श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 94: लव-कुश द्वारा रामायण-काव्य का गान तथा श्रीराम का उसे भरी सभा में सुनना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.94.28 
कृतानि गुरुणास्माकमृषिणा चरितं तव।
प्रतिष्ठा जीवितं यावत् तावत् सर्वस्य वर्तते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हमारे गुरु महर्षि वाल्मीकि ने इन सबकी रचना की है। उन्होंने आपके चरित्र को महाकाव्य का रूप दिया है। आपके जीवन के सभी पहलू इसमें समाहित हैं॥28॥
 
‘Our Guru Maharshi Valmiki has created all of them. He has given your character the form of an epic. All the aspects of your life are included in it.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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