ज्ञानं ते सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ भगवान श्री कृष्ण अपने विषय में कहते हैं कि मुझसे आसक्ति, प्रेम बढ़ाओ। "मय्यासक्तमनाः" — उसी में भगवद्ज्ञान संपूर्ण लाभ हो जाए। "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः" — भगवान का आश्रय ग्रहण करना चाहिए। भगवान... यदि कोई कहे कि भगवान तो हमारे सामने हैं ही नहीं, तो भगवान का आश्रय किस तरह से मैं करूँ? इसलिए चौथे अध्याय में भगवान बताए हैं: "एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः"। भगवान का आश्रय ग्रहण कीजिए, और नहीं तो भगवान से जो परंपरा... हाँ, एक शिष्य से और एक शिष्य। जैसे भगवान पहले ब्रह्मा जी को बताया था, ब्रह्मा जी नारद जी को बताया, और नारद जी व्यासदेव को बताया, और व्यासदेव उनका शिष्य मध्वाचार्य। इसी प्रकार परंपरा से भगवद्ज्ञान लाभ होता है। यह पंथ ऊपर से नीचे आता है, नीचे से ऊपर नहीं जा सकता, वह असंभव है। जो व्यक्ति मनमाना भगवद्-चिंतन करता है, भगवान के पास पहुँचने के लिए प्रयास करता है, उसको भगवान मिलना मुश्किल है। "क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्" — उनके लिए बहुत क्लेश है। और भगवान से, भगवान का विषय जो ज्ञान है, उसको यदि किसी को प्राप्त करना होता है, वह परंपरा से। इसलिए चार संप्रदाय: ब्रह्म संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय, श्री संप्रदाय और कुमार संप्रदाय। संप्रदाय से यदि आप भगवद्ज्ञान लाभ करेंगे, तो वह संपूर्ण है, "असंशयं समग्रं माम्" — उसमें कोई संशय नहीं रहेगा और पूर्ण ज्ञान। क्योंकि "मय्यासक्तमनाः... मदाश्रयः" — भगवान, यह तो भगवान का परंपरा सूत्र से आचार्य हैं, उनका आश्रय ग्रहण करने से भगवद्ज्ञान पूर्णता से लाभ होगा, उसमें कोई संदेह नहीं रहेगा कि भगवान निराकार हैं कि आकार नहीं है, भगवान शून्य हैं कि भगवान का विग्रह है। अनेक विषय में हम लोगों को संदेह रह जाता है। यदि परंपरा सूत्र से आचार्य जो जैसा बताते हैं, उस प्रकार हम लोग भगवद्ज्ञान लाभ करेंगे, तो वह संपूर्ण है।
इसलिए भगवान स्वयं बताते हैं कि "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः"। यह जो अध्याय में भगवान अपने विषय में हम लोगों को समझा रहे हैं, यह पूर्ण ज्ञान है, और सविज्ञान। ज्ञान और विज्ञान। ज्ञान English में बोलता है theoretical knowledge। यह जैसा बड़े-बड़े वैज्ञानिक लोग पहले बताते हैं, यह चीज़ यह-यह वस्तु से बना हुआ है। फिर उसको laboratory में experiment करते हैं, दिखाते हैं किस तरह से वह चीज़ बन सकता है और-और वस्तु से मिलकर के। एक चीज़ ज्ञान और एक चीज़ विज्ञान। ज्ञान है कि परमेश्वर कोई है, यह ज्ञान है। और वास्तविक परमेश्वर हैं, उनसे हम मिल सकते हैं, उनसे बातचीत कर सकते हैं, उनसे निर्देश ले सकते हैं, वह विज्ञान है। तो भगवान से संपूर्ण ज्ञान एक तो किताब, शास्त्र आदि में मिलता है, और जो वास्तविक आगे बढ़े हुए हैं, वह भगवान से, उनसे बातचीत करते हैं। वह भी एक परिस्थिति है, उसको विज्ञान कहा जाता है। यह कोई हमारी बनाई हुई बात नहीं है, भगवान खुद कहते हैं: "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तम्..." तो वह जो भगवान से बातचीत करने की जो परिस्थिति है, वह एक अवस्था विशेष है। "अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः" — हमारा जो अभी इन्द्रिय है, जड़ इन्द्रिय, यह इन्द्रिय से भगवद्ज्ञान नहीं हो सकेगा। हाँ, यह इन्द्रिय को प्राकृत इन्द्रिय से अप्राकृत इन्द्रिय में जाना पड़ेगा। है हमारा प्राकृत इन्द्रिय, बाकी वह ढका हुआ है। प्राकृत... हाँ, भूमि, वायु... आगे जाके भगवान समझाएँगे। यह जो हमारा इन्द्रिय है, जैसे भगवान का इन्द्रिय है, हमारा भी इन्द्रिय है। जैसे पिताजी हैं, पिताजी का भी इन्द्रिय है, पुत्र का भी इन्द्रिय है। हाँ, यह नहीं है जो पुत्र का इन्द्रिय है और पिता का इन्द्रिय नहीं है, यह बात नहीं। हाँ, तो यह इन्द्रिय जो हमारा भी है, यह ढका हुआ है, भौतिक वस्तु द्वारा यह ढका हुआ है। जैसा हमारा शरीर यह कपड़े से ढका हुआ है, असल शरीर कपड़े के अंदर है। इसी प्रकार यह जो शरीर है भौतिक, इसके अंदर में असल में मैं हूँ। "देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥" तो यह जो ज्ञान, और इसको अच्छी तरह से विज्ञान-सम्मत समझना, उसका नाम है विज्ञान। तो भगवद्-विज्ञान और आत्म-विज्ञान और ब्रह्म-विज्ञान, सभी एक ही बात है।
तो भगवान खुद ब्रह्मज्ञान बता रहे हैं। "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" — यह जो मनुष्य शरीर है, यह ब्रह्मज्ञान लाभ करने के लिए है। और कोई ज्ञान लाभ करने की कोई ज़रूरत नहीं है। क्या ज्ञान लाभ करेगा? केवल भगवद्ज्ञान अर्थात ब्रह्म। यह मनुष्य शरीर है, तो भगवान परंब्रह्म हैं। "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्" — वह खुद बता रहे हैं। इसलिए भगवान कहते हैं: "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः" — मैं तुमको बता रहा हूँ। भगवान स्वयं बता रहे हैं। और बाकी क्या रह गया? किसी को ज्ञान लेने के लिए कोई गुरु के पास जाना पड़ता है, teacher के पास जाना पड़ता है, कोई बुज़ुर्ग से लेना पड़ता है। स्वयं भगवान, सर्वज्ञ, पूर्ण भगवान, सब ज्ञान के अधिकारी, "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशशः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव..." संपूर्ण ज्ञान जिसके पास है, वह बता रहा है: "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः" — मैं तुमको बता रहा हूँ अशेषतः, और उसमें कुछ बाकी रक्खा नहीं, सब संपूर्ण बता दिया। भगवद्ज्ञान लेने में क्या मुश्किल होता है? भगवान खुद आकर के बता रहे हैं साक्षात्। अगर आप कहेंगे जो हमको तो नहीं बता रहे हैं, अर्जुन को... अरे, अर्जुन को बताया तो वह तो जो अर्जुन को बताया, सब लिखा है। तुम अर्जुन जैसा समझा, उसी प्रकार तुम समझ जाओ, तो भगवान तुम्हारे साक्षात् सामने ही हैं। भगवान तो हैं ही तुम्हारे सामने। "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति" — भगवान कोई ज़्यादा दूर में नहीं हैं, आपके हृदय में बैठे हुए हैं। केवल उनसे बातचीत करने के लिए आपको qualified, यानी उस गुण को, वह क्या बोलता है, योग्यता, उसको प्राप्ति करनी है। भगवान से बातचीत करने के लिए योग्यता लाभ करना चाहिए।
तो वह योग्यता क्या चीज़ है? भक्ति। "भक्त्या मामभिजानाति..." भगवान को अगर कोई समझते हैं यह पत्थर है, यह क्या नाम, metal है, कोई धातु है, यह पुतली पूजा करते हैं... बहुत से आदमी कहते हैं मंदिर में जाके क्या होगा? भगवान सर्वत्र बैठे हैं, तो मंदिर में क्यों जाएँ? तो उनका विचार है कि भगवान सर्वत्र हैं, केवल मंदिर में नहीं हैं। बाकी बात यह नहीं। भगवान यदि सर्वत्र हैं, तो मंदिर में भी हैं। तो मंदिर में जाने में आपत्ति क्या है? बाकी कई एक व्यक्ति ऐसा कहते हैं, तो उसको मानने की कोई ज़रूरत नहीं है। भगवान मंदिर में हैं, और मंदिर में जाकर के भगवद्-उपासना, "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी माम्..." भगवान की उपासना, पूजा करना चाहिए, "पत्रं पुष्पं फलं तोयम्..." देकर के। इसी तरह से आस्ते-आस्ते आसक्ति बढ़ने से भगवान क्या चीज़ हैं, समझ में आएगा। "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः" — यदि भगवद्ज्ञान तुम्हारा हो गया, यह भगवान कृष्ण, भगवान... यह ज्ञान यदि संपूर्ण हो गया, "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते"। यह वेद में भी ऐसे लिखा है: "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति"। केवल यदि भगवान को ही आप समझ जाएँ, तो और जितने-जितने सब ज्ञान की वस्तु हैं, सब समझ जाएँगे। भगवान को समझने से वह ब्रह्मज्ञान भी हो जाएगा, परमात्मा ज्ञान भी हो जाएगा, सब हो जाएगा। "यज्ज्ञात्वा" — यदि भगवान को समझ गया, तो फिर समझ जाएँगे, उसका और अलग से कोई समझने की ज़रूरत नहीं है। भगवान खुद कहते हैं कि "यज्ज्ञात्वा" — यदि मैं क्या चीज़ हूँ, इसको समझ जाओगे, तो ना यह जगत में और कोई ज्ञातव्य विषय नहीं रहेगा, सब ज्ञान संपूर्ण। "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते"।
तो भगवद्ज्ञान यदि इतना सरल है, केवल कृष्ण को ही समझे, कोई आदमी समझ जाए तो संपूर्ण ज्ञान उसको हो जाता है, यह सिद्धांत कोई अगर कहेंगे, तो फिर जितना कृष्णभक्त है, वह फिर सब ज्ञान उनके पास है, उसको और कोई ज्ञान लाभ करने की ज़रूरत नहीं है। बाकी वह जो कृष्णज्ञान है, वह इतना सरल नहीं है, वह बड़ा कठिन है। इसलिए भगवान बताते हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥" ऐसा साधारण समझना... यह एक कृष्णा, कोई व्यक्ति आए थे, मथुरा में उनका जन्म हुआ था, और उनका पालन किया था नंद महाराज ने, यह भी ज्ञान है। इस ज्ञान का भी बहुत अर्थ है, अर्थ नहीं है सो नहीं, इस ज्ञान का भी बहुत उपकार है। केवल यदि कृष्णा को इतना ही समझ जाए: कृष्ण भगवान कृपा करके इधर आए थे, और वसुदेव का पुत्र होकर के जन्म लिया था, और नंद महाराज ने उनको पाला। यह भी बहुत ज्ञान है। बाकी यह ज्ञान भी होना बड़ा मुश्किल है। कोई-कोई ऐसे समझता है जो यह जो कृष्ण हैं, यह कोई व्यक्ति हैं, और कोई-कोई बोलता है कि कृष्णा ऐसी व्यक्ति कोई इधर आए थे, यह हम नहीं मानते। हाँ-हाँ, बड़े-बड़े सब, हाँ, politician लोग ऐसे कहते हैं जो वह श्रीमद् भगवद्गीता पढ़ के, वह कृष्णा जो कोई व्यक्ति श्रीमद् भगवद्गीता बताया था, उसको भी समझ नहीं पाते, उसको deny करते हैं। इसलिए भगवान खुद बताते हैं जो "मनुष्याणां सहस्रेषु" — हज़ारों व्यक्ति में एक व्यक्ति। हाँ, तभी तो प्रचार की ज़रूरत है। हाँ, क्योंकि भगवान को कोई नहीं समझता। बाकी हमारा Krishna Consciousness जो movement है, हम लोग यही canvass करते हैं कि देखो जी, यह भगवान हैं कृष्ण, और इसके बाप का नाम है यह, और इसका ठिकाना इतना है, यह नंबर है, आप जाइए। इतना हम लोग साफ़-साफ़ बता देते हैं, कोई उसमें अनशन नहीं बताते, साफ़ बता देते हैं। यह चैतन्य महाप्रभु का mission है। खुद करके श्रीमद् भगवद्गीता प्रवचन ना करो, जैसे भगवान बताए हैं, वैसे ही बोलो। "यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥" बस, तुम गुरु बन गए। भगवान जैसे बताते हैं, उसी प्रकार तुम भी बताओ। तुमको कोई और ज़्यादा सीखने का, ज़्यादा विद्वान होने का कोई ज़रूरत नहीं है। अच्छा, इतना ही कह दो जो भगवान ने बताया, बस तुम गुरु हो गया। यह चैतन्य महाप्रभु की हमारी आज्ञा है: "आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश। यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश॥" हम लोग इतने... हम लोग मूर्ख हैं, हम लोग ज़्यादा पढ़े-सुने नहीं हैं, परंतु इतना काम ज़रूर हम लोग करते हैं जो यह जो श्रीमद् भगवद्गीता, भगवान को, Krishna Consciousness सारा दुनिया में हम लोग प्रचार करते हैं, उसमें इतना ही बताते हैं जो कि भगवान ने बताया, बस और कुछ नहीं। भगवान बोलते हैं: "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी माम्..." हम लोग भी यही कहते हैं: देखो जी, अब समय है, भगवान का चिंतन करो। और भगवान कौन हैं? कृष्ण। "हरे कृष्ण" बोलो, और भगवान की उपासना करो, भगवान को नमस्कार करो, भगवान के भक्त हो जाओ। इसमें कोई ज़्यादा विद्वान होने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, सब विद्या है उसमें। इसलिए भगवान कहते हैं: "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते" — और तुम्हारा ज़्यादा उस्तादी करने की कोई ज़रूरत नहीं, इतना ही खाली "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी माम्..." इतना ही समझ जाओ, तो तुम्हारा संपूर्ण ज्ञान हो गया। यही भगवान बताते हैं। जो भगवान आख़िरी में यही कहते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। इतना ज्ञान अगर तुम्हारा हो गया — भगवान कृष्णा स्वयं भगवान हैं, और उनके चरण में शरणागति एकमात्र हमारा कर्तव्य है — बस, यही ज्ञान का लाभ कर लो, तो फिर और ज़्यादा ज्ञान लाभ करने की कोई ज़रूरत नहीं है।
तो यह ज्ञान भी होना बड़ा मुश्किल है। यह सरल है — वह जो कृष्ण भगवान हैं, और कृष्ण के चरण में शरणागत हो जाओ, यह बड़ा simple ज्ञान है। बाकी इतना ही दुर्भाग्य है जो वह समझते हैं: यह क्या भगवान? मैं भगवान, इसको क्यों हम नमस्कार करें? यह सब मंदिर में नहीं जाते। हाँ, वृन्दावन में हज़ारों मंदिर हैं, यह जो अपने को भगवान समझने वाले हैं, कोई दर्शन करने को नहीं जाते। वह सोचते हैं, "हम तो भगवान हैं, हम कोई मंदिर में क्यों जाएँ?" इसलिए भगवान कहते हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु..." यह जो ज्ञान है, यह भगवान कृष्ण, भगवान... "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"। तो यह ज्ञान होना भी बहुत सौभाग्य का विषय है। जिसका सौभाग्य नहीं है, यह ज्ञान होता नहीं, मामूली ज्ञान। इसलिए भगवान कहते हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये"। सिद्धि क्या चीज़ है? सिद्धि यही है जो अपने को समझना, what I am, यह इसका नाम सिद्धि है, ब्रह्मज्ञान। तो ब्रह्मज्ञान लाभ करने... विशेष करके आज के दिन कौन ब्रह्मज्ञान लाभ करने को जाता है? हाँ, यह ज्ञान लाभ हो जाए — दो, चालीस हज़ार, पचास हज़ार, लाख कमा लें और मज़े से रहें — यही ज्ञान लाभ करने के लिए सब school जाते हैं, college जाते हैं। और ब्रह्मज्ञान लाभ करने के लिए कौन जाता है? और कौन सिखाता भी है? इसलिए भगवान कहते हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु..." जाते हैं पेट के पालने के ज्ञान के लिए जाते हैं, और ब्रह्मज्ञान कौन सीखता है? इसलिए कहते हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु..." सब कुत्ता-बिल्ली जैसा ज्ञान लाभ किया है, किस तरह से पेट पालना है, वह ज्ञान लाभ करने को चाहिए। इसलिए शास्त्र में मना करते हैं, यह ज्ञान लाभ करने के लिए दिन भर परिश्रम करने के लिए यह मनुष्य जीवन नहीं है। "नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये" — यह जो इतना तकलीफ़ उठा के दो रोटी के लिए दिन भर परिश्रम करना और इन्द्रिय-तर्पण करना, यह कोई मनुष्य जीवन का काम है क्या? हाँ, मना करता है: "नायं देहो देहभाजां नृलोके..." हाँ, यह तो कुत्ता-बिल्ली करते हैं। हाँ, तो इसलिए कहते हैं, मनुष्य कोई interested है? विशेष करके कलयुग में: "मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः" — very, very slow। हाँ, तो इसलिए भगवान कहते हैं, यह जो भगवद्-तत्त्वज्ञान, यह ब्रह्मज्ञान, यह सबके लिए नहीं है। "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥" और सिद्ध भी हो गया, ब्रह्मज्ञान भी लाभ हो गया, तब भी भगवान को नहीं समझ सकते। "यततामपि सिद्धानां..." जो कि सिद्धि लाभ किया है, इस प्रकार व्यक्ति, वह भी कृष्ण को समझ नहीं पाते हैं। "मनुष्याणां सहस्रेषु... कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः" — तात्त्विक नहीं जानते। इसलिए भगवान खुद बता रहे हैं किस तरह से भगवान को तात्त्विक समझ में आएगा, खुद बता रहे हैं। तो next भाष्य...
हम लोग साधारणतः यह भौतिक वस्तु को समझते हैं। यह जो ज़मीन है... बड़े-बड़े सब expert, scientists, soil expert देखता है इस ज़मीन में क्या फ़ायदा हो सकता है, इस ज़मीन में क्या चीज़ है, सोना है कि कोयला है, यह सब study। Science, whole science, विज्ञान दुनिया में जो विज्ञान चलता है, यह सब भौतिक वस्तु का अध्ययन करते हैं। इसलिए भगवान पहले भौतिक वस्तु का उत्थापन किया कि "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥" हाँ, यह जो पंचतत्त्व है — भूमि है, अप् (पानी जो है, समुद्र है) और land (ज़मीन है), भूमि, अप्, अनल (फिर अग्नि है), वायु (बतास) और आकाश। यह सूक्ष्म, जड़ से सूक्ष्म, नहीं तो सूक्ष्म से जड़ होता है। तो इसमें इससे भी सूक्ष्म जो है, आकाश से सूक्ष्म मन और अहंकार। यह सब विचार जो है, यह भगवान बताते हैं, यह सब चीज़ है भौतिक चीज़। "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च" — बुद्धि भी, intelligence, यह भी भौतिक है, मन भी भौतिक है, आकाश भी भौतिक है, यह सब भौतिक है। "अहङ्कार इतीयं मे..." और अहंकार, अहंकार जो वृथा और झूठ अहंकार। यह जो भौतिक जगत में हम लोग हैं, यह शरीर भौतिक जगत में हमको मिला है, मैं समझता हूँ कि मैं Indian हूँ, और दूसरे कोई समझता है हम American हैं, और कोई समझता है ब्राह्मण है, कोई बोलता है हम क्षत्रिय हैं — यह जो सब अहंकार है, यह झूठ अहंकार है। असल अहंकार है: "अहं ब्रह्मास्मि"। हाँ, तो यह जो अहंकार है, शरीरगत अहंकार, यह वृथा अहंकार है, हाँ, यह असल अहंकार नहीं है। तो यह अहंकार प्राकृत अहंकार है, यह अप्राकृत अहंकार नहीं। अप्राकृत अहंकार है जो "मैं भगवान का दास हूँ।" ना तो हिन्दू है, ना तो मुसलमान है, ना ब्राह्मण है, ना क्षत्रिय है, ना Indian है, ना American है। "नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो... गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर्दास-दासानुदासः" — यह चैतन्य महाप्रभु ने परिचय दिया था। क्यों? "मैं तो ब्राह्मण भी नहीं हूँ, और संन्यासी भी नहीं हूँ, और क्षत्रिय भी नहीं हूँ, और वैश्य भी नहीं हूँ, शूद्र भी नहीं हूँ, नहीं हूँ, नहीं हूँ।" जो चार, आठ वर्णाश्रम विचार है, वह चैतन्य महाप्रभु सब अस्वीकार किया, यह सब कुछ नहीं है। "अहं ब्रह्मास्मि" इसका अर्थ चैतन्य महाप्रभु बताते हैं। तो फिर आप हैं कौन? यह सब मिटा दिया है, नहीं तो उसके जवाब में भगवान कहते हैं... चैतन्य महाप्रभु: "गोपी-भर्तुः" — जो गोपी लोगों के भर्ता हैं, उसको जो पालन करते हैं, उनसे जो संपर्क है भगवान कृष्ण, उनके दास के दास के दास के दास के hundred times, यह हमारा परिचय। "गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर्दास-दासानुदासः" — यह वैष्णव का परिचय है, जो भगवान का दास है। वह directly, immediately भगवान का दास होने के लिए वह प्रयास नहीं करते हैं, वह दास का दास अनुदास। हाँ, प्रह्लाद महाराज जब उनको... हिरण्यकशिपु... नृसिंहदेव ने वर देने को माँगा: "बेटा, तुम बहुत कष्ट सहन किया है, अब लो जो..." तो वह प्रह्लाद महाराज यही बताया था कि "महाराज, आप तो देने वाले हैं ही हैं, और हम असुर कुल में जन्म ग्रहण किया है, वह हमारा स्वभाव ही है माँगने का — और ले आओ, और ले आओ, और ले आओ। तो यह आप देने को चाहते हैं, और हमारा वंश-परंपरा से केवल संग्रह करना, यह तो बड़ा संजोग हो गया। बाकी यह चीज़ हम नहीं चाहते हैं। क्योंकि हम देख चुके हैं, हमारे पिताजी जब कोई क्रोध हो जाते थे, तो देवता लोग भी डर जाते थे। यह संपत्ति, यह प्रभाव आप एक second में ख़त्म कर दिए। तो ऐसी चीज़ क्यों हम माँगें जो एक second में ख़त्म हो सकती है? यदि आप हमको कृपा करने को चाहते हैं, तो आपका जो दास है, उसका नौकर हमको बना दीजिए।" यही प्रह्लाद महाराज की प्रार्थना थी। तो यह हम लोगों का प्रार्थनीय है: "गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर्दास-दासानुदासः" — यह चैतन्य... यही वैष्णव परंपरा का शिक्षण है।
तो कहने का मतलब जो "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये" — सिद्ध, सिद्ध माने जो ब्रह्मज्ञान संपन्न है, उसको सिद्ध बोला जाता है। तो "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा" — जो वास्तविक सिद्ध हो जाते हैं, ब्रह्मज्ञान लाभ किया, उसको प्रसन्नात्मा, आत्मा प्रसन्न हो जाता है। क्योंकि उसको तो असल identification है, क्या वस्तु है, उसको ज्ञान हो जाता है। अभी तो भ्रम है: "मैं शरीर हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं Indian हूँ" — यह तो सब illusion है। भ्रम है। असल ज्ञान जब हो जाता है, "अहं ब्रह्मास्मि", तो प्रसन्नात्मा। फिर उसका कोई सोच... प्रसन्नात्मा का अर्थ क्या? "न शोचति न काङ्क्षति" — उसको कोई सोचना भी नहीं है और आकांक्षा भी नहीं है। क्या चीज़... माने सब तो भौतिक चीज़ है, और भौतिक चीज़ से हमारा क्या मतलब है? इसलिए शास्त्र में कहते हैं, कुन्ती जी ने भगवान को संबोधन किया: "अकिंचन-गोचर" — अकिंचन, जिसका भौतिक संपर्क है नहीं, भौतिक जगत में जिसका कुछ माँगने का है नहीं, उसके लिए आप अकिंचन। वह चैतन्य महाप्रभु बताए हैं एक जगह में कि भगवद्-भक्ति: "निष्किंचनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य" — निष्किंचन, भगवान निष्किंचन-गोचर। और इस प्रकार जो निष्किंचन है: "निष्किंचनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य" — भवसागर के उधर जाने को चाहते हैं, इधर नहीं रहना चाहते, उसके लिए "विषयिणामथ संदर्शनं हि साधोः... हा हन्त हा हन्त विषप्रसादनम्" — यह शास्त्र में है। तो यह ब्रह्मभूत होने से फिर वृथा अहंकार नहीं रहता जो "मैं यह हूँ, मैं यह हूँ।" नहीं, वह समझ जाते हैं। केवल ब्रह्मज्ञान होने से नहीं, "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा समः सर्वेषु भूतेषु" — जो ब्रह्मज्ञानी है, "पण्डिताः समदर्शिनः", वह फिर भेद-दर्शन नहीं करते हैं, सबको जानते हैं कि जो भगवान ब्रह्म का अंश है, "ममैवांशो..." यह भी ब्रह्म है। तो ब्रह्मज्ञान माने ब्रह्म तो हम लोग हैं ही हैं, यह नहीं है जो तपस्या करके ब्रह्म हो गया, नहीं, ब्रह्म तो हैं ही हैं, ढका हुआ ब्रह्म है। वह ब्रह्मभूत होना चाहिए कि "मैं यह भौतिक वस्तु नहीं हूँ, मैं ब्रह्म हूँ।" ज्ञान, ज्ञान, ज्ञान। तो वह ब्रह्मज्ञान होने के पश्चात् "समः सर्वेषु भूतेषु" — तब जाकर के भगवद्-भक्ति शुरू होती है। "मद्भक्तिं लभते पराम्" — यह सब विचार। इसलिए भगवान कहते हैं: "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये"। एक तो ब्रह्मज्ञान होना ही बड़ा मुश्किल है, अब ब्रह्मज्ञान होकर, लाभ करके फिर ब्रह्म-स्थिति होनी चाहिए। वह ब्रह्म-स्थिति है भगवद्-भक्ति। "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥" केवल ब्रह्मज्ञान होने से नहीं होगा, ब्रह्म-स्थिति होनी चाहिए। जो ब्रह्म-स्थिति क्या चीज़ है? भगवद्-भक्ति। "भक्तियोगेन सेवते स गुणान् समतीत्यैतान्..." वह उनसे फिर भौतिक गुण से कुछ संपर्क ही नहीं। हाँ, तभी तो ब्रह्मज्ञान ठीक होगा। यदि भौतिक गुण से हमारा संपर्क रहा, समझ लीजिए हम ब्राह्मण ही हो गए, हाँ, भौतिक गुणों में सत्त्वगुण, तमोगुण... तो ब्राह्मण का सत्त्वगुण में स्थिति है, तो अगर ब्राह्मण ही हो गया, तो उसमें भी हम मुक्त, मुक्त नहीं हैं, वह भी भौतिक स्थिति है। उसका ऊपर जाना चाहिए — शुद्ध सत्त्व। शुद्ध सत्त्व mean वैष्णव, वह भगवद्ज्ञान। इसलिए भगवान कहते हैं कि "समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्" — ब्रह्मज्ञान होने के पश्चात् फिर ब्रह्म-स्थिति। ब्रह्म-स्थिति है तो भक्ति, "मद्भक्तिं लभते पराम्"। वह ब्रह्म, जो ब्रह्म-स्थिति, उसी से भगवद्ज्ञान होता है। "भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः" — वही तत्त्व। यह भगवान इधर कहते हैं: "यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः" — वह तत्त्वज्ञान कब लाभ होता है? "भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः"। तो यदि भगवान को तात्त्विक आप समझना चाहते हैं, तो यह जो भक्ति — श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् — इस process को, इसको याजन करना चाहिए।
यह प्रह्लाद महाराज ने बताया था, जो उनके पिता जब पूछे कि "बेटा, तुम क्या अच्छा चीज़ सीखा है, थोड़ा बताओ।" तो वह बोला: "महाराज, हम तो जानते हैं यही सबसे बढ़िया चीज़ है कि श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥" यह सबसे बढ़िया चीज़ है, यह सब समय भगवान का विषय सुनना चाहिए। श्रवणं... सुनते-सुनते-सुनते-सुनते "शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः..." यदि भगवान की कथा आप सुनेंगे: "शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः" — केवल आप समझें और ना समझें, यदि भगवान की कथा आप श्रवण करेंगे, तो आप पुण्यवान हो जाएँगे। "पुण्यश्रवणकीर्तनः" — जो भगवान की कथा कीर्तन करेंगे और जो कि भगवान की कथा सुनेंगे, दोनों ही पुण्यवान हो जाएँगे। और जब पुण्यवान हो जाएँगे, इसका पाप नहीं रहेगा। "येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्... भजन्ते मां दृढव्रताः" — इसलिए श्रवण-कीर्तन बहुत ही ज़रूरी है। ऐसे ही सभा-समिति में सब समय सभा-समिति संभव नहीं है, तो घर में सब कोई बैठकर के अपना बाल-बच्चा लेकर के कीर्तन कीजिए और श्रीमद् भगवद्गीता को पाठ कीजिए, और अनशन बकिए नहीं। जैसा भगवान बताए हैं, उसको सुनाइए, सुनिए। आपका जीवन सफल हो जाएगा। Thank you very much. Hare Krishna.
Hare Krishna. "कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान्भागवतानिह। दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्॥" आप लोग सब प्रह्लाद महाराज का नाम सुने हैं। प्रह्लाद महाराज वैष्णव, जन्म से, माँ के पेट से जन्म, महाभागवत वैष्णव, महाजन। शास्त्र में बताया है: "महाजनो येन गतः स पन्थाः"। "धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां" — धर्म का तत्त्व समझना थोड़ा मुश्किल है, और सरल भी है। सरल इस तरह से है कि "धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतम्" — धर्म क्या चीज़ है, उसकी सरल व्याख्यान है जो भगवान जो कह देते हैं, इसको पालन करो, वह धर्म। कोई मुश्किल नहीं है। बाकी हम लोगों से भगवान से संपर्क ही है नहीं। भगवान का मुँह नहीं है, हाथ नहीं है, पैर नहीं... बोले कैसे और हमारे सुने कैसे? खाली हमारा हाथ-मुँह है, और भगवान निराकार। तो बेचारे बोले कौन और सुने कौन? बाकी बात यह है, धर्म क्या चीज़ है? "धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतम्"। तो भगवान जैसे बताते हैं, उसको अगर हम लोग सुनें, तो वह धार्मिक होता है, और नहीं तो सब अधार्मिक, जो भगवान की बात सुनता नहीं। जैसे state है, government है, government जो कह देता है, वह कानून है। बड़े-बड़े शहर में government कह देता है: "Keep to the right", "Keep to the left"। इधर हमारे भारतवर्ष में "Keep to the left" है, America में "Keep to the right"। तो यह जो government का हुकुम है, यही कानून है। You cannot manufacture, आप घर में कानून नहीं बना सकते, वह कानून नहीं है। इसी प्रकार धर्म जो है, वह भगवान जो कह देते हैं, वही धर्म है। नहीं तो भगवान क्यों कहेंगे: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"? "हाँ, जो तुम जो फालतू सब धर्म निकाले हो, यह सब धर्म नहीं है — हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म और क्रिश्चियन धर्म और क्या-क्या सब अनेक प्रकार धर्म सब, यह सब धर्म नहीं।" "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे" — वह, वह धर्म असल, असल धर्म है जिसको प्रतिपालन करने से भगवान में भक्ति होती है, वह भक्त। और जिस धर्म को पालन करने से भगवान को बिल्कुल उड़ा दिया जाता है, वह धर्म नहीं, वह cheating है। कोई धर्म... कोई... तब भागवत बता रहे हैं: "धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र" — जो cheating धर्म है, उसको लात मार के फेंक दिया गया है। "प्रोज्झित" — प्रकृष्ट रूप से, जैसा आप लोग कूड़ा लात मार के, झाड़ू देके भगा देते हैं, फेंक देते हैं। इसी प्रकार जो धर्म से भगवान का कोई संपर्क नहीं है, उसको लात मार के फेंक देना, यह शास्त्र का निर्देश है। "धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सताम्..."
यह प्रह्लाद महाराज वही धर्म का प्रतिपालन करते थे। वह नारद जी से सीखे, इसलिए प्रह्लाद महाराज school में जाते थे। उनके पिताजी एक नंबर... वह कहते, "भगवान कौन है? हम भगवान हैं। तो कौन भगवान की प्रार्थना करते हैं? कौन भगवान की उपासना करते हैं? हम भगवान हैं, हमसे बढ़कर कौन भगवान?" यह पिता-पुत्र से झगड़ा। और पुत्र बेचारे पाँच वर्ष का लड़का, वह बाप से क्या कहे? एक नंबर असुर। तो वह बोलता था, "पिताजी, आप क्यों ऐसा कहते हैं? आपके ऊपर जो हैं, वह भगवान हैं।" यह सब उनसे झगड़ा चल रहा था। तो यह जो धार्मिक प्रह्लाद महाराज, जो वास्तविक धार्मिक हैं, वह भगवान की कथा प्रचार करेंगे, यह धार्मिक का लक्षण है। यह नहीं है, "हम धार्मिक हो गए।" धार्मिक तो हो ही नहीं सकता जो भगवान से संपर्क नहीं है। अगर हो भी गया, तो "श्रवणं कीर्तनम्" — जो भगवान का विषय सुना है, उसका दिल चाहेगा, "मैं भगवान का... मैं सुनाऊँ दुनिया में।" श्रवणम्, कीर्तनम्। वास्तविक जो सुना है, वह कीर्तन करेगा। हाँ, यही भगवद्-भक्त का लक्षण है। तो प्रह्लाद महाराज बेचारे पाँच बरस के, वह कहाँ कीर्तन करें? तो school में जब मास्टर लोग चले जाते थे अपना कोई घर-गृहस्थी काम करने के लिए, उस समय जो समय मिलता था, वह प्रह्लाद महाराज अपने सब class friends, सहपाठी, उनको बुला के यह भागवत धर्म सिखाते थे। तो वह बोलते, "भाई, अभी हम लोगों का धर्म से क्या मतलब है? चलो खेलें, मज़ा करें।" वह बोलते, "नहीं-नहीं, यह बात नहीं, ठीक नहीं है।" इसलिए कहते हैं: "कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान्भागवतानिह" — यही वर्ष, यही कौमार अवस्था से, यही पाँच वर्ष से शुरू करके, जब आदमी कुछ बोल सकता है, पढ़ सकता है, सुन सकता है, पाँच वर्ष से शुरू हो जाता है, उससे पहले परिपक्व नहीं है। तो प्रह्लाद महाराज यह सिखा रहे हैं जो "मित्र, आप लोग सुनिए, यह भगवान की कथा सुनिए।" और कहते हैं: "धर्मान् भागवतान्" — और कोई धर्म की बात नहीं है, भागवत धर्म। भागवत धर्म क्या चीज़ है? वही भगवान जो बोल रहे हैं, वह धर्म। भगवान जैसे श्रीमद् भगवद्गीता में बोलते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" — वही धर्म है, भगवान के चरण में शरणागति, उसका नाम है धर्म। और सब cheating है, धोखाबाज़ी। तो भौतिक है, प्राकृत है, और अप्राकृत जो है, transcendental, वह भागवत धर्म है। भगवान जैसे बोलते हैं, उस प्रकार काम करो, तो वह भागवत धर्म है।
और चैतन्य महाप्रभु का प्रचार विषय यही है, जो भागवत धर्म को प्रचार... कैसे? आप लोगों से निवेदन किया है जो चैतन्य महाप्रभु का यही mission है: "आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश। यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश॥" "हमारी आज्ञा से आप लोग सब गुरु होओ, और जहाँ आप रहते हैं, उस सब लोग को आप क्या नाम, रक्षा कीजिए, तारो।" तारो means make them liberated, उनको मुक्त कर दीजिए। हाँ, तो अगर कोई साधारण व्यक्ति कहते हैं, "हम तो लिखे-पढ़े हैं नहीं, कुछ जानते भी, सुने भी नहीं, हम कैसे गुरु हो जाएँ और कैसे दूसरे को मुक्त कर दें?" तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "कोई मुश्किल बात नहीं है, कोई आपको बनाने नहीं पड़ेगा। एक धर्म — यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश।" कृष्ण, भगवान, सर्वज्ञ, पूर्ण भगवान जो बताए हैं, उसको सुना दीजिए, फिर आप गुरु हो गए। गुरु होने का कोई ज़्यादा मुश्किल बात नहीं है। "एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः" — यह परंपरा से भगवान भी कहते हैं, बड़े-बड़े राजर्षि लोग कि श्रीमद् भगवद्गीता को सुना था। विवस्वान् को... यह योग पुरातन... क्षत्रिय लोगों को सुनाया था। हाँ, हमारे भारतवर्ष में चन्द्रवंश, सूर्यवंश होते हैं, तो सूर्यवंश को भगवान ने सुनाया, सूर्यदेव को सुनाया था। और विवस्वान्... मनु... सूर्यदेव उनका पुत्र जो मनु, उनको सुनाया, मनु महाराज को सुनाया। इसी प्रकार परंपरा से यह भागवत धर्म आ रहे हैं। "स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप" — वह परंपरा जब से छूट गई, वह श्रीमद् भगवद्गीता को जब अनशन, बेवकूफ़ आदमी सब समझाने शुरू किया, वह नष्ट हो गया। "योगो नष्टः परन्तप" — योग नष्ट हो गया। इसीलिए भगवान अर्जुन को बताए: "तुमको हम सुना रहे हैं, तुम सुनो, फिर वही भगवद्-भक्ति को प्रचार करो।" "तो हमको क्यों सुना रहे हैं? हम तो वेदांती हैं नहीं, ब्राह्मण भी हैं नहीं, संन्यासी भी हैं नहीं। क्यों हमको सुना रहे हैं? हम क्या समझेंगे?" "भक्तोऽसि मे सखा चेति" — तुम हमारे भक्त हो, इसलिए तुमको... तुम ही समझोगे और कोई नहीं समझेगा। "भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्" — तुम्हारा हमसे बहुत घनिष्ठ संपर्क है, मित्र हो, तुम भक्त हो, इसलिए तुमको हम सुना रहे हैं। तो हम लोगों को चाहिए भागवत धर्म प्रचार करना। और यदि कोई कहते हैं...
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥