श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 92: श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में दान- मान की विशेषता  »  श्लोक 10-12h
 
 
श्लोक  7.92.10-12h 
ईदृशं राजसिंहस्य यज्ञप्रवरमुत्तमम्।
नान्य: शब्दोऽभवत् तत्र हयमेधे महात्मन:॥ १०॥
छन्दतो देहि देहीति यावत् तुष्यन्ति याचका:।
तावत् सर्वाणि दत्तानि क्रतुमुख्ये महात्मन:॥ ११॥
विविधानि च गौडानि खाण्डवानि तथैव च।
 
 
अनुवाद
राजाओं में सिंह के समान पराक्रमी महात्मा श्री रघुनाथजी का वह महान यज्ञ इस प्रकार उत्तम रीति से सम्पन्न होने लगा। उस अश्वमेध-यज्ञ में सर्वत्र एक ही बात सुनाई देती थी - जब तक याचक तृप्त न हो जाए, तब तक उसे उसकी इच्छानुसार सब वस्तुएँ दो, अन्य कोई बात सुनाई नहीं देती थी। इस प्रकार महात्मा श्री राम के महान यज्ञ में गुड़ और खाण्डव आदि नाना प्रकार के खाद्य पदार्थ निरन्तर तब तक दिए जाते रहे, जब तक कि दाता पूर्णतः तृप्त होकर रुक न गए। 10-11 1/2।
 
That great yajna of Mahatma Shri Raghunathji, who was as valiant as a lion among kings, began to be performed in this excellent manner. In that Ashwamedha-yajna, only one thing was heard everywhere - until the beggar is satisfied, give him all the things according to his wish, nothing else was heard. In this way, in the great yajna of Mahatma Shri Ram, various types of food items made of jaggery and Khandav etc. were continuously given until the recipients were completely satisfied and stopped. 10-11 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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