कल हम लोग भगवान की भक्ति, जो आसक्ति, इस विषय में कुछ आलोचना किया था कि "मय्य आसक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः" (Bhagavad Gita 7.1)। यदि भगवान में आसक्ति बढ़ाई जाए, उसका जो process है, पद्धति, रूप गोस्वामी ने जैसे बताया है कि "आदौ श्रद्धा"। श्रद्धा का अर्थ होता है भगवान में विश्वास। जैसे भगवान कहते हैं, "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (Bhagavad Gita 18.66)। इसमें पूर्ण विश्वास। वास्तविक भगवान के चरण में शरणागत होने से सब काम सिद्ध हो जाएगा, इसका नाम है विश्वास। श्री चैतन्य-चरितामृत के कविराज गोस्वामी ने श्रद्धा का अर्थ बताया है: "श्रद्धा"-शब्दे — विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय। इसका नाम है श्रद्धा, सुदृढ़ निश्चय। भगवान कहते हैं कि सब छोड़ के भगवान के चरण में शरणागति, इसमें पूर्ण विश्वास कि भगवान अवश्य मुझको रक्षा करेंगे—"अवश्य रक्षिबे कृष्ण" - विश्वास पालन।
जो आप लोग सब वृन्दावन में बैठे हुए हैं, बहुत से कहीं जंगल में, कहीं पड़े हुए हैं, बाकी उनका विश्वास है कि कहीं भी मैं रहूँ, भगवान कृष्ण के आश्रय में मैं रहूँ, अवश्य हमको रक्षा करेंगे। इसका नाम श्रद्धा, विश्वास। वास्तविक कृष्ण सबके हृदय में बैठे हुए हैं—"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति" (Bhagavad Gita 18.61)। कोई अकेले नहीं है, भगवान सबके हृदय में बैठे हुए हैं। केवल भगवान चाहते हैं कि जो हमारा तरफ थोड़ा लक्ष्य करे। भगवान तो "सुहृदं सर्वभूतानां" (Bhagavad Gita 5.29), भगवान सब जीवात्मा का सुहृद हैं। सब चाहते हैं किस तरह से इसका मंगल हो, और इसलिए भगवान साथ-साथ में रहते हैं, अंतर्यामी परमात्मा, बंधु रूप से।
तो यह भगवान में आसक्ति बढ़ाने के लिए पहली बात है श्रद्धा, विश्वास कि भगवान में आत्म-समर्पण करने से हमारा सब काम सिद्ध हो जाए—"कृष्णभक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय"। और दूसरा काम करने का कोई आवश्यकता है नहीं। ज्ञान, योग, तपस्या, कोई चीज़ की ज़रूरत नहीं, केवल भगवान के चरण में शरण। इसका नाम है आसक्ति। यह आसक्ति, इसका स्तर है: पहली श्रद्धा, "ततः साधु-सङ्गः"। उसके पश्चात साधु लोग जो भगवत भजन करने में सब समय नित्य युक्त हैं—"नित्य-युक्ता उपासते"। वो साधु हैं। साधु यह नहीं है जो कपड़ा बदलने से साधु हो जाता है। साधु का लक्षण है कि "अपि चेत् सुदुराचारो भजते माम् अनन्य-भाक्। साधुरेव स मन्तव्यः" (Bhagavad Gita 9.30)। वो साधु क्योंकि सब समय भगवत भजन करते हैं।
तो श्रद्धा के बाद यदि हमारा इस प्रकार श्रद्धा हो कि भगवान के चरण में शरणागति करने से ही हमारा सब काम सिद्ध हो जाएगा... सिद्ध होने का क्या मतलब है? सिद्ध होने का मतलब यही है, यह जो जन्म-मरण, जरा-मरण... जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, इसमें जो हम फँसे हुए हैं। जीवात्मा मैं नित्य, शाश्वत हूँ—"न हन्यते हन्यमाने शरीरे" (Bhagavad Gita 2.20)। यह जो मैं जीवात्मा हूँ, हमारा शरीर नष्ट होता है बाकी मैं जीवात्मा नित्य, शाश्वत हूँ, हमारा मरण नहीं होता, हमको शरीर पलटना पड़ता है। यह जो हमारा असुविधा है, इसका नाम संसार-चक्र। इससे छुट्टी लेना, यही असल सिद्धि है। "जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शनम्" (Bhagavad Gita 13.9), यह ज्ञान है। यह जन्म-मृत्यु से किस तरह से छुट्टी हो जाए, यही असल सिद्धि है। "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये" (Bhagavad Gita 7.3)। हजारों-करोड़ों व्यक्ति के भीतर कोई वास्तविक क्या सिद्धि है, वो जानने के लिए कोशिश करते हैं। "यतताम् अपि सिद्धानां कश्चिन् मां वेत्ति तत्त्वतः" (Bhagavad Gita 7.3)। और सिद्धि, सिद्ध के भीतर, हजारों-करोड़ों सिद्ध के भीतर कोई-कोई भगवान को समझता है।
तो पहली श्रद्धा, उसके बाद साधु-सङ्ग। जितना हम लोग करेंगे, उस श्रद्धा की वृद्धि और श्रद्धा की वृद्धि के साथ-साथ हमारी सिद्धि, भगवान में आसक्ति उतनी बढ़ेगी। श्रद्धा, साधु-सङ्ग, बस। साधु-सङ्ग करने से फिर भजन-क्रिया। हाँ, साधु लोग किस तरह से भजन करना होता है, बताएंगे आचार्य। इसलिए गुरु के पास जाना चाहिए—"तद्-विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्" (Muṇḍaka Upaniṣad 1.2.12)। यह वेद-वाणी है। तो साधु का अर्थ होता है गुरु। साधु, गुरु और शास्त्र। साधु श्री नरोत्तम दास ठाकुर बताते हैं: "साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्ते करिया ऐक्य"। वही साधु की पहचान है शास्त्र से। और शास्त्र क्या है? साधु का वचन है। और गुरु क्या है? जो साधु हैं और शास्त्र को जानते हैं। यह साधु, गुरु, शास्त्र।
साधु, श्रद्धा, ततः साधु-सङ्ग। साधु-सङ्ग करने से साधु भजन, भजन-क्रिया बताते हैं। और भजन-क्रिया करने से अनर्थ-निवृत्ति। जितना अनर्थ है, हम लोग बहुत अनर्थ में हैं, वो सब निवृत्त हो जाता है। अनर्थ पाप है, पाप से निवृत्त हो जाता है। जैसा हम लोग के American और European ये भक्त लोग को कहते हैं कि अवैध स्त्री-सङ्ग, इसको छोड़ना चाहिए। अपने विवाहित स्त्री छोड़ के कोई स्त्री से संपर्क नहीं, यह अवैध है। अवैध स्त्री-सङ्ग... वैध स्त्री-सङ्ग विवाहित स्त्री-सङ्ग, और अवैध जिससे विवाह नहीं है उससे संपर्क, यह अवैध स्त्री-सङ्ग महापाप है, यह अनर्थ है। यह हमको आगे बढ़ने नहीं देगा। क्योंकि जब तक हमारा पाप से संपर्क रहेगा, फिर हम भगवत भजन ठीक-ठीक नहीं कर सकेंगे। भगवान खुद कहते हैं: "येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥" (Bhagavad Gita 7.28)। एकांत भाव से भजन करने के लिए अनर्थ से मुक्त होना पड़ेगा, पाप से निवृत्त होना पड़ेगा।
अतः अनर्थ... भजन-क्रिया जिसका वास्तविक भजन-क्रिया हो रहा है, वो अनर्थ से निवृत्त हो जाएगा, उसको फिर पाप जीवन नहीं रहेगा। तो पाप जीवन क्या है? यह अवैध स्त्री-सङ्ग, और वृथा पशु-हिंसा, और नशा, और जुआ। शास्त्र में बताया है, "यत्र पाप..." तो अनर्थ-निवृत्ति, वास्तविक भजन-क्रिया होने से ये सब अनर्थ से मुक्त हो जाए। फिर जाकर के रुचि, भगवत कथा में रुचि। फिर रुचि, निष्ठा, भगवत भक्ति में निष्ठा। यह भगवत कथा सुनते-सुनते, जैसे भागवत में बताया: "शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः" (Srimad Bhagavatam 1.2.17)। भगवान की कथा सुनते-सुनते, पुण्य-श्रवण-कीर्तन, जो सुनता है, जो बोलता है, पुण्य-श्रवण-कीर्तन। श्रवण-कीर्तन से भगवत भक्ति शुरू होती है। "श्रवणादि-शुद्ध-चित्ते करये उदय"। जितना शुद्ध होगा भगवान की कथा सुनते-सुनते, उतना ही साधन वृद्धि होगी। तो सब शुद्ध चित्त करो। भगवत भक्ति सबका हृदय में है, कोई बाहरी चीज़ नहीं है। जैसे ये European, American भक्त लोग हैं, ये कृष्ण भक्त कैसे हो गए? सबके भीतर कृष्ण भक्ति है, केवल "श्रवणादि-शुद्ध-चित्ते करये उदय"। उसको उदय करना चाहिए, चीज़ भीतर में है। केवल साधु-सङ्ग में भगवान के विषय में श्रवण करते-करते "चेतो-दर्पण-मार्जनम्" (Śikṣāṣṭaka 1), चित्त-दर्पण मार्जन हो जाता है। फिर अपने को कुछ देख सकता है कि हमारा परिस्थिति क्या है।
तो "श्रवणादि-शुद्ध-चित्ते करये उदय"। तो रुचि, यह भगवान की कथा में रुचि, फिर निष्ठा, भगवत भक्ति में निष्ठा। जितना शुद्ध होते जाएंगे, उतना निष्ठा बढ़ती जाएगी। यह भागवत में बताया: "शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः। हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्-सताम्॥" (Srimad Bhagavatam 1.2.17)। भगवान सबके लिए सुहृद हैं—"सुहृदं सर्वभूतानां"। परन्तु "सताम्", जो भक्त हैं, उनके लिए विशेष सुहृद हैं। तो भगवान सबके हृदय में बैठे हुए हैं। भगवान जब देखेंगे कि जो भगवान की कथा में रुचि बढ़ती है, तो उनके हृदय में बैठ के "विधुनोति हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि"। अभद्र, यह लोभ और काम, काम और लोभ, ये दो चीज़ अभद्र चीज़, इसको नाश कर देते हैं भगवान। "शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः..." हृदय में है। माया की समस्या होने से हमारा हृदय अपवित्र है। यह काम और लोभ, रजोगुण-तमोगुण, यह हमारा हृदय में बैठेंगे। "तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये" (Srimad Bhagavatam 1.2.19)। रजोगुण-तमोगुण का यह लक्षण है काम और लोभ, अत्यंत लोभ, प्रयास। हाँ, हमको दो रोटी मिलने से काम चल सकता है बाकी हमको दस रोटी चाहिए, इसलिए दिन भर हम इधर-उधर घूमते हैं, दो रोटी में समझते नहीं। क्यों? वो काम और लोभ अभी तक हृदय में बैठे हुए हैं। इसलिए भगवान की कथा सुनना चाहिए। इस तरह से एक रुचि, निष्ठा, फिर जाकर के आसक्ति, उसके बाद भाव, उसके बाद भगवत प्रेम—"साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः" (Bhakti-rasāmṛta-sindhu 1.4.15-16)।
वास्तविक यह चीज़ जो है, भगवान में किस तरह से आसक्ति बढ़ती है, यह जो ज्ञान है, भगवान स्वयं बता रहे हैं: "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानं..." विज्ञान और ज्ञान। ज्ञान का अर्थ होता है theoretical ब्रह्मज्ञान, यह theoretical है। और विज्ञान, भक्ति। ब्रह्मज्ञान हम समझ गया, "अहं ब्रह्मास्मि"। केवल समझने से काम नहीं चलेगा, सविज्ञान उसको काम में ले आना चाहिए। काम में नहीं ले आने से फिर हमारा पतन हो जाएगा। "आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदङ्घ्रयः" (Srimad Bhagavatam 10.2.32)। बहुत परिश्रम करके, तपस्या करके ब्रह्मज्ञान लाभ करते हुए भी वो फिर गिर जाते हैं—"पतन्त्यधः"। क्यों? "अनादृत-युष्मदङ्घ्रयः"—ये ब्रह्मज्ञानी लोग भगवान के चरण जो हैं, उसको अनादर करते हैं। भगवान निराकार हैं, उनके चरण नहीं हैं, उनका हाथ नहीं है, पैर नहीं है, इसलिए वो गिर जाते हैं। "आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदङ्घ्रयः"। इसलिए विज्ञान जो है, वो भगवान को सविज्ञान जानना। भगवान कहते हैं, "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानं..." मैं तुमको बता रहा हूँ।
तो वास्तविक भगवान का विषय है, भगवान से ही मालूम हो सकता है। speculation करने से, मनोधर्मी, "भगवान ऐसी है, भगवान ऐसी है..." नहीं। भगवान जिस तरह से हैं, तो भगवान स्वयं आकर समझाते हैं—द्विभुज मुरलीधर श्यामसुंदर भगवान। तो फिर उनके विषय में कल्पना करने की क्या ज़रूरत है? मायावादी लोग कहते हैं, "कल्पना करो, ब्रह्म का कल्पना करो।" कल्पना की क्या ज़रूरत जब भगवान साक्षात सामने मौजूद हैं? इधर जो आप लोग सब दर्शन करने को आते हैं, भगवान को ही तो दर्शन करने को आते हैं ना? और कोई चीज़ दर्शन करने को आते हैं? तो भगवान स्वयं इधर मौजूद हैं, फिर हमको कल्पना करने की क्या ज़रूरत है? यही अज्ञान है, यह ज्ञान नहीं है जो ब्रह्म को कल्पना करे। ब्रह्म का कोई कल्पना कर भी सकता है क्या? नहीं। इसलिए भगवान कहते हैं, "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानं..." आप लोग जो सब ज्ञानी हैं, ब्रह्मज्ञानी, तो सविज्ञान सहित इसको सुनिए। "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते" (Bhagavad Gita 7.2)। यदि वास्तविक भगवान को आप समझ गए, भगवान को समझना तो साधारण बात नहीं है, परन्तु भगवान कृपा करके जब समझाते हैं तो तब हम लोग को कुछ मालूम होता है।
"अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥" (Bhakti-rasāmṛta-sindhu 1.2.234)
यह जो हमारा इन्द्रिय है, इस इन्द्रिय द्वारा भगवान का विषय, भगवान का नाम, भगवान का गुण, भगवान का रूप, भगवान का गुण, भगवान का परिकर वैशिष्ट्य, यह इन्द्रिय द्वारा समझा नहीं जाता। "अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ..." यदि हम लोग जिह्वा को भगवान की सेवा में नियुक्त करता हूँ, तो भगवान स्वयं उपस्थित होते हैं, उसका नाम विज्ञान, सविज्ञान। और भगवान को समझने से सब ज्ञान लाभ हो जाता है—"यस्मिन् विज्ञाते सर्वम् इदं विज्ञातं भवति" (Muṇḍaka Upaniṣad 1.3)। इसलिए भगवान कहते हैं, "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते"। और कुछ जानने के लिए आवश्यकता नहीं है।
भगवान, ब्रह्म, परमात्मा—"ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते" (Srimad Bhagavatam 1.2.11)। एक ही वस्तु है जो अपना समझने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण से, कोई भगवान को ब्रह्म रूप से उपलब्ध करता है, कोई परमात्मा रूप से, और कोई स्वयं भगवान रूप से। जो ज्ञानी लोग हैं, क्योंकि अपनी बुद्धि से भगवान को समझना चाहते हैं, इसलिए उनको निर्विशेष, निराकार ब्रह्म का। योगी लोग सब समय भगवान का चिन्तन करते हैं—"ध्यानावस्थित-तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो" (Srimad Bhagavatam 12.13.1)। भगवान को परमात्मा रूप से देखते हैं। और भक्त लोग साक्षात व्रज-नंदन हरि कृष्ण को देखते हैं—"प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति" (Brahma-saṁhitā 5.38)। जिसका भगवत प्रेम है, वो चौबीस घण्टा भगवान का ही दर्शन करते हैं, और कुछ नहीं देखते। वही चैतन्य-चरितामृत में बताते हैं: "स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्ति। सर्वत्र हय निज इष्टदेव-स्फूर्ति॥" (Caitanya-caritamrta Madhya 8.274)। जो भगवत प्रेमी है, वो कोई भी चीज़ देखता है, उसका भगवान का स्मरण होता है, भगवान को देखता है। स्थावर-जङ्गम, कोई पेड़ भी देखता है, कोई हाथी भी देखता है, कोई मनुष्य भी देखता है—"पण्डिताः समदर्शिनः" (Bhagavad Gita 5.18)। वो देखता है कि भगवान की सर्वत्र, अखिल जगत् पर सब ब्रह्म-शक्ति, यह भगवान की शक्ति, प्रकृति का विस्तार है, असल में भगवान। इसलिए भगवत प्रेम, आसक्ति बढ़ानी चाहिए, तो सब समय भगवान का दर्शन होगा। "यं श्यामसुन्दरम् अचिन्त्य-गुण-स्वरूपं गोविन्दम् आदि-पुरुषं तम् अहं भजामि" (Brahma-saṁhitā 5.38)।
यह ब्रह्म-संहिता। जिसका भगवत प्रेम है, वो सब समय भगवान को दर्शन करता है। नास्तिक लोग बोलते हैं, "जो भगवान को दिखा सकते हैं?" भगवान को देखने के लिए तो आँख होना चाहिए। यही मन्दिर में आते हैं, कोई भगवान को देख के मूर्छित हो जाते हैं, और कोई बोलता है, "यह पत्थर की मूर्ति है, इसको देख के क्या लाभ?" वो तो प्रेम की बात है ना? भगवत दर्शन करने के लिए आँख भी होना चाहिए। चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ मन्दिर में प्रवेश किया, देखते ही जगन्नाथ, मूर्छित हो गए—उनका भगवत दर्शन। और साधारण नास्तिक जो जाते हैं, "यह लकड़ी की मूर्ति है, इसको देखने के लिए क्यों इतना आदमी आते हैं?" वो इसलिए, "प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन"। भक्त लोग ही भगवान को दर्शन कर सकते हैं, बाकी वास्तविक भगवत दर्शन नहीं कर सकता, सविज्ञान दर्शन नहीं होता। थोड़ा ज्ञान से थोड़ा-बहुत आगे पहुँच सकता है बाकी असल दर्शन करने वाला भक्त लोग। क्योंकि भगवान स्वयं बताते हैं कि "भक्त्या मामभिजानाति" (Bhagavad Gita 18.55)। भगवान कहीं बताया नहीं कि ज्ञान से हमको देख सकता है, योग से हमको देख सकता है, नहीं। "भक्त्या मामभिजानाति"। भगवान को तात्त्विक समझना चाहिए तो वो भक्ति से ही सम्भव है। भक्ति से क्यों सम्भव है? क्योंकि भक्ति के वश हो जाते हैं भगवान, और जो भक्त होते हैं उसको दर्शन देते हैं। वो भगवान कृपा करते हैं, भक्त को ही दर्शन देते हैं। "नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः" (Bhagavad Gita 7.25)। दूसरे के लिए योगमाया द्वारा आवृत रहते हैं, सब कोई भगवान को दर्शन नहीं कर सकते।
जैसे प्रह्लाद महाराज, जब प्रह्लाद महाराज के ऊपर अत्याचार हो रहा था, उस समय भगवान नृसिंह खम्भे में प्रह्लाद जी को दर्शन दिया कि "डरो नहीं, हम इधर हैं।" तो प्रह्लाद महाराज देख रहा था। उनका पिताजी देखा, उनको पूछा, "क्यों, तुम्हारा भगवान क्या खम्भे में है?" वो बोला, "हाँ पिताजी, खम्भे में है।" तो क्रोध से खम्भे को तोड़ दिया। तो इसी प्रकार भगवान को जो भक्त होते हैं, वो सब जगह में भगवान को दर्शन करते हैं। और जो भगवान के अभक्त होते हैं, वह भगवान सामने भी रहने से उसका दर्शन नहीं कर सकते—"योगमायासमावृतः"। इसलिए वो ज्ञान, वो विज्ञान जो है, भक्ति, भक्ति जो उसको समझना चाहिए, तब जाके भगवान का दर्शन होगा। "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानं... यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते"। और भगवत दर्शन होने से, भगवान का प्रेम होने से, फिर उनका साधन, साधना और तपस्या सब खत्म हो जाता है। आखिरी बात है भगवत दर्शन। "आराधितो यदि हरिस तपसा ततः किम्, नाराधितो यदि हरिस तपसा ततः किम्" (Nārada-pañcarātra)। यदि भगवान का आराधन हुआ, भगवान की भक्ति लाभ हुई, फिर तपस्या की और क्या ज़रूरत है? तपस्या, तपस्या का फल है भगवत भक्ति लाभ। "नाराधितो यदि हरिस तपसा ततः किम्"—यदि भगवान का ही दर्शन नहीं हुआ, फिर झूठ-मूठ तपस्या करने से क्या लाभ होगा? "श्रम एव हि केवलम्"। भगवत उपलब्धि नहीं होने से केवल तपस्या से क्या लाभ? "धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन-कथासु यः। नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥" (Srimad Bhagavatam 1.2.8)। सब अपना-अपना धर्म को खूब अच्छी तरह से याजन करते हैं, "स्वनुष्ठितः", यदि भगवान की कथा में रुचि नहीं, आसक्ति नहीं है, तो शास्त्र कहते हैं वो केवल परिश्रमी है, उसमें कुछ लाभ नहीं, "श्रम एव हि केवलम्"।
"स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" (Srimad Bhagavatam 1.2.6)। वो धर्म याजन सबसे बढ़िया है, first class क्या चीज़ है? "यतो भक्तिरधोक्षजे"—जिस धर्म याजन करने से भगवान में भक्ति होती है। किस प्रकार भक्ति? "अहैतुकी अप्रतिहता"। कोई हेतु नहीं, "भगवान से कुछ लाभ कर लेंगे", यह बात नहीं। "भगवान प्रभु हैं, मैं भगवान का नित्य दास हूँ, इसलिए हमारा उचित है भगवत सेवा।" इस प्रकार जिसको ज्ञान है, वो ब्रह्मज्ञान। और जब भक्ति में और लग जाते हैं, वो मुक्त पुरुष, वास्तविक दास कर्म। जिसका सब भगवान की सेवा में मन, प्राण, शरीर, धन, सब कुछ लगा हुआ है, वो किसी प्रकार अवस्था में हो, वो जीवन-मुक्त। "जीवन-मुक्तः स उच्यते"। उसके लिए मुक्ति की कोई आवश्यकता है? और मुक्ति का अर्थ होता है: "मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः" (Srimad Bhagavatam 2.10.6)। चैतन्य महाप्रभु बताए हैं: "जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्य-दास'" (Caitanya-caritamrta Madhya 20.108)। जो भगवान की सेवा में सब समय नियुक्त है, वो मुक्त है, उसका नाम ही मुक्ति है। मुक्ति का अर्थ नहीं कि हमारा एक सिर है और चार सिर हो जाएगा, एक हाथ है, दस हाथ हो जाएगा, यह बात नहीं है। जो माया की सेवा छोड़ के जब भगवत सेवा में नियुक्त हो जाते हैं, उसका नाम है मुक्ति—"हित्वान्यथारूपं"। अभी हम लोग अन्यथा रूप सेवा में हैं। कोई देश की सेवा में है, कोई अपना family की सेवा में है, परिवार की सेवा में है, कोई अपना समाज की सेवा में है, और कुत्ता की सेवा में है, बिल्ली की सेवा में है। यह सब सेवा सब छोड़ के जब भगवत सेवा में नियुक्त हो जाते हैं, उसका नाम है मुक्ति। इसलिए भगवत भक्त के लिए मुक्ति की कोई आवश्यकता है नहीं, भगवत भक्त सब मुक्त हैं। "मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः"। यह सब विज्ञान, इसका नाम है विज्ञान, यह सब समझना चाहिए। यह भगवत सेवा, भगवत भक्ति, भगवत रूप, भगवत गुण, भगवत परिकर, भगवत वैशिष्ट्य, यह सब विज्ञान, इसका नाम है विज्ञान। और ज्ञान का अर्थ होता है ब्रह्मज्ञान—"अहं ब्रह्मास्मि", "मैं शरीर नहीं हूँ", इसका नाम है ज्ञान। और भगवत तत्त्व ज्ञान, इसका नाम है सविज्ञान। इसलिए भगवान स्वयं भगवत ज्ञान दे रहे हैं, तो हम लोग को उसको लेना चाहिए, जीवन में अपनाना चाहिए, हमारा जीवन सम्पूर्ण हो जाएगा।
और मनुष्य जीवन का एकमात्र कार्य है कि यह जन्म-मृत्यु से छुट्टी है। यह समझता नहीं है। वो समझता है हमको एक खूब बड़ा मकान, skyscraper building, जैसे America में सब बनाते हैं, 102 मंज़िल, आजकल 104-5 हो गया। पहले जब हम New York में गया था, उधर एक बहुत भारी building, Empire State Building था, उसके 102 मंज़िल। ऊपर से, छत के ऊपर से नीचे motor कार मालूम होता है matchbox, इतने छोटे। तो आदमी समझते हैं इस प्रकार एक building बना लेने से और दो-चार motor रखने से जीवन सफल हो जाएगा। यह बात नहीं है। जीवन सफल तभी होगा कि जब भगवान को हम लोग समझें। भगवान को समझना साधारण बात नहीं है, परन्तु जहाँ तक भगवान समझा रहे हैं, खूब यह भगवत गीता में, इतना अगर हम लोग समझा जाए तो "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥" (Bhagavad Gita 4.9)। फिर जीवन सफल हो गया। केवल कृष्ण को भक्ति द्वारा यदि थोड़ा ही बहुत समझ जाएँ... और क्या समझना है? "कृष्ण प्रभु हैं, मैं नित्य दास हूँ।" बस, इतना। इतना ही समझना है, और क्या समझना है? इतना ही जो समझ गया, उसका जीवन सफल हो गया और वो काम में लग गया। सब कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है, बाकी हमारा चित्त-दर्पण जो है, बहुत गर्दा भरा हुआ है, इसलिए सब समय भगवत कीर्तन करनी चाहिए। यह चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है: "चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्। आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्॥" (Śikṣāṣṭaka 1)।
"कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्" (Srimad Bhagavatam 12.3.51)। केवल भगवान का कीर्तन, भगवान का नाम, गुण, लीला, परिकर, विशेष करके महामन्त्र कीर्तन: हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। सब समय कीर्तन करते रहिए। आप लोग सब वृन्दावन वासी, आपको ज्यादा समझाने की कोई आवश्यकता है नहीं। बाकी सत्संग हो रहा है, भगवान नाम, गुण जितना ही repeatedly उसको समझने के लिए चेष्टा करेंगे, उतना ही हमारा हृदय जो है, जिसमें काम-क्रोध से भरा हुआ है, वो नष्ट हो जाएगा। "तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये" (Srimad Bhagavatam 1.2.19)। "नित्यं भागवत-सेवया" (Srimad Bhagavatam 1.2.18), भागवत में ऐसी बताया: "नित्यं भागवत-सेवया"। यह बात सप्ताह कर लिया, बस नहीं। यह सप्ताह सेवा, हम तो देखा नहीं कहीं भी भागवत है। भागवत में कहते हैं, "नित्यं भागवत-सेवया"। "शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः। हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्-सताम्॥ नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया" (Srimad Bhagavatam 1.2.17-18)। अभद्र जो है, बिल्कुल नष्ट नहीं हुआ है तब भी "नष्टप्राय", प्राय नष्ट हो गया। इस प्रकार अवस्था में नष्ट कैसे हो सकती है? "नित्यं भागवत-सेवया", नित्य, सब समय, सब समय। भगवान, भागवत, भगवान का सम्पत्ति। दो भागवत होते हैं: ग्रन्थ भागवत और भक्त भागवत। तो भागवत सेवा... गुरु हैं भक्त भागवत, और ग्रन्थ भागवत हैं गुरु का प्रमुख। उनसे भागवत सुनें जो वास्तविक जीवन जिसका भागवत में है—"सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो" (Srimad Bhagavatam 3.25.25)। इस प्रकार व्यक्ति का मुखारविन्द से भागवत की कथा सुनें, नित्य, सब समय। नहीं कि एक सप्ताह सुन लिया, काम खत्म, नहीं। सब समय, "नित्यं भागवत-सेवया। भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी" (Srimad Bhagavatam 1.2.18)। यह निष्ठा, नैष्ठिकी भक्ति तभी हो सकती है। "नष्टप्रायेष्वभद्रेषु", यह अभद्र को मिटाना चाहिए। यह अभद्र मिट सकता है, सब शास्त्र का यही सिद्धान्त है: "चेतो-दर्पण-मार्जनम्", "परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्"।
यह संकीर्तन द्वारा चित्त-दर्पण मार्जन हो गया, फिर आस्ते-आस्ते सब चीज़ प्रकाश होगा हृदय में। फिर भगवान से बातचीत कर सकेंगे। भगवान भी बताएंगे, "ऐसा करो।" "तेषां सतत-युक्तानां भजतां प्रीति-पूर्वकम्" (Bhagavad Gita 10.10)। जो भगवान की भक्ति में, भगवान की सेवा में सब समय प्रीति से... नहीं कि "यह काम हमको करना है, चलो थोड़ा कार्य..." नहीं, प्रीति से, भाव से। "भगवान हमारा प्रभु हैं, हमको सेवा ज़रूर करनी चाहिए।" इस प्रकार प्रीति से जो करते हैं, उससे भगवान बातचीत करते हैं—"ददामि बुद्धि-योगं तम्" (Bhagavad Gita 10.10)। यह बुद्धि-योग का, भक्ति-योग उनको बताते हैं, उपदेश देते हैं, जिसके द्वारा आस्ते-आहिस्ते भगवान के पास पहुँच जाते हैं। "यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम" (Bhagavad Gita 15.6)। यही भगवत गीता का उपदेश है और सब शास्त्र का ही उपदेश है। इसी तरह से जन्म-मृत्यु के हाथ से छुट्टी लेकर के भगवान के पास पहुँच जाना और उनकी सेवा में निवृत्त हो जाना।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥