भगवान की प्रेरणा, गुरु महाराज के आदेश से ही पाश्चात्य देश में... कुछ अंग्रेज... कभी गुरु भाई के ऊपर यह आदेश था। बाकी जब देखा कि इधर में ही सब व्यस्त हो गए, उधर कोई ज्ञान नहीं है, तब थोड़ा सोचा कि भला मैं ही बुढ़ापे में थोड़ा चेष्टा करूँ। उस समय हमारी 70 वर्ष उम्र थी, तो उधर गया New York में। और जहाज में बैठ-बैठ के सोच रहा था कि भगवान इधर क्यों भेजा? मैं तो जब इनको वैष्णव सदाचार का विषय बोलूँगा, उसी समय ये लोग कहेगा, "महाराज, आप इधर से चले जाइए।" क्योंकि सदाचार बिना तो वैष्णव होता नहीं।
यद्यपि भगवान ने कहा है, "अपि चेत्सुदुराचारो..." इसका लक्षण है कि सदाचार जरूर होना चाहिए वैष्णव के लिए। "सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः"—वैष्णव का, सब देवता का गुण होना चाहिए, भगवद्भक्त का यही लक्षण है। तो सदाचार पालन... श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर एक जगह बताया है कि असदाचारी वैष्णव को, वैष्णव है इस हिसाब से उनको दंडवत करना जरूरी है, बाकी उनसे ज्यादा मिलना-जुलना नहीं, यह मना किया है। तो सदाचार वैष्णव के लिए बहुत ही जरूरी है।
तो हमारे हृदय में तो यही था पहले, तो इनको यही बात बताया जाएगा कि आप लोग सदाचारी होइए। चार प्रकार का जो पाप है, इसको छोड़ दीजिए। क्योंकि भगवान कहते हैं कि:
भगवान की सेवा में दृढ़ होकर के सेवा में नियुक्त होना, यह साधारण नहीं है। "येषां त्वन्तगतं पापं"—जो पाप कार्य से बिल्कुल निवृत्त हो गया, उसके लिए भगवद्-सेवा संभव है। और नहीं तो यह भी समझना चाहिए कि जो भगवद्-सेवा में नियुक्त है, वह सदाचारी है, वही एकमात्र सदाचारी है। यद्यपि बाहरी कुछ अभ्यास है, सुदुराचार मालूम भी होता है, भगवान उनके लिए कहते हैं: "अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्..."।
तो विदेश में जाकर के, New York में, विशेष करके एक park जिसका नाम है Tompkins Square Park, तो उधर जाके मैं कीर्तन शुरू किया। एक पेड़ के तले में बैठ के—"हरे कृष्ण हरे कृष्ण"—बस एक डगडुगी लेकर के, उधर मृदंग भी नहीं था। यह सब बालक लोग आना शुरू किया। और इधर वह बालक अभी उपस्थित है, जिसका नाम अभी है ब्रह्मानंद स्वामी। यह पहले आकर के नाचा था, यह बालक। और भी एक बालक, उसका नाम है अभी अच्युतानंद स्वामी, वह अभी हैदराबाद में खूब प्रचार कर रहे हैं।
तो आस्ते-आस्ते यह भगवत्-कीर्तन के प्रभाव से—"चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्"—चैतन्य महाप्रभु की वाणी है, "परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्"। भगवान के कीर्तन... "कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्"—शुकदेव गोस्वामी की वाणी है। कलयुग में अनेक दोष हैं, यह दोष की निधि है: "कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥" केवल मात्र भगवान के नाम... "तन्नामग्रहणादेव"—यह भगवद्-भक्ति शुरू होती है, "तन्नामग्रहणादेव"।
तो इसका फल वास्तविक Europe, America में प्रत्यक्ष हुआ है कि कीर्तन करते-करते, साधु-संग, फिर आगे बढ़ के आया और शिष्य होने के लिए मांगा। मैंने उनको बोला कि, "देखो भाई, हमारा शिष्य होने के लिए तुमको चार चीजें छोड़नी चाहिए। एक तो अवैध स्त्री-संग छोड़नी चाहिए।" इनके देश में लड़का-लड़की सब ऐसे ही रहते हैं, बिना विवाह कुछ दिन रहा, छोड़ दिया और किसी को पकड़ लिया as friends। तो हमारा जो शिष्य होते हैं, उसको यह नहीं चलेगा। "तुम किसी लड़की को चाहते हो, लड़का को चाहते हो, तो शादी करो। शादी करके भद्र भाव से रहो।" यह लोग मान लिए। वह मैं शादी करा दिया उनको। सब बच्चे जो हुए हैं, उनके लिए school खोल दिया। तो एक generation change हो रहा है—Vaishnava generation। यह टूटने वाला नहीं है।
हम तो वृद्ध हुआ, अभी 78 वर्ष है, हो सकता है कभी भी चला जाऊंगा। बाकी हमारा विश्वास है, यह लोग चलाएंगे movement। यह उधर नष्ट होने वाला नहीं है, क्योंकि यही सिखाया जाता है कि भगवान में आसक्ति बढ़ाओ, जो कि भगवान स्वयं बताते हैं: "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः"। भगवान का आश्रय लेकर के और यह भक्तियोग को अभ्यास करो। वह भक्तियोग क्या है? जो भगवान में आसक्ति बढ़ाओ, बस।
आसक्ति हम लोग का सभी का है। किसी का घर में है, किसी का दौलत में है, किसी का देश में है, किसी का बाल-बच्चे में है। और किसी का कुछ नहीं है, तो कम से कम पाश्चात्य देश में खूब देखा जाता है कि किसी का कुछ है नहीं family, वह कुत्ता पालता है, बिल्ली पालता है, तो कुत्ता में आसक्ति। तो आसक्ति तो जरूर हमारी है। यह आसक्ति फिरा करके भगवान में लगाना चाहिए, और कुछ नहीं, यही भगवद्-भक्ति है।
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"—भगवान खुद बता रहे हैं कि सब समय हमारा चिंतन करो, "मन्मना", हमारा भक्त बन जाओ, "मद्भक्तो", हमारी पूजा करो, "मद्याजी", और हमको नमस्कार करो। जो कि आप लोग का वृंदावन में यही प्रथा है, सब समय आप लोग भगवान का नाम जपा करते हैं, "मन्मना"—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। तो इस शब्द के साथ-साथ ही भगवान के चरण में मन लीन हो जाता है। गोस्वामी लोग सिखाया है, सब आचार्य लोग सिखाया है, चैतन्य महाप्रभु खुद सिखाया है: "हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥"
कोई मुश्किल है? नहीं है। भगवान में आसक्ति बढ़ानी कोई मुश्किल नहीं है, विशेष करके कलयुग में केवल भगवान के नाम से है। पुराने युग से... "तन्नामग्रहणादेव" भक्ति शुरू होती है, भगवान के नाम ग्रहण से। तो यह भगवान में आसक्ति बढ़ाने के लिए इनको हरिनाम जप करने को बताया गया है। तो सब समय जप करते हैं ये लोग, जहां तक हो आप लोग देखा ही है, सब समय नाम की माला उनका चलता है—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। "मन्मना भव मद्भक्तो..." और जो नाम का जप करेगा, तो भक्त हो ही जाएगा।
"नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः ।" भगवान और भगवान का नाम कोई भिन्न नहीं है, अभिन्नत्वात्। नाम चिंतामणि है, स्वयं भगवान है। "नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः"—रस का विग्रह है। "रसो वै सः"—जैसे भगवान श्यामसुन्दर कृष्णचन्द्र सब रस का आधार हैं, द्वादश रस का आधार हैं। रूप गोस्वामी भक्तिरसामृतसिंधु में बताया है: "अखिलामृतसिन्धुः"। तो भगवान रस-विग्रह हैं, सब आनंद भगवान में ही है। भगवान से जिसका संपर्क है, वह आनंदमय हो जाता है। "आनन्दमयोऽभ्यासात्"—अभ्यास से, केवल भगवान से संपर्क रखने से वह आनंदमय हो जाता है।
और भगवान का स्वरूप है आनंदमय, और हम लोग भगवान के अंश हैं, इसलिए हम लोग भी आनंदमय हैं। क्योंकि भगवान को हम लोग छोड़ दिया है, इसलिए निरानंद, और कुछ नहीं। फिर अगर भगवान के चरण को हम लोग पकड़ लेते हैं, फिर आनंदमय हो जाएंगे। "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते"। भगवान सच्चिदानंद विग्रह हैं, और भगवान का अंश है जीव, वह भी सच्चिदानंद विग्रह है। बाकी अणु होने के कारण... भगवान विभु हैं और हम लोग अणु होने के कारण, जैसे अग्नि का कण बहुत छोटा होने के कारण कभी-कभी बुझ जाता है, और फिर उसको, वह अग्निकण जो अंगार है, उसको आग में दे दीजिए तो फिर वह प्रज्वलित हो जाता है।
इसी प्रकार हम लोग जब दुनिया को भोग करने को चाहता हूँ, जैसे जगदानन्द पंडित बताते हैं:
कृष्ण भुलि' सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख ।
अतएव माया तारे देय संसार-दुःख ॥
जब हम लोग भोग करने को चाहते हैं, वही माया है और कुछ नहीं। हम लोग भोक्ता नहीं हैं, भोक्ता भगवान हैं। "भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्"। यह बात जब हम लोग भूल जाते हैं कि भगवान भोक्ता हैं और हम लोग भगवान की भोग की सामग्री उनको देने के लिए हमारा काम है, जैसे गोपी लोग करते हैं—सब समय भगवान के भोग के लिए प्रस्तुत। सब वृंदावनवासी... वृंदावनवासी का यही काम है कि भोक्ता भगवान, और भगवान के भोग के लिए सब सेवा करने के लिए तैयार। यह तो बिना आसक्ति से... क्योंकि भगवान सभी चाहते हैं, "मैं भोग करूँ।" अपना भोग छोड़ देता है, जैसे पिता-माता अपना भोग छोड़ देता है अपना बालक प्रतिपालन करने के लिए, स्वाभाविक प्रेम है। प्रेमी जो है, वह अपने प्रेमी को सुखी करने के लिए अपना भोग... दुनिया में यह बात नहीं हो सकती है, परंतु पर-जगत में, अप्राकृत भूमिका में यह संभव है।
दुनिया में जो है, कोई अपना भोग को छोड़ नहीं सकता। बाकी वैकुंठ जगत में, उसमें भोक्ता एकमात्र भगवान हैं और सब भोग्य हैं। जीव भी उधर, जो जीव हैं, सब भगवान की सेवा के लिए तैयार हैं। वही चीज इधर सिखाया जाता है हमारे वैष्णव पद्धति में कि भगवान की सेवा में सब कोई नियुक्त रहो।
भगवान ने यह सप्तम अध्याय में यही बता रहे हैं: "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः"। वह जो योग है, भक्तियोग, वह भगवान का आश्रय लेने से ही हो सकता है। या भगवान के भक्त का... भगवान और भगवान के भक्त में कोई अंतर नहीं है।
गुरु का काम है कि सबको भगवद्-भक्ति में लगाए। इसलिए गुरु को भगवान के जैसे सम्मान दिया जाता है, देना भी चाहिए। क्योंकि गुरु जो हैं, भगवान की तरफ से सम्मान ग्रहण करते हैं, बाकी वह सब सम्मान भगवान को देते हैं, अपने लिए नहीं। इसलिए जैसे कोई manager है, वह रुपया-पैसा जो कुछ अदा करता है, मालिक के लिए। इसी प्रकार भगवद्-भक्त जो है, उनको जो कुछ दिया जाता है—सम्मान, अर्थ और कुछ—वह सब भगवान के पास पहुँचता है। इसलिए साधु, गुरु, वैष्णव सेवा के लिए शास्त्र में विधि है कि उनको जो कुछ दिया जाता है, वह भगवान को ही दिया जाता है।
तो भगवान स्वयं कहते हैं: "मदाश्रयः"—भगवद्-भक्त का आश्रय। यदि साक्षात भगवान का आश्रय नहीं होता, साक्षात भगवान का आश्रय हो भी नहीं सकता—"तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्"—भगवान के जो आश्रय में हैं, इस प्रकार भक्त का आश्रय ग्रहण करने से ही भगवान का आश्रय होता है, direct नहीं हो सकता। सो भगवान बताते हैं: "मदाश्रयः"—जो व्यक्ति हमारे आश्रय में है, उसका आश्रय लेकर भक्तियोग पालन करो। यह भगवान... और "एवं परम्पराप्राप्तम्" भगवद्-भक्ति। भगवान, भगवान का नाम, भगवान का गुण, भगवान की लीला, भगवान की वैशिष्ट्य, यह सब समझने के लिए वह परंपरा सूत्र से ग्रहण करना चाहिए।
इसलिए हमारे वैष्णव समाज में चार संप्रदाय हैं: ब्रह्म संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय, कुमार संप्रदाय और लक्ष्मी जी का श्री संप्रदाय। आप लोग श्री जी का जो है... कुमार संप्रदाय, नारद संप्रदाय। तो संप्रदाय बिना मंत्र निष्फल है—कोई भी संप्रदाय का आश्रय लेने से वह "मदाश्रयः", वह भगवान का आश्रय। चार संप्रदाय के भीतर कोई भी आचार्य कहो, आप आश्रय लीजिए, वह भगवद्-भक्ति सिखाएंगे। भगवान में किस तरह से आसक्ति बढ़ती है, वही सिखाएंगे, उनका और कुछ काम नहीं।
इसलिए भगवान कहते हैं: "मय्यासक्तमनाः..."। यदि भगवान में आसक्ति आप लोग बढ़ाना चाहते हैं, मन को भगवान की आसक्ति में... "स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः"—जैसे अम्बरीष महाराज थे। महाराज होते हुए भी सब समय भगवान के चरण में मन को लगा रखा था। ऐसे हम लोग को भी कम से कम उनका अनुगमन करना चाहिए, अनुकरण नहीं। अनुगमन जहां तक हो, क्योंकि बड़े-बड़े महाजन जो हैं, आचार्य जो हैं, उनका अनुकरण हम लोग नहीं कर सकते, अनुगमन कर सकते हैं। "महाजनो येन गतः स पन्थाः"—महाजन लोग जैसे-जैसे रास्ता बताते हैं, उसको हम लोग अगर अनुगमन करें तो हमारा उपकार है।
और शुकदेव गोस्वामी बताते हैं: "किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुल्कशा..." जब भी हो, और पुल्कशादि हैं, भगवान स्वयं भी बताते हैं: "येऽपि स्युः पापयोनयः..." सबके लिए भगवद्-भजन का द्वार खुला है, किसी के लिए रोक नहीं है। "पापयोनयः"—पाप योनि होने से कोई हर्ज नहीं। जीव तो पापी नहीं है, जीव तो भगवान का अंश है, पवित्र है। बाकी संस्कार से, संसर्ग से उनको पाप-पुण्य का विचार आ गया है। असल में पुरुष जो है, "असंगो ह्ययं पुरुषः"—वेद की वाणी है, कि उनका कोई संसर्ग नहीं है। अभी अज्ञान से, माया से संसर्ग है। एक मुहूर्त में वह संसर्ग नष्ट हो सकता है: "मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते"।
अगर कोई दिल से भगवान से प्रार्थना करे कि, "भगवान, इतने दिन, जन्म-जन्मांतर आपको भूले हुए थे। अब मालूम होता है आप ही हमारे स्वामी हैं। आपके चरण में मैं अपने जीवन को समर्पण कर रहा हूँ।" उसी वक्त सब पाप से निर्मुक्त हो जाता है, यदि वास्तविक और न पाप करे। अभी भगवान के चरण में आश्रय लिया, पाप से जरूर मुक्त हो गया, और फिर भी पाप करे, वह ठीक नहीं। जैसे जगाई-माधाई को उद्धार किया था चैतन्य महाप्रभु ने, वे बहुत पाप काम करते थे, परंतु चैतन्य महाप्रभु इतना ही शर्त किया कि, "आज से पाप काम नहीं करोगे, फिर तुम्हारा सब हम ग्रहण कर लेंगे।"
इसी प्रकार भगवान भी कहते हैं कि: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥" यदि हम लोग मन-प्राण से वास्तविक भगवान के चरण में शरणागत हो जाते हैं, तो फिर भगवान तो समर्थ हैं, वह हमारा जो पाप का जो फल है... "कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजाम्"—जो भगवद्-भक्त हैं, उनके कर्म को निर्दहन कर देते हैं। इसलिए भगवान में आसक्ति बनानी चाहिए और भगवान का जो भक्त है, उनका आश्रय लेना चाहिए।
और भगवद्-भक्तियोग जो है: "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥"—नवधा भक्ति। यह श्रवण-कीर्तन से ही शुरू होती है। असल चीज है श्रवण। जैसे आप लोग यह मंदिर में रोजाना आते हैं और भगवान के विषय में श्रवण करते हैं, यह बहुत ही जरूरी है। चैतन्य महाप्रभु इसी को ग्रहण किया: "स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिः"—अपने-अपने स्थान में रहो, स्थान परिवर्तन करने की कोई जरूरत नहीं है। ब्राह्मण हो ब्राह्मण रहो, क्षत्रिय हो क्षत्रिय रहो, वैश्य हो वैश्य रहो, शूद्र हो शूद्र रहो, ब्रह्मचारी हो ब्रह्मचारी रहो, और गृहस्थ हो गृहस्थ रहो, वानप्रस्थ हो, संन्यास हो। अपने-अपने स्थान में स्थित रहो, अपना-अपना काम करो, साथ-साथ में भगवान का विषय सुनते रहो।
"सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः"—सुनते-सुनते-सुनते फिर "चेतोदर्पणमार्जनम्", वह जो अपना जो स्वरूप है, वह सिद्ध हो जाएगा, भगवान से जो संपर्क है, वह सिद्ध हो जाएगा। इसलिए श्रवण-कीर्तन बहुत ही जरूरी है।
और इसका फल भी हो रहा है। उदाहरण स्वरूप आप लोग सब देख रहे हैं कि यह सब American वासी, European वासी, ये श्रवण-कीर्तन करते-करते ही सब बड़े-बड़े भक्त बन रहे हैं और प्रचार भी खूब हो रहा है। India से इनका प्रचार बहुत जोर है India के बाहर। आप लोग जानते होंगे हमारा कम से कम 100 मंदिर हैं सारा दुनिया में। खाली America में ही 50 मंदिर हैं, Europe में हैं कोई 15-20, इसी प्रकार Japan में हैं, Australia में हैं, New Zealand में हैं, सब जगह में हैं। और सब राधा-कृष्ण मूर्ति का पूजन हो रहा है बड़ा सदाचार से।
और ये लोग सब दुर्व्यसन छोड़ दिए हैं। ये चाय भी नहीं पीते और बीड़ी भी नहीं छूते, और मदिरा-मांस की बात तो छोड़ ही दीजिए। ऐसी सदाचार है। और अवैध स्त्री-संग नहीं करते हैं, और जुआ नहीं खेलते हैं, और किसी प्रकार मादक द्रव्य ग्रहण नहीं करते हैं, और बिल्कुल भगवद्-प्रसाद केवल ग्रहण करते हैं, और मांसादि की बात छोड़ दीजिए। इसी प्रकार सदाचार से हर एक जगह में... कभी आप लोग आइएगा तो देखिएगा। अभी सब तीर्थ करने Vrindavan में आते हैं।
उधर America में नया वृंदावन है—New Vrindavan है, वह West Virginia में। हम लोग 500 acres जगह लिया है, उधर गोपालन हो रहा है। और अभी फिलहाल हम लोग का कम से कम रोजाना 500 pounds दूध अदा होता है गाय से। बड़े आनंद से वो लोग हैं।
यह सब सिखाया जाता है और यह सीखने के लिए वो लोग प्रस्तुत हैं। इधर से हम लोग को बहुत साधु, संन्यासी, संत को जाना चाहिए, यह चीज समझाना चाहिए। इसका market बहुत है। हम तो अकेले इतना किया है, अगर आप लोग सब आइएगा तो सब सारा दुनिया वैष्णव हो जाएगा। आप लोग थोड़ा सा Pakistan के लिए रो रहे हैं, सब Hindustan हो जाएगा। हाँ, तो आप लोग तो आते ही नहीं, हम क्या करें? अकेले जहां तक हो रहा है... आप लोग आशीर्वाद कीजिए, आगे और बढ़ेंगे।
Thank you very much. Hare Krishna.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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