श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 86: इन्द्र के बिना जगत् में अशान्ति तथा अश्वमेध के अनुष्ठान से इन्द्र का ब्रह्महत्या से मुक्त होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.86.21 
इति लक्ष्मणवाक्यमुत्तमं
नृपतिरतीव मनोहरं महात्मा।
परितोषमवाप हृष्टचेता:
स निशम्येन्द्रसमानविक्रमौजा:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण के उन उत्तम एवं अत्यन्त मनोहर वचनों को सुनकर इन्द्र के समान पराक्रमी एवं बलवान राजा श्री रामजी हृदय में अत्यन्त प्रसन्न और संतुष्ट हो गए॥21॥
 
On hearing those excellent and extremely charming words of Lakshmana, the great King Shri Ram, who was as valiant and powerful as Indra, became very pleased and satisfied in his heart. ॥ 21॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षडशीतितम: सर्ग: ॥ ८ ६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ६॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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