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श्लोक 7.86.3  |
सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसंज्ञो विचेतन:।
कालं तत्रावसत् कंचिद् वेष्टमान इवोरग:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| वे लोकों की अंतिम सीमा पर शरण लेकर सर्प की भाँति लोटते रहे और कुछ समय तक वहीं अचेत और मूर्च्छित पड़े रहे॥3॥ |
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| Taking refuge at the last boundary of the worlds, He rolled like a serpent and remained lying there for some time, unconscious and senseless.॥ 3॥ |
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