श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 86: इन्द्र के बिना जगत् में अशान्ति तथा अश्वमेध के अनुष्ठान से इन्द्र का ब्रह्महत्या से मुक्त होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.86.3 
सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसंज्ञो विचेतन:।
कालं तत्रावसत् कंचिद् वेष्टमान इवोरग:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वे लोकों की अंतिम सीमा पर शरण लेकर सर्प की भाँति लोटते रहे और कुछ समय तक वहीं अचेत और मूर्च्छित पड़े रहे॥3॥
 
Taking refuge at the last boundary of the worlds, He rolled like a serpent and remained lying there for some time, unconscious and senseless.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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