श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 84: लक्ष्मण का अश्वमेध यज्ञ का प्रस्ताव करते हुए इन्द्र और वृत्रासुर की कथा सुनाना, वृत्रासुर की तपस्या और इन्द्र का भगवान् विष्णु से उसके वध के लिये अनुरोध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.84.5 
विस्तीर्णो योजनशतमुच्छ्रितस्त्रिगुणं तत:।
अनुरागेण लोकांस्त्रीन् स्नेहात् पश्यति सर्वत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वह सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन ऊँचा था। वह तीनों लोकों को अपना ही मानता था और उन्हें स्नेह से देखता था॥5॥
 
‘He was a hundred yojanas wide and three hundred yojanas high. He loved all the three worlds as his own and looked at them with affection.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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