एवं विनिश्चयं कृत्वा सम्प्रगृह्य कुशीलवौ॥ २७॥
तं जनौघं विसृज्याथ पर्णशालामुपागमत्।
तामेव शोचत: सीता सा व्यतीता च शर्वरी॥ २८॥
अनुवाद
ऐसा निश्चय करके श्री रघुनाथजी ने भीड़ को विदा किया और कुश तथा लव को साथ लेकर अपनी कुटिया में आ गए। वहाँ उन्होंने सीता का चिंतन करते हुए रात बिताई।
Having made this decision, Shri Raghunathji sent the crowd away and taking Kush and Lava with him he came to his hut. There he spent the night thinking of Sita.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टनवतितम: सर्ग: ॥ ९ ८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥