श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 89: बुध और इला का समागम तथा पुरुरवा की उत्पत्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.89.4 
सोमस्याहं सुदयित: सुत: सुरुचिरानने।
भजस्व मां वरारोहे भक्त्या स्निग्धेन चक्षुषा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
"सुमुखी! मैं सोमदेवता का परम प्रिय पुत्र हूँ। वररोहे! मुझ पर स्नेह और प्रेम की दृष्टि डालो और मुझे अपना लो।" ॥4॥
 
"Sumukhi! I am the most beloved son of Somdevata. Vararohe! Look at me with affection and love and adopt me." ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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