श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 92: श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में दान- मान की विशेषता  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.92.17-18h 
न शक्रस्य न सोमस्य यमस्य वरुणस्य च॥ १७॥
ईदृशो दृष्टपूर्वो न एवमूचुस्तपोधना:।
 
 
अनुवाद
वहाँ आये तपस्वी ऋषिगण कहते थे कि ऐसा यज्ञ तो इन्द्र, चन्द्रमा, यम और वरुण ने भी कभी नहीं किया था।
 
The ascetic sages who came there used to say that such a yajna had never been performed even by Indra, Chandrama, Yama and Varuna. 17 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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