श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 93: श्रीराम के यज्ञ में महर्षि वाल्मीकि का आगमन और उनका रामायणगान के लिये कुश और लव को आदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.93.14 
इमास्तन्त्री: सुमधुरा: स्थानं वापूर्वदर्शनम्।
मूर्च्छयित्वा सुमधुरं गायतां विगतज्वरौ॥ १४॥
 
 
अनुवाद
ये वीणा के सात तार हैं। इनसे अत्यंत मधुर ध्वनि निकलती है। ये उसमें विशिष्ट स्वरों को प्रकट करने के लिए बने स्थान हैं। इन स्वरों को गुंजित करके और इनका मिश्रण करके तुम दोनों भाइयों को मधुर स्वर में काव्य का गान करना चाहिए और पूर्णतः निश्चिन्त रहना चाहिए॥14॥
 
‘These are the seven strings of the Veena. They produce a very sweet sound. These are the places made in it to display unique notes. By making these notes resonate and mixing them, both of you brothers should sing poetry in a melodious voice and remain completely carefree.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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