श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 94: लव-कुश द्वारा रामायण-काव्य का गान तथा श्रीराम का उसे भरी सभा में सुनना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.94.3 
प्रमाणैर्बहुभिर्बद्धां तन्त्रीलयसमन्विताम्।
बालाभ्यां राघव: श्रुत्वा कौतूहलपरोऽभवत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्र जी उन दोनों बालकों के उस मधुर गान को सुनने के लिए बहुत उत्सुक थे, जो अनेक प्रमाणों - ध्वनिभेद के उपकरणों - तीव्र, मध्यम और विलम्बित - इन तीनों की आवृत्तियों अथवा सप्तविधा स्वरों को भेदने और वीणा की ताल मिलाने की सिद्धि के लिए बनाए गए स्थानों - से बंधा हुआ था ॥3॥
 
Shri Ramchandra ji was very curious to hear that sweet song of those two children, which was tied to the numerous evidences - the instruments of sound separation - fast, middle and vilambit - the frequencies of these three or the places made for the accomplishment of distinguishing the Saptavidha swaras and matching the rhythm of the veena. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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