श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 85: भगवान् विष्णु के तेज का इन्द्र और वज्र आदि में प्रवेश, इन्द्र के वज्र से वृत्रासुर का वध तथा ब्रह्महत्याग्रस्त इन्द्र का अन्धकारमय प्रदेश में जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.85.2 
राघवेणैवमुक्तस्तु सुमित्रानन्दवर्धन:।
भूय एव कथां दिव्यां कथयामास सुव्रत:॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी के इस प्रकार आदेश देने पर उत्तम व्रत के रक्षक सुमित्रानन्दन लक्ष्मणजी पुनः उस दिव्य कथा को कहने लगे-॥2॥
 
On thus ordering Shri Ramchandraji, Sumitranandan Laxman, the guardian of the best fast, again started narrating that divine story -॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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