन ब्राह्मण है—"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च, ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।"
तो सब चीज दैवी संपद... दैवी संपद है, किस तरह से भगवान से संपत होता है। "द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च, विष्णुभक्तः स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः।" विष्णु भक्त जो भगवान विष्णु का भक्त हो, विष्णु का पता है, और दूसरे देवता का भक्त होने से उसको दैवी नहीं कहा जाएगा। जैसे रावण, रावण शिव जी का बहुत बड़ा भक्त था, आप सब जानते हैं, उसको राक्षस बताया गया। हिरण्यकशिपु ब्रह्मा जी का भक्त, बाकी उसको राक्षस कहा। क्यों? विष्णु भक्त नहीं। इसलिए शास्त्र में कहते हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश... ब्रह्मा, विष्णु और शिव। तो "विष्णुभक्तः स्मृतो दैव..." जो भगवान विष्णु का भक्त है, वो देवता। "यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः"—कहते हैं जिसको भगवान में भक्ति है, भगवती... भगवान का अर्थ होता है विष्णु, कृष्णा, राम। राम, कृष्ण भगवान के अवतार हैं, रामादि-मूर्तिषु कला-नियमेन तिष्ठन्... कृष्ण परम भगवान। तो कृष्ण भक्त, विष्णु भक्त जो है, वो दैवी। और वो विष्णु भक्त का जिसका गुण है, वो दैवी संपद। इसलिए भगवान कहते हैं, "दैवी सम्पद्विमोक्षाय..." दैवी संपद अगर हो तो मुक्ति। "निबन्धायासुरी मता"—निबंध, बंधन का कारण होता है, किसका होता है? आसुरी मता, जो असुर हैं, जो भगवान को नहीं मानते, इतना ही फर्क। जो भगवान को नहीं मानते—आसुरी। दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं—"विष्णुभक्तः स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः।" जो भगवान का भक्त नहीं है, वो असुर। जैसे हिरण्यकशिपु को बताया गया, कंस को असुर बताया गया है, जो रावण को असुर बताया गया है। उनका सब गुण था, आप जानते हैं कि रावण material बहुत advanced था, सोना का लंका बना लिया था। सोना का! इधर तो पत्थर का होता है, सोना का कितना बड़ा भारी material... पहले सोना का बर्तन में खाया जाता था, अभी plastic का बर्तन में खाते हैं। तो उस समय सोना का बर्तन नहीं, सोना का शहर भी बना लिया था। आप material इसकी क्या advance क्या है? अभी America में हम देख रहे हैं बड़े-बड़े सब मकान वो लकड़ी का, सोना का बात कुछ कर... इसलिए कोई भी शहर में जाइए, सब समय दमकल घूमता है—टंग टंग टंग, सब आग कहीं ना कहीं लग जाता है, लकड़ी का। कहीं electric थोड़ा इधर हो गया, आग लग जाता है। और खपड़े का... Beverly Hills में quarter है, Beverly... तो उधर देखते हैं शौक से वो लोग खपड़े का मकान [बनाते हैं]। हम बोलते हैं, "ये तो हमारा देश में जो गरीब है, उसका खपड़े का मकान है, ये सबसे बड़ा आदमी शौक है खपड़े का मकान [बनाना]!" Very rich man, लिख दे... तो अपना-अपना शौक है। तो ये जो रावण था, वो खपड़े का भी नहीं और पत्थर का भी नहीं, सोना का [मकान बनाया]। मतलब इतना भारी advanced, फिर भी उसको कहा गया क्या उपाधि? राक्षस! आज तक आप लोग जानते हैं रामलीला होता है, वो राक्षस को अपमान किया जाता है। क्यों? इसका क्या दोष था? भगवान नहीं मानता। "राम जी का सीता क्यों होगा? हमारा ले आओ सीता, सीता को ले आओ, लक्ष्मी को ले आओ, राम को छोड़ो।" यही आसुरी मत है जो, "भगवान को छोड़ो और भगवान के लिए जितना धन संपत्ति है [उसे भोगो]..."
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