श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  761015BG-CHANDIGARH_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 7.1
चंडीगढ़, 15-अक्टूबर-1976
 
 
 
Translation: "Arjuna, practice yoga, with mind attached to Me, you can know Me..." mayy āsakta-manāḥ pārtha yogaṁ yuñjan mad-āśrayaḥ...

आज दो-तीन रोज से हम लोग जो नास्तिक हैं, असुर हैं, उनका विषय चर्चा कर रहे थे कि asatyam apratiṣṭhaṁ te jagad āhur anīśvaram—जो भगवान हैं नहीं, यह असुर लोगों का कहना है। असुर लोग कहते हैं कि भगवान नहीं हैं। तो असुर का और एक परिचय है, भगवान खुद बताए हैं कि जो आसुरी भाव से प्रभावित हैं, उनको चार classes में विभाजन किया जाता है:

na māṁ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ / māyayāpahṛta-jñānā āsuram bhāvam āśritāḥ

जो लोग सुर हैं और असुर हैं, आप लोगों को समझाया है कि दो प्रकार के आदमी होते हैं—एक असुर और एक देवता। viṣṇu-bhaktaḥ smṛto daiva āsuras tad-viparyayaḥ—जो भगवान के भक्त होते हैं, भगवान को मानते हैं, उनको देवता कहा जाता है। आप लोग देवताओं के नाम सुने होंगे। जो देवता लोग हैं—ये सब इंद्र, चंद्र, वरुण, वायु, बड़े-बड़े सब देवता, ब्रह्मा जी, शिव जी, ऐसे बड़े-बड़े सब देवता हैं। तो देवता उनको क्यों कहा जाता है? क्योंकि वे सब भगवान के भक्त हैं और भगवान की आज्ञानुसार काम करते हैं।

भगवान मालिक हैं और सब उनके भृत्य हैं। Caitanya-caritāmṛta में बताया है कि जो मालिक हैं, वो कृष्ण हैं—ekale īśvara kṛṣṇa, āra saba bhṛtya। भगवान कृष्ण ही मालिक हैं। īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ—यह शास्त्र का विचार है। भगवान कृष्ण स्वयं īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ हैं। और भगवान खुद भी बता रहे हैं भगवत गीता में: mattaḥ parataraṁ nānyat kiñcid asti dhanañjaya। यह सब शास्त्र का निर्देश है। जो भगवान, जिनको आपको मालूम नहीं हो सकता, भगवान खुद आकर के बता रहे हैं कि भगवान क्या चीज हैं। इस भारत भूमि में भगवान रामचंद्र, भगवान कृष्ण आकर के समझा रहे हैं। जैसे भगवान निराकार नहीं हैं, और निराकार जो है, उनकी शक्ति का परिचय है। जैसे भगवान ने भगवत गीता में बताया है: mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā / mat-sthāni sarva-bhūtāni na cāhaṁ teṣv avasthitaḥ। यह सब विचार भगवत गीता में अच्छी तरह से समझाया गया है। तो "भगवान हैं नहीं", यह मूर्खता है। यह मूर्ख लोग, असुर लोग कहते हैं।

इसलिए असुरों का चार विभाजन है। एक तो है दुष्कृतिन। दुष्कृति का अर्थ होता है जो सब समय बुरा काम करते हैं। 'कृति' का अर्थ होता है जो बहुत अच्छी तरह से काम करने वाला हो, जिसके पास merit भी है, दिमाग भी ठीक है, बाकी वह उसे दुष्कार्य में लगाता है, उसका नाम है दुष्कृति। और जिसका दिमाग ठीक है और अच्छे काम के लिए दिमाग लगाता है, उसका नाम है सुकृति। तो वही असुर और देवता हैं। देवता लोग सुकृति हैं और असुर लोग दुष्कृति। जो सुकृति होते हैं, वो भगवान के पास पहुँचते हैं: catur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛtino 'rjuna। चार प्रकार के व्यक्ति जो सुकृतिन हैं, वो चार प्रकार के व्यक्ति कौन हैं? आर्त, अर्थार्थी, ज्ञानी और जिज्ञासु। जो पुण्यवान हैं, वह दुखी होने से भगवान के पास पहुँचते हैं—"भगवान, मैं दुखी हूँ। आप कृपा करके कुछ उपाय कीजिए।" यद्यपि यह शुद्ध भक्ति नहीं है, तथापि उसको पुण्यवान कहा जाता है। जो दुखी होकर के भगवान के पास पहुँचते हैं, वो यद्यपि शुद्ध भक्त नहीं हैं। शुद्ध भक्त भगवान से कुछ माँगते नहीं हैं। anyābhilāṣitā-śūnyaṁ jñāna-karmādy-anāvṛtam / ānukūlyena kṛṣṇānuśīlanaṁ bhaktir uttamā—उत्तम भक्त जो है, वो भगवान से कभी कुछ माँगता नहीं है।

वो खाली भगवान को देने के लिए तैयार रहता है—"भगवान हमसे सब कुछ ले लें।" हाँ, prāṇair arthair dhiyā vācā—हमारा प्राण भी ले लें, हमारा धन भी ले लें, हमारा वचन भी ले लें और हमारी बुद्धि भी। यह शुद्ध भक्त का विचार है। जैसे पांडव लोग हैं, भगवान उनके सामने हैं, उनके मित्र कृष्ण हैं। उनका राज लूट गया, उनके परिवार और स्त्री का अपमान हुआ, बाकी आप लोग देखिएगा महाभारत में, उन्होंने कभी भगवान से प्रार्थना नहीं की—"भगवान, आप हमारे इतने बड़े मित्र हैं और यह सब हो रहा है!" नहीं, कभी नहीं बोला। भगवान हमेशा साथ-साथ में हैं, बाकी भगवान से कभी प्रार्थना नहीं की कि "हमारा दुख मिटा दीजिए।" यह शुद्ध भक्त का विचार है। और जो लोग उस दर्जे में पहुँचे नहीं हैं, उनको कहा जाता है पुण्यवान्, ताकि आगे जाकर के वे शुद्ध भक्त हो जाएँ। ऐसा शास्त्र में निर्देश है। यदि आपके पास कुछ कामना भी है, तब भी भगवत-भजन कीजिए: akāmaḥ sarva-kāmo vā mokṣa-kāma udāra-dhīḥ / tīvreṇa bhakti-yogena yajeta puruṣaṁ param। भगवान से माँगना उचित नहीं है, बाकी साधारण व्यक्ति, जैसे Christian लोग भगवान से माँगते हैं: "O God, give us our daily bread." ठीक है?

भगवान से माँगने की कोई ज़रूरत नहीं है। भगवान जिसको जो देना है, सब देते हैं। eko bahūnāṁ yo vidadhāti kāmān—भगवान का अर्थ होता है जो सबकी कामना पूर्ण करे। तो जो खाने-पीने के लिए भगवान के पास जाना, यह खराब भी नहीं है, बाकी उचित भी नहीं है। भगवान के पास पहुँचना इसलिए है—"भगवान, मैं तो इस माया में फँस गया हूँ। आप कृपा करके फिर अपनी सेवा में लगा लीजिए।" ayi nanda-tanuja kiṅkaraṁ patitaṁ māṁ viṣame bhavāmbudhau / kṛpayā tava pāda-paṅkaja-sthita-dhūlī-sadṛśaṁ vicintaya—चैतन्य महाप्रभु ने हम लोगों को सिखाया है कि भगवान से क्या चीज प्रार्थना करनी चाहिए। तो भगवान नंद... भगवान जब इधर आए थे, नंद महाराज के पुत्र होकर के वृंदावन में ठहरते हैं। भगवान को 'नंदनंदन' बोलने से बड़ी खुशी होती है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने हम लोगों को सिखाया है। और कृष्ण ने नहीं बताया, हाँ, वासुदेव, उससे और भगवान को खुशी है। "नंदनंदन, कृपया तव पाद-पंकज-स्थित-धूली-सदृशं विचिन्तय..." मैं किसी कारण से यह जो भव-समुद्र है—यह material world, भौतिक जगत्, इसको भव-समुद्र बोला जाता है।

'भव' का अर्थ होता है—एक दफ़े जन्म लो, मरो, और फिर एक दफ़े जन्म लो। और वह कोई एक जन्म नहीं, अनेक प्रकार की 84 लाख योनियों में भ्रमण करना पड़ता है। इसलिए इसका नाम है भव-समुद्र। न जाने अगला क्या जन्म हो जाएगा, इसको समझना चाहिए। मनुष्य जीवन इसलिए है कि इस भव-समुद्र में जो dehāntara-prāptiḥ—एक शरीर छोड़ कर के दूसरा शरीर लेना पड़ता है, उसके लिए हमको तैयार होना चाहिए कि आगे हमको किस प्रकार का शरीर मिले। पूर्व में भगवान ने गीता में बताया है कि यदि आप तैयार होना चाहते हैं, तो निश्चित कर लीजिए कि किधर आप जाना चाहते हैं। हाँ, यदि आप स्वर्गलोक आदि... अरे, अच्छे-अच्छे जगह हैं—स्वर्गलोक, जनलोक, महर्लोक, सत्यलोक, ये चतुर्दश भुवन हैं। और नीचे भी हैं—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल, इस प्रकार सब हैं। oṁ bhūr bhuvaḥ svaḥ tat savitur vareṇyaṁ bhargo devasya... आप लोग जो गायत्री जपते हैं। तो यदि आप ऊँचे लोकों में जाना चाहते हैं, तब जा सकते हैं, उन लोकों के देवताओं की उपासना कीजिए। अब ऐसा-ऐसा aeroplane चढ़ कर के जो चंद्रलोक में जाएँगे, यह संभव नहीं है।

आपको उसके लिए तैयार होना पड़ेगा। यदि आप चंद्रलोक में जाना चाहते हैं, तो उसका साधन शास्त्र में विधि है। कर्मकांड विचार से आप चंद्रलोक में जा सकते हैं। और उधर जाने से आपको 10,000 वर्ष की आयु मिल सकती है, जहाँ हमारा छह महीना उनका एक दिन होता है। और भोग इधर से हज़ारों गुना ज़्यादा, यह सब मिल सकता है। इसलिए बोला जाता है—स्वर्गलोक, जनलोक, महर्लोक, तपोलोक, ब्रह्मलोक। यदि आप उच्च लोकों में जाना चाहते हैं, तो उस प्रकार प्रस्तुत होइए, उधर आप जा सकते हैं। यदि आप उन लोकों में जाना चाहते हैं, तो कर्मकांड विचार करके जाइए। और यदि हम इधर ही रहना चाहते हैं कि "हमारा देश है, यह भारतवर्ष है, कि England है"—आजकल nationalism खूब चलता है—तो इधर ही रह सकते हैं। और यदि आप चाहते हैं कि "हमारे पास चले आएँ"—mad-yājino 'pi yānti mām—तो भगवान के भक्त हो जाइए, फिर भगवान के पास चले जाएँगे। आपका क्या विचार है, कहाँ जाना है? dehāntara-prāptiḥ के लिए तैयार होना चाहिए। यह मनुष्य जीवन का कर्तव्य है। ऐसा खाली पशु जैसा जीवन यापन करना और "भगवान-वगवान कुछ हैं नहीं, खाओ-पिओ मज़ा करो"—यह पशु जीवन है, यह उचित नहीं है। इसलिए जो भगवान को समझने के लिए प्रयत्न नहीं करते हैं, उनको असुर कहा गया है।

हाँ, असुरों के चार विभाजन हैं, जैसा मैं बोल रहा था। एक तो होता है दुष्कृति, जो पापी केवल पाप का कार्य करते हैं—duṣkṛtinaḥ। और एक मूढ़ है। हाँ, मूढ़ यानी गधा, कुछ समझता नहीं। "भगवान हैं नहीं"—कैसे बोलोगे? जब तक आप गधा नहीं हैं, तब तक "भगवान हैं नहीं" यह आप नहीं बोल सकते। थोड़ा विचार करना पड़ेगा। अब देखिए, आप अपने शरीर से ही विचार कर सकते हैं। यह जो आपका शरीर है, यह हमारा शरीर है, हम इसे बहुत सजाते हैं, हाँ, जब तक हम जीवित हैं। या हमारा कोई बाल ऐसा पकड़ ले, तो हम बहुत गुस्सा हो जाते हैं। और यही शरीर रहेगा, और जब भगवान का अंश जो जीवात्मा है, वह यह शरीर छोड़ जाएगा, तब इस शरीर में कोई जूता भी लगाए, तो कोई कुछ बोलेगा नहीं। तो जैसे शरीर में जीवात्मा रहने के कारण शरीर की इज़्ज़त है, इसी प्रकार यह जो विराट रूप शरीर है, cosmic manifestation है, इसमें भी परमात्मा हैं, इसलिए इसकी इज़्ज़त है। इसलिए ठीक time पर सूर्य उदय होता है, time पर सब... हाँ, और भगवान खुद बोल रहे हैं: mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ—भगवान की आज्ञा से। तो जैसे मैं इस शरीर में मौजूद हूँ, इसलिए यह शरीर ठीक-ठीक काम दे रहा है।

और इससे आगे बढ़िए। Office में जाइए, government में जाइए। Minister साहब हैं, president साहब हैं, इससे government ठीक चल रही है। Office में जाइए, managing director हैं, तब office ठीक से चल रहा है। कहीं भी जाइए, एक कर्ता, एक देखने वाला, एक मालिक ज़रूर होता है। तो इतना बड़ा भारी जो ब्रह्मांड है, इसमें कोई नहीं है? jagad āhur anīśvaram—कितना बड़ा मूर्ख होता है! तो "भगवान हैं ही नहीं" जो बोल सकता है, वह महामूर्ख है। नहीं तो साधारण रूप से मालूम होता है कि कहीं भी जाइए, एक कर्ता होता है, एक देखने वाला होता है, एक हुकुम देने वाला होता है। हाँ, तो यह सब विचार नहीं करते हैं। राक्षस लोग बोलते हैं कि भगवान नहीं हैं। इसलिए उन्हें कहते हैं मूढ़। और वो मूढ़ क्यों रहते हैं? duṣkṛtino narādhamāḥ—जो केवल पाप कार्य करते-करते मनुष्य जीवन जो मिला है, उसमें अधम रह जाते हैं। उससे उन्नति नहीं होती। पाप कार्य करने से मनुष्य जीवन में, मनुष्य होते हुए भी वे नराधम होंगे। इसलिए यह हमारे लिए उचित नहीं है।

आज हमारी एक व्यक्ति से बात हुई, वो बोलता है कि "हमको तो रोटी चाहिए, कपड़ा चाहिए। भगवान से हमारा क्या मतलब?" ठीक है, रोटी चाहिए, कपड़ा चाहिए। और ऐसे तो जानवर भी होते हैं, उनको कपड़ा भी नहीं चाहिए, केवल रोटी चाहिए। तो मनुष्य क्यों केवल रोटी के लिए परिश्रम करे? वो तो सूकर... हाँ, जैसे सूकर परिश्रम करते हैं दिन भर—"कहाँ विष्ठा है, कहाँ विष्ठा है?" तो मनुष्य अगर ऐसा ही करे कि "कहाँ रोटी है, कहाँ रोटी है?" और इसलिए केवल परिश्रम करे और कुछ ज़रूरत नहीं है, यह तो सूकर-कुकुर का काम है। ऐसे सब चलता है। हाँ, जो भगवान को नहीं चाहते हैं, भगवान का विषय जो समझने को नहीं चाहते हैं, वो सूकर-कुकुर हैं—śva-viḍ-varāhoṣṭra-kharaiḥ—यह शास्त्र का सिद्धांत है। इसलिए मनुष्य जीवन मिला है, और इस जीवन में भगवान से संपर्क तो है ही है।

Government है, जो राज्य में रहता है उससे भी संपर्क है, और jail का जो कैदी है उससे भी संपर्क है। Government का संपर्क छूट नहीं सकता है। जो जीव है, उसका भगवान से संपर्क है। और जो देवता हैं, उनका भी भगवान से संपर्क है। बाकी अंतर क्या होता है? देवता जानते हैं कि भगवान हैं, और असुर नहीं जानते। इतना ही फ़र्क है। संपर्क तो है ही। जैसे jail में कोई आता है, हाँ, कैदी लोग, तो क्या कारण है? पाप काम किया है, चोरी की है, और कुछ किया है। इसी प्रकार जो भगवान को भूल जाता है, उसे संसार में दुःख भोगना पड़ता है। भगवान ने इस शास्त्र को बनाया है ताकि जीव इसे पढ़ कर अपनी समस्या को हल कर सके और फिर भगवान के पास पहुँच जाए। इसलिए शास्त्र दिए गए हैं। इसलिए जो भगवान को भूल गया है और भगवान से दूर चला गया है, उसको आहिस्ता-आहिस्ता सिखाया जाए। यही शास्त्र का काम है:

kṛṣṇa bhuli' sei jīva anādi-bahirmukha / ataeva māyā tāre deya saṁsāra-duḥkha
māyā-mugdha jīvera nāhi svataḥ kṛṣṇa-jñāna / jīvere kṛpāya karilā kṛṣṇa veda-purāṇa

प्रह्लाद महाराज ने नृसिंहदेव से बताया था कि "हे महाराज, व्यक्तिगत रूप से मेरा कोई दुःख नहीं है, क्योंकि जब मैं आपका कीर्तन करता हूँ, तो मैं सुखी हो जाता हूँ।"

"हे महात्मन्, तो तुमको मालूम होता है कि मैं कुछ दुखी हूँ? हाँ, ज़रूर दुखी हूँ। क्यों?"

śoce tato vimukha-cetasa indriyārtha- / māyā-sukhāya bharam udvahato vimūḍhān

"मैं इसलिए दुखी हूँ कि ये जो विमूढ़ हैं, जो आपको मानते नहीं और दुखी हैं, इन लोगों के लिए मैं दुखी हूँ कि इनको किस तरह से सिखाया जाए कि ये सुखी हों।" तो वैष्णव का अर्थ होता है—पर-दुःख-दुःखी। वो अपने लिए दुखी नहीं है, अपने लिए तो उसने भगवान को प्राप्त कर लिया है, परंतु वह दूसरों के दुःख से दुखी है। दुनिया में जो मूर्ख लोग हैं, ये भगवान को भूल करके दुःख उठा रहे हैं। दिन भर सूकर जैसा परिश्रम करते हैं दो रोटी खाने के लिए, और उसमें भी अनेक दुःख हैं। ये समझ नहीं पाते कि क्या सही जीवन है।

और शास्त्र मना करते हैं कि देखो जी, तुमको मनुष्य जीवन मिला है, सूकर-कुकुर जैसा परिश्रम करने के लिए नहीं। गधा जैसा, आजकल सब रिक्शा भी ठेलता है और ठेला भी ठेलता है, इतना परिश्रम करते हैं दो रोटी के लिए! फिर भी उनको उत्तेजित किया जाता है—"और परिश्रम करो, और परिश्रम करो!" वो घोड़ा का काम करता है, गधा का काम करता है, उसमें भी बोला जाता है—"अभी तुम्हारा परिश्रम ठीक नहीं है, और करो, और करो!" यह कोई मनुष्य जीवन है क्या? मनुष्य जीवन होना चाहिए कि आराम से जो भगवान ने खाने को दिया है, उसे खाए। भगवान ने बहुत खाने को दिया है, भगवान के पास खाने की कमी नहीं है। शास्त्र में कहते हैं: nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām eko bahūnāṁ yo vidadhāti kāmān। भगवान भी नित्य वस्तु हैं और जीव जो है, वो भी नित्य वस्तु है। na hanyate hanyamāne śarīre—भगवान भी कभी मरते नहीं, जीव भी कभी मरता नहीं। बाकी अंतर क्या है? भगवान का शरीर बदलता नहीं, हमारा शरीर बदलता है, इसलिए ऐसा मालूम होता है कि जीव मरता है। नहीं, भगवान इसलिए सिखाते हैं: na hanyate hanyamāne śarīre—ऐसा ना समझो कि शरीर नष्ट हो गया तो वह मर गया। नहीं, वह तो भगवान का अंश है—mamaivāṁśo jīva-loke। जो भगवान की quality है, जीव की भी वही quality है। जैसे सोना—एक बड़ा सोना और एक सोने का टुकड़ा, quality एक ही है। यह नहीं है कि सोने का टुकड़ा होने से वह लोहा हो गया। इसी प्रकार से जीव, जो भगवान की quality का है, वह जीवात्मा भी शुद्ध रूप से वैसा ही है, यह आप लोग समझ सकते हैं। बाकी माया के आवरण से—यह जो भौतिक आवरण है, tejo-vāri-mṛdāṁ yathā vinimayo—और मन, बुद्धि, अहंकार से जो आवृत सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर से जो आवृत हो गया है, उसका नाम है भवरोग। हाँ, उससे छुट्टी होनी चाहिए।

इसलिए भगवान आते हैं। उनका उद्देश्य है कि "तुम्हारा जो वास्तविक शरीर है, वह हमारे सच्चिदानंद विग्रह जैसा ही है। तुम क्यों इधर इतनी तकलीफ़ उठाते हो? तुम हमारे पास आओ, तुम हमारे पुत्र हो।" जैसे एक धनी आदमी है, उसका पुत्र पागल हो गया, तो बाप चाहता है कि पागल को किस तरह से ठीक किया जाए ताकि वह घर में आकर आराम से रहे—"हमारी तो संपत्ति बहुत है, वह अपना खाए-पिए, मज़ा करे। यह बेवकूफ ऐसा पागल हो गया, क्या किया जाए? रास्ते में घूमता है नंगा होकर और अनेक प्रकार के दुःख उठाता है।" तो पिता इसलिए बड़ा परेशान रहता है। इसी प्रकार भगवान भी परेशान हैं कि ये जो हम लोग पागल होकर इधर सुखी होना चाहते हैं। इसलिए भगवान आते हैं और आकर समझाते हैं:

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata / abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmy aham / paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām

इसलिए भगवान आते हैं। जो देवता हैं, उनकी इच्छा है कि भगवान का दर्शन हो। यह सभी इच्छा करते हैं। भक्त जो हैं, वो भगवान से "हमें दर्शन दीजिए" ऐसा हुकुम नहीं करते हैं, बाकी इच्छा तो ज़रूर रहती है। इसलिए भगवान आते हैं—paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām। भगवान के पास इतनी शक्तियाँ हैं कि वे किसी को भी चाहें, उसी वक्त विनाश कर सकते हैं, बाकी वे भक्तों के लिए आते हैं—paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām। तो भगवान जो असुर हैं, उनको कहते हैं कि "देखो जी, यह ठीक नहीं है। भगवान हैं, हम हैं।" "I am आदि, aham ādir hi devānām।" ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate / iti matvā bhajante māṁ budhā bhāva-samanvitāḥ—ये सब बातें सिखाते हैं।

तो ये जो असुर लोग कहते हैं कि "भगवान हैं नहीं", उनको सिखाते हैं भगवान—"नहीं, मैं हूँ। देखो, यह हूँ मैं भगवान।" premāñjana-cchurita-bhakti-vilocanena—दर्शन करो। और फिर sarva-dharmān parityajya—यह जो आसुरिक धर्म तुमने स्वीकार किया है, जिससे जन्म-जन्मांतर केवल दुःख उठाते हो। अभी तो मनुष्य जीवन मिला है, तभी कुछ सुख है, और इस जन्म के बाद तुम्हारा एक पेड़ का जन्म हो जाएगा या जानवर का जन्म हो जाएगा, तो कितना दुःख उठाओगे! यह सब सोचो। सोच करके sarva-dharmān parityajya—यह सब तुमने जो plan बनाया है, इस सब से कुछ काम होगा नहीं। mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja / ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ—मैं तुमने जितना भी पाप किया है, उसके भोग से तुम सबका उद्धार करूँगा। इसलिए भगवान कृष्णचंद्र आते हैं और हमको समझाते हैं। और भगवत-भक्ति क्या है, भगवान क्या चीज़ हैं, उसको समझाने के लिए इस सातवें अध्याय में भगवान बताते हैं: mayy āsakta-manāḥ pārtha।

जो असुर होते हैं, उनकी बात छोड़ दीजिए। जिज्ञासु, आर्त, अर्थार्थी—ज़्यादातर गृहस्थ लोग होते हैं, क्योंकि गृहस्थ आश्रम में बहुत दुःख है—"आज धन नहीं है, आज यह नहीं है, आज वह नहीं है।" जो है, उससे और चाहिए, और चाहिए—उसका नाम है अर्थार्थी। और आर्त होते हैं—धन कम हो गया तो दुखी होते हैं, काम नहीं चलता है। ये गृहस्थ लोग हैं। और सन्यासी लोग जिज्ञासु और ज्ञानी होते हैं। तो चार प्रकार के व्यक्ति—ज्ञानी, जिज्ञासु, आर्त और अर्थार्थी—catur-vidhā bhajante māṁ। तो ज्ञानी और जिज्ञासु भगवान क्या चीज़ हैं, उसको समझना चाहते हैं। बड़े-बड़े दार्शनिक, विचारक हैं ना, वो लोग भगवान को एकदम उड़ा नहीं देते। नास्तिक जो हैं, वो उड़ा देते हैं कि "भगवान हैं ही नहीं"—वो तो महापापी हो गए। और जो पापी नहीं हैं, सुकृतिन हैं, वो जिज्ञासु होते हैं—"वास्तविक भगवान हैं क्या कुछ? हाँ, ज़रूर होंगे। मालूम तो पड़ता है कि भगवान कैसे काम करते हैं।" Professor Einstein ने भी स्वीकार किया था कि "हम जितना आगे बढ़ रहे हैं, हम देख रहे हैं कि भगवान ज़रूर हैं।"
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥