श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 86: इन्द्र के बिना जगत् में अशान्ति तथा अश्वमेध के अनुष्ठान से इन्द्र का ब्रह्महत्या से मुक्त होना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.86.8 
ते तु दृष्ट्वा सहस्राक्षमावृतं ब्रह्महत्यया।
तं पुरस्कृत्य देवेशमश्वमेधं प्रचक्रिरे॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र को ब्रह्महत्या से ग्रस्त देखकर उन्होंने उन्हीं भगवान को सामने रखकर अश्वमेध यज्ञ करना आरम्भ किया॥8॥
 
Seeing Indra obsessed with Brahmahatya, he started performing Ashwamedha Yagya by placing the same God in front of him. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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