श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 89: बुध और इला का समागम तथा पुरुरवा की उत्पत्ति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  7.89.11 
भगवन् पर्वतं दुर्गं प्रविष्टोऽस्मि सहानुग:।
न च पश्यामि तत् सैन्यं क्व नु ते मामका गता:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
"प्रभो! मैं अपने सेवकों के साथ दुर्गम पर्वत पर आया था, परंतु यहाँ मुझे अपनी सेना दिखाई नहीं दे रही है। मैं नहीं जानता कि मेरे सैनिक कहाँ चले गए?"॥11॥
 
"Lord! I had come to the inaccessible mountain with my servants, but I cannot see my army here. I do not know where my soldiers have gone?"॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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