श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  750826BG-VRNDAVAN--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 7.1
वृंदावन, 26-अगस्त-1975
 
 
 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

श्रीभगवानुवाच—
मय्य आसक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥

श्रीभगवानुवाच— मय्य आसक्त-मनाः पार्थ... योगं युञ्जन् मदाश्रयः... असंशयं समग्रं... असंशयं समग्रं... असंशयं समग्रं... असंशयं समग्रं यथा... यथा...

श्री भगवान [गला साफ़ करने की आवाज़] श्री भगवानुवाच— मय्य आसक्त-मनाः... जो मदाश्रयः असंशयं समग्रं मां यथा तच्छृणु। भगवान स्वयं, भगवान कृष्ण अपने विषय में स्वयं कह रहे हैं— श्री भगवान। हमारा जो सब इंद्रिय है— चक्षु, कर्ण, नासिका, हस्त, पद, दशेंद्रियाँ और मन— ये सब को अंदर से यदि हम भगवान को समझना चाहते हैं, वो संभव है। क्योंकि हमारा जो चक्षु है वो भौतिक है और भगवान आध्यात्मिक हैं। जैसे बहुत से भक्त लोग इधर दर्शन करने आते हैं। कोई कहते हैं कि "देखो जी, एक पत्थर का मूर्ति बना दिया और ये सब मूर्ख लोग दर्शन करने आते हैं।" क्योंकि उसको आँख नहीं है, वो भगवान को पत्थर देखता है। और जिसको आँख है, वो हज़ारों रुपया खर्च करके वो वृंदावन में भगवान का दर्शन करने आता है। इतना ही फ़र्क है। हाँ।

भगवान तो दर्शन देने के लिए आए हैं, क्योंकि हम लोग भगवान का विषय नहीं जानते हैं। इसलिए भगवान अवतार ग्रहण करके कृष्ण इधर आए थे। फिर उनके जो प्रवचन हैं और उनके जो उपदेश हैं, वे श्रीमद् भगवद्गीता को छोड़ गए हैं। और उनको दर्शन करने के लिए कि भगवान मूर्ति से इधर बैठे हुए हैं, तो भगवान को कोई समझना कोई मुश्किल नहीं है। जैसा किसी का विषय है, [गला साफ़ करने की आवाज़] आप उपदेश ले रहे हैं, उनके मूर्ति का दर्शन कर रहे हैं, उस व्यक्ति का विषय समझना कोई मुश्किल नहीं है। हाँ।

तो इसीलिए भगवान खुद अपने विषय में ये गीता के सप्तम अध्याय में बता रहे हैं। "श्री भगवानुवाच"। यह नहीं है कि व्यासदेव बता रहे हैं। व्यासदेव लिखते हैं— "श्री भगवानुवाच"। ये भगवान का विषय है, भगवान ही कह रहे हैं। हमारा विषय है, आप जानना चाहते हैं। आप चाहे जितना मन-माफ़िक सोचें, वो आपको संपूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता। अगर मैं खुद बोलता हूँ कि "देखो जी, मैं ऐसा हूँ। हमारा इतना मंदिर है, इतना संपत्ति है, इतना किताब है", तो आपको समझ में आएगा। इसलिए भगवान कहते हैं, श्री भगवानुवाच। क्या बोल रहे हैं? "मय्य आसक्त-मनाः"। जो व्यक्ति की भगवान में आसक्ति, भगवान से प्रेम, आसक्ति... जैसा आपको बच्चे से आसक्ति है, पति से आसक्ति है, पत्नी से आसक्ति है, इसी प्रकार यदि भगवान में भी आपको आसक्ति हो जाए, तो आप भगवान को समझ सकते हैं। और दूसरी तरह से नहीं।

‘प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेशु विलोकयन्ति’— भगवान से प्रेम हो तो भगवान [गहरी सांस लेने की आवाज़] खुद ही उनको दर्शन देते हैं। और हम यदि speculation करें मन-माफ़िक कि "भगवान ऐसे हैं, भगवान साकार हैं, भगवान निराकार हैं, भगवान ये हैं, वो हैं", तो इस तरह से भगवान को कोई समझ नहीं सकेगा। It is not possible. इसलिए यह जो आसक्ति है, यह आसक्ति को बढ़ाने के लिए जो उपाय है, उसका नाम है भक्ति। इसलिए भगवान कहते हैं— ‘मय्य आसक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः’।

ये आसक्ति बढ़ाने के लिए भगवान का आश्रय लेना पड़ेगा— "मदाश्रयः"। या तो भगवान का आश्रय लीजिए। फिर भी आप कहेंगे, "भगवान तो हमारे सामने हैं नहीं, हम कैसा आश्रय लें?" तो "मदाश्रयः" का अर्थ होता है— या तो भगवान का आश्रय लीजिए, और नहीं तो जो भगवान का आश्रय लिया है, उसका आश्रय लीजिए। "मदाश्रयः"— जो व्यक्ति भगवान के बिना और कुछ जानता ही नहीं, उसने भगवान का आश्रय ले लिया, बस उसका आश्रय। ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’। तो जो भगवान का आश्रय लेते हैं, वो तत्त्वदर्शी हैं। कैसे तत्त्वदर्शी हैं? भगवान का आश्रय कौन लेता है? भगवान का भक्त लेता है, और कौन लेता है? और भगवान कहते हैं कि भक्त ही केवल भगवान को समझ सकते हैं— ज्ञानी नहीं, योगी नहीं, कर्मी नहीं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] भगवान ने बताया नहीं कि जो कर्म से... कर्म से, ज्ञान से, योग से परमेश्वर मालूम हो सकता है।

भगवान हैं सच्चिदानंद विग्रह। कर्म से तो कुछ मालूम ही नहीं होता है। जो लोग ज्ञानी हैं, उनको कुछ मालूम होता है। वो सदांश... भगवान जो "ॐ तत् सत्", उसको मालूम होता है— सद-वस्तु। ज्ञानी को इतना मालूम होता है, और ज़्यादा नहीं। और योगी को, वो भगवान का जो परमात्मा मूर्ति है, उसका दर्शन होता है। भगवान का तीन स्वरूप है: ‘वदन्ति तत् तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’। भगवान का ज्ञान— ब्रह्म ज्ञान, परमात्मा ज्ञान एवं भगवद्-ज्ञान। तो भगवद्-ज्ञान आख़िरी है। पहले ब्रह्म ज्ञान— निराकार ब्रह्म। फिर और आगे बढ़े, योगी लोग जो दर्शन करते हैं— ‘ध्यान-अवस्थित-तद्-गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनः’। योगी जो कि ध्यानावस्थित होकर परमात्मा को हृदय में दर्शन करते हैं, उसको योगी कहा जाता है। तो पहली दर्शन ब्रह्म दर्शन, उससे आगे बढ़े तो परमात्मा दर्शन, और उससे आगे बढ़े तो भगवद्-दर्शन। तो जिसको भगवद्-दर्शन हो जाता है, उसको परमात्मा दर्शन और ब्रह्म दर्शन सभी हो जाता है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] संपूर्ण ज्ञान हो जाता है।

श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है: ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते’। जो लोग विशेषवादी हैं, निराकारवादी हैं और ज्ञानी हैं... ज्ञानी का अर्थ होता है जो कि ब्रह्म ज्ञान संपूर्ण लाभ किया है— "अहं ब्रह्मास्मि", मैं भौतिक वस्तु, शरीर नहीं हूँ, मैं ब्रह्म वस्तु हूँ। ये ज्ञान जिसको संपूर्ण है, उसको ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है। और ‘ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा’— उसका आत्मा प्रसन्न हो जाएगा। जो ब्रह्म ज्ञान है, उसमें भगवान का आंशिक ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं है। पूर्ण ज्ञान तभी हो सकेगा जैसे भगवान बताते हैं— "असंशयं समग्रं"। "समग्र" माने कि संपूर्ण, partial नहीं, आंशिक नहीं। आंशिक ज्ञान ब्रह्म ज्ञान, उससे थोड़ा बड़ा परमात्मा ज्ञान, और समग्र ज्ञान— कृष्ण। भगवान स्वयं: ‘वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः’। जिसको वासुदेव ज्ञान हो जाता है— "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"। वासुदेव ज्ञान क्यों? वासुदेव जी का जो... खुद आपका वृंदावन में, वृंदावन में स्वयं भगवान और मथुरा में वासुदेव भगवान। कृष्ण वृंदावन छोड़के कहीं नहीं जाते। और जो लीलाएँ होती हैं, वो वासुदेव मूर्ति से और सब लीला करते हैं। मथुरा में कंस को मारा— वो वासुदेव मूर्ति। और वृंदावन में जो ये गोपाल रूप से भगवान खेले और गोपियों के साथ लीला की— ये भगवान कृष्ण। ये विचार है।

तो फिर भगवान की अनंत लीला, अनंत रूप: ‘अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्त-रूपम् आद्यं पुराण-पुरुषं नव-यौवनं च’। ये जो नवजवान भगवान... भगवान की मूर्ति आप देखिएगा, सब समय नौजवान, हाँ, 15-20 साल का लड़का, 15-20 वर्ष के। भगवान जब अर्जुन के सारथी बने थे, उस समय grandfather, great-grandfather थे, उस समय भी भगवान मालूम होते थे एक नवजवान। ये भगवान की मूर्ति है— नवयौवनं, सब समय नौजवान देखने में बड़े सुंदर। ‘अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्त-रूपम् आद्यं...’ [गला साफ़ करने की आवाज़] केवल वेद ज्ञान होने से मुश्किल है भगवान को समझना। बड़े-बड़े वेदांती लोग सब फेल हो जाते हैं भगवान को समझने में। वेद का उद्देश्य है कि भगवान को समझें, बाकी इतनी कठिनाई है कि बड़े-बड़े विद्वान लोग समझ नहीं पाते। हाँ। ‘वेदेषु दुर्लभम्’— किस तरह से समझा जाए भगवान को? ‘अदुर्लभम् आत्म-भक्तौ’— जो भगवान का भक्त है, उनके लिए अदुर्लभ, बड़ा आसानी से, easily we can understand. भगवान तो समझा देते हैं ना, वो मान लेते हैं।

भगवान कहते हैं, पर वो कौन समझेगा? भगवान कहते हैं— "मुझसे बढ़कर के और कोई पर-तत्त्व है ही नहीं"। कौन समझेगा? बिना भक्त... जो भक्त नहीं है, वो समझेगा— "देखो जी, बेकार की बात कहते हैं, इनसे बड़ा कोई नहीं है।" और जो भगवान का भक्त है, वो समझ जाएगा— "हाँ, ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्।" जो भगवान का भक्त है, उसको समझ में आएगा कि ये जो कृष्ण हैं, ये परमेश्वर हैं— "ईश्वरः परमः कृष्णः"। उनका जो शरीर है, वो सच्चिदानंद है— सत्, चित्, आनंद। तो ब्रह्म ज्ञान में केवल उनको सत्-अंश का ज्ञान होता है, और परमात्मा के ज्ञान में चित्-अंश का ज्ञान होता है, और भगवद्-ज्ञान में सत्-चित्-आनंद— वो है आनंद। ‘आनन्दमयोऽभ्यासात्’। इसलिए जो भगवान का जो आख़िरी जो ज्ञान है— ‘आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभावि ताभिः’— आनंद-चिन्मय-रस का जो विग्रह है, उसको समझने के लिए वही नाम... वो भक्ति से ही मालूम होगा और कोई रास्ता नहीं है। वो भक्ति किस तरह से होगी? यही भगवान बता रहे हैं— "मय्य आसक्त-मनाः"। आसक्ति, भगवान की तरफ़ आसक्ति बढ़ाना।

जैसे मंदिर में आप घूमते हैं, तो अगर रोज़ाना आएँगे तो आसक्ति बढ़ेगी। इधर जो आरती होती है, उस समय दर्शन करने से... शास्त्र में विधान है, कोई थोड़ा झाँझ बजा दिया, कोई थोड़ा दर्शन किया, कोई करताल बजाया, कोई चरणामृत लिया, किसी तरह से आप जाइए, फिर आपकी आसक्ति बढ़ती जाएगी। इसलिए मंदिर पद्धति है। जो साधारण व्यक्ति हैं, उनकी आसक्ति बढ़ाने के लिए, फिर भगवान का दर्शन होगा। इसलिए भगवान कहते हैं— "मय्य आसक्त-मनाः"। जो कि भगवान के विषय में आसक्ति बढ़ाइए, उसके लिए समग्र ज्ञान भगवान का होता है। "असंशयं समग्रं मां यथा..." और उसमें कोई संदेह नहीं— "असंशयं समग्रं मां"। और कौन बता रहा है? भगवान स्वयं। "असंशयं समग्रं"। सभी का doubt होता है। और सब religion में वास्तविक भगवान का कोई स्पष्ट ज्ञान नहीं है। और हमारा वैदिक धर्म भी, जो कि विशेष करके ब्रह्मज्ञानी हैं, उनको भी ठीक-ठीक स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। और जो भक्त हैं, उनको तो भगवान का ज्ञान तो है ही है, और बता देंगे— "देखो जी, भगवान का नाम ये है, भगवान के बाप का नाम ये है, भगवान का ठिकाना ये है", सब बता देंगे। और जो भक्त नहीं है, उसको भगवान का ज्ञान भी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि भगवान में आसक्ति नहीं है। इसलिए पहले आसक्ति बढ़ानी है— "मय्य आसक्त-मनाः"। जिसका भगवान में आसक्ति हो जाए, वही भगवान को "असंशयं समग्रं"... असंशय, कोई संदेह नहीं। जैसे इधर कृष्ण भक्त लोग आप हैं, आप लोगों को कोई संशय नहीं है कि भगवान कृष्ण स्वयं भगवान हैं। असंशय और समग्र ज्ञान— जो भगवान का ज्ञान जिसका है, उसका ब्रह्म ज्ञान, परमात्मा ज्ञान, ये सब ज्ञान पूर्ण है। ‘ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः’।

वो आसक्ति बढ़ाने के लिए जो भगवान के भक्त हैं— रूप गोस्वामी, जो कि वृंदावन का आविष्कार किया... ये वृंदावन पहले मैदान था। ये गोस्वामी लोग— रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट, दास रघुनाथ— ये छह गोस्वामी इधर आकर के वृंदावन को प्रकाश किया था। इसलिए मदनमोहन का मंदिर पहले बना, फिर गोविंद जी का मंदिर है। वो बताया कि आसक्ति किस तरह से बढ़े। उन्होंने 'भक्ति-रसामृत-सिंधु' में उसका रास्ता बताया। वो कैसे है? ना— ‘आदौ श्रद्धा’। पहले चीज़ है श्रद्धा। देखिए, आप लोगों को श्रद्धा है, इसलिए आप लोग आए हैं। और जिसको श्रद्धा है ही नहीं, वो उठ-उठ के चले जाते हैं। उनको और भगवान का विषय समझाया जाए, वो ठीक नहीं लगता। और सब बातें, सब बात कीजिए, तो बैठ के सुनेगा। और जो भगवद्-विषय है, भगवान की भक्ति जो है, वो उनको अच्छी नहीं लगती। आसक्ति नहीं है। तो पहले तो श्रद्धा— भगवान का विषय सुना जाए, ये श्रद्धा। ‘आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गः’। तो साधु-श्रद्धा के बाद फिर साधु का संग किया जाए।

तो साधु कौन है? हम लोग अगर कहें कि "हम लाल कपड़ा पहन लिए, हम साधु हो गए", नहीं, वो साधु नहीं। साधु कौन है? ‘अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः’— वो साधु भगवान ने बताया हुआ बात है। साधु कौन है? साधु जो मुझको अनन्य भाव से भजन करते हैं और कुछ नहीं जानते हैं, कृष्ण छोड़कर— वो साधु। और साधु नहीं। ‘साधवः सद्रूपाः’ या ‘साधवः साधु-भूषणाः’। साधु, भगवान खुद बता रहे हैं। जैसे भगवान अपने विषय में खुद बता रहे हैं, इसी प्रकार भगवान साधु कौन है, महात्मा कौन है, वो सब बता रहे हैं। तो साधु कौन है? ‘भजते मामनन्यभाक्’ [गला साफ़ करने की आवाज़] जो कि भगवान को छोड़के कुछ नहीं जानता है, भगवान कृष्ण को छोड़के और कुछ नहीं जानता है। और महात्मा कौन है? ‘महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो’— वही बात, अनन्य मन से जो कि सब समय केवल भगवद्-भजन करते हैं।

इसलिए भक्तियोग की पद्धति तो यही आप लोग देख रहे हैं। ये जो सब यूरोपियन, अमेरिकन लोग इधर आए हैं, ये और कुछ नहीं जानते। ये भगवान को ही, कृष्ण को ही मानते हैं। और सब समय देखिएगा— हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम हरे हरे। ये साधु और महात्मा हैं। इसलिए हम लोगों का उचित है, साधु-संत इन लोगों का संग करना चाहिए। ये [नाक से की जाने वाली आवाज़] विचार ठीक नहीं है कि "ये लोग अंग्रेज़ हैं, ये मंदिर में नहीं जाना चाहिए, क्योंकि अंग्रेज़ लोग इधर हैं और अमेरिकन लोग हैं।" नहीं, वैष्णवे जाति-बुद्धि नहीं करनी चाहिए। ‘अर्च्ये विष्णौ शिला-धीर् गुरुषु नर-मतिर् वैष्णवे जाति-बुद्धिः’— वैष्णव कोई जाति विशेष नहीं है। जैसे हनुमान जी; हनुमान जी तो मनुष्य भी नहीं थे, बंदर थे। बंदर तो जानवर ही होता है, फिर हनुमान जी की क्यों पूजा की जाए? अगर कोई बंदर को पूजा करते हैं क्या? जाति-बुद्धि से अगर हनुमान जी को समझा जाए कि "ये तो बंदर जाति है, इसको क्यों सम्मान दिया जाए?" नहीं, वैष्णवे जाति-बुद्धि नहीं करनी चाहिए। ‘अर्च्ये विष्णौ शिला-धीः’— भगवान की जो अर्चा-मूर्ति है, उसमें कोई अगर समझे पत्थर है; ‘गुरुषु नर-मतिः’— और जो गुरु हैं, वास्तविक गुरु, आचार्य हैं, उनको कोई साधारण मनुष्य समझे; और इसी प्रकार जो वैष्णव हैं, उनको कोई जाति विशेष समझे, उसको शास्त्र में कहते हैं— नारकी बुद्धि। ये बुद्धि ठीक नहीं है। जो भजन करे, हाँ, वो साधु। चैतन्य महाप्रभु बताए हैं— ‘कृष्ण भजने नाही जाति-कुलादि-विचार’। जो कृष्ण भजन करने आए हैं, उसको जाति-कुल का विचार नहीं करना चाहिए। भगवान सबके लिए हैं। ‘पाप-योनयः’— जो पापी से महापापी योनि में जन्म हुआ है, चंडाल कुल में जन्म हुआ है, तो उसमें कोई बाधा नहीं। जैसे जमुना जी में स्नान करने को जाते हैं, किसी के लिए बाधा है? नहीं। सब कोई, यहाँ भंगी भी जा सकते हैं स्नान करने को, उसमें क्या दोष? वो भी पवित्र हो सकते हैं। और ब्राह्मण, पंडित, साधु, संन्यासी— वो भी जा सकते हैं, कोई किसी के लिए रोक नहीं। इसी प्रकार भगवद्-भजन करने में किसी के लिए रोक नहीं, सबके लिए है। क्योंकि असल में तो जीवात्मा वो तो भगवद्-वस्तु है, भगवान का अंश स्वरूप है। सोना अगर कोई ख़राब जगह में पड़ा है, पड़ा हुआ है, वो सोना को कोई लेगा नहीं? ज़रूर लेगा। हाँ, सोना अपवित्र नहीं होता। यह चाणक्य पंडित भी कहते हैं— ‘अमेध्यादपि काञ्चनम्’। यदि कोई ख़राब जगह में कांचन (सोना) है, तो उसको ले लेते हैं, उसको ग्रहण कर लेते हैं— ‘अमेध्यादपि काञ्चनम्’।

तो ये आसक्ति बढ़ाने के लिए रूप गोस्वामी बताते हैं— ‘आदौ श्रद्धा’। पहली चीज़ है श्रद्धा, विश्वास। देखो जी, इधर भगवान हैं। ये भगवान मंदिर में जो आते हैं, ये पत्थर दर्शन करने नहीं आते हैं। वो जानते हैं इधर भगवान हैं। इसका नाम है श्रद्धा। ज़रूर भगवान हैं। ‘आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गः’। हाँ, ये श्रद्धा से आते हैं। और अगर आप श्रद्धा और बढ़ाना चाहते हैं, तो साधु जो हैं, जो भजन करने वाले हैं, उनका संग करना चाहिए। प्रति-दिन साधु के व्यवहार करने से, साधु-संग... फिर आस्ते-आस्ते साधु-संग होने से जो आगे बढ़े, ‘ततो भजन-क्रिया’। तब उनको— "हम भी भजन करें, साधु लोग जैसे करते हैं, मैं भी हरिनाम को जपा करूँ"— भजन-क्रिया। ‘आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गोऽथ भजन-क्रिया। ततोऽनर्थ-निवृत्तिः’— भजन करने से ये जो अनर्थ हैं, जो अनर्थ का जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता है, जो चीज़ हमारी ज़रूरत नहीं है, वो सब चीज़ अगर दुःसंग से हमें प्राप्त हुई है, तो वो छूट जाती है— अनर्थ-निवृत्ति। जैसे बीड़ी फूँकना; तो बीड़ी नहीं फूँकने से कोई मर जाता है? एक अनर्थ है, दुःसंग से सीखता है बीड़ी फूँकना। इसी प्रकार सत्संग में छोड़ भी सकता है। ये लोग देखिए, ये अमेरिकन लोग, इनका दैनिक कार्य था स्त्री-संग और मांस खाना और शराब पीना और जुआ खेलना, लेकिन सब छोड़ दिया— अनर्थ-निवृत्ति। सब निवृत्त हो गया। ये साधु-संग का फल है। ‘आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गोऽथ भजन-क्रिया। ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा’— फिर विश्वास दृढ़ हो जाता है, भगवद्-भक्ति में निष्ठा हो जाती है। ‘ततो निष्ठा रुचिस्ततः’— रुचि होती है भगवान की कथा सुनने में। ‘तथासक्तिः’— ये रुचि का भाव, ये आसक्ति। ये आसक्ति भगवान पहले से शुरू कर दिए। इसके पहले श्रद्धा, और साधु-संग, और अनर्थ-निवृत्ति, और निष्ठा, और रुचि— ये पाँच stage पार होकर जब आसक्ति... भगवान को छोड़ ही नहीं सकता, वो नशा हो जाती है। ये सब नशा— बीड़ी का नशा, सिगरेट का नशा और शराब का नशा, चाय का नशा— ये सब छोड़के ये नशा जब पैदा हो जाती है, तो आप भगवान को कब छोड़ सकते हैं? उसका नाम है आसक्ति।

तो ये "मय्य आसक्त-मनाः"— इस प्रकार व्यक्ति जो कि भगवान से आसक्ति... ये liberated stage है। भगवान में आसक्ति होना, ये साधारण stage नहीं है, भौतिक stage में नहीं। क्योंकि ‘अनर्थ-निवृत्ति-पूर्वक भक्तिः परस्य विरक्तिः अन्यत्र च’— भक्ति कोई व्यक्ति भक्त है, तो फिर उसका ये सब जो अनर्थ है, उससे रुचि नहीं लगती है, खुद ही छोड़ देगा। ये भक्ति की पहचान है। हाँ, और भक्त भी हैं, बीड़ी भी पीते हैं, वो भी ठीक है, फिर कभी-कभी होता है। बाकी ख़ुशी से ये सब अनर्थ को लेना नहीं चाहिए। अभ्यास से एक आदमी छोड़ दिया साहब, फिर भी पूर्व अभ्यास से कभी दुष्ट हो जाते हैं, उसको भी भगवान कहते हैं— ‘अपि चेत् सुदुराचारो’... हाँ, कोई बात नहीं, उसका भजन ठीक है कि नहीं? ‘भजते मामनन्यभाक्’— वो बात ठीक है। यदि वो बात ठीक है, तो साधु ही समझते हैं, वो साधु। उनका जो भक्ति का जो क्रिया-क्रम है, उसको छोड़ता नहीं। कभी-कभी भय से, कभी बीड़ी पी ली, तो उनके लिए माफ़ होता है। बाकी जो जान-बूझ करके ये सब व्यसन करते हैं, उनके लिए मुश्किल है।

तो "मय्य आसक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन्"... ये जो योग है, इसको practice करना चाहिए। तो योग क्या practice? भक्तियोग का— ‘श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्। अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यम् आत्म-निवेदनम्’। नौ प्रकार से भक्ति जागरण कीजिए। कुछ नहीं तो इधर आके सुनिए— श्रवण। सुनते-सुनते आपको सब चीज़ प्राप्त हो जाएगा। ‘शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः’— भगवान की कथा जितना आप लोग सुनेंगे, उतना आपका पाप नाश हो जाएगा, पुण्य हो जाएगा। और संपूर्ण पाप नाश हो जाने के पश्चात् केवल पुण्य ही पुण्य ही रहेगा, तब आप भगवान को समझ सकते हैं। ‘येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्’— वो तो दृढ़ता से भजन कर सकता है जिसको बिल्कुल पाप मिट गया। ये भगवान, भगवान हैं परम पवित्र, और तो अपवित्र होकर के भगवान के पास कोई पहुँच नहीं सकता, वो पवित्र होना चाहिए। ‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्’। तो यदि आप भगवान को चाहते हैं, तो आपको भी पवित्र होना पड़ेगा। ये बात नहीं है कि मैं अपवित्र रहूँगा और भगवान को समझूँगा। बाकी भगवद्-भजन करते-करते पवित्र हो जाता है— ‘पुण्य-श्रवण-कीर्तनः’।

इसलिए उचित है कि भगवद्-मंदिर में आइए और भगवान का दर्शन कीजिए और भगवान की कथा सुनिए— श्रवण हो। और केवल श्रवण नहीं, श्रवण करके कीर्तन कीजिए। जितना सुने हैं, वो दूसरे को सुनाएँगे, उसका नाम है कीर्तन। ‘श्रवणं कीर्तनं विष्णोः’— किसका विषय? विष्णु, और किसी का विषय नहीं। ‘श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्’— ये सब विधि है। तो जो लोग वृंदावन में आए हैं, उनकी उचित है कि ये सब भगवद्-विषय सुनें। और फिर आस्ते-आस्ते केवल पुण्यवान ही रहें। जो... जिसको पुण्य-पुण्य नहीं होता है, वो भगवान को समझ नहीं सकता है। इसलिए आपको सुनना चाहिए। जो पुण्यवान हुए बिना, उसको भगवान की कथा में रुचि नहीं है, आसक्ति नहीं है। और आस्ते-आस्ते होगी, एक दिन में सब चीज़ नहीं होता है। ये सब process है। "मय्य आसक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः"। ये भक्तियोग, "मदाश्रयः"— ये कोई बाहरी आदमी के आश्रय में रहने से काम नहीं। "मदाश्रयः"— या तो डायरेक्टली (directly) भगवान का आश्रय कीजिए, नहीं तो जो व्यक्ति संपूर्ण रूप से भगवान के चरण में आश्रय लिया है, उनका आश्रय। तो फिर भगवान को समझ में आएगा— "समग्रं" और "असंशयं", कोई संदेह नहीं और संपूर्णता से। वो चीज़ भगवान बता रहे हैं, हम लोग आगे और कहेंगे।

धन्यवाद।
 
 
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