श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 94: लव-कुश द्वारा रामायण-काव्य का गान तथा श्रीराम का उसे भरी सभा में सुनना  »  श्लोक 17-19h
 
 
श्लोक  7.94.17-19h 
तत: प्रभृति सर्गांश्च यावद् विंशत्यगायताम्।
ततोऽपराह्णसमये राघव: समभाषत॥ १७॥
श्रुत्वा विंशतिसर्गांस्तान् भ्रातरं भ्रातृवत्सल:।
अष्टादश सहस्राणि सुवर्णस्य महात्मनो:॥ १८॥
प्रयच्छ शीघ्रं काकुत्स्थ यदन्यदभिकांक्षितम्।
 
 
अनुवाद
वहाँ से आगे उन्होंने बीस सर्गों तक गाया। तत्पश्चात् मध्याह्न हो गया। बीस सर्गों का गायन सुनकर भ्राता श्री रघुनाथजी ने भाई भरत से कहा - 'ककुत्स्थ! तुम इन दोनों महारथियों को शीघ्र ही अठारह हजार स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार स्वरूप दे दो। इसके अतिरिक्त यदि वे कुछ और चाहते हों, तो वह भी शीघ्र दे दो।'॥17-18 1/2॥
 
From there onwards they sang for twenty cantos. Thereafter it was afternoon. After listening to the singing of twenty cantos, the brotherly Sri Raghunath said to brother Bharata - 'Kakutstha! You should quickly give eighteen thousand gold coins to these two great boys as a reward. Apart from this, if they wish for anything else, then give that too quickly.'॥ 17-18 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd