दुनिया असत्य है। हम लोगों का कहना है कि अगर ब्रह्म सत्य है, तो दुनिया असत्य कैसे होगी? वेदांत सूत्र में इस विषय में पहली चर्चा की है कि—अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। यह जो मनुष्य जीवन है, जानवर से क्या अंतर है? अंतर यही है कि कुत्ता जो है, केवल भोगता है और खाता है, पीता है, बच्चा पैदा करता है और कुछ दिन बाद मर जाता है। आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च—मनुष्य और पशु में इन चार विषयों में कोई फर्क नहीं है। कुत्ता भी खाता है, मैं भी खाता हूँ; कुत्ता भी सो जाता है, मैं भी सो जाता हूँ; कुत्ता भी बच्चा पैदा करता है, स्त्री-संभोग करता है, मैं भी करता हूँ; और कुत्ता भी भयभीत होता है दुश्मन से, और मैं भी भयभीत होता हूँ। तो क्या फर्क है? फर्क इतना ही है कि मनुष्य समाज में ब्रह्म-जिज्ञासा कर सकता है। जिज्ञासा—कि भगवान क्या चीज हैं, दुनिया किस तरह से चल रही है, इसका कोई मालिक है कि नहीं, कोई चलाने वाला है कि नहीं? यह सब विषय मनुष्य के हृदय में, ये सब प्रश्न उदय होते हैं। और कुत्ता जो है, यह सब नहीं जानता। इतना ही फर्क है, और कुछ फर्क नहीं।
इसलिए शास्त्र में बताते हैं—"जलदी तीर्थ बुद्धि सले जने गोख आत्म बुद्धि" (यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके... यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचित्... स एव गोखरः)। यह जो शरीर है, यह शरीर त्रिधातु—कफ, पित्त, वायु—आयुर्वेद के अनुसार, combination of kaph, pitta, vayu है। तो यह कफ, पित्त, वायु का एक संयोग है। इसको कोई समझ जाए कि आत्मा है—देहात्म-बुद्धि—और उसी basis पर, उसी आधार पर वह अपना काम करता है, तो उसको शास्त्र बोलता है—स एव गोखरः। 'गो' का अर्थ होता है गाय, और 'खर' का अर्थ होता है गधा। तो यह देहात्मक बुद्धि जो है, यह कोई मनुष्य की बुद्धि नहीं है। मनुष्य की बुद्धि तभी खुलती है जब वह ब्रह्म-जिज्ञासा करता है और समझता है कि "मैं यह शरीर नहीं हूँ, मैं ब्रह्म वस्तु हूँ—अहं ब्रह्मास्मि"। यह मनुष्य जीवन है। जब तक यह प्रश्न उदय नहीं होता है, जब तक यह ज्ञान नहीं होता है, तब तक वह पशु ही है।
इसलिए मनुष्य समाज में शिक्षण देने के लिए व्यवहार है। कोई जगह में जाइए, सभ्य समाज में कोई धर्म का विचार है, क्योंकि धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः। जिस समाज में धर्म की चर्चा नहीं है—धर्म क्या चीज है, भगवान क्या चीज हैं, आत्मा क्या चीज है, यह सब प्रश्न नहीं होता है—वह समाज समझ लीजिए कि वह कुत्ता-बिल्ली का ही समाज है। तो कुत्ता लोग जिस तरह से बातचीत करते हैं... तो भगवान कृष्ण खुद समझा रहे हैं, तो उनका क्या बोलना है? पहले ही कहते हैं: असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। यह जो दुनिया है, यह असत्य है—असुरों का ऐसा कहना है। आजकल बड़े-बड़े वैज्ञानिक लोग, वे अपना एक theory बताते हैं—accident, accidental theory। हाँ, असल में वे लोग विश्लेषण करके उनको समझा नहीं सकते हैं, और एक theory निकाल दिया है—accident। accident से कोई काम नहीं होता है। जगदाहुरनीश्वरम्—कोई हेतु है नहीं, ऐसा कुछ काम हो ही नहीं सकता। दुनिया के सब विषयों में हेतु है।
तो भगवान कहते हैं... कृष्णस्तु भगवान स्वयम्। हमारे वैदिक शास्त्र में जो भगवान का विषय समझने के लिए जो प्रयत्न किया है, उसमें यही conclusion दिया है। ब्रह्मा जी ब्रह्म-संहिता में, श्रीमद्भागवतम् और वेदादि शास्त्र में यही स्वीकार्य विषय है कि कृष्णस्तु भगवान स्वयम्। श्रीमद्भागवतम् में अनेक प्रकार के जो भगवान के अवतार हैं, उनका सब गुण और उनका कार्यक्रम, सब एक list दिया हुआ है। और आखिरी में यह सिद्धांत क्या है? कि यह जैसा list आपको बताया गया है—एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयम्। और इसके भीतर में जो नाम है 'कृष्ण', वह कृष्णस्तु भगवान स्वयम्। गोलोक के भगवान, अवतार और अवतारी। तो इसी प्रकार ब्रह्म-संहिता में है: ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥
'ईश्वर' का अर्थ होता है—जो हुकुम देने वाला है, controller। हम सभी लोग अल्प-विस्तार ईश्वर हैं। इधर हमारे Chief Minister साहब बैठे हुए हैं, हुकुम देते हैं राज्य चलाने के लिए। बाकी उनको भी कोई हुकुम देता है, यह बात नहीं है कि कोई परम हुकुम देने वाला नहीं है। इसी प्रकार आप देखिएगा, एक हुकुम देने वाला है, हुकुम देता है, और दूसरे का हुकुम मानता है। ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा जो केवल हुकुम देता है और हुकुम किसी का मानता नहीं। ऐसा नहीं हो सकता। आप ब्रह्मा तक पहुँच जाइए, खाली दुनिया में नहीं, और जो सब planets हैं, देवलोक हैं, आखिरी में ब्रह्मा जी हैं, वे भी हुकुम मानते हैं। He is the first living creature in this universe, वे भी हुकुम मानते हैं। और फिर आगे बढ़िए, ब्रह्मा जी के ऊपर विष्णु हैं, विष्णु जी के ऊपर महाविष्णु हैं, महाविष्णु के ऊपर नारायण हैं, नारायण के ऊपर संकर्षण हैं—इसी प्रकार सब शास्त्र में सब विचार है। एक-एक हुकुम देने वाला है और नीचे तो बहुत ही हैं। हम भी अपने शिष्यों के ऊपर हुकुम देते हैं, आप लोग सब अपने business में, factory में हुकुम देते हैं, घर में हुकुम देते हैं। इस हिसाब से सभी ईश्वर हैं, इसमें कोई विवाद नहीं है। ईश्वर सभी हैं। आजकल जो है, "सब भगवान हैं"—हाँ, भगवान हैं, मान लिया ईश्वर हैं। परंतु शास्त्र बोलता है कि ईश्वरः परमः कृष्णः। छोटे-मोटे हुकुम देने वाले ईश्वर सभी हैं, [गला साफ़ करने की आवाज़] उसमें कोई विवाद नहीं है। परंतु 'परमेश्वर'—परमेश्वर का अर्थ होता है जिसके ऊपर और कोई हुकुम देने वाला है नहीं। वह जो ईश्वर है, वह कृष्ण हैं—ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
और उनका विग्रह, शरीर जो है, वह सच्चिदानंद है। शास्त्र से प्रमाण लेना चाहिए—सत्, चित्, आनंद। उनका शरीर जो है, वह हमारा जैसा शरीर नहीं है। हमारा शरीर जो है, यह सच्चिदानंद नहीं है। पहली बात है, यह 'सत्' (सत्य) नहीं है; यह कुछ दिन टिकेगा—20, 50, 100 ज्यादा से ज्यादा—इसलिए असत् है, सत्य नहीं है। और 'चित्' का अर्थ होता है ज्ञान; तो ज्ञान भी नहीं है, बहुत सी चीजें हमको सीखनी हैं, अभी तक सीख रहा हूँ, तो चित् भी नहीं है, सत् भी नहीं है। और आनंद तो है ही नहीं। आनंद कैसे होगा? जब तक यह शरीर है, आपको यह जो प्राकृतिक तीन प्रकार की तकलीफें हैं—आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक—ये तो आपको सहन करनी ही पड़ेंगी। अब देखिए, इधर थोड़ा सा पंखा हिला रहा है, क्यों? तो गर्मी है, सहन नहीं होता; यह आधिदैविक है। इसी प्रकार मन से, शरीर से जो दुख होता है, उसका नाम आध्यात्मिक। दूसरे आदमी, दूसरे जानवर, दूसरे कीट-पतंग, सभी दूसरे को तकलीफ देते हैं, दूसरे को खा जाते हैं—यह जगत का नियम है, जीवो जीवस्य जीवनम्—तो उसका नाम है आधिभौतिक। और ऊपर वाले देवता लोग तकलीफ देते हैं—कभी अनावृष्टि हुई, कभी भूकंप हो गया, कभी epidemic हो गया—इसमें हमारा कोई हाथ नहीं है। ये हर एक प्रकार के, जब तक यह शरीर है, ये तीन प्रकार के ताप—इसको कहते हैं त्रिताप—तीन प्रकार के जो ताप हैं, इनको आपको भोगना ही पड़ेगा। तो आनंद कहाँ है? यह जो शरीर है, सत् भी नहीं है, ज्ञानमय भी नहीं है और आनंदमय भी नहीं है।
और भगवान का शरीर क्या है? सच्चिदानन्दविग्रहः। इसलिए शास्त्र में जहाँ बताया गया है 'निराकार', निराकार का अर्थ यह नहीं कि उनका आकार नहीं है, यह बात नहीं है। आकार जरूर है, बाकी वह आकार ऐसा आकार नहीं है जैसा हमारा आकार है, आपका आकार है; वह आकार नहीं। विग्रह—विग्रह का अर्थ होता है मूर्तिमान। हाँ, भगवान की मूर्ति है। "नहीं, सब भगवान परम पिता हैं, हमारा... हम जो हैं, हमारे पिता की मूर्ति है, as a person, I am also a person." अब पिता का पिता, पिता का पिता और आगे जाइए, ब्रह्मा जी, उनके ऊपर जाइए, उनके ऊपर परम पिता हैं, उनका शरीर नहीं है—यह कौन सी युक्ति है? हाँ, जरूर है। जैसे आपने अपने परदादा को देखा नहीं; बाप का बाप, उसका बाप, उसका बाप... तो इसका मतलब निराकार है? कोई परदादा थे, उनको निराकार कहना कि आपका आकार है और उनका नहीं, तो भगवान वह निराकार नहीं हैं। निराकार इसलिए हैं कि हमारे जैसा आकार नहीं है, उनके आकार हैं—सच्चिदानन्दविग्रहः।
इसलिए शास्त्र में कहते हैं—ईश्वरः परमः कृष्णः। उस कृष्ण को साधारण ऐसा मनुष्य न समझा जाए। इसलिए भगवान ने मना किया है: अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। क्योंकि मैं मनुष्य जैसा एक शरीर धारण करके लोगों के उपकार के लिए मैं आता हूँ, जो गधे होते हैं—मूढ़। 'मूढ़' का अर्थ होता है गधा। वे हमको मनुष्य समझते हैं—अवजानन्ति मां मूढा। गधे को क्यों उपमा दी है? तो गधे का हिसाब-किताब ठीक नहीं है, इसलिए उसको गधा बोला जाता है। जैसे गधा धोबी के घर में रहता है, वह सवेरे तीन टन कपड़े उसकी पीठ पर लाद देता है, वह घाट में ले जाता है, और उधर थोड़ा घास देता है, और वह दिन भर में घास खाता है, फिर शाम को तीन टन कपड़ा ले आता है। तो उसको गधा क्यों कहा जाता है? वह देखता नहीं कि "घास तो हमको सब जगह मिल सकती है, इस धोबी के घर में मैं क्यों इतना कपड़ा लाता हूँ? यह कपड़ा भी हमारा नहीं है।" उसका नाम है गधा। गधा जो समझता नहीं कि हमारा दुनिया में interest क्या है, और दिन भर हम परिश्रम कर रहे हैं, किसलिए मैं परिश्रम कर रहा हूँ, क्या हमारा उद्देश्य है—यह जो समझता नहीं, केवल परिश्रम करता है, उसका नाम है गधा।
तो इसलिए शास्त्र में कहते हैं—मूढ़। और एक जगह में भगवान... बहुत जगह 'मूढ़' शब्द का व्यवहार किया है। और एक जगह कहते हैं: न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ जो गधे लोग, आसुरी भाव वाले... असुर का विचार यह 16th Chapter में किया जाता है, तो उसका क्या लक्षण है? कहते हैं—न मां प्रपद्यन्ते—भगवान को स्वीकार नहीं करते, यह पहले उनका qualification है। भगवान क्या हैं? न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते। क्यों? मूढ़, नराधम। 'नराधम' का अर्थ होता है नर जैसा हम लोग मनुष्य हैं, यह नर। तो मनुष्य जीवन में भगवान को चाहे तो समझ सकता है, उनका यह facility है। इतना ही फर्क है जानवर से और मनुष्य से। मनुष्य अगर चाहे—ब्रह्म-जिज्ञासा—वह अगर जिज्ञासा करे कि ब्रह्म वस्तु क्या है, भगवान क्या हैं... यह सब शास्त्र हैं। क्यों शास्त्र? शास्त्र किसलिए बनाया? यह भगवत गीता, श्रीमद्भागवतम्, चैतन्य चरितामृत, वेद, पुराण—अनेक प्रकार के शास्त्र हैं। यह हमारे भारतवर्ष की संपत्ति है।
इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने बताया है:
भारत-भूमिटे मनुष्य-जन्म हइल यार।
जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार॥
जिसका भारत भूमि में जन्म हुआ है, बड़े पुण्य से होता है, साधारण नहीं है। हम तो देख रहे हैं सारा दुनिया में घूम करके, अभी तक इतने पतित हम लोग हो गए हैं, तब भी भारतवर्ष का जो culture है, सबसे ऊँचा है। यह हमारा practical experience है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने बताया है—भारत-भूमिटे मनुष्य-जन्म हइल यार, जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार। यह चैतन्य महाप्रभु का mission है। यह जो चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति आप लोग देख रहे हैं, इनका यही mission है। जो भारतवासी जो हैं, यह भारत भूमि में जिसका मनुष्य जन्म हुआ है—गधा नहीं—उसके लिए कार्य है कि अपना जीवन सार्थक करो। क्योंकि इधर सब शास्त्र हैं—वेद, पुराण, वेदांत, रामायण, महाभारत, भगवत गीता। अनेक शास्त्र हैं, उपनिषद हैं, 108 अष्टादश पुराण हैं, रामायण है, महाभारत है, भगवत गीता है। इसको सब पढ़ के, सुन-सुन के जीवन सार्थक कीजिए। हमको बाहर में क्या सीखना है?
एक जगह में चैतन्य चरितामृत में बताया है कि:
अनादि-बहिर्मुख जीव कृष्ण भूलि' गेला।
अतएव कृष्ण वेदे-पुराणे करिला॥
यह जो जीव भगवान को भूल गया है, कब भूल गया उसका history पता नहीं चलता, बाकी भूल गया है। अनादि—अनादि का अर्थ होता है जब से सृष्टि हुई है, उससे भी पहले। अनादि जीव कृष्ण को भूल गया, भगवान को भूल गया। और भगवान को भूल गया, उसको याद दिलाना चाहिए, उसको समझाना चाहिए, इसलिए अतएव कृष्ण वेदे-पुराणे करिला। तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि आपको जो भारतवर्ष में जन्म मिला है, ये सब चीजें पढ़ के, सुन के... पढ़ना भी नहीं होगा, सुनने से भी काम चलेगा। जैसा आप लोग सुन रहे हैं और हम लोग सुना रहे हैं—श्रवणं कीर्तनं विष्णोः—यह भक्ति है। कुछ व्यक्ति तो श्रवण करते हैं और कुछ व्यक्ति बोलते हैं। तो बोलने वाला और सुनने वाला, दोनों का फायदा है। शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः—सुनने वाले का भी पुण्य होगा और बोलने वाले का भी पुण्य होगा, ऐसी चीज है। इसलिए अभी तक इतने गिरे हुए होते हुए भी, भारतवर्ष में कहीं हम लोग यह festival मनाते हैं, तो 10, 20, 25, 30 हजार सब आदमी आते हैं। क्योंकि उसके खून-खून में है, भारतवर्ष में इस पुण्य भूमि में जन्म होने के कारण उसके भगवत-भक्ति खून-खून में है, उसको जगाना चाहिए। और यह चैतन्य महाप्रभु का mission है—भारत-भूमिटे मनुष्य-जन्म हइल यार—तो सबके लिए है। यह नहीं है कि एक भक्तिवेदांत स्वामी बाहर जाकर परोपकार करे, आप लोग सब जाइए, इसके customer बहुत हैं, सब आग्रह से लेंगे। ये जो European, American सब बालक लोग हमारे साथ घूम रहे हैं, इनको हमने कुछ घूस नहीं दिया। यह जो हमारा नौकर-चाकर जैसा काम करते हैं, कुछ उनको मिला है तभी तो हमारे साथ हैं, नहीं तो हमसे उनका क्या लेना-देना? एक तो इंडिया हम लोग poor country हैं, हम तो संन्यासी हैं, हमारे पास पैसे नहीं हैं। वो लोग अब समझ रहे हैं कि यदि कोई वस्तु है, तो भारतवर्ष में है, यह बात सही है।
इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भारतवर्ष से दूसरे और-और country का ऐसा सीखना नहीं चाहिए कि किस तरह से और दूसरे को exploit किया, loot किया, नहीं—परोपकार। भारत-भूमिटे मनुष्य-जन्म हइल यार, जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार। पहले अपना जन्म सार्थक कीजिए, ये सब शास्त्र पढ़िए। जब आपने हृदयंगम कर लिया, तभी तो परोपकार करेंगे। जब आपके पास कुछ है ही नहीं, तो परोपकार क्या करेंगे? इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भारत-भूमिटे मनुष्य-जन्म हइल यार, जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार।
और भी बताया है कि:
पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥
यह भी चैतन्य महाप्रभु बताए हैं—सारा दुनिया में जितने गाँव हैं और जितना शहर है, सब जगह में हमारा नाम प्रचार होगा। यह भविष्यद्वाणी है, यह हो रहा है। यह चैतन्य महाप्रभु का विषय आपने अभी अपने सामने ही देखा है कि हम लोगों ने 102 केंद्र बनाए हैं सारा दुनिया में—Europe में, America में, Australia में, और Japan में, Africa में, सब जगह में, कोई जगह छोड़ा नहीं। अकेले single-handed यह सब किया गया है। यदि आप लोग सब अपना जीवन सार्थक करके दुनिया में यह culture प्रचार करेंगे, तो देखिएगा आपके भारतवर्ष का सम्मान कितना होगा। If you love your country, if you love your culture, you should take this Krishna consciousness movement and preach all over. That is what... yes, यह चैतन्य महाप्रभु का है।
तो हमारा कहने का यही है कि don't neglect, आप इसकी अवहेलना न कीजिए, यह आप लोगों से प्रार्थना है। आप चाहे government officer हों, चाहे businessman हैं, यह जो culture है, Krishna consciousness, इसमें कोई आपको मुश्किल नहीं है। यह भी चैतन्य महाप्रभु बताए हैं। क्या बताया कि:
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश।
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—हमारी आज्ञा से आप लोग सब गुरु हो जाओ। तो कोई कहेंगे, "हम कैसे गुरु होंगे? हमारे पास तो ऐसा विद्वान... हम विद्वान भी हैं नहीं, कुछ पढ़े-सुने भी हैं नहीं, हम कैसे गुरु बनें?" तो चैतन्य महाप्रभु आश्वासन दे रहे हैं, उसमें कोई मुश्किल नहीं है। गुरु बनो इस तरह से—यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। केवल इतना ही सीख लो, ज्यादा उस्ताद नहीं, जो भगवान कृष्ण ने बताया है, उसको सुनाओ बस। हाँ, वैसे गुरु हो गए। गुरु होने में कोई मुश्किल नहीं है। यदि जो परम गुरु हैं, भगवान कृष्ण हैं, खुद आकर के समझा रहे हैं, आप क्या ज्यादा चाहते हैं कि भगवान क्या हैं? हम लोग सब सोचते हैं, अनेक प्रकार के दार्शनिक विचार करते हैं। अरे, भगवान तो खुद आकर अपने को बता रहे हैं, उनका क्यों नहीं सुनते हैं? उसमें क्यों उस्तादी करते हैं आप? जो भगवान बताते हैं, उसको मान लो। भगवान कहते हैं—मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय—मुझसे बढ़कर के और कोई परतत्व है नहीं। और भगवान जब इधर मौजूद थे, तब दिखा भी दिया है। भगवान कृष्ण से कोई भी बढ़ नहीं सका। उनके जन्म से शुरू करके, केवल असुर लोग उनको मारने के लिए तैयार थे। उनके जन्म के पहले उनके मामा जी कंस महाराज, वह हुकुम दिया नौकर को—"देखो जी, जब कृष्ण का जन्म हो, उसी वक्त बच्चे को ले आकर मार डालो।" तो वहाँ से शुरू करके, फिर अघासुर, बकासुर... कितने-कितने। आखिरी में कई भगवान की धारा... तो भगवान को कोई नहीं मार सकता। यह जो आजकल चल रहा है कि भगवान को उड़ा दो, भगवान को कैसे उड़ा देंगे? अभी सुना, कल कोई accident हो गया, 95 years की उम्र में air crash में मर गए। तो भगवान का नियम चलेगा, उसमें आप कैसे उसके ऊपर जाएँगे? यह मूढ़ता है। न जानन्ति मम परमम्—उसको मूढ़ कहा जाता है, गधा, जो भगवान को नहीं मानते। तो उसका जो लक्षण है, वह गधे लोग का, उसका लक्षण भगवान खुद बताते हैं कि असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। जो उसको... पहली बात यही है कि यह दुनिया असत्य है। "यह दुनिया असत्य है और केवल मैं सत्य हूँ, मैं जो बोल रहा हूँ वही सत्य है और सब असत्य है।" नहीं, दुनिया असत्य नहीं है, सत्य है। यदि दुनिया असत्य है और ब्रह्म सत्य है, तो ब्रह्म का अर्थ होता है—जन्माद्यस्य यतः। ब्रह्म का अर्थ होता है, वेदांत में यह सब विचार किया गया है, जहाँ से सब चीज का जन्म होता है—the original source of everything, that is Brahman. अर्थात ब्रह्म-जिज्ञासा—कि ब्रह्म क्या वस्तु है? ना, जन्माद्यस्य यतः—जहाँ से... यह भागवत पहले इसी सूत्र से शुरू होता है—जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्। यह सब विचार किया गया है कि जो original source, जो मुख्य source है, उत्स है, वह क्या चीज है? तो उसमें वह कोई जड़ वस्तु है कि जीवंत वस्तु, यह सब विचार किया है। तो विचार करके निश्चित क्या किया है? नहीं, अभिज्ञः—जड़ वस्तु नहीं, अभिज्ञ, ज्ञानी। नहीं तो कैसे सृष्टि करेंगे? जन्माद्यस्य यतोऽन्वयात्—उसको सब चीज मालूम होना चाहिए। जैसे कोई engineer है, एक बड़ा भारी पुल बनाया है, उसको सब मालूम है। वह office में बैठे हुए हैं, बाकी जानते हैं कहाँ-कहाँ एक-एक screw लगा है, वह सब जानते हैं। इसलिए शास्त्र में कहते हैं—अन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्। हमारा शरीर है, मैं कहता हूँ हमारा शरीर, हम कुछ नहीं जानते हैं इस शरीर का। हम खाते हैं, किस तरह से अन्न पेट में जाता है, किस तरह से वह खून बनता है, किस तरह से मल बनता है, मूत्र बनता है, फिर किस तरह से heart में जाता है, कुछ नहीं जानते, बस खा ही लेते हैं। डॉक्टर लोग कुछ-कुछ जानते हैं, वह भी अभिज्ञ नहीं हैं, संपूर्ण नहीं हैं। परंतु जो भगवान हैं, जिन्होंने कि दुनिया को सृजन किया है, वह अन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः—वह अन्वय भाव से, व्यतिरेक भाव से सब कुछ जानते हैं, उनका नाम है भगवान।
तो यह सब विचार है। तो जो मूर्ख लोग होते हैं, वे कहते हैं—असत्यम्। इतना भारी दुनिया जिसने बनाया है... हम लोग एक मकान बनाते हैं, थोड़ा सा एक मकान समझिए, खूब अच्छी तरह से बनाया। कोई friend आकर कहता है, "हाँ जी, तुम बड़ा अच्छा मकान बनाया," तो हम बड़े खुश हो जाते हैं। और कोई आकर कह दे, "अजी, तू मकान बनाया है, यह सब असत्य है," तो हम derange हो जाएँगे—"हम इतना पैसा खर्च किया, इतना मेहनत किया, और यह बोलता है असत्य!" तो क्यों असत्य? जो भगवान को मानता नहीं, जो भगवान को समझता नहीं, वह बोलेगा दुनिया असत्य है। असत्य नहीं है, इसमें कितनी कारीगरी है! जो समझदार है, वह देख सकता है कि किस तरह से सूर्योदय होता है, किस तरह से चंद्रोदय होता है, और किस तरह से समुद्र है, भूमि, वायु, अग्नि, मन—यह सब कार्य भगवान ने बनाए हैं। यह सब असत्य है? और भगवान... अगर ब्रह्म सत्य है, तो ब्रह्म से असत्य कैसे निकलेगा? हाँ, असत्य यही है कि हम जो कहते हैं कि "भगवान नहीं हैं" या "अपने आप बन गया है", वह चीज असत्य है। नहीं तो भगवान हैं, भगवान की कारीगरी इसमें है। यह जो समझता है, वह जरूर आदर करेगा। यह नहीं कहना चाहिए, यह असुर लोग कहते हैं—असत्यम्—यह false है। हम लोग false नहीं कहते हैं। दो विचार हैं—एक मायावादी विचार और एक वैष्णव विचार। मायावादी लोग कहते हैं कि दुनिया... ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या—जगत मिथ्या है। नहीं, मिथ्या तो भगवान भी नहीं कहते हैं। असत्यम् कौन कहते हैं? वे असुर लोग कहते हैं—असत्य। भगवान खुद कहते हैं: भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ "यह हमारी प्रकृति है, हमारी energy है, मैंने इसको सृजन किया है।" तो असत्य कैसे होगा? उससे कुछ मतलब है। भगवान... यह जो भौतिक जगत बनाने वाले हैं, इसमें भूमि चाहिए, और पानी भी चाहिए, और जमीन भी चाहिए, आग भी चाहिए, हवा, वायु भी चाहिए, सब चीज चाहिए। यह सब भगवान कहते हैं—प्रकृतिरष्टधा—यह आठ प्रकार की प्रकृति है, यह हमारी energy से यह बनी हुई है। और फिर भी बताते हैं: अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ "यह जो आठ प्रकार की प्रकृति है, यह अपरा—निकृष्ट है। इससे और एक आगे बढ़ी हुई प्रकृति है—अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्—और एक परा प्रकृति है।" वह क्या चीज है? जीवभूताम्—वह जीवात्मा, जैसे हम लोग हैं। जड़ से हमसे फर्क है, क्योंकि एक जड़ वस्तु जो है, उसके ऊपर हमारा control है। हम कहीं से ईंट ले आते हैं, पत्थर ले आते हैं, लकड़ी ले आते हैं और उसका सब सुंदर एक मकान बना लेते हैं। तो मैं भी एक प्रकृति हूँ और यह जड़ भी एक प्रकृति है। परंतु मैं जो जीवात्मा हूँ, यह परा प्रकृति हूँ। यह भगवान अच्छी तरह से समझाते हैं। अपरा—यह अपरा निकृष्ट है, और यह जो प्रकृति है... तो हम लोग प्रकृति हैं, पुरुष नहीं हैं। पुरुष तो भगवान हैं, एकमात्र पुरुष। पुरुषं शाश्वतम्—जैसे अर्जुन भगवत गीता सुन करके स्वीकार किया: परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥ "आप जो हैं, आप पुरुष हैं और सब प्रकृति हैं।" 'प्रकृति' का अर्थ होता है भोग्या, और 'पुरुष' का अर्थ होता है भोक्ता। भगवान खुद कहते हैं: भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ हम लोग सब शांति चाहते हैं, बाकी शांति मिलने का जो रास्ता है, वह हम लोग नहीं... वह भगवान खुद बताते हैं कि "आप शांति चाहते हैं, यही शांति का पथ है।" क्या? कि भोक्ता जो है, पुरुष, वह भगवान हैं—भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्—"और मैं सब लोक का मालिक हूँ।" यह जो हम लोग मालिक बनते हैं, यह false है, यह सत्य नहीं है। जो भगवान बोलता है कि "मैं मालिक हूँ।" हम लोग आते हैं, समझ लीजिए हम लोग Indian हैं, हम समझते हैं इंडिया हमारा है। कितना दिन तक इंडिया हमारा रहेगा? जब तक यह शरीर है। बस, शरीर खत्म हो गया कि इंडिया खत्म हो गया, इंडिया तो रह गया। हमने Paris में एक park में देखा था—Napoleon and France. Equalizing... हम देख... हमको पूछा, "जब फ्रांस मौजूद था, नेपोलियन किधर चला गया?" तो कोई जवाब नहीं। हाँ, यह सब चल रहा है। इसलिए जो भगवान जो बोलते हैं कि भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्—भगवान की मालिकाना तो रह जाती है, और हम आते हैं दो-चार, दस रोज, बीस रोज... नहीं, दस बरस, बीस बरस, पचास वर्ष, सौ बरस। नहीं, millions of years ब्रह्मा जी रहते हैं, millions of years, इसका मतलब वह मालिक नहीं हैं, मालिक तो भगवान हैं। हम लोग आते हैं, धर्मशाला में आया, दो-चार दिन ठहरा, फिर चला गया, "यह धर्मशाला हमारा हो गया"—अहं, यही सब भ्रम है। यही सब भ्रम दुनिया में चल रहा है। सब भगवान का है—ईशावास्यमिदं सर्वम्—सब कुछ भगवान का है। यह sense जगाना चाहिए, इसका नाम है Krishna Consciousness Movement। इसके लिए हम लोग थोड़ा प्रयास कर रहे हैं। आपसे निवेदन है, यह भारतीय culture है, आप लोग सब join कीजिए। यह कोई sentimental नहीं है, केवल बोलने वाली बात नहीं है, शास्त्र-प्रमाण है। हम लोगों ने 84 किताबें लिख कर आपके सामने हाजिर की हैं। शास्त्र से पढ़िए, विज्ञान से पढ़िए और इस movement को अच्छी तरह से seriously लीजिए। और चैतन्य महाप्रभु जैसे बता रहे हैं कि भारत-भूमिटे मनुष्य-जन्म हइल यार... हम लोग जाते हैं परदेश में भीख मांगने के लिए। क्यों भीख माँगें? आप कुछ दीजिए, आपके पास चीज है, क्यों आप भीख मांगने जाते हैं? "आपन धन बिलाये भीख मागे परे"—अपना धन तो लुटा दिया और दूसरे के पास भीख माँगते हैं, यह उचित नहीं है। यह Krishna Consciousness Movement बताता है कि आपके पास चीज है, वह चीज आप लीजिए, अपना जीवन सार्थक कीजिए और दुनिया में दीजिए, परोपकार कीजिए।
Thank you very much. Jaya Srila Prabhupada.
आयोजक: गुरु जी के भाषण के बाद किसी भी भाई या बहन को उसमें कोई शंका है, तो वह यहाँ आगे आकर, जो बोले हैं सिर्फ उसी के ऊपर में, आगे यहाँ आकर प्रश्न पूछ सकते हैं। लेकिन प्रश्न उसी के ऊपर में होना चाहिए जो वे बोले हैं, जिसको समझ नहीं है। उनके लिए दो मिनट हैं, कोई भी व्यक्ति आगे आकर प्रश्न पूछ सकता है। तो इसका मतलब कि आप लोग सब सहमत हैं जैसे वे बोले हैं उनके मुताबिक। तो अभी आरती होगी, तो आप लोग सब आरती में, जैसे संकीर्तन होगा, उसमें आप लोग भी भाग लें और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करें। और उसके बाद में आप लोगों को बहुत सुंदर चित्र दिखाए जाएँगे, जैसे गुरु महाराज जी ने बताया कि हरे कृष्णा जो है बाहर के मुल्कों में... और आगे चतुर्वेदी साहब ने भी बताया था, और अब भी आपको चित्रों में स्पष्ट करके दिखाएँगे बाहर के मुल्कों में लोग इसको कैसे अपना रहे हैं और क्यों अपना रहे हैं और कहाँ-कहाँ... आरती होगी, आप सब भाग... ऐसे बैठे रहना। हरे कृष्णा।
Questioner: Come... not quite clear as such as Saccidananda, Nityananda has form or not?
Srila Prabhupada: Yes, form. Just like you have got form—asat, acit, nirananda—its opposite is also a form, saccidānanda. That when you come to understand, then you know it. It cannot be explained in one minute. It requires some education and some understanding. But, but you have to accept the statement of the shastra that vigraha, saccidānanda. Just like you know that "I have got mind" and "you have got mind". Can you see my mind? No, you cannot see it. But you can... person... I got mind, you have mind. I got intelligence, you have intelligence. But what is that intelligence? Can you see? Something cannot be seen, but it can be perceived. Therefore, our knowledge is acquired by perceiving. Vedas mean shruti—you have to hear and perceive. You cannot see at the present. You have not the eye to...
Questioner: Can I not say light of consciousness?
Srila Prabhupada: Whatever may be. Just like I am already giving the... the gross thing you can see. Yes, consciousness...
आयोजक: तो ऐसे जो प्रश्न हैं, भगवत गीता में श्लोक है, प्रश्न व्यक्ति को जो प्रश्न पूछना है, वह बहुत से बहुत नम्रता से, पहले उनकी शरण में आओ और आकर बोलो कि "मैं यह नहीं जानता हूँ और मेरे ऊपर में कृपा करिए, मुझे यह बताइए।" तो तब जो है प्रश्न है, उसका उत्तर आपको मिलता है।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥