श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  761016BG-CHANDIGARH_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 9.3
चंडीगढ़, 16-अक्टूबर-1976
 
 
 
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥

Chapter 9, Text 3. Translation: Those who are not on the path of devotional service but return and death in this material world...

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥

कल आप लोगों को सुनाया था कि भगवान में आसक्ति बढ़ानी चाहिए। आसक्ति एक चीज़ है—अटैचमेंट (attachment)। जैसे स्त्री की पुरुष से आसक्ति और अनेक प्रकार की आसक्ति है। श्रील रूप गोस्वामी ने यह उदाहरण बताया है। जैसे एक युवक स्वाभाविक तौर से एक युवती से आसक्त होता है, और एक युवती स्वाभाविक तौर से एक युवक से आसक्त होती है। इस प्रकार, आपकी और हमारी आसक्ति भगवान से कब होगी? इसमें कोई सिखाना नहीं पड़ता। This is called simultaneous nature.

तो वही चीज़ भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में हर तरह से समझा रहे हैं कि किस तरह से इन मूर्ख लोगों की आसक्ति भगवान में होने से फिर इस मृत्यु-संसार से छुट्टी मिल जाएगी। दो चीज़ें आपके सामने हैं और मनुष्य जीवन में आपको मौका है कि कौन सा रास्ता आप पकड़ें। इसलिए भगवान खुद आकर के समझा रहे हैं। भगवान तो हर तरह से समझा रहे हैं। जितना वैदिक शास्त्र है, उसमें भगवान का विषय ही समझाया जाता है, उसमें और कोई बात नहीं है। 'वेदेश्च सर्वैर्अहमेव वेद्यः'—हाँ, जितने वेद-वेदान्त हैं, चार वेद हैं, 108 उपनिषद हैं, अष्टादश पुराण हैं, रामायण है, महाभारत है इत्यादि अनेक प्रकार के वैदिक शास्त्र हैं, वेदान्त सूत्र है, तो इसका उद्देश्य क्या है?

उद्देश्य यही है कि जो बद्ध जीव इस भौतिक जगत में आकर के अनेक प्रकार के कष्ट उठा रहे हैं—'अनादि करम-फले, पड़ि' भवानर्णव-जले'—यह समुद्र के समान है, और इसमें हम गिर गए हैं। गिरकर के चाहे जितना हाथ-पैर मारने वाले हों, बाकी बड़ा परिश्रम है और उसकी भी कोई गारंटी नहीं है। अनेक प्रकार की विपदाएँ हैं। जैसे किसी को हाथ-पैर बाँधकर समुद्र में फेंक दिया जाए, तो उसकी जिस प्रकार की अवस्था होती है, हम लोगों की भी उसी प्रकार की अवस्था है। हम लोग इस भव-समुद्र में गिर गए हैं। इसीलिए चैतन्य महाप्रभु हमको सिखा रहे हैं—'कृपय तव पाद-पंकज-स्थित-धूली-सदृशं विचिन्तय'। सब लोगों को प्रार्थना करनी चाहिए। हरे कृष्ण महामंत्र प्रार्थना है—

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

इसमें तीन शब्द हैं भगवान के—एक कृष्ण है, एक राम है, और एक हरा शब्द है। 'हरा' शब्द से 'हरे' सम्बोधन है, और 'कृष्ण' भगवान का सम्बोधन है, 'राम' भगवान का सम्बोधन है। 'राम' का अर्थ होता है परम ब्रह्म जो भोक्ता है, और 'कृष्ण' भी परम ब्रह्म जो सबको आकर्षित करता है। विशेष करके कृष्ण-बलराम। राम और बलराम में कोई फर्क नहीं है। कृष्ण और बलराम में, राम में कोई फर्क नहीं है।

'रामादि मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन् नानावतारमकरोद् भुवनेषु किन्तु।
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥'

भगवान के अनेक प्रकार के रूप हैं—'अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपम्'। अनेक प्रकार के शास्त्रों में ऐसा बताते हैं। जैसे समुद्र में जो तूफान की तरंगें हैं, उनको कोई गिन नहीं सकता, इसी प्रकार भगवान के अनेक अवतार हैं जिनको कोई गिन नहीं सकता, असंभव है। शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि भगवान का राज्य भी बहुत बड़ा है और उसको पालन करने के लिए भगवान को अनेक प्रकार के अवतार ग्रहण करने पड़ते हैं। यह सब समझाया गया है श्रीमद् भगवद्गीता में, श्रीमद्भागवतम् में, वैदिक ग्रन्थों में। 'वेदेश्च सर्वैर्अहमेव वेद्यः'—सब वेदों का यही उद्देश्य है कि किस तरह से ये जो बद्ध जीव हैं, जो कि इधर गिरे हुए हैं...

What is that? There are two kinds of jivas (दो प्रकार के जीव होते हैं)—एक बद्ध जीव और एक मुक्त जीव। तो मुक्त जीव वे सब वैकुण्ठ लोक में रहते हैं, उनकी संख्या अनेक अधिक है। यह जो हम लोग भौतिक जगत देख रहे हैं, यह एकांश जगत है, यह एकांश है। जो ब्रह्मांड आप देख रहे हैं, यह एक ब्रह्मांड है, ऐसे अनन्त कोटि ब्रह्मांड हैं। शास्त्र से पता चलता है:

'यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः।
विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥'

महाविष्णु के एक निश्वास से अनन्त कोटि ब्रह्मांड निकलते हैं, और निश्वास ग्रहण करने से अनन्त कोटि ब्रह्मांड उनके भीतर प्रवेश करते हैं—'यस्यैक-निश्वसित-कालम् अथावलम्ब्य'। तो एक ब्रह्मांड नहीं, अनेक ब्रह्मांड हैं, अनन्त कोटि। यह जो एक ब्रह्मांड में आप हैं, यह केवल एक ब्रह्मांड है, ऐसे अनन्त कोटि ब्रह्मांड हैं। और ये सब ब्रह्मांड एकत्रित करके भगवान का एकांश होता है—'एकांशेन स्थितो जगत्'। भगवान जब अर्जुन को सुना रहे थे:

'अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥'

यह भगवान की एकांश शक्ति है। इसी प्रकार वैकुण्ठ जगत है, उसका अभी हम लोगों को पता ही नहीं है। शास्त्र से पता मिलता है:

'परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।'

वह जो धाम है, वह सनातन है। यह जो धाम है, भौतिक जगत—'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते'। इसका एक दफ़ा सृजन होता है, कुछ दिन ठहरता है, फिर यह विलीन हो जाता है, नष्ट हो जाता है—'भूत्वा भूत्वा प्रलीयते'। जैसे आपका शरीर है, हमारा शरीर है। यह शरीर कुछ दिन पहले सृजित हुआ था, अभी चल रहा है, फिर एक दिन आएगा जब यह शरीर नष्ट हो जाएगा। यह शरीर फिर नहीं मिलेगा, और एक शरीर मिलेगा। यह समाप्त हो गया।

इसी प्रकार भौतिक जगत जो है, यह भगवान का विराट शरीर जो है, यह 'भूत्वा भूत्वा प्रलीयते'—एक दफ़ा प्रकाश होता है, फिर कुछ दिन ठहरता है, फिर यह लीन हो जाता है, यह चक्र चलता रहता है। और इसको छोड़कर 'परस्तस्मात्तु' और एक जगत है, वह वैकुण्ठ जगत है। उधर जाना चाहिए। इधर आने से यह 'भूत्वा भूत्वा प्रलीयते'—एक शरीर मिलेगा, और क्या शरीर मिलेगा, अपने कर्म के अनुसार, और फिर वह नष्ट हो जाएगा। इसलिए भगवान खुद आकर के समझा रहे हैं। यह कोई स्पेकुलेशन (speculation) नहीं है, मनोधर्म नहीं है, यह फैक्ट (fact) है, वास्तविक वस्तु है। भगवान आपसे झूठ बोलने नहीं आते हैं।

हाँ, भगवान कहते हैं—'अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप'। और जो यह जो मैं धर्म का विषय बता रहा हूँ, इसमें यदि किसी व्यक्ति की श्रद्धा नहीं है, तो उसको क्या लाभ होगा? कुछ नहीं। 'अप्राप्य मां'—उनको भगवद्-प्राप्ति नहीं होगी, 'मां' यानी भगवान स्वयं, उनको मैं नहीं मिलूँगा। 'अप्राप्य मां निवर्तन्ते'—तो क्या लाभ होगा? तो फिर इसी चक्र में—'मृत्युसंसारवर्त्मनि'। अभी-अभी मनुष्य जीवन मिला है, श्रीमद् भगवद्गीता आपके सामने है, और भगवान स्वयं बता रहे हैं। यदि आप कहें कि भगवान स्वयं उपस्थित तो हैं ही नहीं, तो कोई कहे कि भगवान और भगवान की वाणी एक ही वस्तु है। श्रीमद् भगवद्गीता जब आपके सामने प्रस्तुत है, आप समझ लीजिए कि भगवान स्वयं आपके सामने प्रस्तुत हैं। एब्सोल्यूट (Absolute) है श्री कृष्ण।

'नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः।
पूर्णः शुद्धो नित्यो-मुक्तोऽभिन्नत्वान्नाम-नामिनोः॥'

एब्सोल्यूट (Absolute) का अर्थ होता है कि भगवान और भगवान का जो कथन श्रीमद् भगवद्गीता है, वह एक ही चीज़ है। यह न समझें कि श्रीमद् भगवद्गीता हमारे सामने है, भगवान नहीं हैं। साक्षात् भगवान हैं। इस प्रकार श्रद्धा से श्रीमद् भगवद्गीता समझनी चाहिए। वह भगवान और भगवान की वाणी, जैसे भगवान और भगवान का नाम—'अभिन्नत्वान् नाम-नामिनोः'। यह जो हरे कृष्ण कीर्तन हो रहा है, यह साक्षात् भगवान कृष्ण उपस्थित हैं, जीभ पर नाच रहे हैं। हाँ, जो शुद्ध भक्त हैं, जिनका कोई अपराध नहीं है, वे जब कीर्तन करते हैं, तो भगवान उनकी जीभ पर नाचते हैं, यह समझना चाहिए।

और समझें या न समझें, यदि यह 'कृष्ण' शब्द कोई प्राकृत शब्द होता, दुनिया का कोई साधारण शब्द होता, तो 24 घंटे 'कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण' बोलते-बोलते कोई थकता नहीं क्या? कोई भी दूसरा प्राकृत शब्द बोलिए, 10-20 दफ़ा बोलने से ही बस, थक जाएँगे। और हरि-कीर्तन ऐसी चीज़ है कि आप जितना आगे बढ़ेंगे, जितना कीर्तन करते जाएँगे, आपका उत्साह उतना ही बढ़ता जाएगा। रूप गोस्वामी बताते हैं कि भगवान ने हमको एक जीभ दी और दो कान दिए; यदि करोड़ों कान देते और करोड़ों जीभ देते, तब कीर्तन करके कुछ आनन्द आता!

हाँ, तो यह अनुभव का विषय है। भगवान और भगवान का नाम, भगवान का गुण, भगवान के परिकर, भगवान की वैशिष्ट्य—सब भगवान ही हैं। इसका नाम है अद्वय-ज्ञान। यह न समझिए कि जैसे भगवान सामने अर्जुन के सामने श्रीमद् भगवद्गीता बता रहे थे, अब तो भगवान हमारे सामने हैं नहीं। कोई-कोई बोलता है, 'भगवान को हमको दिखाइए।' तो भगवान को तो वही देख सकेगा जिसको प्रेम है भगवान से—'प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति'। जिससे भगवान से प्रेम है, वह सब समय भगवान का दर्शन करता है। उसके लिए भगवान के बिना कोई दर्शन ही नहीं है। कोई भी चीज़ देखे, जैसे चैतन्य चरितामृत में बताया है:

'स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्ति।
सर्वत्र हय निज इष्ट-देव-स्फूर्ति॥'

भक्त जब यह माइक्रोफोन (microphone) या लाउडस्पीकर (loudspeaker) देखता है, तो वह लाउडस्पीकर नहीं देखता, वह भगवान को देखता है। क्यों? क्योंकि वह जानता है कि यह लाउडस्पीकर क्या चीज़ है। हाँ, उसका भगवान से प्रेम है, भगवान से परिचय है। वह जानता है कि यह भगवान की एक शक्ति का विकास है। भूमि, वायु—ये सब चीज़ें क्या हैं? मिट्टी से ही बनी हैं। लोहा क्या चीज़ है? मिट्टी का ही और एक रूप है, उसको आग से पकाया गया है, उससे और एक रूप में बदल दिया गया है। इस प्रकार यह माइक्रोफोन बना है, बाकी यह भगवान की शक्ति ही है।

तो भगवान की जो चीज़ है, वह भगवान की सेवा में लगनी चाहिए—यह भक्त का दर्शन है। इसीलिए वह माइक्रोफोन नहीं देखता है, वह देखता है कि जो भगवान की चीज़ है, भगवान की शक्ति का विकास है, इसको किस तरह से भगवान की सेवा में लगाया जाए। इसलिए जो भक्त होते हैं, उनका भौतिक दर्शन होता ही नहीं, सब चिन्मय दर्शन होता है।

हाँ, अद्वैतवादी लोग कहते हैं कि सब एक है, बाकी उनका भौतिक दर्शन है, उनको दो दर्शन हैं—'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या'। यदि तुम्हारा अद्वय-ज्ञान है, तुम अद्वैतवादी हो, तो फिर दो दर्शन क्यों होते हैं? इसलिए वैष्णव जो हैं, वे शुद्ध अद्वैतवादी हैं। उनका शुद्ध दर्शन है कि जो भगवान की शक्ति से जो चीज़ बनाई गई है, वह भगवान से अलग नहीं है, वह भी ब्रह्म वस्तु है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'। उनका ब्रह्म दर्शन होता है, उनमें भौतिक दर्शन होता ही नहीं।

'प्रपञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धिवस्तुनः।
मुमुक्षुभिः परित्यागो फल्गु वैराग्यं कथ्यते॥'

वैरागी या त्यागी भौतिक समझकर भगवद्-सम्बन्धी चीज़ को छोड़ देता है, उसको रूप गोस्वामी बताते हैं 'फल्गु वैराग्य'। वह वैराग्य पूर्ण नहीं है। वैराग्य पूर्ण तभी हो सकेगा जब कोई व्यक्ति यह समझ जाएगा कि सब चीज़ भगवान की है—'ईशावास्यमिदं सर्वम्'। हमारा कोई चीज़ नहीं है, उसका नाम है वैराग्य। और जो यह सोचता है कि 'यह चीज़ भौतिक है, यह चीज़ हमारी है, इसको हम अपने भोग में लगाएँगे'—यह भौतिक दर्शन है। भौतिक का अर्थ होता है जहाँ कृष्ण का स्मरण नहीं होता है, उसका नाम है भौतिक—Absence of Krishna consciousness. नहीं तो वास्तविक भौतिक बोलकर कोई चीज़ ही नहीं है, क्योंकि सब चीज़ भगवान से पैदा हुई है। तो भगवान से पैदा होने से वह मिथ्या कैसे हो सकती है? यह विचार है, यह दार्शनिक विचार है।

तो इसलिए हमको गुरु के पास जाना चाहिए और सब चीज़ अच्छी तरह से समझनी चाहिए—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्'। यहाँ 'अभिगच्छेत्' शब्द का व्यवहार किया गया है। इसको संस्कृत व्याकरण में कहते हैं 'विधिलिङ्'। यह विधि है, जैसे कानून है, उसको आप 'ना' नहीं बोल सकते। जैसे रास्ते में नियम है—Keep to the left. This is law. You cannot deviate from it. इसी प्रकार विधिलिङ् का अर्थ होता है कि यह आपकी खुशी की बात नहीं है, अवश्य करना चाहिए—'गुरुमेवाभिगच्छेत्'। जरूर उसके पास जाना चाहिए, यह सब शास्त्र की विधि है। मनुष्य जीवन में भगवान को समझना चाहिए, और भगवान को समझने के लिए गुरु के पास जाना चाहिए।

और गुरु कौन है? जो भगवान जैसे बताते हैं—'एवं परम्पराप्राप्तम्'। जैसा कल शाम को आपको सुनाया कि जो ज्ञान भगवान ने ब्रह्मा जी को दिया—'तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये'। आदिकवि ब्रह्मा जी का नाम है। तो भगवान वासुदेव ने ब्रह्मा को ज्ञान दिया। किस तरह से दिया? उस समय तो भगवान साक्षात् उपस्थित नहीं थे, भगवान तो और कहीं थे, और ब्रह्मा जी अकेले अन्धकार में सोच रहे थे कि 'मैं किधर से आया, मेरा क्या काम है?' यह सब सोच रहे थे। तो 'तेने ब्रह्म हृदा'—भगवान ने ब्रह्मा जी के हृदय से उनको ज्ञान दिया। आपको भी दे सकते हैं, ऐसी बात नहीं है कि ब्रह्मा जी को दिया और आपको नहीं देंगे। आपको भी देंगे, कब देंगे?

'तेषां सतत-युक्तानां भजतां प्रीति-पूर्वकम्।
ददामि बुद्धि-योगं तं येन मामुपयान्ति ते॥'

शास्त्र में भगवान कहते हैं कि आप योग्यता अर्जन कीजिए। वह योग्यता क्या है? 'तेषां सतत-युक्तानां'—सतत, 24 घंटे केवल भगवान का चिन्तन कीजिए। 'सततं कीर्तयन्तो माम्'—ये महात्मा हैं, इसलिए सब समय कीर्तन करना चाहिए। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। रास्ते में जाइए—हरे कृष्ण कीजिए, बस में बैठिए—हरे कृष्ण बोलिए, ट्रेन में जाइए—हरे कृष्ण बोलिए। 'वाचांसि वैकुण्ठ-गुणानुवर्णने'—मन को सब समय भगवान के चरणों में लगाइए। 'मन्मना भव मद्भक्तो'—जब भगवान के चरणों में मन को लगा दिया, तो आप भक्त हो गए। भक्त होना कोई मुश्किल नहीं है, सब कोई भक्त हो सकता है। यह तो स्वाभाविक है, जैसे पिता का पुत्र से प्रेम स्वाभाविक है, उसको कोई सिखाना नहीं पड़ता, केवल कोई भूल जाता है और भूलने से फिर उसको स्मरण कराया जाता है। वह शास्त्र इसीलिए है, जो हम लोग भूल गए हैं, हमको स्मरण कराने के लिए ये सब शास्त्र हैं। इसलिए शास्त्र में हमको ध्यान लगाना चाहिए।

यदि हम ध्यान नहीं लगाते हैं—'अश्रद्दधानाः पुरुषाः'—जिसको शास्त्र में श्रद्धा नहीं है, इस प्रकार जो पुरुष हैं—'धर्मस्यास्य परन्तप'। यह जो धर्म है, वैदिक धर्म, यह जो भागवत धर्म बोलिए, आत्म-धर्म बोलिए, असल धर्म यही है। 'धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्'—भगवान जो कहते हैं, वही धर्म है। आप धर्म नहीं बना सकते। जैसे जज साहब हैं, और कोई मूर्ख जाकर कोर्ट में अगर बोले कि 'जज साहब, माय लॉर्ड (My Lord), यह जो जिस कानून से आप विचार करते हैं, यह कुछ काम का नहीं है, मैं एक कानून बनाके ले आया हूँ, इससे विचार कीजिए।' तो जज साहब थोड़े ही सुनेंगे! वे तो जो गवर्नमेंट (Government) का कानून है, उसी को मानेंगे। इसी प्रकार धर्म का अर्थ होता है—'धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्'—जो भगवान बताते हैं, उसका नाम है धर्म, और सब चीटिंगबाज़ी है।

इसीलिए भगवान बोलते हैं—'सर्वधर्मान्परित्यज्य'। यह सब चीटिंगबाज़ी धर्म छोड़ो। यदि वास्तविक धर्म चाहते हो, तो यह धर्म है—'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'। जो मैं कहता हूँ, इसको लो, तब तुम्हारी सुविधा होगी। इधर भी वही बात कहते हैं, आख़िर में तो यही बताया, बीच में भी नवम अध्याय में—'अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप'। यह जो मैं बता रहा हूँ, इस धर्म में जिसकी श्रद्धा नहीं है, उसको क्या लाभ होगा? 'अप्राप्य मां'—हमको तो मिलेगा नहीं, और 'निवर्तन्ते'—फिर उसी चक्र में गिर जाएँगे। क्या चक्र? 'मृत्युसंसारवर्त्मनि'—यह जो मृत्यु-संसार है, एक दफ़ा शरीर ग्रहण करो और फिर मरो, और मरने और जन्म के बीच में खूब रोग से तकलीफ उठाओ, बुढ़ापे से तकलीफ उठाओ—'जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शनम्'।

यह जो हम लोग सब प्रॉब्लम सॉल्व (problem solve) कर रहे हैं, बड़े-बड़े सब कानून बनाने वाले और नियम बनाने वाले हैं, पर असल प्रॉब्लम (problem) तो यही है—जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि। उसका क्या सोल्यूशन (solution) है, क्या बताओ? बड़े साइंटिस्ट (scientist) हैं, बड़े प्लान (plan) बनाने वाले हैं, सब कुछ हैं, बाकी इसके लिए क्या करें? 'नहीं, यह तो होने ही वाला है।' नहीं, होने वाला है तो क्यों होगा? जो भगवान बताते हैं कि 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे'—क्यों हमको ऐसा शरीर मिलता है जो हन्यमान शरीर है? इस पर प्रश्न होना चाहिए। और नहीं तो इधर-उधर छोटी-छोटी बातों में फँस जाने से क्या लाभ होगा? इसका सोल्यूशन (solution) करो—'मृत्युसंसारवर्त्मनि'। यह जो 'भूत्वा भूत्वा प्रलीयते'—एक दफ़ा शरीर धारण करते हो, एक दफ़ा फिर मरते हो, क्यों इस झंझट में फँसे हुए हो? यह ब्रेन (brain) में नहीं है, इसलिए बोलता है 'मूढ़', 'गधा'।

और भगवान ने बताया है—'न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः'। भगवान यही सिखा रहे हैं, यही धर्म सिखा रहे हैं कि 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'। इसी में तुम्हारा सुख होगा, नहीं तो मृत्यु-संसार में पड़े रहोगे और जन्म-जन्मान्तर घूमते-फिरते रहोगे। यह सोल्यूशन (solution) है तुम्हारे जीवन का, इसको ग्रहण करो। बाकी इसको कौन ग्रहण नहीं करता है? 'अश्रद्दधानाः'—जिसकी भगवान में, भगवान की कथा में श्रद्धा नहीं है, वे इसको मानते नहीं। इसलिए भगवान उनको बोलते हैं कि ये जो व्यक्ति हैं, जो मैं बताता हूँ उसको मानते नहीं, वे कौन हैं? 'न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥' महापापी। भगवान आकर खुद समझा रहे हैं, ठीक-ठीक रास्ता बता रहे हैं, उसको ग्रहण नहीं करेगा क्योंकि वह महापापी है। और महापापी क्यों हुआ? मूढ़, गधा।

यह जितना पाप करते हैं, कानून तोड़ने वाले हैं, वे लोग मूर्ख होते हैं। जैसे एक बच्चा किसी की चीज़ ले ले, तो उसको एक्सक्यूज (excuse) है। बाकी 16 बरस, 18 वर्ष का हो गया और वह किसी की चीज़ ले ले, तो वह चोरी हो गई। वह अगर अदालत में जाकर बता दे, 'जज साहब, हम तो बचपन से किसी की चीज़ उठा लेते थे, हम तो नहीं जानते थे कि यह चोरी है।' तो There is no excuse. Ignorance is no excuse. तो पाप काज वही करते हैं जो मूढ़ हैं, जो भगवान को जानते नहीं, भगवान का कानून जानते नहीं, धार्मिक तत्त्व नहीं जानते हैं, तो वे जानवर हैं। इसलिए जानवर के लिए पाप नहीं है, परन्तु जब आपको मनुष्य शरीर मिला, तो आपको जानना पड़ेगा, नहीं तो पाप-पुण्य का अधिकार आपको... वेद-शास्त्र जो बनाया गया है, यह पशु के लिए नहीं है। जैसे गवर्नमेंट का कानून है, यह कुत्ता-गधा के लिए नहीं है, मनुष्य के लिए है। मनुष्य अगर कोई कानून तोड़ेगा, तो उसको सज़ा होगी। इसी प्रकार मनुष्य जीवन मिला है, और भगवान की कथा को समझा नहीं—'अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप'। उसको क्या होगा? Again condemned—'निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि'। इसको समझना चाहिए।

दो चीज़ें हैं, दो रास्ते हैं। एक भगवान के पास जाओ—'यद् गत्वा न निवर्तन्ते'—उस रास्ते में जाओ, और नहीं तो इस रास्ते में चलो—जन्म-जन्मान्तर केवल एक शरीर धारण करो और फिर दूसरा शरीर। यह नहीं है कि मनुष्य शरीर ही मिलेगा नेक्स्ट लाइफ (next life) में, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हाँ, एक पेड़ का शरीर मिल गया, तो एक जगह खड़े रहो 10,000 बरस! सैन फ्रांसिस्को (San Francisco) में हमने एक पेड़ देखा है, उसको रेड वुड ट्री (Redwood tree) बोलते हैं। बोलते हैं 7,000 बरस उसकी उम्र है। ऐसे बहुत से ट्री (tree) हैं। क्या कितना बड़ा पनिशमेंट (punishment) है, समझ लीजिए! आपको अगर इधर बोला जाए कि एक घंटा इधर खड़े रहिए, तो इसकी कितनी तकलीफ है, और वह पेड़ जो है, 7,000 बरस खड़ा रहता है, उसको एक कणिक भी शक्ति नहीं है कि वह उधर से हट जाए। यह भी एक शरीर है—84 लाख योनियों में—'तथा देहान्तर-प्राप्तिः'।

यह सब समझना चाहिए। क्यों आप इस मृत्यु-संसार में अपने को फँसा देते हैं? क्यों माया के जाल में, वेब्स (webs) में, उफ़ान में क्यों बहते चले जाते हैं? यह मुकुन्द दत्त के गीत गाए हैं—'मायार वशे याओ भेसे', खाओ हाबुडुबु, भाई!' जैसे माया की एक नदी है, स्रोत है, उसमें आपको फेंक दिया जाए, और कभी आप डूब जाते हैं, कभी तैरकर थोड़ा उठ जाते हैं, बाकी बड़ा तकलीफ है। तो जब तक हम लोग माया के वश में रहेंगे, इस उफ़ान में हमको बह जाना पड़ेगा—'मृत्युसंसारवर्त्मनि'। यानी कभी मनुष्य शरीर मिला, कभी पेड़ का शरीर मिला, कभी देवता का शरीर मिला, कभी लाट साहब का शरीर मिला, कभी कुत्ते का शरीर मिला। यह तो आपके हाथ में नहीं है, वह तो प्रकृति के हाथ में है। जैसा कर्म कीजिएगा, वैसा शरीर मिलेगा—'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः'। आप स्वाधीन नहीं हैं, प्रकृति के वश में हैं—'गुणमयी माया'। जब तक प्रकृति के वश में रहेंगे, इस उफ़ान में आपको फँस जाना पड़ेगा—'मृत्युसंसारवर्त्मनि'। इसको समझना चाहिए।

इसलिए आपको यह उचित है कि भगवान जो धर्म की बात कहते हैं, उसको समझिए, श्रद्धा रखिए उसमें। 'अजी, बोलने दीजिए।' नहीं, यह बात नहीं है। Then you are committing suicide. अपने गले में आप छुरी लगाते हैं। ऐसा काम न कीजिए, मनुष्य जीवन को बर्बाद न कीजिए। 'बहूनां जन्मनामन्ते'—अनेक जन्मों के बाद यह शरीर मिला है, 84 लाख योनियों में भ्रमण करते-करते।

'जलजा नव-लक्षाणि स्थावरा लक्ष-विंशति।
कृमयो रुद्र-सङ्ख्यकाः पक्षिणां दश-लक्षणम्॥'

पहले सभी जल था, जब प्रलय होता है तो जल में जल का जानवर होना पड़ता है। प्रलय के जल में, जल की योनियों में, उसमें 9 लाख अलग-अलग सब हैं। उसका इवोल्यूशन (evolution) होता है—'जलजा नव-लक्षाणि, स्थावरा लक्ष-विंशति'। फिर जल जब सूख जाता है, फिर पेड़ होता है, घास होती है, पौधे होते हैं, जो कि 20 लाख हैं। इसी प्रकार कृमि-कीट-पतंग होकर के फिर मनुष्य जीवन मिलता है, मनुष्य शरीर मिलता है। वह भी 'किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुल्कशा' जाने क्या-क्या शरीर सब मिलता है, उसके बाद बड़े पुण्य से भारतवर्ष में जन्म मिलता है, मनुष्य शरीर। इसको बर्बाद न कीजिए।

'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥'

आजकल एक अहंकार हुआ है कि 'हम बड़े पंडित हैं, हम बड़े समझदार हैं, हम बड़े ऑफिसर (officer) हैं।' यह अहंकार है। अहंकार ठीक है, बाकी 'विमूढात्मा'—जो अपना इंटरेस्ट (interest) नहीं समझते हैं, उस प्रकार अहंकार होने से क्या लाभ होगा? बैठकर के 'हम लाट साहब हैं', हो सकता है तुम लाट साहब हो, बाकी जो प्रकृति का जो कानून है, तुम लाट साहब हो या जो कोई हो, तुमको उसको मानना ही पड़ेगा। जैसे कोई डिज़ीज़ (disease) आपने इन्फेक्ट (infect) की, तो लाट साहब हैं या गरीब हैं, उस रोग से आपको भुगतना ही पड़ेगा। यह श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है:

'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनि-जन्मसु॥'

जब तक हम लोग प्रकृति में रहेंगे, इस भौतिक प्रकृति में, तो 'प्रकृतिजान् गुणान्'—वह हमको भुगतना पड़ेगा। और इसी कारण से, यह गुणों के साथ हमारा संग होने से—सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण—जैसे-जैसे गुण हम संग करेंगे, एसोसिएट (associate) करेंगे, उस प्रकार हमको शरीर मिलेगा।

'ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्य-गुण-वृत्ति-स्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥'

यह सब विचार है। यह भगवान आकर खुद समझा रहे हैं। यह जो गीता हम लोग पाठ कर रहे हैं, यह हमारे द्वारा बनाई हुई चीज़ नहीं है, यह तो भगवान आकर खुद कह रहे हैं। इसलिए भगवान कहते हैं—'अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप'। तो मैं बता रहा हूँ इसको, इसमें जिसकी श्रद्धा नहीं है, उसको क्या लाभ होगा? 'निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि'। यह सुसाइडल (suicidal) है, यह नहीं करनी चाहिए। भगवान की बात सुनिए और अपने जीवन को सफल कीजिए। यह माया के स्रोत में अपने को उफ़ान में बहा देना उचित नहीं है। मनुष्य जीवन इसलिए बनाया गया है कि हम खुशी करें? 'अहङ्कार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते'। 'हम किसी को मानते नहीं, भगवान क्या है?'—यह आसुरी भाव है, इसे छोड़िए।

इसीलिए हम लोगों ने शुरू किया था कि 'प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः'—किस रास्ते में हमको जाना चाहिए, प्रवृत्ति मार्ग या निवृत्ति मार्ग, यह असुर जो है वह जानता नहीं। क्यों? 'माययापहृत-ज्ञाना'। यूनिवर्सिटी (University) में डिग्री लेने से क्या होगा? उसका असल जो ज्ञान है, वह माया ने छीन लिया है—'माययापहृत-ज्ञाना'। इस ज्ञान से कुछ लाभ नहीं होगा। इसलिए शास्त्र में कहा है—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्'। वह ज्ञान के लिए गुरु के पास जाइए, उनसे समझिए—'तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥' यह मनुष्य जीवन के लिए उचित है।

इसीलिए हमारी वैदिक सभ्यता में पहले ही गुरुकुल में भेजा जाता है लड़कों को—'जाओ, सीखो जीवन का क्या उद्देश्य है।' वह सब तो अब सिखाया नहीं जाता है, बाकी जो चाहे वह सीख सकता है, सब चीज़ें मौजूद हैं—वेद, वेदान्त, शास्त्र आदि, और गुरु भी मौजूद हैं। बाकी हम लोग परवाह नहीं करते—'चलो जी, यह सब क्या होगा? इसमें क्या लाभ होगा? हथौड़ी पीटो, हथौड़ी पीटो, खूब रुपया मिलेगा, शराब पिएँगे और मज़ा करेंगे।' यह शूद्र सभ्यता है, इसमें कुछ लाभ नहीं होगा। 'कलौ शूद्र-सम्भवाः'—कलयुग में यह शूद्र सभ्यता जो है, यह खूब चालू है। विशेष करके पाश्चात्य देशों में यह सब फैक्ट्री (factory) बनाना, शूद्र होना, शराब पीना, मज़ा करना—यह सब हम लोग सीखते हैं। बाकी वे लोग फेड अप (fed up) हो गए हैं, वे लोग अब यह नहीं चाहते।

इसीलिए ये सब जो बालक हैं, वे तो कहते हैं, 'महाराज, आपसे अगर मुलाकात नहीं होती, तो हम लोग सुसाइड (suicide) करते।' इतना होपलेस (hopeless) हो गया था। यह कृष्ण कॉन्शसनेस (Krishna consciousness) उनको लाइफ (life) दे रहा है, लाइट (light) दे रहा है—Yes, there is life. Yes, there is a way of living life, not like cats and dogs. That is the Krishna Consciousness movement. तो भारतवर्ष में, भारतवर्ष की चीज़ है, आप लोग क्यों छोड़ देते हैं इसको? यह क्या बुद्धि है? उचित नहीं है, इसको लीजिए। फिर खूब अच्छी तरह से श्रीमद् भगवद्गीता पढ़िए और उसमें मनमाना अर्थ नहीं लगाइए कि 'यह कुरुक्षेत्र शरीर है और पंच पाण्डव इन्द्रियाँ हैं'—यह सब नहीं। As it is, try to understand Bhagavad-gita.

क्यों आप कुरुक्षेत्र का अर्थ लगाते हैं शरीर? कौन सी डिक्शनरी में है? बाकी लगा देते हैं, सब पागल हैं। कुरुक्षेत्र अभी तक मौजूद है, यह आपके चंडीगढ़ से बहुत नजदीक है। कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र है, यह शास्त्र में लिखा है—'कुरुक्षेत्रे धर्ममाचरेत्'। आज से नहीं, वैदिक युग से है। तो धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे पाण्डव लोग सब एकत्रित हुए, युद्ध के लिए, उनको तय करना चाहिए कौन राज्य लेगा। तो इसमें समझने में अनर्गल अर्थ लगाने की ज़रूरत क्या है? यह तो सब स्पष्ट मालूम होता है कि किसलिए श्रीमद् भगवद्गीता है, कहाँ बताई गई है। यह सब अनुसन्धान कीजिए। श्रीमद् भगवद्गीता यथास्वरूप उसको पढ़िए, जो भगवान बताते हैं उसको ग्रहण कीजिए, उसमें आपका लाभ होगा।

और नहीं करते हैं—'अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते...' वह तो समझता ही नहीं कि भगवान को प्राप्त करने से क्या लाभ है, जानता ही नहीं। बाकी यही असल चीज़ है—भगवान को प्राप्त करना। 'न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुम्'—भगवान के पास जाना, भगवान को प्राप्त करना, यही जीवन का उद्देश्य है, इसको जानते ही नहीं। 'न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः'—भगवान की जो एक्सटर्नल एनर्जी (external energy) है, बहिरंगा शक्ति, उसमें फँस गए हैं। वह समझता है कि भौतिक जगत में एडजस्टमेंट (adjustment) करके हम सुखी होंगे। क्योंकि मूर्ख हैं, जानते नहीं कि इसमें सुखी नहीं हो सकते जब तक भगवान के पास नहीं पहुँचते।

और लीडर (leader) लोग उसी तरह से उनको डील (deal) करते हैं—'देखो जी, यह प्लान (plan) हमने बनाया है, और इसको तुम ग्रहण करो और तुम सुखी हो जाओगे।' तो क्या लीडर हैं? 'अन्धा यथान्धैरुपनीयमानः'—एक अन्धा व्यक्ति है, वह दूसरे अन्धे को बोलता है, 'चलो जी, हम तुमको पार कर देंगे।' यह सब चल रहा है—'तेऽपीश-तन्त्र्यामुरु-दाम्नि बद्धाः'। यह सब प्लान-प्लान करने से कुछ नहीं चलेगा, यह तो माया इतनी तेज़ है—'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया'। जब तक आप भगवान की शरण नहीं लेंगे, आपको हर तरह से तकलीफ दी जाएगी, इसको आप समझिए—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते'। जब तक भगवान के चरणों में शरणागत नहीं होंगे, तो आपको तकलीफ उठानी पड़ेगी।

कृतान्त-मृत्यु-संसार—यह मृत्यु-संसार कितना कष्टदायक है, यह हम लोग सब भूल जाते हैं। मृत्यु—एक दफ़ा मरना, फिर माँ के पेट में निवास करना, हाथ-पैर बन्धन होकर 10 महीना इस तरह से सफोकेटेड (suffocated) अवस्था में पैक अप (pack up), या टाइट बैग (tight bag) की तरह। तो समझ लीजिए कि जन्म होने की कितनी तकलीफ है। वह भी आजकल माँ भी डॉक्टर के पास जाकर उसको मार देती है, यह सब समझना चाहिए। आजकल आधुनिक सभ्यता में वे जो बच्चे बेचारें इतनी तकलीफ में हैं, उनको भी डॉक्टर सुई दे देता है—'जाओ, इस बच्चे को मार दो।' उसका कानून भी हो गया यूरोप में, उसमें कोई दोष नहीं। यह सब है वह मृत्यु-संसार। वह महापापी जो होता है, वह माँ के पेट से निकलता ही नहीं। ऐसा काम न कीजिए, आपकी खुशी है, और उसमें आपको तकलीफ ही उठानी पड़ेगी, उसमें कोई लाभ नहीं होगा।

Thank you very much. Hare Krishna.

[प्रश्नोत्तरी सत्र - Q&A Session]

प्रश्न: बहुत सी चीज़ें हैं, उनसे कैसे मुक्ति पाई जा सकती है? भौतिक संसार में क्यों रहना है? यह एक ज़िद है कि भौतिक संसार में हमको रहना ही पड़ेगा।

प्रभुपाद: हाँ, यह एक भौतिक रोग है। वह जब रशियन (Russian) लोग पहले स्पुतनिक (Sputnik) छोड़े थे, वह बहुत ऊँचा ऊपर उठा। उधर से देखता था, 'हमारा मॉस्को (Moscow) कहाँ है?' यानी यह जो आसक्ति है, तो यह आपके क्या ध्यान में होता है? भौतिक संसार में रहना पड़ेगा? आप भौतिक संसार से छुट्टी ले लीजिए—'त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति'। भौतिक संसार में हमको रहने की ज़रूरत क्या है? इसमें लाभ क्या है? लाभ तो कुछ है नहीं, केवल तकलीफ उठाना। यह ज़िद क्यों है कि भौतिक संसार में हमको रहना पड़ेगा? ऐसा काम कीजिए कि फिर हमको भौतिक संसार में आने की ज़रूरत न पड़े। यह जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।

उसका उपाय बताया भगवान ने—'जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥' केवल भगवान कृष्ण को समझ लीजिए। भगवान क्यों आते हैं? क्यों इतनी तकलीफ उठाते हैं, हमको समझाते हैं? उनका जन्म क्या चीज़ है, उनका कर्म क्या चीज़ है? 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्' बताया। भगवान का जो जन्म लेना, भगवान का कुरुक्षेत्र की लड़ाई में शामिल होना—यह सब दिव्य है, ट्रांसेंडेंटल (transcendental) है, यह भौतिक चीज़ नहीं है। भगवान भी भौतिक नहीं हैं, भगवान का शरीर भी भौतिक नहीं है, भगवान का जो कार्यक्रम है वह भी भौतिक नहीं है, वह सब चिन्मय है। यदि इतना ही आप समझ जाएँगे, तो आपका जीवन सफल हो गया।

इसीलिए शास्त्र में कहा है कि भगवान कोई भौतिक वस्तु नहीं हैं—'अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्'। केवल भगवान कृपा करके जैसे मनुष्य हैं, उस प्रकार आकर के आपको समझा रहे हैं। इसलिए यह न समझिए कि भगवान हमारे जैसे एक साधारण व्यक्ति हैं, यह मूढ़ लोग समझते हैं। हाँ, तो इसीलिए कहते हैं, केवल भगवान का विषय, दिव्य विषय को यदि आप समझ जाएँगे, तो 'त्यक्त्वा देहं'—शरीर तो छोड़ना ही पड़ेगा। तो जो भगवान को समझे नहीं हैं, वे शरीर छोड़कर फिर और एक शरीर लेना पड़ेगा उनको, चाहे देवता का शरीर हो, चाहे कुत्ते का शरीर हो, लेना पड़ेगा। और जो भगवान को समझ गया—'जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः'—यह शरीर छोड़कर के 'पुनर्जन्म नैति', फिर पुनर्जन्म अर्थात् भौतिक शरीर फिर नहीं मिलता है। उसका जो चिन्मय शरीर है, वह चिन्मय शरीर से भगवान के पास जाएगा, वह चाहिए।

तो भौतिक जगत में रहकर के किस तरह से आप नेक्स्ट लाइफ (next life) में भगवान के पास जा सकते हैं, उसका उपाय तो भगवान ही बता रहे हैं श्रीमद् भगवद्गीता में। आप जिस अवस्था में हैं, रहिए, केवल सुनिए—'स्थाने स्थिताः श्रुति-गतां तनु-वाङ्-मनोभिः'। अपने स्थान में रहिए, कोई चेंज (change) करने की कोई ज़रूरत नहीं है। आप गृहस्थ हैं, संन्यास लेना पड़ेगा? या आप जज साहब हैं, आपको छोड़ना ही पड़ेगा? नहीं, केवल सुनिए। भगवान का विचार सुनने के लिए तो बहुत चीज़ें मौजूद हैं, श्रीमद् भगवद्गीता सुनिए। भगवान जैसे बताते हैं, यह श्रवण से ही आपको सब लाभ होगा—'श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्'। कोई मुश्किल नहीं है—'स्थाने स्थिताः श्रुति-गतां तनु-वाङ्-मनोभिः'। अपने स्थान में रहिए, कोई परिवर्तन करने की ज़रूरत नहीं, बाकी सुनिए। कान जो भगवान ने आपको दिया है, उस कान को उपयोग कीजिए। यह बिना संकोच खूब अच्छी तरह से सुनिए, इसका नाम है श्रुति। सुनिए, खूब सुनिए। इसीलिए यह सभा की गई है कि आप लोग आकर कृपा करके सुनें।

यही उपाय है कि भौतिक जगत में रहकर, अपने स्थान में स्थित होकर केवल सुनिए। हाँ, 24 घंटे सुनिए, कीर्तन कीजिए, केवल सुनिए, बस आपका जीवन सफल हो जाएगा। कोई परिवर्तन की ज़रूरत नहीं, सुनना चाहिए यह बात। और सुनना चाहिए कहाँ से? हाँ, जो गुरु हैं, उनसे सुनिए। अनर्गल व्यक्ति से, बकने वाले से सुनने से कुछ लाभ नहीं होगा। ठीक व्यक्ति से सुनिए, काम बन जाएगा।

प्रश्नकर्ता: अभी भाई ने प्रश्न किया है, ये तीनों प्रश्न हैं, उत्तर मिल चुके हैं। जब आप प्रश्न करते हैं, जब गुरु महाराज जी बोलते हैं, तो बहुत ध्यान से सुनिए। और कोई नहीं, जो बोलके हटे हैं और फिर आप उसको लेकर भेज रहे हैं। तो अगर आपको नहीं समझ आया, तो प्रश्न करना सिर्फ इसमें था—How the world can have peace? How can a man in the world...

प्रभुपाद: तो ज़रूरत नहीं है, आप कर भी नहीं सकते हैं। क्या रिनॉन्स (renounce) कीजिएगा? आपका है क्या जो रिनॉन्स (renounce) करें? सब तो भगवान की चीज़ है। आपकी चीज़ हो, तभी तो रिनॉन्स (renounce) करने की बात है। रिनॉन्स (renounce) करने की कोई बात नहीं है, खाली समझिए कि सब भगवान का है। हाँ, इतना समझने से आपका काम बन जाएगा। रिनॉन्स (renounce) आप क्या कीजिएगा? आपके पास तो कुछ है नहीं, यह शरीर भी आपका नहीं है, तो आप रिनॉन्स (renounce) क्या कीजिएगा?

इसीलिए दुनिया में दो चीज़ें चल रही हैं—एक रिनॉन्समेंट (renouncement) और एक भोग, भोग एंड त्याग (enjoyment and renunciation)। जो मूर्ख होते हैं, वे दूसरे की चीज़ भोग करने को चाहते हैं, और और एक मूर्ख होते हैं जिनका कुछ है ही नहीं और वे बोलते हैं, 'हम रिनॉन्स (renounce) करते हैं।' तुम्हारे पास है क्या जो तुम रिनॉन्स (renounce) करो? दोनों ही मूर्ख हैं। जो भोग करने वाला है वह भी मूर्ख है, और जो रिनॉन्स (renounce) करने वाला है वह भी मूर्ख है।

और ज्ञानी कौन है? जो जानते हैं कि हमारे पास कुछ है नहीं रिनॉन्स (renounce) करने को, न तो दूसरे की चीज़ भोग करने का हमारा अधिकार है। इसलिए जिसका जो है, उसको उसी के काम में लगाया जाए, वह ज्ञानी है, वह बुद्धिमान है। कौन है? भक्त। भगवान के भक्त जो हैं, वे रिनॉन्स (renounce) भी नहीं करते, भोग भी नहीं करते, सब चीज़ भगवान की सेवा में लगाते हैं। वह ज्ञानी है। 'सर्वधर्मान्परित्यज्य'।

इधर दुनिया में दो धर्म होते हैं—एक कर्मी है, वह केवल भोग के लिए प्लान (plan) बनाता है, कर्मी का धर्म; और जो अपने को ज्ञानी बताता है, वह कहता है—'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या', मिथ्या जगत को छोड़ दो। तो इसीलिए भगवान कहते हैं, कर्म-धर्म और ज्ञानी-धर्म इसको छोड़ो। हाँ, फिर क्या लिया जाए? भक्ति-धर्म—'अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्'। जब सब अभिलाषा छोड़ देंगे और ज्ञान से, कर्म से अनावृत हो जाएँगे, मुक्त हो जाएँगे, तब भक्ति मिलेगी—'आनुकूल्येन कृष्णानु-शीलनं भक्तिरुत्तमा'। उस भक्ति का आश्रय लीजिए, सब आपका सफल हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता: एक प्रश्न और है। उन्होंने लिखा है कि एक गुरु ने कहा था, 'मैं तो केवल कृष्ण के बारे में जानता हूँ और किसी के बारे में नहीं, बाकी तो सभी चोर हैं।' क्या सभी बाकी... उन्होंने कहा, आपने कहा कि 'मैं तो खाली कृष्ण के बारे में जानता हूँ और किसी के बारे में नहीं, बाकी सब जितने हैं चोर हैं।' तो इसमें क्या प्रश्न है?

प्रभुपाद: भगवान खुद ही बताते हैं—'न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः'। और गाली बकने का क्या बाकी रह गया? जो गधा है, और महापापी है, और नराधम है, हाँ, भगवान तो इतनी बातें बोले। हम एक ही बात बोले—'चोर', उसमें क्या दोष? श्रीमद् भगवद्गीता ने इतनी गाली दी कि नराधम, महापापी, और गधा, और ज्ञानहीन, आसुर, सब बताया। हम थोड़ा बोले—'चोर'। चोर तो है ही। भगवान की वस्तु लेकर समझता है, 'यह हमारी वस्तु है।' सब दुनिया में चलता है—'यह हमारा देश है।' कोई बोलता है, 'हमारा इण्डिया (India) है', कोई बोलता है, 'हमारा अमेरिका (America) है', कोई बोलता है, 'हमारा पाकिस्तान (Pakistan) है।' सब चोर हैं।

क्यों? भगवान बोलते हैं—'भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्'। मैं सबका मालिक हूँ, सर्वलोक। तुम्हारा कैसा हो गया? तो चोर हैं। हम क्या गलत बात बताए? सब चोर हैं जो भगवान की वस्तु लेकर के भोग कर रहे हैं और भगवान को मानते नहीं, सब चोर हैं। कोई गलत बात नहीं की हमने। आप लोग समझ लीजिए, जज साहब विचार करें।

प्रश्नकर्ता: भगवान का अंश होते हुए भी जीव क्यों पाप करता है?

प्रभुपाद: 'मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति'। भगवान का अंश होते हुए भी क्यों पाप करता है? कारण—'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनि-जन्मसु'। जैसे हमारी उँगली है, शरीर का अंग है, और इसमें कोई इन्फेक्शन (infection) हो गया, तो उँगली को तकलीफ होती है। वह जो इन्फेक्शन (infection) है, वह कारण है—'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनि-जन्मसु'। जो इस भौतिक जगत में आए हैं जीव, भगवान के जो पार्ट एंड पार्सल (part and parcel) हैं, यह तो ठीक है कि भगवान के हैं, बाकी क्योंकि भौतिक जगत में आए हैं और उनको संग करना पड़ता है—सात्त्विक, राजस, तामस। तो संग के अनुसार उसको...
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥