जाते हैं तो दुनिया में ऐसी कोई शक्ति है नहीं कि हमारी भगवद्-भक्ति करने में बाधा डाल सके। येन केनचित् प्रकारेण इस प्रकार यदि शुद्ध भक्ति किसी के पास हो, तो आत्मा प्रसन्न हो। इसलिए भगवान कहते हैं—"ज्ञानं"। मैं तुमको जो ज्ञान का विषय बोल रहा हूँ, यह निर्विशेष ब्रह्मज्ञान नहीं है। यह भगवद्-ज्ञान है। निर्विशेष ब्रह्मज्ञान जो है, वह तो मुक्ति के लिए है। और यह जो ज्ञान भगवान बताते हैं, वह मुक्त पुरुषों के लिए है, जो मुक्त हो गए हैं। इसलिए कहते हैं—"ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम्"। सविज्ञान का अर्थ होता है कि व्यावहारिक (practical) क्रियात्मक ज्ञान, खाली ज्ञान नहीं। केवल ज्ञान होने से "अहं ब्रह्मास्मि"—यह ज्ञान है कि मैं यह कोई भौतिक वस्तु नहीं हूँ, मैं यह शरीर नहीं हूँ, मैं ब्रह्म वस्तु हूँ। ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा—यह ब्रह्मज्ञान होने से वह जरूर आत्मा प्रसन्न हो जाती है।
क्योंकि जितना झंझट है, यह भौतिक ज्ञान... जब तक हम लोग भौतिक शरीर ग्रहण करेंगे, तब तक हमको सब समय "full of anxiety" रहना पड़ेगा। वह भगवान... यह प्रह्लाद महाराज ने बताया है: तत् साधु मन्येऽसुर-वर्य सदा समुद्विग्न-धियाम असद्-ग्रहात्। जब तक भौतिक शरीर रहेगा, हमको सब समय समुद्विग्न, "full of anxiety" रहना पड़ेगा। तो ज्ञान-भूमिका में आने से यह जो anxiety है, उद्विग्नता है, यह नष्ट हो जाती है। उद्विग्नता नष्ट हो गई, लेकिन यदि आगे हम नहीं बढ़ेंगे... जैसे एक आदमी बुखार में तकलीफ उठा रहा है, उसका बुखार छूट गया। बाकी केवल बुखार छूट जाना ही उसका स्वस्थ शरीर नहीं है। वह जब बिस्तर से उठकर चलेगा-फिरेगा, अच्छी तरह से खाएगा और सुखानुभव करेगा, तब उसको कहा जाएगा स्वस्थ। केवल बुखार छूट जाना ही उद्देश्य नहीं है।
इसी प्रकार, यदि केवल हमने ज्ञान लाभ किया—"अहं ब्रह्मास्मि", मैं ब्रह्म वस्तु हूँ, मैं भौतिक शरीर नहीं हूँ—यह सबसे उपयुक्त ज्ञान नहीं है। इसलिए भगवान कहते हैं: बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते। जो ज्ञान को लाभ किया है, इस प्रकार भक्ति अनेक जन्म-जन्मांतर बाद, फिर बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते—भगवान के चरणों में शरणागत होता है। यह असल ज्ञान है। केवल ज्ञान से प्रसन्नता हो जाती है, परंतु जब तक भगवान के चरणों में प्रपत्ति नहीं है, तब तक कार्य की समाप्ति नहीं होती। यह शास्त्र का सिद्धांत है।
इसलिए श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
जो ज्ञान लाभ करके प्रसन्न-आत्मा हुआ—"मैं भौतिक वस्तु नहीं हूँ, अहं ब्रह्मास्मि हुआ हूँ"—यह बात ठीक है, परंतु आगे यदि आप नहीं बढ़ेंगे, तो फिर पतन हो जाएगा। वह ज्ञान-भूमिका से ही पतन हो जाता है, यह शास्त्र का सिद्धांत है:
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्त-मानिनस्
त्वय्यस्त-भावादविशुद्ध-बुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदङ्घ्रयः॥
ये असल में अभी मुक्त नहीं हुए हैं, अभी देर है बाकी। वे लोग अपने को मान लेते हैं कि "मैं अब मुक्त हो गया।" तो विमुक्त-मानिनः, उनकी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई। क्यों? त्वय्यस्त-भावात् क्योंकि आपका अनुसंधान अभी तक नहीं हुआ। इसलिए भगवान कहते हैं—"ज्ञानं सविज्ञानम्"। "Practical application", क्रियात्मक ज्ञान। यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्। "Now I speak", तुमको बताऊंगा, जो असल ज्ञान है, विज्ञान सहित, उसको मैं आपको बताऊंगा। यज्ज्ञात्वा, यदि यह ज्ञान तुम्हारा लाभ हो गया—भगवद्-ज्ञान। यह वैदिक वेद में भी ऐसे कहते हैं: यस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति। यदि आप भगवान को समझ जाएँ, तो फिर आप सब ज्ञान आपको लाभ हो जाता है।
अब देखिए, आप लोग प्रचार कर रहे हैं। बड़े-बड़े सब "scientists" (वैज्ञानिक), "psychologists" (साइकोलॉजिस्ट)—ये सब आते हैं परदेश में मिलने के लिए। बाकी उनको जो ज्ञान है, वह हम लोग प्रमाणित कर देते हैं कि जो आपको ज्ञान खुद है, वह अभी पूर्ण ज्ञान नहीं है। जैसे हम लोग "scientists" नहीं हैं, "psychologists" नहीं हैं, परंतु भगवान की कृपा से यह सब संभव है, होता भी है। अभी हमारा एक शिष्य है—Dr. Svarupa Damodara, he is a great scientist in chemistry here. वह एक किताब लिखा है—"Scientific Basis of Krsna Consciousness"। कहने का मतलब है, वह तो "recognized scientist" है, तथापि यह भगवद्-ज्ञान लाभ करके वह अपने को समर्थ समझते हैं। कई किताबों में है... तो वह है विज्ञान। भगवद्-ज्ञान जो है, वह विज्ञान है। ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः। यदि इस ज्ञान को तुम्हारी समझ में आएगा ना, यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते, और तुमको दूसरा ज्ञान लाभ करने की कोई आवश्यकता है नहीं। तो यह जो सविज्ञान है, विज्ञान सहित जो ज्ञान है, यह भक्ति-मार्ग है।
आगे-आगे भगवान बताएंगे और यह भक्ति-मार्ग की बातें हैं कि उस विज्ञान से किस तरह से भगवान में आसक्ति बढ़ानी चाहिए। यह अध्याय का शुरू है: मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। अर्थात भक्तियोग, जो कि विज्ञान सहित है। भक्तियोग कोई "sentiment" नहीं है। भक्तियोग विज्ञान है। भक्तियोग—यह तो वेद-सम्मत है, इसलिए विज्ञान-सम्मत है। गोस्वामी बताते हैं कि:
श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं विना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पादायैव कल्पते॥
श्रुति, वेद, शास्त्र सम्मत और स्मृति-पुराणादि और पंचरात्र की विधि—यह सब छोड़ दिया और जो भगवद्-भक्ति है, उस भगवद्-भक्ति को गोस्वामी कहते हैं—"उत्पाद" (उत्पादाय)। आप लोग समझते हैं, वास्तव में वह शुद्ध भक्ति नहीं है, वह समाज में उत्पात करते हैं। तो विज्ञान... वेद, ब्रह्मसूत्र... जैसे भगवान स्वयं भगवद्-भक्तियोग कहते हैं, तब भी वह ब्रह्मसूत्र का उदाहरण देते हैं: ब्रह्मसूत्र-पदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः। तो भक्ति-मार्ग है श्रुति, स्मृति, पुराण, शास्त्र-विधि के अनुसार। वह भक्ति-मार्ग होनी चाहिए। इसलिए हम लोगों को रास्ता दिखाने के लिए श्री रूप गोस्वामी 'भक्तिरसामृतसिंधु' यह पुस्तक बनाए हैं। इसका हम लोगों ने ट्रांसलेशन किया है इंग्लिश में—"Nectar of Devotion"। यह "Nectar of Devotion" पाश्चात्य देशों में अनेक "universities" में "textbook" है। तो सविज्ञान, विज्ञान आप लोग समझते हैं, यह शब्द भक्तियोग के लिए है। यह "sentiment" नहीं है, यह विज्ञान-सम्मत है, साधु-सम्मत है, आचार्य-सम्मत है। आचार्योपासनम्। "Without" आचार्य-उपासना किए हुए भक्तियोग समझना मुश्किल है।
इसलिए नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं:
एइ छय गोसाञि यार, मुइ तार दास।
ता-सबार पद-रेणु मोर पञ्च-ग्रास॥
यह जब हम लोग... यह श्री रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट, दास रघुनाथ—ये छह गोस्वामियों का पद-अनुसरण करें। ता-सबार पद-सेवी... "to follow" वह पदानुसार। जो वृंदावन का आविष्कार किए थे गोस्वामी, उनकी सेवा करनी चाहिए और भक्त-सने वास—भक्तों के साथ में रहना चाहिए। तभी विज्ञान मालूम होता है। जैसे सब "business" का एक "society" होता है, इसी प्रकार भक्तियोग साधन करने के लिए अवश्य साधु-संग करना चाहिए। और साधु कौन है? जो भगवद्-भजन छोड़कर और कुछ नहीं जानते, वह साधु है। तो उसका नाम है विज्ञान।
फिर भगवान कहते हैं:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
भगवान को तत्त्वतः समझना चाहिए। भगवान का अर्थ होता है—भगवान श्रीकृष्ण। कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। और भगवान के सब अवतार भी भगवान ही हैं, परंतु जो मुख्य भगवान हैं, वह हैं: गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि। और भगवान के जितने अवतार हैं—रामादि-मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्—राम, वराह आदि भगवान के अनेक अवतार हैं। ये सभी भगवान हैं, कोई ऐसी बात नहीं है। परंतु कृष्ण आदि-पुरुष हैं, इसलिए कृष्ण सबसे बड़े हैं। भगवान सभी भगवान हैं, छोटा-बड़ा नहीं है। जैसे तुलसी-पत्र जो है, उसमें छोटा-बड़ा देखने का नहीं है, परंतु वह काम सभी का है। छोटा तुलसी-पत्र भी हम भगवान के चरणों में दे सकते हैं और बड़ा तुलसी-पत्र भी दे सकते हैं, दोनों का एक ही काम है। इसी प्रकार भगवान के अवतार अनेक हैं: अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्तरूपम्। जो सब भगवान की शक्तियाँ हैं, सब नाम भी भगवान का अवतार हैं। यह जो हरे कृष्ण नाम है, यह भी भगवान का शब्द-अवतार है। यह चैतन्य महाप्रभु ने बताया है: नाम्नामकारि बहुधा निज-सर्व-शक्तिस्। यह जो भगवान का नाम है, इसमें भगवान की शक्तियाँ सब हैं। यह चैतन्य महाप्रभु का... यह नहीं है कि जब हरे कृष्ण नाम हम लोग करते हैं, यह जो कृष्ण-कृष्ण नाम है, यह साक्षात् कृष्ण ही हैं। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। यह जो भगवान की अर्चा-मूर्ति है, इनकी पूजन करने के लिए समय होता है और सब नियम होते हैं, परंतु भगवान के नाम-कीर्तन के लिए कोई नियम नहीं है—नियमितः स्मरणे न कालः। सभी कर सकते हैं, जब खुशी, जहाँ भी। यही भगवान की कलयुग में कृपा है।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त-सङ्गः परं व्रजेत्—यह शुकदेव गोस्वामी ने बताया है। कलयुग में सभी दोष ही दोष हैं, दोषों का समुद्र है: कलेर्दोष-निधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः। यह तो महान है। यह दोष का समुद्र होते हुए भी एक महान गुण है। वह क्या चीज़ है? कीर्तनादेव कृष्णस्य—यह जो हरे कृष्ण नाम है, इसका कीर्तन करने से वह कलयुग का जो प्रभाव है, उससे मुक्त हो जाते हैं और फिर वैकुंठ-धाम में चले जाते हैं—मुक्त-सङ्गः परं व्रजेत्। यह कलयुग है, इसलिए कलयुग में और यही नाम प्रधान है:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
तो भगवान कहते हैं कि यह जो ज्ञान-लाभ है, यह सबके लिए नहीं है—मनुष्याणां सहस्रेषु। वह ज्ञान-विज्ञान क्या चीज़ है? भगवद्-ज्ञान। ज्ञान का अर्थ होता है—जैसे वेद। वेद का अर्थ होता है ज्ञान। तो भगवान कहते हैं कि वेद, सब वेद, जितना ज्ञान का मार्ग है, वेद-शास्त्र, उसको पढ़कर यदि भगवद्-ज्ञान लाभ नहीं हुआ, तो... हाँ, यह शास्त्र का सिद्धांत है। शास्त्र में कहते हैं कि:
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन-कथासु यः।
नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥
वेद-ज्ञान आपने अभ्यास किया, सब शास्त्रों को पढ़ा, परंतु यदि भगवद्-ज्ञान लाभ नहीं हुआ, तो फिर वह केवल श्रम ही है, परिश्रम ही है। यह शास्त्र का सिद्धांत है। धर्म... धर्म का अर्थ होता है—ब्राह्मण का धर्म, क्षत्रिय का धर्म और वैश्य का धर्म, अलग-अलग सब है। सबका उद्देश्य है भगवद्-भक्ति लाभ करना। स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्। यह संसिद्धि है। क्या संसिद्धि है? सब अपना-अपना धर्म करो, परंतु धर्म का उद्देश्य होता है—हरितोषणम्, किस तरह से भगवान को संतोष हो। संसिद्धि। तो यह सब शास्त्र का सिद्धांत है।
तो इसे किस तरह से करना है, उसका विषय भगवान स्वयं ही बताते हैं: मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये। वह सिद्धि क्या चीज़ है? वह योग-सिद्धि नहीं है। भगवद्-भक्त योग-सिद्धि के लिए प्रयास नहीं करते हैं, क्योंकि भगवान साक्षात् योगेश्वर हैं, सब "mystic power" के मालिक हैं। तो जो भगवान की शरण में रहता है, उनको सब योग-सिद्धियाँ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाती हैं। उसके लिए अलग से कोई परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं है। भगवद्-भक्त भगवान के द्वारा रक्षित हैं और भगवान स्वयं योगेश्वर हैं, तो जो सिद्धि का काम होता है, वह भगवान से सब हो जाता है। शास्त्र की जो सिद्धि भगवान कराते हैं, तो यह "practical" है। "Practical" हमने देख चुका है कि यह जो संकीर्तन "movement" दुनिया में चल रहा है, यह आश्चर्यजनक है। क्योंकि थोड़े ही वर्षों में सारा दुनिया में बड़े-बड़े मंदिर प्रतिष्ठित हुए हैं, मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हुई हैं। यह एक समझ लीजिए योग-सिद्धि है। वह योग-सिद्धि हम लोग कुछ नहीं जानते, बाकी भगवान योगेश्वर हैं, उनकी कृपा से यह सब संभव होता है।
तो इसलिए भगवद्-भक्त जो हैं, वे योग-सिद्धि नहीं चाहते हैं, परंतु क्योंकि योगेश्वर के शरणागत हैं, इसलिए योग-सिद्धि स्वाभाविकता से मिल जाती है। श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है कि जहाँ योगेश्वर हरि हैं—यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः—और जहाँ अर्जुन जैसे भक्त हैं, उधर सब सिद्धियाँ आपको मिलेंगी, उसमें अलग से और कोई चेष्टा करने की ज़रूरत नहीं है। तो मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये। जो सिद्धि और जो-जो सिद्धियाँ हैं, वे सब सिद्धियाँ लाभ करने से भी भगवद्-तत्त्व ज्ञान... भगवद्-तत्त्व ज्ञान वह भगवद्-भक्त को ही होता है, और भगवान जिसको कृपा करके बताते हैं, उसको होता है। तो यह आपको "Krishna Consciousness Movement" सारा दुनिया में प्रचार करना, यह भगवद्-तत्त्व है। इसलिए नाम है "Krishna conscious", कृष्ण भावना। और कृष्ण भावना संभव है यदि आप कृष्ण का, जो भगवान की श्रीमूर्ति है, उसमें आसक्ति बढ़ाएँ। इसलिए मंदिर स्थापना किया जाता है कि आप लोग आइए, दर्शन कीजिए और भगवान की कथा सुनिए। फिर आहिस्ते-आहिस्ते, साधु-संग—यह सब प्रक्रिया से भगवान में आसक्ति हो जाएगी और वही जीवन की सफलता है।
Thank you very much.
Srila Prabhupada ki jaya!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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