श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 98: सीता के लिये श्रीराम का खेद, ब्रह्माजी का उन्हें समझाना और उत्तरकाण्ड का शेष अंश सुनने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.98.5 
सादर्शनं पुरा सीता लङ्कां पारे महोदधे:।
ततश्चापि मयाऽऽनीता किं पुनर्वसुधातलात्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘पहली बार सीता मेरी दृष्टि से तब ओझल हुई थीं, जब वे समुद्र पार लंका गईं थीं। परन्तु जब मैं उन्हें वहाँ से भी वापस ले आया, तो फिर पृथ्वी के भीतर से उन्हें वापस लाने में क्या बड़ी बात है?’॥5॥
 
‘For the first time Sita disappeared from my sight when she went to Lanka across the sea. But when I brought her back from there also, then what is the big deal in bringing her back from within the earth?’॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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