श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 90: अश्वमेध के अनुष्ठान से इला को पुरुषत्व की प्राप्ति  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  7.90.14-15h 
संवर्तस्य तु राजर्षि: शिष्य: परपुरंजय:॥ १४॥
मरुत्त इति विख्यातस्तं यज्ञं समुपाहरत्।
 
 
अनुवाद
‘संवर्तके शिष्य और शत्रु नगरको जीतनेवाले प्रसिद्ध ऋषि मरुत्तने उस यज्ञका आयोजन किया । 14 1/2॥
 
‘Marutta, the disciple of Samvarta and the famous sage who had conquered the enemy city, organized that yagya. 14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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