श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 85: भगवान् विष्णु के तेज का इन्द्र और वज्र आदि में प्रवेश, इन्द्र के वज्र से वृत्रासुर का वध तथा ब्रह्महत्याग्रस्त इन्द्र का अन्धकारमय प्रदेश में जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.85.14 
कालाग्निनेव घोरेण दीप्तेनेव महार्चिषा।
पतता वृत्रशिरसा जगत् त्रासमुपागमत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र का वह वज्र प्रलयकाल की अग्नि के समान भयंकर और तेजस्वी था। उसमें से बड़ी-बड़ी ज्वालाएँ उठ रही थीं। जब उसके प्रहार से वृत्रासुर का सिर कटकर गिर पड़ा, तब सारा संसार भयभीत हो गया॥14॥
 
‘That thunderbolt of Indra was as dreadful and radiant as the fire of doomsday. Huge flames were rising from it. When Vritraasura's head fell after being cut by its blow, the entire world became frightened.॥ 14॥
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